फिल्मकार संजयलीला भंसाली के साथ दुर्व्यवहार निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। किन्तु ऐतिहासिक तथ्यों और लोकमान्य प्रेरणादायक राष्ट्रीय विभूतियों की छवि विकृत करना भी एक सामाजिक अपराध है। यह आवश्यक है कि कवि-कथाकारों और कलाकारों को अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर रचना को अधिक से अधिक कलात्मक बनाने की छूट दी जानी चाहिए किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि रचनाकार इतिहास के तथ्यों और स्वीकृत सत्यों को ही उलट कर रख दे। फिल्म ‘पद्मावती’ में महारानी पद्मावती को अलाउद्दीन खिलजी की प्रेमिका बताया  जाना भी ऐतिहासिक तथ्यों को उलटना और महारानी पद्मावती की आदर्श सती की प्रेरक छवि को कलंकित करना है। यह अक्षम्य अपराध है। इस से केवल राजपूत समाज की ही नहीं बल्कि उस सारे भारतीय समाज की भावनाएं आहत हुई हैं जो अपनी मान-मर्यादा के लिए स्वयं को सहर्ष भस्मसात कर देने वाली महारानी  को अपना आदर्श मानता है ; उनके महान बलिदान पर गर्व का अनुभव करता है।

भारतीय इतिहास में महारानी पद्मावती अप्रतिम वीरांगना हैं। वे सिंहलद्वीप (श्रीलंका) के चैहान राजा हमीर सिंह की पुत्री और चित्तौड़ नरेश रावल रतनसेन की पतिव्रता पत्नी थीं। उनके रुप-सौन्दर्य की प्रसिद्धि सुनकर उन्हें प्राप्त करने के लिए पागल विलासप्रिय बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड पर आक्रमण किया। वीर राजपूत पद्मावती के सम्मान की रक्षा के लिए छः मास तक युद्ध करते रहे और अंत में 29 अगस्त, सन् 1303 ईसवी को सोमवार के दिन साका करने पर विवश हुए । महारानी पद्मावती  और सारी नारियाँ जौहर करके जीवित जल गईं तथा रावल रतनसेन सहित सारे राजपूत युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। अपनी आन-बान  और स्वतंत्रता के लिए आत्मोत्सर्ग करने के ऐसे उदाहरण भारतीय इतिहास के वे स्वर्णिम पृष्ठ हैं  जिनसे परवर्ती पीढ़ियाँ प्रेरण लेती रही हैं। महारानी पद्मावती  को अलाउद्दीन की प्रेमिका के रुप में दर्शाया जाना राष्ट्रीय गौरव पर कलंक लगाना है। स्वाभिमान और आत्मबलिदान की महान परंपरा की अवमानना है। कला के नाम पर कल्पना का यह दुरुपयोग ; फिल्म में नये प्रभाव भरकर उसे सुपर हिट बनाने के लिए इतिहास की ऐसी तोड़-मरोड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जा सकती।

महारानी पद्मावती पर केन्द्रित दो प्रख्यात महाकाव्य ‘पद्मावत’ और ‘जौहर’ हिन्दी-साहित्य में उपलब्ध हैं। सूफी संत परम्परा के कवि जायसी ने 947 हिजरी अर्थात सन् 1540 ईसवी के लगभग ‘पद्मावत’ महाकाव्य की रचना पूर्ण की। इसमें चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण और पद्मावती के जौहर का सविस्तार वर्णन है किन्तु कहीं भी पद्मावती  की प्रस्तुति खिलजी की प्रेमिका के रुप में नहीं है। यह विचारणीय है कि जायसी प्रेमाख्यानक परम्परा के कवि हैं। उनका समय भी पद्मावती के समय से लगभग डेढ़ दो सौ वर्ष बाद का है। यदि पद्मावती की खिलजी के प्रति जरा भी प्रीति होती तो जायसी अपनी दार्शनिक मान्यता की पुष्टि के लिए इसका संकेत अवश्य करते। जायसी ने पद्मावती का प्रेम उनके पति रतनसेन के प्रति प्रकट किया है , खलनायक खिलजी के प्रति नहीं। इससे साफ हो जाता है कि पद्मावती अलाउद्दीन की प्रेमिका नहीं थीं। सन् 1945 ई में ‘ सरस्वती मंदिर, काशी ’ से प्रकाशित पंडित श्यामनारायण पाण्डेय के महाकाव्य ‘ जौहर ’ में भी पद्मावती की यश गाथा अंकित करते हुए कवि ने उन्हें खिलजी की पे्रमिका के रुप में प्रस्तुत नहीं किया है।

इस प्रकार साहित्य और इतिहास - दोनों स्तरों पर महारानी पद्मावती सतीत्व की रक्षा के लिए जीवित जल जाने वाली वीरांगना के रुप में प्रतिष्ठित हैं ; शक्ति के मद में चूर अलाउद्दीन की प्रेमिका के रुप में नहीं । पद्मावती के रुप-सौन्दर्य पर आसक्त होने मात्र से न अलाउद्दीन खिलजी को पद्मावती का प्रेमी कहा जा सकता है और न उसकी एकतरफा आसक्ति के कारण पद्मावती को उसकी प्रेमिका दर्शाया जा सकता है। फिल्म में पद्मावती की ऐसी प्रेमिका छवि का प्रदर्शन पद्मावती के पवित्र-चरित्र पर कीचड़ उछालने जैसा है । किसी भी कलाकार को ऐसी भ्रामक कल्पना की इतिहास विरुद्ध प्रस्तुति करने की छूट नहीं दी जा सकती।

सुयश मिश्र
माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में अध्ययनरत.