जयप्रकाश: 1971 में बनी थी यह फिल्‍म : मोहम्‍मद जाकिर हुसैन, मोहम्‍मद रफी और सुमन कल्याणपुर के सुपरहिट गीतों 'गोंदा फूल गे मोर राजा'  और 'सुन-सुन मोर मया पीरा के'  से सजी पुरानी छत्तीसगढ़ी फिल्म 'घर-द्वार' का एकमात्र सेल्युलाइड प्रिंट निर्माता स्व. विजय कुमार पांडेय के परिवार की कोशिशों से मिल गया है। अब इस फिल्म को बड़े पैमाने पर डिजिटल स्वरूप में इस माह के अंत में रिलीज करने की तैयारी है। मुंबई की एक लैब में इस फिल्म के पॉजिटिव प्रिंट को डिजिटाइज करने की प्रक्रिया अगले हफ्ते शुरू हो रही है। छत्तीसगढ़ के रायपुर भनपुरी निवासी स्व. विजय कुमार पांडेय द्वारा निर्मित और रायपुर के ही स्व. निर्जन तिवारी द्वारा निर्देशित 'घर-द्वार' छत्तीसगढ़ी की दूसरी फिल्म थी। 1971 में रिलीज हुई इस फिल्म में दुलारी बाई, कान मोहन, रंजीता ठाकुर, गीता कौशल के अलावा छत्तीसगढ़ अंचल के जफर अली फरिश्ता, शिवकुमार दीपक, इकबाल अहमद रिजवी, स्व. बसंत दीवान और नीलू मेघ ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थी। 1981 तक यह फिल्म छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, यूपी और बिहार में रिलीज होती रही। आकाशवाणी से भी इसके गीत खूब बजे। लेकिन 1987 में निर्माता विजय पांडेय की हादसे में मौत के बाद यह सारा सिलसिला खत्म हो गया। इस प्रिंट के मिलने से जुड़े तथ्य भी बेहद रोचक है।

स्व. पांडेय के पुत्र जयकुमार पांडेय ने बताया कि पिताजी की मौत के बाद परिवार पूरी तरह टूट चुका था और किसी ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया कि घर में रखा एकमात्र प्रिंट खराब हो रहा है। इसके अलावा फिल्म का एक प्रिंट और नेगेटिव मुंबई में दादर स्थित रंजीत स्टूडियो के क्वालिटी लैब में था। लैब के मालिक बाबू भाई देसाई की मौत के बाद इसे बंगलुरू के मनोहर शेट्टी ने खरीद लिया। इस दौर में लैब की पुरानी बिल्डिंग तोड़ कर नई बनाई गई। इस दौरान पांडेय परिवार का मुंबई में संपर्क नहीं रहा। ऐसे में फिल्म के नेगेटिव, पॉजिटिव और अन्य रश प्रिंट गुम हो गए।

जयकुमार पांडेय के मुताबिक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद उन्होंने अपने भाई जय संतोष पांडेय (अब दिवंगत) के साथ मिलकर प्रिंट को तलाशने की काफी कोशिश की। अंतत: मुंबई में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म 'कहि देबे संदेश'  के निर्माता-निर्देशक मनु नायक के माध्यम से लैब की जानकारी मिली। लेकिन वहां पहुंचने पर निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद उन्होंने पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय में भी प्रिंट की खोजबीन की लेकिन वहां इसका कोई रिकार्ड नहीं मिला। इसी दौरान मुंबई में पिताजी के पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई। जिसमें एक सज्जन के जरिए दादर में ही मराठी फिल्मों के एक निजी संग्रहालय में इस फिल्म का प्रिंट मिला।

श्री पांडेय के मुताबिक संपूर्ण 13 रील का यह प्रिंट मिल तो गया लेकिन यह बहुत ही खस्ता हाल में था। दूसरी दिक्कत यह थी कि जैसे ही रायपुर में कुछ लोगों को यह मालूम हुआ तो फिल्म और वीडियो के कारोबार से जुड़ा एक कारोबारी उनसे हर हाल में प्रिंट का 'सौदा' करने दबाव डालने लगा। लेकिन उस वक्त कुछ शुभचिंतक सामने आए और हम लोगों ने दृढ़ता से मना कर दिया। श्री पांडेय ने बताया कि इस प्रिंट को पुनर्जीवित करने के लिए मुंबई के तकनीशियनों से मार्गदर्शन लिया गया था। जिसमें एक विचार इस पॉजिटिव से नेगेटिव बनाकर फिर से सेल्युलाइड फार्म में पॉजिटिव तैयार कराने का था। लेकिन इस दिशा में काम शुरू होने तक डिजिटल का जमाना आ गया। ऐसे में अब नई प्रक्रिया के तहत पूरे सेल्युलाइड पॉजिटिव प्रिंट के हर फ्रेम की स्कैनिंग होगी। इसकी पिक्चर और साउंड क्वालिटी सुधारी जाएगी। उसके बाद उसका एक मूल नेगेटिव प्रिंट बनाया जाएगा। जिसके बाद डिजिटल फार्म में सैटेलाइट के जरिए यह फिल्म रिलीज की जाएगी।

श्री पांडेय ने बताया कि यह संयोग ही है कि जिस क्वालिटी लैब से फिल्म का प्रिंट नष्ट हुआ था, उसी के नए मालिक की लैब से इस फिल्म को पुनर्जीवन मिलेगा। श्री पांडेय के मुताबिक इन दिनों मुंबई में श्वेत-श्याम फिल्मों को डिजिटाइज करने का काम काफी जोरों पर चल रहा है, इसलिए छह माह की कोशिशों के बाद उनकी फिल्म का नंबर दिसंबर के दूसरे सप्ताह में आया है। सारी प्रक्रिया में 10 से 12 दिन का वक्त लगेगा। इसके जाकिर हुसैनबाद वह 23 दिसंबर को अपने पिता स्व. विजय पांडेय की जयंती के अवसर पर फिल्म को रिलीज करेंगे।

मोहम्‍मद जाकिर हुसैन की रिपोर्ट.