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छिनाल नहीं होतीं, छिपती नहीं हैं, छिड़ती नहीं हैं छिपकलियां

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छिपकलियां बोलती हैं गोवा की

गोवा से

क्‍या बोलती हैं

जानता नहीं हूं

पर मैंने सुना है

टिक टिक टिक
जो सुनाई मुझे देता है
हर रोज रात को
पता नहीं क्‍या कहती हैं
वे मुझसे
या किटकिटाती हैं दांत
अगर वे दांत वाली हैं
क्‍या छिपकलियां
काट खाती हैं

क्‍या वे पढ़ रही हैं कविता
इससे कवयि‍त्रियां
न हो जायें नाराज
वे छेड़ सकती हैं
मुहिम मेरे खिलाफ

वे कुछ भी कह रही हों
पर मुझे कविता सुनाई देती है
छिपकलियां तो नहीं छेड़ेंगी
मेरे खिलाफ मुहिम

कहीं मुहिम वैसी न हो
जैसी छिड़ी थी
या छेड़ी गई थी
छिनाल जंग
राय के खिलाफ
कालिया के खिलाफ
सब सबसे परिचित हैं
पर मुझसे नहीं
न मैं सबसे।

मैं छिपकलियों से परिचित हूं
छिपकलियां मुझसे नहीं
छिपकलियां छिनाल नहीं हैं
पर हो भी सकती हैं
छि से छिपकली
छि से छिनाल
और ....

छिड़ जाती हैं
छेड़ दी जाती है जंग
या छिड़वा दी जाती है
जंग जिसमें नुकसान ही होता है
पर होता है फायदा भी

वे जो जंग के हथियार बेचते हैं
जंग की खबरों पर
अपनी अपनी रोटियां सेंकते हैं
कुछ कोल्‍ड ड्रिंक भी पीते हैं
पीते हैं कुछ साफ्ट ड्रिंक भी
पर यह सच है
ड्रिंक सेंका नहीं जाता
चाहे कोई सा भी हो
पर हॉट न हो

छिपकलियां छिपती नहीं हैं
साहित्‍य के समुद्र में जाल फैलाये
मछलियों को नहीं
छिपकलियों को फंसाएं
मछलियों के लिए कोई
मगरमच्‍छ नहीं लड़ता
छिपकलियों के लिए कोई
मगरमच्‍छ नहीं लड़ता
लड़ने के लिए सब लड़ते हैं
हारने के लिए कोई नहीं लड़ता
जीतते फिर भी सब नहीं हैं
एक को तो हारना ही होता है
और हारना हारना होता है
छिड़ना नहीं होता
छेड़ना नहीं होता।

भय के कारण नींद
छिपकलियों को भी नहीं आती
और वे दौड़ती रहती हैं
दीवार -दर- दीवार, दीवार- दर- छत
और उससे अधिक
दिमाग में
जबकि देख रही हैं
उसकी हर हरकत को आंखें
हकीकत को देख
डर रहा है मन
देह पर न आ गिरे
छिपकली गोवा की
जो सरकारी क्‍वार्टर की
चौथी मंजिल की छत पर
उल्‍टी लटकी, दीवार से चिपकी
भोजन के लिए करती जद्दोजहद
दो चार मच्‍छर मिलें
तो खा लूं
एक दो तितलियों को चबा लूं
क्राकरोच को डरा दूं

मच्‍छर टाइम पास हैं
मूंगफली की तरह
या कोई और कीड़ा
पर पीड़ा कहां हो रही है
यह जितने समझ रहे हैं
वे भय की राह के
पथिक हैं

सुनता हूं
पथिकों पर भौंकते कुत्‍ते गोवा के
रात में सूनी सड़कों पर
पर्यटकों का करते हैं इंतजार
पता नहीं वे दिन में भी भौंकते हैं
या नहीं
भौंकते होंगे
तो शहर के शोर में
उनको कोई सुनता नहीं होगा
वे देते रहते होंगे संदेश
भौंक भौंक कर, चीख कर
सब संदेश अनपहुंचे रह जाते होंगे
जिन्‍हें कुत्‍ते रात रात भर जागकर
भौंक भौंक कर भेजते रहते हैं
इसी समय, इसी पहर में
इस सृष्टि में
लेखक जाग रहे हैं
समन्‍वयन अनूठा है। वाचस्‍पति

लेखक अविनाश वाचस्‍पति वरिष्‍ठ पत्रकार, लेखक, कवि और ब्‍लागर हैं. व्‍यंग्‍य लेखन में इन्‍हें महारत हासिल है. यह व्‍यंग्‍य कविता उनके ब्‍लाग पर प्रकाशित है.

Comments
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achcha hai sir
vineet 2010-12-01 19:58:15

achcha hai
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sushil Gangwar 2010-12-02 14:57:46

wow wow Achha likha hai

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tanmay agrawal
tanmay agrawal 2010-12-04 00:52:48

shandaar shandaar

Anonymous 2010-12-02 18:33:39

:pirate: :0 :( :angry-red: :evil: :D :angry: :idea: :love: :x :no-comments: :ooo: :pirate: :?: :( :sleep: :) ;) :0
छिपकिली
हरिराम 2010-12-03 18:35:51

विस्मयकारी, गजब का सोच, और शब्द चयन हैं। अति रोचक।
sochiye kya hai hakikat hai
Amit kumar 2010-12-06 22:12:17

kutte bhouk rahen hain andheri galiyon me
ek sabera aisa aaye in kutton ko andheri galiyon se bhagayen


ye awara kutte bhi hamare ghar ke paltu hain
dr.lakshmikant pandey 2010-12-08 07:27:00

aaj ise sahas kaha jayega. badhai
badhai
RAJKUMAR SAHU, JANJGIR, CHHATT 2010-12-08 12:40:04

bhaiya, aapka lekh jaandar hai. vaah kya kahne.

ek chhinar
rita das 2011-01-28 19:44:13

aapne to vibhuti ray ko v pichhe chhor diya mahoday! aap to unse bhi uppar k chij hai ...kutto ko itni ijjat...apni jati ka acHHa sthan diya hai... :ooo:
beautifual
pawan kumar bhoot 2011-05-10 15:04:00

good....
Kya Khoob Apne Chhipkiliyon ko pakda hai
Praveen Bharadwaj 2011-06-15 18:48:32

क्या कहने हैं आपके इस बेलौस खरामा-खरामा इस्टाइल की कविता के। बड़ी दूर तक मार की है भाई अविनाश जी। बधाई हो। बाबा नागार्जुन जन्मशती वर्ष में बाबा के एक और चेले से मुलाकात हो रही है।
good
virendra singh shilpi 2011-11-07 18:20:13

I like it.
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