शशिजीभ्रष्टाचार का संबंध गरीबी या अमीरी से न होकर हमारी अंतहीन इच्छा, कामना, हवस फिर चाहे वह मान हो धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा, नाम हो, के इर्द-गिर्द ही पूरा भ्रष्टाचार घूमता नजर आता है। शालीनता के लहजे में आज यह शिष्टाचार का दर्जा प्राप्त कर चुका है। कुछ इसे सुविधा शुल्क भी कहते हैं। हम इच्छा पहले करते हैं, कर्म बाद में करते है और सारी की सारी ऊर्जा फल प्राप्ति पर लगाते हैं और इच्छा की रणभूमि पर अंतहीन दौड़ में जाने-अनजाने में सम्मिलित हो जाते हैं। सोचते हैं आज धन कमायेंगे कल आराम से जीवन व्यतीत होगा, जो कभी आता नहीं और अंत में केवल निराशा ही हाथ लगती है।

समझ में नहीं आता की केंद्र सरकार अब इस काम में इतनी देर क्यों कर रही है. बिना देर किये केंद्र सरकार को राज्य सरकारों को विश्वास में लेकर सदानीरा को राष्ट्रीय नाला घोषित कर देना चाहिए. गंगा की लगातार बिगड़ती सेहत और केंद्र सरकार के प्रयासों को देखते हुए आम जन को इस बात की पूरी उम्मीद है कि जल्द ही गंगा नदी नहीं रह जाएगी बल्कि मल जल ढोने वाले एक नाले के स्वरुप में आ जाएगी. गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक लगभग 2525  किलोमीटर का सफ़र तय करने वाली गंगा अपने किनारों पर बसे करोड़ों लोगों को जीवन देती है. देव संस्कृति इसी के किनारे पुष्पित पल्लवित होती है तो दुनिया का सबसे पुराना और जीवंत शहर इसी के किनारे बसा है.

अलकाशांतिदेवी आज बहुत खुश नज़र आ रही थीं, मनोहरलाल जी ने जब उनकी इस ख़ुशी का राज़ पूछा तो कहने लगीं कि आज मेरा बेटा लन्दन से वापस आ रहा है. मनोहरलाल जी चौंके और कहने लगे - 'क्यों भई, कोई फ़ोन आया है क्या?' शांतिदेवी मुस्कराईं और कहने लगीं -'आज मेरे बेटे को गए पूरा एक साल बीत गया मगर वो नहीं आया, परन्तु आज अपनी माँ का जन्मदिन वो नहीं भूल पायेगा!' यह सुन कर मनोहरलाल जी बोले- 'लगता है 65 साल की उम्र में तुम सठिया गई हो. सचमुच शांतिदेवी आज सठिया गई थीं. वह पूरे दिन इंतज़ार करती रहीं और उनका बेटा नहीं आया.

थाना सिविल लाइन्स, मेरठ में फेसबुक नामक सोशल नेटवोर्किंग साइट पर “EveryBody Draw Gando Gay Ram, Krishna and Randi Sita and all Bhagwan Photos (एवेरी बॉडी ड्रा गाँडो, गे राम कृष्ण, रंडी सीता एंड आल भगवान)” नाम से चल रहे एक ग्रुप के आपराधिक कृत्य के सम्बन्ध में फेसबुक कंपनी तथा अन्य के विरुद्ध अंतर्गत धारा 153, 153 A(1) (a), 153 A(1)(b), 153 A(1)(c), 153-B, 290, 504, 505 (1), 505 (2),506 आईपीसी तथा धारा 66 A इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी एक्ट 2000 मुक़दमा दर्ज करने हेतु आईआरडीएस सचिव डा. नूतन ठाकुर द्वारा आवेदन पत्र प्रस्तुत किया गया है.

मां, एक ऐसा शब्द जिसमें संसार का हर गूढ़ सार निहित है. मां, जिसने भगवान को भी जन्म दिया है. मां की ममता अपार है. वेद-पुराणों में भी मां की महिमा का बखान किया गया है. कहा जाता है कि पूत-कपूत भले ही हो जाए, माता कभी कुमाता नहीं होती. मां के दूध पान करने के बाद बच्चा स्वस्थ तो रहता ही है, साथ ही मां के दिल से भी जुड़ जाता है. मुझे एक फिल्म याद आती है दूध का क़र्ज़. जिसमें एक मां सांप के बच्चे को अपना दूध पिलाकर पालती है. वो सपोला भी बड़ा होकर मां के दूध का क़र्ज़ चुकाता है, लेकिन वर्तमान में जैसी स्थिति देखने में आ रही है. उसे देखकर लगता है शायद ही बच्चे अपनी मां का स्तनपान कर पाएं. मां की कोख तो पहले ही बिक चुकी थी. अब मां का दूध भी बिकेगा. यानी मां के दूध की बनेगी आइसक्रीम.

सौवीर: शाहन के शाह : सन 1776 का दौर भारत के लिए बेहद त्रासद रहा। बंगाल से लेकर उत्‍तर भारत तक के एक बडे इलाके में दुर्भिक्षु अचानक एक महामारी की तरह आ गया। पहले तो राजनीतिक अराजकता और अन्‍याय से जूझ रही जनता को यह अकाल बेहद भारी पड़ा। बडे़ पैमाने पर लोग भूख से मरने लगे। कि अचानक ही दिल्‍ली और बंगाल की बडी सत्‍ता की चुप्‍पी के खिलाफ एक महिला ने बिगुल बजाया और अपने खजाने का दरवाजा खोल दिया। हुक्‍म दिया कि राज्‍य में कोई भी मौत अब भूख से नहीं होनी चाहिए। और इसके बाद से ही भारतीय इतिहास की इस महिला को जन-सामान्‍य ने साक्षात अन्‍नपूर्णा का ओहदा दे दिया।

मौत बिकती है बोलो खरीदोगो? आइये नजर डालते हैं समाज में बिक रही उन नशीली मौतों पर जो खुले आम बेची जा रही है, ऐसी मौत जो ना किसी बन्दूक की गोली से ना किसी हादसे से होती है बल्कि जो खुद खरीदी जाती है, जिसे बेचती है सरकार वो भी डंके की चोट पर. सरकार द्वारा जनहित में जारी विज्ञापन से इसके दुष्परिणाम को बता कर लोगों को मौत के मुंह में जाने से नहीं रोका जा सकता, ये प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक ऐसे नशीले पदार्थों पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध नहीं लगा दिया जाता. हमारी सरकार के भी क्या कहने- हाल ही में गुटखा-तम्बाकू की बिक्री पर रोक लगाने की बजाय प्लास्टिक पाउच में बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. ऐसे में सरकार क्या साबित करना चाहती है ये सरकार ही जाने! चलिए बात करते है उन मौतों की जो तम्बाकू के सेवन से होती है. सरकार द्वारा इसके दुश्‍परिणामों की जानकारी एक विज्ञापन के द्वारा लोगों तक पहुंचाई जा रही है और इसका सेवन ना करने की सलाह लगातार दी जा रही है. दूसरी तरफ इसे खुले आम बेचा भी जा रहा है.

शेषजीपिछले दिनों नई दिल्ली में एक पत्रकार संगठन के कार्यक्रम में महिलाओं के प्रति समाज के रवैये के बारे में आयोजित चर्चा में शामिल होने का मौक़ा मिला. आम तौर पर महसूस किया गया कि समाज के रूप में औरतों के प्रति हमारा रुख दकियानूसी है और उसको हर हाल में बदलना होगा. इस बहस का असर यह हुआ कि बहुत सारी तस्वीरें दिमाग मे घूमने लगीं, जहां औरत को पुरुषों की तुलना में दोयम दर्जे का मना जाता रहा है. जब आरएसएस के कारसेवक अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद को ढहा रहे थे तो वहां बड़ी संख्या में पत्रकार भी मौजूद थे. आज की तरह लाइव टेलीविज़न का ज़माना नहीं था. उन दिनों सबसे ज्यादा विश्वसनीय ख़बरों का सूत्र बीबीसी को ही माना जाता था. बीबीसी के भारत संवाददाता मार्क टुली भी वहां थे.

दस साल पहले एशियाई शेरों को बसाने के नाम पर उजाड़े गए हजारों लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। हजारों परिवारों को इस बात का सबसे अधिक दुख है कि जिन शेरों के नाम पर उन्हें अपने ही गांवों से बेदखल किया गया, वहां आज तक शेर नहीं आ पाया है। केंद्र सरकार मध्य प्रदेश के श्योपुरी जिले में स्थित पालपुर कुनो में गुजरात से एशियाई शेरों को लाने के लिए दस साल पहले 28 गांवों के 6500  परिवारों को विस्थापित किया था। उस वक्त उनसे वादा किया गया था कि नए गांव में वे सभी सुविधाओं को उपलबध कराया जाएगा, जिससे वे महरुम हैं। लेकिन ऐसा हो नहीं सका।विस्थापित गांवों में से एक श्योपुर जिले के चक्र पारोंद गांव के पूर्व सरपंच सुजात सिंह कहते हैं कि सरकार ने शेरों के लिए हमें तो उजाड़ दिया लेकिन आज तक शेर नहीं ला पाई। हमारे गांव के कई टुकड़े हो गए, अब अपने ही गांव से बेदखल हो गए लेकिन हमारी तकलीफ कम होने की बजाय बढ़ती गई।

लोकेन्‍द्र भारत एक उत्सवप्रिय देश है। यहां उत्सव मनाने के लिए दिन कम पड़ जाते हैं, अब तो और भी मुसीबत है। बाजारवाद के प्रभाव से कुछ विदेशी त्योहार भी इस देश में घुस आए हैं। खैर, अपन ने तो इनका विरोध करने का शौक नहीं पाला है, अपन राम तो पहले अपनी ही चिंता कर लें तो ज्यादा बेहतर होगा। अक्सर लोगों के श्रीमुख से सुनता हूं कि अरे यार अब त्योहारों में वो मजा नहीं रहा। लगता ही नहीं दीपावली है, होली है। बहुत दु:ख होता है यह सुनकर। अब तो कुछेक मीडिया संस्थान और सामाजिक संगठन भी भारतीय त्योहारों का मजा खराब करने पर तुल गए हैं। पता नहीं इन्हें क्या मजा आता है।

जंगल, जमीन, पेड़ एवं पर्यावरण को बचाने से ही भविष्य को बचाया जा सकता है। विश्व की कई समृद्ध सभ्यता एवं समाज महज इसीलिए नष्ट हो गए क्योंकि उन्होंने पर्यावरण की उपेक्षा की। वर्तमान विकास का ढांचा प्रदूषण को बढ़ा रहा है और यह वर्तमान मानव समाज के विनाश का कारण बन सकता है। जिम्मेदार नागरिकता से ही इस आसन्न संकट को दूर किया जा सकता है। यह विचार पूर्व विदेश सचिव जगत एस मेहता ने गुरूवार को डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से आयोजित नागरिक संवाद में व्यक्त किए। विख्यात लेखक जे. डायमण्ड की पुस्तक ‘कोम्पलेक्स’ का विशद विश्लेषण करते हुए मेहता ने कहा कि 'टूस्टर आइलैण्ड' जैसी समृद्ध व विकसित सम्भयता का आज नामोनिशान नहीं बचा है। अमेरिका के मोन्टाना सहित हैनी इत्यादि स्थान हैं, वहां कुछ हिस्से समृद्ध है- कुछ एकदम खराब।

पीयूसीएल ने बरेली जेल में बंद आतंकवाद के आरोपियों के परिजनों की पुलिस द्वारा की गई पिटाई की कड़ी निन्दा की है। संगठन ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए दोषी जेल और पुलिस अधिकारियों को तत्काल निलंबित करने की भी मांग की है। पीयूसीएल के प्रदेश संगठन सचिव राजीव यादव और शहनवाज आलम ने जारी विज्ञप्ति में घटना के पीछे गहरी साजिश का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि चूंकि पुलिस रामपुर सीआरपीएफ कैम्प पर हुए कथित आतंकी हमले में गिरफ्तार लोगों के खिलाफ कोइ सुबूत कोर्ट में पेश नहीं कर पाई है, इसलिए उसने कुंठावश आरोपियों के परिजनों की, जो उनसे जेल में मिलने आये थे, आधे घंटे तक बर्बर पिटाई की। जेल में हुई इस आपराधिक घटना के दौरान बच्चों सहित कई महिलाएं बुरी तरह से घायल हुईं हैं।

: यहां नशे की गिरफ्त में हैं महिलाएं और बच्‍चे : राजस्थान के ग्रामीण अंचल में इन दिनों शराब का काफी प्रचलन बढ़ने लगा है। कई घर उजाड़ चुके तथा बड़े कांड करवाने वाला यह नशा अब महिला व बच्चों पर भी अपना रंग चढ़ाता नजर आ रहा है। आने वाली युवा पीढ़ी जो देश का भविष्य है का आकर्षण इसकी और बढ़ रहा है, वही सबसे ज्यादा इसका शिकार हो रही है। सरकारी आबकारी नीति के चलते गांव-गांव ढाणी-ढाणी में खुली शराब की दुकानों ने इसकी खरीद खरीद आसान करने के साथ युवा वर्ग को इस और आकर्षित कर लिया है। शराब की दुकानों पर खरीद के लिए कम उम्र के बच्चे भी बेझिझक पहुंच रहे है। वहीं शराब पीने के मामले में महिलाएं भी पीछे नहीं रही है।

वह है या नहीं। क्या फर्क है इनमें। एक मृगतृष्णा की तरह वह दूर नज़र तो आती है पर ज्यों ही पास जाता हूँ, न जाने कहाँ खो जाती है। फ़िर मरुस्थल के भटकते राही की तरह प्यासा ही दम तोड़ देता हूँ। यहाँ दो तरह की अनुभूतियाँ विद्यमान है। हो सकता है की बात साहित्यिक कम और दार्शनिक ज्यादा लगे, परन्तु यथार्थ से शायद ही कोई इनकार करे। स्त्री विमर्श के संदर्भ में ऐसी ही 'कनफ्यूज़्ड' अनुभूतियों से समाज ग्रसित या आक्रांत है। एक औरत ( ज़ाहिर हैं खुबसूरत सी!) की मांग में सिन्दूर का होना या न होना- फर्क है।  इस्लाम, सिख, क्रिस्चियन समुदाय में औरतों पर सिन्दूर और मंगल-सूत्र जैसे प्रतीक नहीं थोपे गये हैं। मांग भरी है तो ज़ाहिर है शादी- शुदा होगी। अगर मांग सूनी है तो भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समाज में प्रचलन के लिहाज से बात गंभीर हो जाती है, क्योकिं वह कुंवारी, विधवा या परित्यक्ता -इन तीनों में से कोई भी हो सकती है। यहाँ सिन्दूर का महत्व बड़ा ही 'प्रतीकात्मक' है। यही कारण है की युवतियाँ कुछ भी पहन लें, मंगलसूत्र नहीं पहनतीं और चेहरे पर कुछ भी लगायें, सिन्दूर तो भूले से भी नहीं लगाती।

आप अकेले है...? मन उदास रहता है...? कोई महिला दोस्त नहीं है....? किसी लड़की को दोस्त बनाना चाहते हैं..? तो देर किस बात की, नीचे लिखे फ़ोन नंबर पर किसी भी उमर के युवक और युवतिया कॉल करें. ऐसे ही तमाम विज्ञापन आपको रोज़ समाचार पत्रों में देखने को मिलेगा. दरअसल ये एक व्यापार है, जो फ़ोन काल करने वाले से उसकी बात करने के दौरान लिये गए काल चार्जेज पर चलता है, इनके द्वारा दिए गए फ़ोन नंबर पर काल करने पर आपको इंटरनेशनल/एसटीडी काल का चार्ज देना पड़ेगा. फ्रेंडशिप क्लब के नाम पर चल रहा ये व्यापार पूरी तरह फ़ोन काल पर ही  निर्भर होता है, लेकिन आज अधिकतर फ्रेंडशिप क्लब इस व्यापार को गलत दिशा में ले जा रहे हैं, जिसे एक तरह से हम टेलीफोनिक वेश्यावृति का भी नाम दे सकते हैं.

शेषजीमध्यप्रदेश में खंडवा के गवर्नमेंट कालेज के एक प्रोफेसर को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा. उसका चेहरा काला किया और उसे लात घूंसों और जूतों से मारा. जान बचाने के लिए जब वह अध्यापक भाग कर प्रिंसिपल के आफिस में छुप गया तो वहां से भी घसीट कर बाहर लाये और उसको अधमरा कर दिया. संतोष की बात यह है कि वह अभी जिंदा है वरना इसी  अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी के सदस्यों ने कुछ वर्ष पहले उज्‍जैन में एक प्रोफ़ेसर को पीट-पीट कर मार डाला था. इसमें कुछ भी नया नहीं है. एबीवीपी की मालिक संस्था आरएसएस है और वहां मतवैभिन्य के लिए कोई स्पेस नहीं होता.