: मत भूले सामाजिक जिम्मेदारी : नोएडा में रहने वाली दो बहनें जिस में से एक की मौत सुनकर रूह कांप उठी। दिल दहला देने वाली इस घटना से सारे समाज को सबक लेनी चाहिए। आज अगर अनुराधा और सोनाली के पड़ोसी ध्यान देते तो इतनी बड़ी घटना नहीं घटती। यह तो सिर्फ अभी शुरुआत हैं। क्योंकि आने वाले समय में यही होने वाला हैं कि समय अभाव के कारण आस- पड़ोस से मिलना- जुलना कम हो पाता हैं। यहां तक कि पड़ोस में कौन रह रहा है यह भी नहीं पता होता हैं। हमें इससे कोई मतलब नही हैं कि किसके यहां कौन जा रहा हैं या कौन आ रहा हैं। इससे लोगों कोई लेना-देना नहीं है यही कारण हैं कि इतने दिनों से दोनों बहन बंद थी! मगर किसी ने यह जिम्मेदारी नहीं समझी कि अन्दर कौन हैं उसकी क्या जरूरत हैं।

कौशल किशोरअन्ना हजारे द्वारा शुरू किये गये आंदोलन के आगे सरकार इतनी जल्दी घुटने टेक देगी, अन्ना अपना अनशन खत्म कर देंगे और जनता जीत जायेगी, यह सब बड़ा अविश्वसनीय सा लग रहा है। अभी तो आंदोलन अपने आरम्भिक चरण में था। लोग जाग रहे थे, जुड़ रहे थे। लोगों का अन्तर्मन करवट ले रहा था। ऐसा महसूस हो रहा था कि 1974 अपने को दोहराने जा रहा है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहें तो ‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए’ अभी तो भगीरथ प्रयास शुरू हुए थे।

मिथिलेशलोकतंत्र - जिसमें लोगों की बात हो और सिस्टम के तहत उनको जीने की आजादी हो और इसकी मूलभूत अधिकारों का हनन न हो - इस परिकल्पना के तहत हमारे पास विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका है। इसके अलावा एक और स्तंभ माना जाता है मीडिया। जिसके लिए भारतीय संविधान में एक भी शब्द बयाँ नहीं किया गया या उल्लेखित नहीं किया गया, सिर्फ हम "फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेसन" के तहत आज मीडिया को चौथा स्तम्भ मानते हैं, लेकिन हम पूछना चाहते है कि क्या यह चारों संस्थाएं पारदर्शिता और जवाबदेही के मापदंडों का पालन करते हुए काम करती हैं?

बीपीहिंदुस्तानी समझते थे कि उन्हें अंग्रेजों ने गुलाम बना रखा है और इसी भ्रम में दो सौ साल तक गुलाम बने रहे, लेकिन पढऩे-लिखने के बाद महात्मा गांधी को यह ज्ञान पैदा हुआ कि उन्हें गुलाम बना नहीं रखा है, बल्कि गुलाम बने हुए हैं। यही बात उन्होंने सब को समझायी और सबकी समझ में जैसे ही आ गयी, वैसे ही अंग्रेजों के पैर उखड़ गये। आशय यही है कि गुलामी और आजादी के बीच सिर्फ सोच का अंतर था, तभी लोकपाल विधेयक को लेकर हुए अनशन पर इस लिए हंसी आ रही है, क्यों कि यह सब चुटकुला जैसा ही प्रतीत हो रहा है। लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर अचानक होने वाले इस बवाल को लेकर कई सवाल ऐसे खड़े हैं, जो स्थिति को स्वत: ही हास्यासपद बना रहे हैं।

भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रख्यात समाजसेवी अण्णा हजारे की मुहिम का असर पूरे देश में नजर आ रहा है। जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर जहां अन्ना हजारे दिल्ली के जंतर मंतर पर आमरण अनशन कर रहे हैं। वहीं गाजीपुर में भी कई समाजसेवी अन्ना के समर्थन में आमरण अनशन कर रहे है। पूरे देश में अबतक अन्ना के साथ सिर्फ गाजीपुर के तीन सामाजिक कार्यकर्ता आमरण अनशन कर रहे है। जिनका दावा है कि मर जायेंगे लेकिन अन्ना से पहले अनशन नही तोड़ेंगे। इनके जज्बे को देख लोग इन्हें गाजीपुर का अन्ना कह रहे हैं।

कुमार सौवीर : शाहन के शाह : बात ईश्‍वर दर्शन, मोक्षमार्ग और विरक्ति की हो रही थी। भव्‍य राजसी बजड़ा कलकल बहती नदी पर धीमी गति से झूम रहा था। दो राजाओं के समान ही भव्‍य आसन पर बैठा साधु हर प्रश्‍न का अकाट्य जवाब दे रहा था। दोनों राजा उसके तर्कों के सामने नतमस्‍तक थे, कि अचानक उस नंगे साधु ने काशी नरेश की गोद में रखी तलवार उठायी और उलट-पुलट कर देखने के बाद उसे नदी की गहरी धारा में फेंक दिया। इतना होते ही भक्ति और वैराग्‍य पर चल रही चर्चा ने अचानक ही उग्र रूप धारण कर लिया। श्रद्धा से झुका काशी नरेश के सिर का पारा अब सातवें आसमान पर पहुंच गया। साथ बैठे उज्‍जैन नरेश भी क्रोधित हो उठे कि इस नंग-धडंग भिखारी की यह मजाल। गिरफ्तार करने का हुक्‍म बस होने ही वाला था कि साधु ने नदी में हाथ डाला और एक साथ दो तलवारें निकाल कर पूछा- तुम्‍हारी कौन सी है।

अजय कृष्‍ण75 साल के नौजवान अन्ना हजारे को बार बार सलाम, उनके हौसले को सलाम। भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल विधेयक लाने के लिए जन्तर मन्तर पर आमरण अनशन पर बैठे अन्ना हजारे से सैकड़ों मील दूर बनारस में रहते हुए महसूस कर रहा हूँ कि मैं और मेरे जैसे तमाम साथी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने को संकल्पित हो चुके हैं। बनारस में भी अन्ना हजारे के सर्मथन में नौजवान सड़कों पर उतर चुका है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुछ छात्र कल ही अन्ना साहब के समर्थन में अपने छात्रावास पर अनशन पर बैठे जिन्हें कुछ ही घंटों बाद वार्डेन ने जबरन उठा दिया। एक छात्र विश्वविद्यालय के सिंह द्वार स्थित मालवीय प्रतिमा के पास अनशन पर बैठ चुका है। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों ने कल ही शाम को भ्रष्टाचार के खिलाफ और अन्ना हजारे के सर्मथन में कैन्डिल मार्च निकाला।

पद्म सिंह देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की पावरफुल सीएम मायावती के पीएसओ (पर्सनल सिक्योरिटी आफिसर) हैं, इस परिचय से शायद आप पद्म सिंह को पहचान न पाएं। लेकिन कुछ दिन पहले आपने मीडिया के माध्यम से एक पुलिस आफिसर को सीएम मायावती के जूते साफ करते देखा होगा। ये कारनामा करने वाले अफसर पद्म सिंह ही थे। विपक्षी दलों ने सीएम के इस कृत्य को सामंतवाद की संज्ञा दी और खूब हो-हल्ला मचाया। सरकारी नुमांइदों ने सुरक्षा का वास्ता देकर पद्म सिंह के कृत्य को जायज ठहराया। दो-चार दिन की चर्चा और तकरार के बाद मामला रफा-दफा हो गया लेकिन पद्म सिंह ने जो कुछ भी किया वो अपने पीछे कई अनुत्तरित प्रश्‍न जरूर छोड़ गया।

देश में साक्षरता अभियान चलाने से क्या आज एक गरीब और माध्यम वर्गीय परिवार अपने बच्चों के उज्ज्‍वल भविष्य के लिये निश्चिन्‍त हो सकता है? ये एक ऐसा सवाल है जिसे ले कर तमाम ऐसे परिवार चिंतित हैं जो या तो गरीब हैं या फिर एक मध्यम श्रेणी से ताल्लुक रखते हैं. अपने बच्चों के उज्ज्‍वल भविष्य की राह देख रहे अधिकांश परिवार आज चिंतित अवस्था में देखे जा सकते हैं, वो भी सिर्फ इसलिए कि वो अपने बच्चों को एक अच्छे स्कूल में पढ़ाने में असमर्थ हैं. स्कूलों की आसमान छूती फीस एक मध्यम परिवार और गरीब परिवार के बच्चों को बुलंदियों तक जाने से रोकने का का काम कर रही हैं. इन सब से बेखबर हमारी सरकार इन पर कोई शिकंजा कसने के बजाय चीर निंद्रा में सो रही है.

पंकज झाआपातकाल के समय बीस महीने जेल में रहे एक संपादक की टिप्पणी काबिलेगौर है. बहुत क्षुब्ध होकर वो कहते हैं ‘जेपी के सम्पूर्ण क्रान्ति के समय की तुलना में आज के हालात के हालात कहीं बुरे हैं, लेकिन जनता में किसी भी तरह का कोई सुगबुगाहट न होना देश के भविष्य प्रति गहरा नैराश्य भरता है.’  लेकिन श्‍मशानी सन्नाटे के इस ज़माने में अपने ही दीन-दुनिया और क्रिकेट में मस्त निस्तब्ध इस समय में अन्ना साहब के अनशन ने वास्तव में एक बिगुल बजाया है कुम्भ्करणों को जगाने के लिए. लेकिन यहां भी आशा के साथ आशंकायें भी कम नहीं है. एक विशुद्ध गैर-राजनीतिक आंदोलन से नेताओं को दूर रखने की बात तो समझ में आती है लेकिन क्या इससे समस्या का समाधान हो जाएगा?

अमिताभ ठाकुरआज सुबह से ही मुझे बधाइयों का तांता लगा हुआ है. बल्कि सुबह क्यों, रात ग्यारह बजे के बाद से ही मुझे कई सारी बधाइयां मिल चुकी हैं. पहला एसएमएस मिलने के बहुत पहले मैं समझ चुका था कि भारतीय क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप जीत चुकी है. मैं मैच तो नहीं देखता और चुपचाप अपने कमरे में बैठा जेफेरी आर्चर की पुरानी मशहूर किताब “शैल वी टेल द प्रेसिडेंट” पढ़ रहा था, पर मोहल्ले वाले भला हम जैसे लोगों को इस “ऐतिहासिक” और “महान” घटना से अनजान कैसे रख सकते थे. ग्यारह बजे से शायद कुछ पहले ही अचानक पूरे मोहल्ले में पटाखों का शोर मचने लगा, ताबड़-तोड़ पटाखे चलने की आवाजें और साथ ही हर्ष-ध्वनि के स्वर पूरे इलाके में गूँज गए.

121 करोड़ भारतीयों के देश में 72 साल के समाजसेवी अन्ना हजारे ने जो बिगुल बजाया है इसे भारतीय लोकंतत्र के लिए एक अच्छी पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। देश के 66 फीसदी लोग मानते हैं कि देश में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। हजारे ने राजनीतिज्ञों की चूलें हिला दी और केंद्र सरकार भी सकते में है। बड़े भ्रष्टचार के आरोपों में कई दिग्गज राजनीतिज्ञ और अफसरशाह शिकंजे में हैं लिहाजा ऐसे में अन्ना हजारे के आंदोललन व्‍यवस्था को हिलाने का मादा रखता है। ऐसी स्थिति में यदि आजादी के बाद यह आंदोलन जन आंदोलन बन कर आजादी की दूसरी लड़ाई बनता है तो इसके नतीजे राजनीतिज्ञों को भले ही रास न आए लेकिन देश बिगड़ती व्‍यवस्था को पटरी पर लाने में यी मददगार साबित हो सकता है।

मंजू मनुपुलिस शब्द कान में पड़ते ही एक अजीब सी बेचैनी होने लगती है और तब तो हवा ही खराब हो जाती है, जब पता चले कि पुलिस हमें ही खोज रही है! मन में डर और आशंका के बीज उग आते हैं बिना किसी गुनाह में भागीदार रहे हुए भी अपने आप को पुलिस के चंगुल से बचाने की जुगत किसी राजनेता या वकील तक खींच ले जाती है. बड़ी अजब बात है तस्बीर का एक पहलू यह भी है कि अगर आज पुलिस थाने हटा लिए जाये तो समाज में अराजकता फैल जाएगी, लोगों का जीना और रहना, चलना दूभर हो जाएगा तब क्यों पुलिस "हौउआ" बनी है?

अन्ना नहीं यह आंधी हैं, देश का दूसरा गांधी है। यह नारा गोरखपुर ही नहीं पूरे पूर्वांचल के गली, चौराहों, कस्बों, नगरों में ही नहीं गांवों तक में गूंज रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्त्ता अन्ना हजारे का छेड़ा गया आंदोलन जन आंदोलन की रूप ले चुका है। इमरजेंसी के बाद संभवतः भ्रष्टाचार के खिलाफ यह दूसरी बड़ी जनक्राति होगी, जो किसी दल के सहयोग के बिना गांधीवादी तरीके से लड़ी जा रहा है। पूरे देश को जकड़ चुके भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने और कल के सुनहरे भारत के लिए आज का युवा छटपटा रहा था पर उसे कोई सक्षम नेतृत्व नहीं मिल रहा था, अन्ना हजारे के रूप में युवाओं को दूसरा गांधी मिल चुका है और युवा हजारे के अनशन को यूं ही बेकार नही जाने देंगे। गोरखपुर में पिछले तीन दिनों से अन्ना के अनशन को समर्थन देकर उनकी हौसला आफजाई करने की होड़ सी लगी हुई है।

‘अकेले ही चले थे जानिबे मंजिल मगर, लोग आते गए कारवां बनता गया।’ ये पंक्तियां दो वर्ष पूर्व भ्रूण परीक्षण व कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ बिगुल फूंकने वाली डॉक्टर मीतू खुराना पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। अपने साथ हुए अत्याचार को हथियार बनाकर अकेले ही कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ मुहिम शुरू करने वाली दिल्ली की इस महिला डॉक्टर के साथ आज देश विदेश की हजारों महिलाएं जुड़ी हैं। और इसके खिलाफ लोगों में अलख जगा रही हैं। हालांकि सबकुछ इतना आसान नहीं था। शुरू में उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन डॉ. मीतू खुराना ने हार नहीं मानी।

अंकुरकल रात एक पत्रकार मित्र का फोन आया। बेहद हड़बड़ाये हुए थे। पत्रकारिता की भाषा में कहें तो पूरे पगलाये हुए थे। फोन उठाते ही दुआ सलाम के बिना ही बोले कि “अंकुर बाबू कल जंतर मंतर चलना है। अन्ना हजारे हमारे जैसे लोगों के लिए अनशन पर बैठे हैं। हमें उनका समर्थन जरूर देना होगा। गोली मारो पत्रकारिता को और आओं अब समाज सेवा करते हैं।” चूंकि मित्र हमसे उम्र में बड़े थे इसलिए फोन पर तो उन्हें हां कहने के अलावा कुछ नहीं कह पाया, लेकिन फोन रखते हुए उन्हें मन ही मन जमकर गालियां दी। सोचा साला कल फालतू की छुट्टी करनी पड़ जायेगी। यहां खुद की तो सेवा हो नहीं पाती, समाज की क्या खाक करेंगे।