दिनेशदेश दुनिया मे अपराध के नये-नये तौर तरीकों के ईजाद हो जाने के बाद भी आज सिनेमा की दुनिया के निर्माता-निर्देशकों का मोह चंबल के बीहड़ों से अलग नहीं हुआ है। यह बात अलग है कि बीहड़ पर फिल्म बना कर हकीकत की तस्वीर आम दर्शकों को फिल्मकार दिखाना चाहते हों, लेकिन इससे एक बात साफ हो चली है कि कभी ऐसी फिल्मों के जरिये ही चंबल में डकैतों ने एक से एक नये-नये अपराध करके पुलिस के सामने चुनौती खड़ी की है। कभी चंबल के खूंखार डाकुओं में शुमार रहे निर्भय गुर्जर की जिंदगी पर बनने वाली फिल्म को लेकर दो सैकड़ा से अधिक छोटे-बडे़ कलाकारों की फौज चंबल के बीहड़ों मे कूद पड़ी है। जो इस समय चंबल के बीहड़ों में अपनी हकीकत की शूटिंग करने मे लगी हुई है।

ओपीसाईंबाबा के दरबार में फिल्म अभिनेत्री प्रीति जिंटा द्वारा शिरडी मीडिया पर लगाये गये आरोप बेबुनियाद और सरासर झूठे हैं। एक मार्च को साईं की धूप-आरती के समय बहुत ही जल्दी में प्रीति साईं बाबा के मंदिर पहुंची थीं. उस वक्त उन्‍हें अपने कैमरे में  मीडियाकर्मी उतार रहे थे. इसी दौरान प्रीति ने मीडीयाकर्मियों को कैमरे में बंद करने तथा कवरेज करने से मना किया. प्रीति की साईंबाबा के प्रति आस्‍था को देखते हुए सभी कैमरामैन बाहर निकल आए. सिर्फ साईंबाबा ट्रस्ट का कैमरामैन अंदर कवरेज कर रहा था, लेकिन प्रीती के गार्ड ने उसे भी कैमरा बंद करने को कहा। सेलीब्रेटी होने और उनकी भक्ति का लिहाज करते हुये ट्रस्ट का कैमरामैन भी दूसरी ओर चला गया. तभी प्रीति ने चेहरे पर घूंघट ओढ़कर ही साईंबाबा की आरती की. आरती समाप्त होने के बाद अभिनेत्री प्रीति जिंटा को देखने के लिये उनके फैंस की भीड़ जमा हो गई. हर कोई प्रीती को देखना चाहता था लेकिन उनके गार्ड मंदिर परिसर में बैठे बाकी भक्तों को हटाते हुये प्रीति को बाहर ले गये.

राजकुमारसब लोग जिधर हैं वो, उधर देख रहे हैं...हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं... शीर्षक पढ़ते ही आ गई न चेहरे पर मुस्कान। दरअसल इसमें आपकी गलती नहीं है। मुन्नी और शीला दो ऐसे नाम है जो बेहद चलताऊ है। वैसे तो मोना और मोनिका जैसे नाम भी कम भड़काऊ नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि मुन्नी और शीला जैसे दो नामों से उन लोगों का अच्छा-खासा वास्ता रहा है जो साठ-सत्तर या अस्सी के दशक में पैदा हुए थे। इन सालों में जब लोगों के घर-घर में फैशन टीवी नहीं पहुंचा था, तब पीले रंग के जिल्द वाली कोक शास्त्र के भीतर चित्रों में कैद मुन्नी और शीला ही लोगों की नींद हराम किया करती थी। हो सकता है कि बहुत से लोगों को इन नामों से चिढ़ भी रही हो, लेकिन यह सच है कि एक समय बहुत सारे लोग लोग मुन्नी और शीला के नाम पर रची जाने वाली कहानियों को पढ़ने के लिए टूट पड़ते थे। मजे की बात यह है कि इन दो नामों पर कहानी लिखने वाली भी कोई लेखिका ही थी। अब कोई पुरूष लेखक ही यह कारनामा करता रहा होगा तो इसकी जानकारी मुझे नहीं है, लेकिन एकाध बार कुछ समझदार मित्रों ने ही मुझे नशे की रौ में बताया था कि कामिनी देवी बम फोड़ते रहती है। वैसे जो हरामी किस्म के पत्रकार और साहित्यकार हैं वे इस बात को बखूबी जानते हैं कि कामिनी देवी अपने समय में किस-किस तरह के गुल खिलाती रही है।

बैंकिंग तो झमेला है और बैंकिंग अब चुटकी में यार! दो शिशु, जो खुद बोल भी नहीं सकते, आपको भरोसा दिला रहे हैं! नीचे छोटे अक्षरों में लिखा है- बच्चे इसकी नकल न करें। तो उपर विज्ञापन में दो नन्हें मुन्ने ही मोटरसाइकिल पर बैठ, स्थिर मुद्रा में ही सही, पर इसे चलाकर गाड़ी की खूबियां बता रहे है! यही नहीं ‘कहानी’ में एक बच्ची लिफ्ट भी लेती है, गर्लफ्रेंड/ब्यायफ्रेंड के अंदाज में, तो अंत में दूसरे बाइक पर सवार बच्ची यह कहकर स्कूल जाने से इनकार करती है कि ‘मैं नहीं जाउंगी इस बोरिंग बाइक पर’। लगे हाथों एक घटना की खबर। पटना में सात फरवरी 2011 को स्कूटी फिसलने के बाद उसके स्कूल बस की चपेट में आने से एक 11वीं क्लास की छात्रा की मौत हो गई। यों तो यह देश के हजारों दुर्घटनाओं की तरह एक और एक दुखद दुर्घटना है, लेकिन बहुत सारे सवाल उठाते हैं। इसमें से एक है ड्राइविंग लाइसेंस न मिलने की उम्र में पूरी ट्रैफिक में रोजाना गाड़ी चलाना।

जयप्रकाश: 1971 में बनी थी यह फिल्‍म : मोहम्‍मद जाकिर हुसैन, मोहम्‍मद रफी और सुमन कल्याणपुर के सुपरहिट गीतों 'गोंदा फूल गे मोर राजा'  और 'सुन-सुन मोर मया पीरा के'  से सजी पुरानी छत्तीसगढ़ी फिल्म 'घर-द्वार' का एकमात्र सेल्युलाइड प्रिंट निर्माता स्व. विजय कुमार पांडेय के परिवार की कोशिशों से मिल गया है। अब इस फिल्म को बड़े पैमाने पर डिजिटल स्वरूप में इस माह के अंत में रिलीज करने की तैयारी है। मुंबई की एक लैब में इस फिल्म के पॉजिटिव प्रिंट को डिजिटाइज करने की प्रक्रिया अगले हफ्ते शुरू हो रही है। छत्तीसगढ़ के रायपुर भनपुरी निवासी स्व. विजय कुमार पांडेय द्वारा निर्मित और रायपुर के ही स्व. निर्जन तिवारी द्वारा निर्देशित 'घर-द्वार' छत्तीसगढ़ी की दूसरी फिल्म थी। 1971 में रिलीज हुई इस फिल्म में दुलारी बाई, कान मोहन, रंजीता ठाकुर, गीता कौशल के अलावा छत्तीसगढ़ अंचल के जफर अली फरिश्ता, शिवकुमार दीपक, इकबाल अहमद रिजवी, स्व. बसंत दीवान और नीलू मेघ ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थी। 1981 तक यह फिल्म छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, यूपी और बिहार में रिलीज होती रही। आकाशवाणी से भी इसके गीत खूब बजे। लेकिन 1987 में निर्माता विजय पांडेय की हादसे में मौत के बाद यह सारा सिलसिला खत्म हो गया। इस प्रिंट के मिलने से जुड़े तथ्य भी बेहद रोचक है।

: अखिल भारतीय सुमन स्‍मृति सम्‍मान : भोपाल में  विगत दिनों अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में अखिल भारतीय सुमन स्मृति तथा डॉक्टर चंद्रप्रकाश वर्मा स्मृति सम्मान समारोह का आयोजन कोलार रोड के विशाल प्रांगण में किया गया। मुख्य अतिथि थे- उत्तर प्रदेश विधान सभा के निवर्तमान अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी तथा मध्य प्रदेश के शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा। इस वर्ष का सुमन सम्मान होशंगाबाद की कवयित्री उमाश्री को तथा डॉक्टर चंद्रप्रकाश वर्मा सम्मान ग्वालियर के प्रसिद्ध गीतकार श्री रामप्रकाश अनुरागी को दिया गया। इस अवसर पर कविसम्मेलन का भी आयोजन किया गया, जिसके मुख्य अतिथि दिल्ली से पधारे पंडित सुरेश नीरव थे। अध्यक्षता डॉक्टर मधु चतुर्वेदी ने तथा संचालन कमलकांत सक्सेना ने किया। कवि सम्मेलन में केशरी नाथ त्रिपाठी सहित कुल बत्तीस कवियों ने कविता पाठ किया।

प्रमोद सच! उनकी उड़ती हुई रेशमी जुल्फें देख कुंवारियों का दिल मचल जाता होगा। उनके अंदाज और अभिनय का कायल हर युवक देवदास और हर बाला पारो बन प्रेम रस में डूब जाना चाहती होगी। उनकी कहानियां, सिनेमाई अफसाने दुहराये गये। साधारण सी उनकी छवि में भारतीय जन-मानस झांक उठता। दर्शक गण बार-बार उनकी फिल्में देखते। फिल्मी अभिनेता उनके ही रंग-ढंग में ढल जाना चाहते। उनकी मोर चाल में चलना चाहते, नाचना चाहते। क्या पुराणों, महापुराणों, दंतकथाओं-लोककथाओं के नायक भी ऐसे ही होते होंगे? इतने ही आकर्षक, चित्तचोर, परिपक्व!! शायद नहीं, भला कौन सा साधारण नायक बहुआयामी अभिनय रचता होगा? कभी राजकुमार, कभी किसान, कभी जोकर तो कभी प्रेमी बन जाता होगा? ऐसा तो दिलीप कुमार जैसी अद्भुत क्षमता वाले अभिनेता ही कर सकते हैं। चंचलता, शोखी, खिलंदड़पने से भरपूर गंभीर और सशक्त अभिनय को जीते, कला को जीते- सच्चे अभिनेता, सच्चे कलाकार। अमिताभ बच्चन जहां दिलीप कुमार को प्रेरणा मानते हैं, उनके अभिनय को उतारते है वहीं भारत की आवाज लता मंगेशकर भी दिलीप साहब की पैर छूती हैं।

लोकेन्‍द्र सिंहमध्य प्रदेश, देश का हृदय है। प्राकृतिक सौंदर्य, संपदा और ऐतिहासिक महत्व के स्थलों से भी खूब समृद्ध है मध्य प्रदेश। इसके सौंदर्य का गुणगान पर्यटन को आकर्षित करने के लिए बनाए गए विज्ञापन बखूबी करते हैं। मन को आल्हादित करने वाले मध्य प्रदेश के वातावरण ने आखिरकार बॉलीवुड को अपने मोहपाश में बांध ही लिया है। बॉलीवुड के नामी निर्देशकों में शुमार प्रकाश झा को भी मध्यप्रदेश भा गया है। सिने सितारों से सजी उनकी सफल फिल्म राजनीति की अधिकांश शूटिंग प्रदेश की राजधानी भोपाल में ही हुई थी। भोपालियों सहित प्रदेश की आवाम ने राजनीति में वीआईपी रोड और न्यू मार्केट का अप्रितम सौंदर्य निर्देशक प्रकाश झा की नजरों से देखा।

टीवी पर मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता परोसने का काम कई चैनल बखूबी कर रहे हैं। इस नाते उनकी टीआरपी कहां से कहां पहुंच गई लेकिन इस चक्कर में भारतीय संस्कृति का बंटाधार हो रहा है। राखी के इंसाफ- कार्यक्रम में एक व्यक्ति को सार्वजनिक तौर पर नामर्द कहने और उसके खुदकुशी कर लेने की घटना की देशभर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। इसी तरह से बिग बास में अश्लीलता और भौंडे प्रदर्शन पर भी सवालिया निशान लगे हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने दोनों कार्यक्रमों के समय में बदलाव करने को कहा है। सवाल यह है कि क्या ऐसे कार्यक्रम प्राइम टाइम में आने से रोके जाने चाहिए या इन्हें पर्दे पर आने से ही रोक दिया जाना चाहिए। सेट पर गाली-गलौज और प्रस्तुतकर्ता का आधुनिक वेशभूषा और टैटू लगाकर इंसाफ करते दिखाए जाने से कौन सहमत होगा। प्राइम टाइम में एकल परिवार हो या साझे एक साथ टीवी देखने का चलन है, लेकिन मौजूदा कई कार्यक्रम इस स्तर के नहीं है कि उन्हें मां-बाप अपने बेटे-बेटियों या बहुओं के साथ देख सकें।

प्रमोदभारतीय सिनेमा में वैजयंती माला नया इतिहास लेकर आती हैं। दक्षिण भारत का नमकीन पानी रग-रग में समाये वैजयंती माला नृत्य में थिरकते हुए पांव बंबई सिनेमा जगत में हौले-हौले रखती हैं और सिने-जगत उनके घुंघरुओं की आवाज से खनक उठता है। धीरे-धीरे यह खनक दर्शकों के बीच पहुंच जाती है। और दर्शक शास्त्रीय-नृत्य के मोहपाश में बंध-से जाते हैं। हमारे सामने और ख्‍वाबों में एक अकेला घुंघरू खनक उठता है। एक जोड़ी आँखों का नृत्यभरा अभिनय और दो थिरकते कदम हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार करने लगते हैं। यह नई ऊर्जा हमारा रोम-रोम कंपा देती है और हम नृत्य संग झूम उठते हैं। सिनेमा को लय-ताल संग पिरोकर चमकती आंखों से देखने लगते हैं। वैजयंतीमाला के नृत्य में सधे हुए पांव नई बानगी लिखते हैं। उनके नृत्य को ध्यान में रखकर स्क्रिप्‍ट लिखे जाने लगे और हम फिल्मों संग झूमने के आदी हो गए। इस तरह वैजयंती माला एक नई परंपरा रच डालती हैं।

प्रमोद अब तक तंग-अंधेरे सिनेमाघरों में सिनेमा की आवाज से ही लोग हतप्रभ थे कि दर्शकों के विस्मय को दोगुना करते चलते-फिरते और बोलते सिनेमाई पर्दे पर जादू होने लगे। अब जिन्न और हनुमान उडऩे लगे थे। हाथों में पहाड़ उठाए भगवान को उड़ता देख लोग नतमस्तक हो गये। अब कथाओं-परीकथाओं की कल्पनाएं आंखों के सामने साकार हो रही थीं। शीशमहल उड़ सकते थे, इच्छाधारी नाग अपना रूप बदल सकते थे। जादुई कालीन हवा से बातें कर सकती थी। देवताओं, राजा महाराजाओं और दानवों की आंखों से एक साथ चिंगारी फूट सकती थे। वे अग्निवर्षा कर सकते थे और वर्षा की मोटी जलधारा एक पल में सब कुछ खाक कर सकती थी। पौराणिक कथाओं को पर्दे पर चरितार्थ होते देखना रहस्य नहीं तो और क्या था! लोग सिनेमाघरों की ओर भागने लगे थे। शानदार स्टंट और करिश्में चमत्कृत किये देते थे। कभी-कभी एक ही कलाकार एक साथ पर्दे पर दो रूपों में दिख जाता। आत्मा और वास्तविक शरीर का द्वंद्व दर्शकों को किसी मायाजाल में बांध देता। यह सब देख लोग दांतों तले अंगुलिया दबा लेते। यह सब कैमेरामैन के स्पेशल इफेक्‍टस का प्रभाव था।

हरिगोविंद मनोरंजन टेलीविज़न चैनलों पर आने वाले धारावाहिकों की एक्स्ट्रामैरिटल अफ़ेयर और चाइल्ड-लेबर जैसे मसले पर चाहे जितनी आलोचना की जाए या विरोध हो, लेकिन इतना तो सच है कि ये सीरियल्स फिलहाल राष्ट्रीय एकता के वाहक बनते जा रहे हैं। सोमवार से शुक्रवार शाम सात बजे से रात ग्यारह बजे तक प्रमुख टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले इन धारावाहिकों को नियमित देखने से देश के दूसरे हिस्से लोगों की जीवन-शैली और भाषा की जानकारी मिल रही है। ऐसे में कहें कि इन धारावाहिकों से देश की क्षेत्रीय जीवनशैली, भाषा, सभ्यता और संस्कार का गुपचुप तरीक़े से विस्तार हो रहा है तो कतई अतिशयोक्ति न होगा। वस्तुतः ये धारावाहिक हिंदी में हैं, लेकिन इनकी कहानी और जीवनशैली अलग-अलग संस्कृति-भाषा का प्रतिनिधित्व करती है। संवादों में क्षेत्रीय भाषाओं और वेशभूषा के इस्तेमाल से इसे स्थानीय टच मिल रहा है।

प्रमोद बचपन में एक कहानी पढ़ी थी, ‘काबुलीवाला।' तब काबुलीवाला किताब के पन्नों से निकलकर हमारे नन्हें मन पर छा गया था। अपनी नन्ही बच्ची को याद करता काबुलीवाला। उसकी धुंधली छवि जो हमने मन ही मन रची थी फिल्म ‘काबुलीवाला’ को देखकर साकार हो उठी। हाँ ऐसा ही रहा होगा दूर देश से आया वह आदमी! बलराज साहनी ऐसे ही अभिनेता थे, हर तरह के रोल के सांचे में फिट बैठने वाले। साम्यवादी विचारधारा के पक्के समर्थक, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को कई सशक्त रोल देकर गरिमा प्रदान की। बलराज साहनी सही अर्थों में जनमानस के अभिनेता थे। एक साधारण भारतीय और आम आदमी उनके दिल में बैठा था जो अभिनेता बनकर उनकी फिल्मों में उतर जाता। बलराज साहनी हिंदी सिनेमा के गरीब और आम आदमी थे। रिक्शा चालक थे, मजदूर थे। ‘दो बीघा जमीन’ में काम करने वाले शंभु महतो थे। बलराज साहनी एक लेखक थे, पत्रकार थे, रेडियो उद्घोषक थे, निर्देशक थे।

गौतम: दिलीप कुमार के जन्म दिन पर विशेष : हिंदुस्तान के ट्रेजडी किंग और पाकिस्तान के निशान-ए-इम्तियाज दिलीप कुमार उर्फ युसूफ खान का जन्म 11 दिसम्बर 1922 को वर्तमान में पाकिस्तान के पेशावर शहर में हुआ था, जो विभाजन से पूर्व भारत का ही हिस्सा था। विभाजन के दौरान उनका परिवार मुम्बई आकर बस गया। उनका शुरुआती जीवन तंगहाली में ही गुजरा। पिता के व्यापार में घाटा होने के कारण वह पुणे की एक कैंटीन में काम करने लगे थे, यहीं देविका रानी की पहली नजर उन पर पड़ी और उन्होंने दिलीप कुमार को अभिनेता बना दिया। उन्होंने ही युसूफ खान की जगह नया नाम दिलीप कुमार रखा। यह नाम कुछ ही समय बाद स्वयं में एक ब्रांड बन गया। उनका फिल्मी कैरियर 1944 में ‘ज्वार भाटा’ फिल्म से शुरू हुआ, लेकिन 1949 में बनी महबूब खान की फिल्म ‘अंदाज’ से वह चर्चा में आये। त्रिकोणीय प्रेम कहानी पर बनी इस फिल्म में वह राज कपूर और नरगिस के साथ खूब पसंद किये गये। फिल्म अंदाज की कहानी भी प्रेम पर ही आधारित थी, पर इसमें उन्होंने एक ऐसे दु:खी व्यक्ति का किरदार निभाया, जो दर्शकों के दिल में समा गया और उन्हें ट्रेजडी किंग कहा जाने लगा। प्रेमी के दर्द का जिस तरह उन्होंने अहसास कराया, वैसा आज तक कोई नहीं कर पाया।

प्रमोद पांडेय सिनेमा पर्दे पर यथार्थ का मंचन है। फिल्मी पर्दे पर उभरती आवाजें हमारी अपनी ही आवाजें होती हैं। हमारे संवाद कला बनकर कलाकारों की भाषा बन जाते हैं। फिल्में हमारी बातों को औरों तक पहुँचाती हैं, औरों की बातों को हम तक पहुँचाती हैं। बातों ही बातों में हम दुनियाभर की बातें जान जाते हैं। दुनियाभर की बातें और आवाजें हमारे अंदर संवेदना का संचार करती हैं। सिनेमा की आवाजें यथार्थ का भ्रम कराती हैं। कभी-कभी सिनेमाई ध्वनियां सच से भी अधिक प्रबल हो जाती हैं। इस प्रबलता में हम बिंध से जाते हैं। ढिशूम-ढिशूम की आवाज सुन दर्शक उतावले हो जाते हैं। अपनी-अपनी सीटों से खड़े हो जाते हैं। शहनाई की आवाज आँखों में आँसू दे जाती है। दहशत भरी डरावनी आवाजें भूतों का अहसास दिला हमें कंपा जाती हैं। फिल्मों में हम सब सुन सकते हैं- सांय-सांय करती तेज हवा, नदी का कलरव, चिडिय़ों की चह-चह और पायल की मधुर मद्धिम छमकती ध्वनि। सच! फिल्मी कलाकारों और दृश्यों की सुरीली, रोबिली, सुंदर, छमकती, खनकती, गीत गातीं, रोती और हँसती ध्वनियां हमें यथार्थ और यथार्थ से भी परे ले जाती हैं। साउंड रिकॉर्डिस्ट ऐसा ही जादू करते हैं। उनके करिश्मे से हम बूटों की खटखट, थप्पड़ की झन्नाहट और कान-बालियों के घुंघरुओं की मद्धिम खनक तक सुन सकते हैं.