टीवी पर मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता परोसने का काम कई चैनल बखूबी कर रहे हैं। इस नाते उनकी टीआरपी कहां से कहां पहुंच गई लेकिन इस चक्कर में भारतीय संस्कृति का बंटाधार हो रहा है। राखी के इंसाफ- कार्यक्रम में एक व्यक्ति को सार्वजनिक तौर पर नामर्द कहने और उसके खुदकुशी कर लेने की घटना की देशभर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। इसी तरह से बिग बास में अश्लीलता और भौंडे प्रदर्शन पर भी सवालिया निशान लगे हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने दोनों कार्यक्रमों के समय में बदलाव करने को कहा है। सवाल यह है कि क्या ऐसे कार्यक्रम प्राइम टाइम में आने से रोके जाने चाहिए या इन्हें पर्दे पर आने से ही रोक दिया जाना चाहिए। सेट पर गाली-गलौज और प्रस्तुतकर्ता का आधुनिक वेशभूषा और टैटू लगाकर इंसाफ करते दिखाए जाने से कौन सहमत होगा। प्राइम टाइम में एकल परिवार हो या साझे एक साथ टीवी देखने का चलन है, लेकिन मौजूदा कई कार्यक्रम इस स्तर के नहीं है कि उन्हें मां-बाप अपने बेटे-बेटियों या बहुओं के साथ देख सकें।

प्रस्तुतकर्ता महिला को बता रही है कि पति को वश में करने के लिए क्या-क्या करना चाहिए, जबकि उसे इसका बिल्कुल अनुभव नहीं है कि दांपत्य जीवन क्या होता है। सार्वजनिक तौर पर स्वयंवर रचाकर मुकरने वाली राखी सावंत इंसाफ करते हुए कुछ अजीब लगती है। कभी दर्शकों पर राखी गुस्सा होती नजर आती है तो कभी वादी और प्रतिवादी पक्ष को लताड़ते हुए नजर आती है। अब तक हुए कार्यक्रमों में एक भी ऐसा नहीं जिसे परिवार के लोग एक साथ बैठकर देख सके। यह उन परिवारों और लोगों की बात जो इतने अत्याधुनिक नहीं हुए हैं और जिनमें संस्कार अब भी कहीं न कहीं बचे हुए हैं। वे परिवार और लोग नहीं जो संस्कारों को बिसरा कर पश्चिमी संस्कृति को अपनाकर उसमें सराबोर हो गए हैं। जहां बेटी परिवार के लोगों के साथ अपने दोस्तों की बातें और उनके साथ घूमने फिरने के किस्से साझा करती है या बेटा अपनी महिला दोस्त के बारे में बताने में जरा भी नहीं सकुचाता है। ऐसे मार्डन लोगों के लिए अश्लीलता का क्या अर्थ और संस्कारों से क्या सरोबार। ऐसे लोग आगे बढ़ चले हैं और उनका लौटना या न लौटना कोई मायने नहीं रखता। क्या टीवी पर ऐसे प्रोग्राम ऐसे ही मुट्ठीभर लोगों के लिए बनाए जा रहे हैं। देश की सत्तर प्रतिशत आबादी गांवों या कस्बों में रहती है जहां संस्कार अब भी है और ऐसी अश्लीलता वहां असहनीय है।

उदाहरण के तौर पर बिग बास और राखी का इंसाफ जैसे कार्यक्रमों की चौतरफा आलोचना के बाद इनके प्राइम टाइम में बदलाव करने की बात कही गई। इन्हें रात 11 बजे के बाद सुबह 5 बजे से पहले ही दिखाये जाने की बात सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कही। समझ में नहीं आता कि समय बदलने से क्या फर्क पड़ेगा? यही ना कि अब बच्चे इसे नहीं देख सकेंगे लेकिन 11 बजे के बाद जहां बड़े इसे अकेले में आराम से देख सकेंगे वहीं बच्चे भी अपने-अपने कमरों में मजे से देख लेंगे। सवाल समय बदलने का नहीं है बल्कि इन्‍हें पूरी तरह से रोकने का है।

राखी का इंसाफ कार्यक्रम किरण बेदी द्वारा प्रस्तुत जनता की अदालत जैसा है लेकिन दोनों में रात और दिन का फर्क है। कहां किरण बेदी और कहां राखी जैसी माडल, जिसे खुद भी कई बार इंसाफ के लिए टीवी की मदद लेनी पड़ी। शनिवार 20 नवंबर के कार्यक्रम में राखी पति-पत्नी के बीच किसी विवाद का इंसाफ करने के लिए बैठी लेकिन सवाल उटपटांग करने लगी। मसलन महिला ने कहा भगवान की दया से उसके दो बच्चे हैं, लेकिन राखी ने पूछा इन्‍हें भगवान ने दिया या पति ने। महिला क्या उत्तर देती शर्मसार हो गई, आखिर सकुचाते हुए उसने वही कह दिया जो उससे वह कहलवाना चाहती थी। क्या राखी भारतीय संस्कारों को भूल चुकी है।

क्या कोई भारतीय नारी सार्वजनिक तौर पर यह कहती सुनी गई है कि इतने बच्चे उसे पति ने दिए है। भगवान की दया से इतने बच्चे हैं यही तो कहा जाता है और यही हमारी संस्कृति भी है। ब्यूटीपार्लर जाए बिना सुंदर होना राखी के लिए हैरानी वाली बात हो सकती है पर इसमें चकित करने वाली क्या बात है। गांवों कस्बों में ऐसी ऐसी महिलाएं मिल जाएंगी जिन्होंने ब्यूटीपार्लर की शक्ल भी नहीं देखी और सौंदर्य प्रसाधन के बारे में छिटपुट जानकारी के अलावा वे कुछ नहीं समझती, लेकिन सुंदरता और शालीनता में उनका कोई सानी नहीं होता।

लेख का मकसद किसी कार्यक्रम या उसके प्रस्तुतकर्ता की आलोचना या प्रशंसा नहीं है बल्कि यह कि वे किस उद्देश्य को लेकर आए हैं और क्या कर रहे हैं। विषय से इतर बात करने का कोई मतलब नहीं है। इस कार्यक्रम में इसके अलावा कुछ भी नहीं होता। प्रोग्राम के दौरान कई बार स्थिति इतनी विस्फोटक हो जाती है कि लगता है कि खून-खराबा ही हो जाएगा। टीआरपी बढ़ाने और ज्यादा से ज्यादा राजस्व कमाने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों पर पूरी तरह से रोक लगा दी जानी चाहिए या इन्हें मर्यादित कर देने की ताकीद होनी चाहिए।

अदालतों में न्याय के लिए जाने वाले वादी-प्रतिवादी से क्या न्यायाधीश इस तरह से गले मिला करते हैं और क्या वहां भी दर्शक ऐसा व्यवहार करते हैं मानो किसी मेले में आए हों। चिल्ला-चिल्ला कर, हाथ और मुंह की मुद्राएं बनाकर ये लोग क्या कहना चाहते हैं, सब समझ से परे है। किरण बेदी के इसी तर्ज पर आ चुके जनता की अदालत में भी कई ऐसे मामले आए, उनमें भी अश्लीलता आई, लेकिन बात आगे जाती उससे पहले उसका रूप बदल दिया गया क्योंकि इंसाफ के लिए किरण बेदी थी। वादी-प्रतिवादी उनके प्रति ऐसा व्यवहार करते थे मानो वे सचमुच की न्यायाधीश ही हों, लेकिन राखी के प्रति ऐसा भाव कहीं नजर नहीं आता।

बिग पास में तो सारी ही गड़बड़ है, अश्लीलता और मर्यादा का उल्लंघन कहां-कहां नहीं हो रहा है यह देखने वाली बात है। गाली-गलौज और एक दूसरे पर परले दर्जे की छींटाकशी बताती है कि यह महज शो है और इसमें रहने वाले लोग एक परिवार के नहीं बल्कि बड़े पुरस्कार को जीतने और लोगों में चर्चित होने के लिए ही एक  घर में एकत्रित हुए हैं। बिग बास तीन में लोगों का मर्यादित व्यवहार और अश्लीलता से इसकी घोर निंदा हुई थी। बिग चार में उससे कोई सबक नहीं सीखा गया है। राखी के इंसाफ या बिग बास सरीखे कार्यक्रम अगर स्वस्थ मनोरंजन तक सीमित रहते तो गनीमत रहती लेकिन बदकिस्मती से ऐसा नहीं है।

लेखक महेन्‍द्र सिंह राठौर पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.