इन दिनों एक प्रतिष्ठित चैनल पर प्रसारित हो रहे एक रियलटी ड्रामे के फाइनल एपिसोड की हर कोई बाट जोह रह है। हर किसी के दिल में ये सवाल है कि क्या वाकई में इस ड्रामे वाले स्वयंवर में सच्ची शादी हो पाएंगी या नहीं? पर जो भी हो यह केवल एक ड्रामा है और जो न केवल समाजिक बंधनों का बल्कि धर्म पर भी कुठाराघात कर रहा है। हमारे देश में प्रचीन काल से स्वयंवर की परम्परा चली आ रही है। सुंदर, सुशील राजकुमारियों के लिए श्रेष्ठतम वर की तलाश स्वयंवर के माध्यम से ही की जाती थी। राजा आस-पास की रियासतों के राजकुमारों को अपने यहां निमंत्रित करते थे और फिर उनकी योग्‍यता का परीक्षण किया जाता था। कभी-कभी इस तरह भी होता था कि राजकुमारियों को स्वाधिकार दिया जाता था कि वो खुद अपने योग्य वर का चयन करें। इतिहास गवाह है कि जब-जब नारी सर्वश्रेष्ठ दक्षता से परिपूर्ण होती थी तब स्वयंवर का आयोजन किया जाता था।

माता सीता अपने पिता के घर में रखे शिव जी के धनुष को फूल की तरह उठा देती थी जबकि महाराजा जनक को पता था कि यह धनुष अच्छे से अच्छा बलधारी नहीं उठा सकता। तभी उन्होंने एक ऐसे वर की तलाश के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था जो उस धनुष को उठा सके और राजा राम ने न केवल  धनुष को उठाया बल्कि उसकी कमान चढ़ाते समय उसे तोड़ भी दिया। इसी प्रकार द्रोपदी के स्वयंवर में भी एक घूमती हुई मछली की आंख को निशाना बनाने वाला धनुर्धर ही द्रोपदी का पति बनने के लायक था, जो काम अर्जुन ने बखूबी कर दिखलाया था। इसी प्रकार सावित्री और दयावंती के उदाहरण भी इतिहास में मौजूद हैं। इस प्रकार के कई स्वयंवर है जो वीर नारियों के स्वयंवर की गाथा सुनाते हैं।

अब वक्त बदल गया है। अब न तो राजा रहे ना ही राजकुमारियां रही। न वो वीरांगनाएं रही न वो वीर पुरूष रहे। पर स्वयंवर की प्रथा आज भी बखूवी जारी है। ये स्वयंवर योग्य जीवन साथी चुनने के लिए नहीं बल्कि टीआरपी के लिए किये जाते हैं। टीआरपी- टेलीविजन रेटिंग पायंट। जो आज के दौर में रियलटी शो के नाम से खूब बटोरी जा रही हैं। रियलटी शो के नाम से आज स्वयंवर जैसी प्रचीन परम्परा का नौटंकीकरण कर दिया गया है। जिसे रियल्टी शो पसंद करने वाले बढ़े शौंक से देखते हैं। देश की एक चर्चित इंटरटेनिंग टीवी चैनल पिछले तीन वर्षों से हर वर्ष स्वयंवर नामक एक कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है। जिसमें किसी चर्चित हस्ति का स्वयंवर आयोजन किया जाता है।

रियलटी शो के नाम से स्वयंवर का नौटंकीकरण पिछले तीन साल पहले 2009 में किया गया था। जिसमें देश की सबसे सुंदर, सुशील और वीर नारी जो पॉप संगीत और आइटम सांग की दुनिया की राजकुमारी माने जाने वाली राखी सावंत का स्वयंवर आयोजित किया गया था। राखी की पर्दे पर रियल नौटंकी लोगों को बहुत पसंद आयी। स्वयंवर में सब कुछ हुआ, बस अंत में चुने हुए वर से शादी नहीं हुई। वहीं इस प्रोग्राम का दूसरा सीजन 2010 में तैयार किया गया। इस बार ये स्वयंवर किसी राजकुमारी का नहीं बल्कि कई राजकुमारियों के दिलों में राज करने वाले राहुल महाजन का था। जिसमें पार्टिसिपेट करने वाली लड़कियों ने राहुल को रिझाने की पूरी कोशिश की। अंत में आखिरकार राजकुमार को अपनी सच्ची राजकुमारी मिल ही गयी और उनका फाइनली विवाह भी हो गया। इस स्वयंवर की सफलता के बाद फिर वही हुआ जो होना था। स्वयंवर तीन की तैयारी शुरू की गयी।

अब स्वयंवर सीजन तीन का प्रसारण बखूबी जारी है। जिसमें रतन राजपूत अपने योग्य वर को चुनने के लिए विभिन्न तरीके से उनकी परीक्षा ले रही है। जिसे लोग न केवल देखते हैं बल्कि पसंद भी करते हैं। लेकिन यहां सवाल ये उठता है कि क्या यह स्वयंवर सच्चे हैं? क्या रतन राहुल महाजन की तरह शादी कर अपना सुखमय जीवन बितायेंगी या फिर राखी सावंत की तरह अपने चुने वर को ठुकरा देगी? जनाब! ये सारी बातें वो सोचते हैं जो आम इंसान की तरह जीवन जीते है। जिन्हें दो जून की रोटी जुटाने के लिए मशकत करनी पड़ती है। जो जिंदगी के झमेलों में फंसे होते हैं। इन चर्चित चेहरों के लिए ये बात मायने नहीं रखती कि वो स्वयंवर के माध्यम से अपना जीवन साथी चुनगें या नहीं? बल्कि ये सब टीआरपी का खेल है। रियलटी शो के नाम पर एक निश्चित दर्शक वर्ग को लुभाने का तरीका है।

हम तो कहते है कि स्वयंवर में आने वाले चर्चित चेहरे किस दृष्टि से महान हैं। जो उनके लिए योग्य वर/वधु नहीं मिलती। क्या यह लोग अपनी तुलना उन महान हस्तियों (सीता, द्रोपती, सावित्री और दयावंती) से करती हैं? सच पूछो तो ये स्वयंवर क्या शादी के भी लायक नहीं है जो शादी के पवित्र बंधन का मजाक उड़ा रहे हैं। यहां तक की स्वयंवर जैसी प्रचीन प्रथा को शर्मसार कर रहे हैं।

लेखक जितेंद्र कुमार नामदेव गाजियाबाद में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.