Yashark Pandey : बंगाली फ़िल्मकार सृजित मुखर्जी की एक पिक्चर है: 'राजकाहिनी'। दो साल पहले इसका ट्रेलर देखा था तो रोंगटे खड़े हो गए थे। टैगोर के गीत 'भारत भाग्य विधाता' की उन सभी पंक्तियों को- जो राष्ट्रगान में सम्मिलित नहीं हैं- बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है। ट्रेलर में पूरा गीत किसी एक ने नहीं गाया बल्कि विभिन्न बंगाली गायकों की आवाज में गीत की हर पंक्ति अंदर तक झकझोर देती है। राजकाहिनी की कहानी यही है कि देश विभाजन के समय सरकारी आदेश से एक वेश्यालय को तोड़ा जाना है जो बदकिस्मती से भारत पाकिस्तान के मध्य खींची गयी सीमा रेखा पर स्थित है। उस वेश्यालय की लड़कियाँ किस प्रकार लड़ती हैं यही प्लॉट है। मैंने बहुत खोजा कि राजकाहिनी का कोई डाउनलोड लिंक मिल जाये लेकिन नहीं मिला। डीवीडी भी नहीं मिली।

सृजित मुख़र्जी अपनी बंगाली फ़िल्म का हिंदी रीमेक लेकर आ रहे हैं 'बेगम जान' के नाम से। बेगम जान की नायिका हैं 'बिद्दा मैडम' यानी विद्या बालन। ट्रेलर से ही पता चलता है कि सिनेमा अपने मौलिक स्वरूप में नहीं है। राजकाहिनी बंगाल विभाजन पर आधारित थी जबकि बेगम जान के ट्रेलर में खड़ी हिंदी सहित पंजाबी में संवाद सुनने को मिल रहा है। खांटी बंगाली पुट गायब है। बिद्दा मैडम ने बेगम जान के किरदार के साथ कितना न्याय किया है यह तो तब पता चलेगा जब पिक्चर रिलीज़ होगी। मुझे यह खल रहा है कि बंगाल के ओरिजिनल प्लॉट, किरदार, कहानी और भाषा को सृजित मुख़र्जी हिंदी बॉलीवुड में काहें ले के चले गए। सोचा होगा कि दमदार कहानी है बंगाली में हिट रही तो हिंदी भाषी भी लपक लेंगे; और कुछ नहीं तो बिद्दा मैडम को देखने तो आयेंगे ही।

मेरा कन्सर्न दूसरा है। बहुत साल पहले द पायनियर के एक बुढ़ऊ पत्रकार ने मुझसे कहा था कि देखो यार टैगोर को पढ़ना हो तो बंगाली सीखो तब गीतांजलि वगैरह बंगाली में पढ़ो। अंग्रेज़ी में टैगोर नीरस हो जाते हैं। एक व्यथा इस देश की यह भी है कि लोग दूसरे प्रांतों की भाषा से विमुख हो रहे हैं। हमारे परिवार में ऐसे बुजुर्ग अभी भी हैं जो धाराप्रवाह बंगाली बोलते हैं जबकि उनका जन्म कर्म सब हिंदी पट्टी में हुआ। याद आ रहा है कि मैंने शिक्षा व्यवस्था सम्बंधी किसी पोस्ट में इसका उल्लेख किया था कि सीबीएसई के पाठ्यक्रम में मातृभाषा से भिन्न एक अन्य भारतीय भाषा की प्रारम्भिक शिक्षा अनिवार्य रूप से सम्मिलित की जानी चाहिये। आश्चर्यजनक रूप से मोदी बाबा पिछले कुछ दिनों से यही कह रहे हैं कि राष्ट्रीय एकता को शक्ति प्रदान करने के लिए सभी को दूसरे प्रान्त की भाषा अवश्य सीखनी चाहिये। इससे प्रांतों की भौगोलिक सीमायें ही नहीं खत्म होंगी वरन् सांस्कृतिक विघटन का षड्यंत्र रचने वाले भी घबराएंगे।

हम हिंदी उर्दू और अंग्रेजी तक ही क्यों सीमित हैं? क्योंकि कभी कभी हम अपनी ही भाषा का सम्मान नहीं करते। एक मैडम जी कहीं पढ़ाती हैं उन्होंने मुझसे कहा, 'यू नो यशार्क उर्दू इज़ अ वेरी ब्यूटीफुल लैंग्वेज।' मैंने कहा, 'मैडम जी वाय डोंट यू से दिस इन उर्दू?' तो इस पर मैडम जी बमक उठीं। फिर मैंने कहा 'मैडम जी बंगाली इज़ मोर ब्यूटीफुल दैन उर्दू ऑर इंग्लिश।' इस पर मैडम जी खुश हो गयीं क्योंकि वो स्वयं बंगाली थीं। अब यहाँ मैडम जी की मानसिकता देखिये। उनको अपनी मातृभाषा बंगाली की कद्र नहीं है। वो मुझ जैसे हिंदी भाषी से अंग्रेजी में यह बहस कर रही थीं कि उर्दू बड़ी सुंदर भाषा है जिसकी लिपि अरबी फ़ारसी है, जो भारत के किसी भी प्रान्त में बहुसंख्यक आबादी द्वारा नहीं बोली जाती और जिसे आज के पाकिस्तान पर सत्तर साल पहले जबरदस्ती थोपा गया था। उर्दू में सामान्य मुसलमान भी बातचीत नहीं करता। यह केवल शेर-ओ-शायरी जलसे मुशायरे में वाह वाही लूटने लुटाने वाले सेक्युलरिस्टों द्वारा प्रोमोट की गयी भाषा है ताकि साधारण आदमी और लड़के लड़कियां मोहब्बत के तराने गाते रहें और मस्त रहें। बाकी प्रांतीय भाषाएँ जिनमें राष्ट्रीय संस्कृति की महक घुली मिली है वे हाशिये पर रहें। हिंदी तो हिंग्रेजी का स्वरूप धर ही चुकी है।

मैं तो तमिल सीख कर तिरुक्कुरल पढ़ना चाहता हूँ। हम अंग्रेजी में क्यों पढ़ें भाई? अंग्रेजी तकनीकी व्यवसायिक विषयों तक सीमित रहे यही ठीक है। शेक्सपियर पढ़ना हो तब भी उचित है परन्तु यदि हम संकल्प लें कि जीवन में मातृभाषा के अलावा कम से कम एक भारतीय भाषा अवश्य सीखेंगे और उस भाषा से सम्बंधित कम से कम एक साहित्यिक पुस्तक अवश्य पढ़ेंगे तो देखियेगा 'भारत तेरे टुकड़े होंगे'- यह चिल्लाने वाले अपने आप पैदा होना ही बन्द हो जाएंगे। भाषाई आधार पर प्रान्त बाँटे गए थे। फिर दक्षिण में हिंदी विरोधी अभियान चले। क्यों न आज हम इस बंटवारे को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मत से समाप्त कर दें? भाषा संस्कृति का अभिन्न अंग है। यह हमें मनोवैज्ञानिक फलक पर विस्तारित होने का अवसर प्रदान करती है। क्या पता जिस साहित्यिक रचना को हम अंग्रेजी के फूहड़ नॉवेल में खोज कर अवसादग्रस्त हो गए थे वह किसी मलयाली कहानी में मिल जाये जिसे पढ़ कर मन प्रफुल्लित हो उठे।

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