प्रमोद सच! उनकी उड़ती हुई रेशमी जुल्फें देख कुंवारियों का दिल मचल जाता होगा। उनके अंदाज और अभिनय का कायल हर युवक देवदास और हर बाला पारो बन प्रेम रस में डूब जाना चाहती होगी। उनकी कहानियां, सिनेमाई अफसाने दुहराये गये। साधारण सी उनकी छवि में भारतीय जन-मानस झांक उठता। दर्शक गण बार-बार उनकी फिल्में देखते। फिल्मी अभिनेता उनके ही रंग-ढंग में ढल जाना चाहते। उनकी मोर चाल में चलना चाहते, नाचना चाहते। क्या पुराणों, महापुराणों, दंतकथाओं-लोककथाओं के नायक भी ऐसे ही होते होंगे? इतने ही आकर्षक, चित्तचोर, परिपक्व!! शायद नहीं, भला कौन सा साधारण नायक बहुआयामी अभिनय रचता होगा? कभी राजकुमार, कभी किसान, कभी जोकर तो कभी प्रेमी बन जाता होगा? ऐसा तो दिलीप कुमार जैसी अद्भुत क्षमता वाले अभिनेता ही कर सकते हैं। चंचलता, शोखी, खिलंदड़पने से भरपूर गंभीर और सशक्त अभिनय को जीते, कला को जीते- सच्चे अभिनेता, सच्चे कलाकार। अमिताभ बच्चन जहां दिलीप कुमार को प्रेरणा मानते हैं, उनके अभिनय को उतारते है वहीं भारत की आवाज लता मंगेशकर भी दिलीप साहब की पैर छूती हैं।

दिलीप कुमार हिंदी सिनेमा के महानतम कलाकारों में हैं, जो अभिनय और कला का पर्याय हैं। वे सिर्फ एक ट्रैजिक हीरो, प्रेम-पगे प्रेमी ही नहीं बल्कि हंसा-हंसाकर दर्शकों को अपनी बहुंरंगी प्रतिभा से परिचित कराने वाले संपूर्ण कलाकार रहे। धोती - कुर्ते में लदे - फदे ग्रामीण की भूमिका हो या मुगल - राजकुमार की, सबमें दिलीप कुमार खूब सजे।

दिलीप कुमार का वास्तविक नाम मोहम्मद यूसुफ खान था। इनका जन्म पेशावर के किशाख्वानी के मोहल्ला खुदाबाद में हुआ। पठान परिवार में जन्में दिलीप कुमार बारह भाई-बहन थे। इनके पिता लाला गुलाम सरवर फलों के व्यापरी थे, जिनके पेशावर और देवलाली, महाराष्‍ट्र में बड़े-बड़े बागान थे। इनका परिवार 1930 में बंबई आकर बस गया। 1940 के पूर्वार्द्ध में यूसुफ खान बंबई से पुणे चले गये और वहां कैंटीन चलाने तथा सूखे मेवों के निर्यात का काम करने लगे। 1943 में देविका रानी और उनके पति, जो कि बॉम्बे टॉकिज फिल्म स्टूडियो के संस्थापक भी थे, ने पुणे के औध मिलीटरी कैंटिन्स में दिलीप कुमार को देखा। उन्होंने फिल्म इण्डस्ट्री में दिलीप की एंट्री में मदद की।

हिंदी के प्रख्यात लेखक भगवती चरण वर्मा ने यूसुफ खान को दिलीप कुमार का नाम दिया और अपनी फिल्म ‘ज्वार-भाटा’(1944) में मुख्य भूमिका दी। इसके बाद दिलीप कुमार ने 1947 में फिल्म ‘जुगनू’ की। 1949 में राजकुमार के साथ रोमांटिक फिल्म ‘अंदाज’ और 1955 में देवानंददिलीप साहब के साथ ‘इंसानियत’ की। इन्होंने ‘दीदार’ (1951), ‘अमर’ (1954), ‘देवदास’ (1955) और ‘मधुमति’ (1958) जैसी गंभीर फिल्में की। दिलीप कुमार ने विभिन्न आयामों वाली कई फिल्में कीं, जिनमें शामिल हैं हल्के-फुल्के रोल वाली फिल्में जैसे- ‘आन’ (1952), कॉमिक फिल्में जैसे - ‘अंदाज’, ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ तथा डबल-ट्रिपल रोल वाली फिल्में जैसे ‘बैराग’ (1976) और ‘राम और श्याम’ (1967)। इसके बाद कुछ वर्षो के अंतराल तक उन्‍होंने फिल्‍मों से दूरी बना ली, इसके बाद 1982 में फिल्म ‘क्रांति’ से वापसी की। विभिन्न प्रकार की चरित्र प्रधान फिल्में ‘शक्ति’ (1981), ‘विधाता’ (1982), ‘मशाल’ (1984) और ‘कर्मा’ (1986) की। 1982 में फिल्म ‘शक्ति’ के लिये दिलीप कुमार को बेस्ट ऐक्टर का खिताब भी मिला। ‘किला’ (1998) उनकी आखिरी फिल्म थी। उनकी फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ और ‘नया दौर’ रंगीन बनाई गई तथा दोबारा रिलीज हुई। फिल्म ‘सौदागर’ (1991) में भी उनकी परिपक्व भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दिलीप कुमार को ‘एक्टिंग का इंस्टीट्यूट’ कहा जाता है और कई सफल अभिनेता जैसे मनोज कुमार, अमिताभ बच्चन आदि उनके तौर-तरीकों तथा एक्टिंग स्टाइल से प्रेरणा लेते रहे हैं। दिलीप कुमार ने अभिनेत्री और सौंदर्य की मल्लिका सायरा बानो से शादी की। उनके भाई हैं नासिर खान, एहसान खान और असलम खान। छोटे भाई नासिर खान भी अभिनेता थे और दिलीप कुमार के साथ ‘गंगा-जमुना’(1961) तथा ‘बैराग’ (1976) में दिखे।

दिलीप कुमार संसद के सदस्य रहे हैं। और इन्होंने भारत-पाकिस्तान के लोगों को करीब लाने में सक्रिय प्रयास किये हैं। लंबे फिल्मी करियर में दिलीप ने कई अवार्ड जीते, जिनमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए आठ फिल्म फेयर अवार्ड शामिल हैं। 1993 में इन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला। सिनेमा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ अवार्ड ‘दादा साहब फाल्के’ अवार्ड से भी 1994 में इन्हें सम्मानित किया गया। 1980 में दिलीप साहब को मुंबई का शैरिफ नियुक्त किया गया। भारत सरकार की तरफ से 1991 में पद्म-भूषण से सम्मानित किये गए। 1997 में कुमार को पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ भी प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त 1997 में एमटीआर नेशनल अवार्ड और 2009 में सीएनएन-आईबीएन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी इन्हें मिला।

आज 85 से भी अधिक की उम्र में सक्रिय दिलीप कुमार एक अभिनेता ही नहीं भारतीय संस्कृति के राजदूत हैं। निरंतर सीखने की उनकी जीजिविषा ही उन्हें औरों से अलग बनाती है। दिलीप कुमार अभिनय ही नहीं, कला के हर रंग के प्रेमी हैं। हम उनका गाया गाना ‘लागी नहीं छूटे रामा चाहे जिया जाये’ (मुसाफिर)सुन सकते हैं। ‘कोहिनूर’ में उन्हें सितार बजाता देख सकते हैं। लता मंगेशकर के साथ ठुमरी गाता (मुसाफिर) सुन सकते हैं तो सायरा बानो के प्रोडक्शन में मदद करता देख सकते हैं। सीखने की उनकी ललक आज भी बाकी है। तभी तो हैं वो समृद्ध राजनीतिक और सामाजिक रूप से... चिरयुवा... चमकते हुए...!!

लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.