राजकुमारसब लोग जिधर हैं वो, उधर देख रहे हैं...हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं... शीर्षक पढ़ते ही आ गई न चेहरे पर मुस्कान। दरअसल इसमें आपकी गलती नहीं है। मुन्नी और शीला दो ऐसे नाम है जो बेहद चलताऊ है। वैसे तो मोना और मोनिका जैसे नाम भी कम भड़काऊ नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि मुन्नी और शीला जैसे दो नामों से उन लोगों का अच्छा-खासा वास्ता रहा है जो साठ-सत्तर या अस्सी के दशक में पैदा हुए थे। इन सालों में जब लोगों के घर-घर में फैशन टीवी नहीं पहुंचा था, तब पीले रंग के जिल्द वाली कोक शास्त्र के भीतर चित्रों में कैद मुन्नी और शीला ही लोगों की नींद हराम किया करती थी। हो सकता है कि बहुत से लोगों को इन नामों से चिढ़ भी रही हो, लेकिन यह सच है कि एक समय बहुत सारे लोग लोग मुन्नी और शीला के नाम पर रची जाने वाली कहानियों को पढ़ने के लिए टूट पड़ते थे। मजे की बात यह है कि इन दो नामों पर कहानी लिखने वाली भी कोई लेखिका ही थी। अब कोई पुरूष लेखक ही यह कारनामा करता रहा होगा तो इसकी जानकारी मुझे नहीं है, लेकिन एकाध बार कुछ समझदार मित्रों ने ही मुझे नशे की रौ में बताया था कि कामिनी देवी बम फोड़ते रहती है। वैसे जो हरामी किस्म के पत्रकार और साहित्यकार हैं वे इस बात को बखूबी जानते हैं कि कामिनी देवी अपने समय में किस-किस तरह के गुल खिलाती रही है।

खैर.. मैं यहां मुन्नी और शीला का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इन दो नामों की इन दिनों बड़ी जबरदस्त चर्चा है। मुन्नी बदनाम होने के साथ-साथ झंडुबाम भी बेच रही है। जबकि शीला को अपनी जवानी पर घमंड आ गया है। वह हर चैनल में अपनी जवानी की विशेषताओं को बताते फिर रही है। अभी दो रोज पहले ही मुझे एक विवाह समारोह में शामिल होने का अवसर मिला था। प्रदेश की राजनीति में रूचि रखने वाले कुछ लोगों के साथ मैं बात कर ही रहा था कि अचानक एक सोलह-सत्रह साल की लड़की दौड़ती हुई आई और उसने गोलगप्पे खा रहे एक आदमी से फरमाया- पापा.. रिशु को देखो न, मैंने मुन्नी बदनाम हुई पर डांस तैयार किया है लेकिन अब बोल रही है कि पहले वो नाचेगी। गोलगप्पे गटकने वाले बाप ने एक लंबी सी डकार लेने के बाद लड़की को ज्ञान दिया कि बेटा पहले रिशु को नाच लेने दो... वो तुमसे बड़ी है। जब रिशु नाच लेगी तब कुछ देर बाद अपन अनाउसमेंट करवा देंगे अब तहलका मचाने आ रही है सक्सेना साहब की छोटी बेटी अंशु। जाओ बेटे जाओ दोनों नाच लेना। एक पिता की भयंकर किस्म की प्रगतिशीलता को देखकर आसपास खड़े सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। नतीजा यह हुआ कि राजनीति की चर्चा को विराम लग गया और मुन्नी और शीला की चर्चा शुरू हो गई। बातों ही बातों में एक पत्रकार मित्र ने बताया कि हम लोग बिलावजह ही मुबंई की मुन्नी और शीला को देखकर परेशान हो रहे हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ की फिल्म इंडस्ट्री में भी सैकड़ों मुन्नी और शीलाएं तहलका मचा रही है।

सब जानते हैं कि एक सुपर-डुपर छत्तीसगढ़ फिल्म की हिरोइन पर किस तरह एक मंत्री मर मिटा था। जोगी शासनकाल में हुई इस घटना को लोग आज भी चटखारा लेकर याद करते हैं। राजनांदगांव की दिव्या साहू भी यहां एक हिरोइन ही बनने आई थी। कुछ फिल्मों और एलबम में काम करने के बाद उसे एक शादी-शुदा आदमी ने हमेशा-हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया था। मध्यप्रदेश के भोपाल से छत्तीसगढ़ में अपने बच्चे के साथ फिल्मों में काम करने आई अंनिदता की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। कुछ रईसजादों ने अंनिदता को टाप की हिरोइन बनाने का झांसा दिया था। लेकिन एक रोज राजधानी से कुछ किलोमीटर की दूरी पर उसकी लाश मिली थी। अंनिदतता के साथ एक नेता का पुत्र भी घायल मिला था।

राज्य निर्माण के बाद जब प्रदेश में पहली बार चुनाव हुए तब एक बड़े नेता ने अचानक पार्टी बदल ली थी। बाद में पता चला कि सत्ताधारी दल के एक नेता ने किसी मुन्नी के साथ उसकी सीडी बना ली है। सीडी के सार्वजनिक होने के भय से नेताजी ने कांग्रेस में प्रवेश कर लिया था। रंगमंच की एक बूढ़ी हिरोइन अपने से छोटे उम्र के एक हीरो के साथ घर बसा चुकी है, तो भिलाई की एक हिरोइन का मामला थाने पर जाकर खत्म हुआ है। इधर पिछले कुछ समय से राजधानी की फिजांओं में फिल्मों में काम करने की इच्छुक एक लड़की की फोटोग्राफी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।  खबर है कि फिल्म बनाने के इच्छुक कुछ रईस निर्माताओं ने लड़की को एक सस्ते से होटल में बुलाकर उसे मल्लिका शेरावत बनने का गुर सीखा डाला, सच तो यह है कि बाजार ने अच्छे-अच्छे घरों की लड़कियों को मुन्नी और शीला बनने पर मजबूर कर दिया है। यह अलग बात है कि मुबंई की मुन्नी को एक गाने पर कमर मटकाने का ढाई करोड़ मिलता है। यहां की मुन्नी भी कमर हिलाकर ढाई हजार तो कमा ही लेती है। आप माने या न माने लेकिन यह सच है कि छत्तीसगढ़ में कुछ लोग बैंकाक और पटाया का आनन्द प्राप्त करने के लिए ही फिल्में बना रहे हैं। गत एक दशक में यहां सौ से ज्यादा फिल्मों का निर्माण हो चुका है लेकिन छत्तीसगढ़ की आत्मा कही जाने वाली एक भी फिल्म का प्रदर्शन अब तक नहीं हो पाया है। निसार इटावी का यह शेर शायद किसी के काम आ जाए-

वही हकदार हैं किनारों के
जो बदल दे बहाव धारों के।

लेखक राजकुमार सोनी छत्‍तीसगढ़ के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा इस समय रायपुर में हरिभूमि अखबार से जुड़े हुए हैं.