: शाहन के शाह : सूफी संतों ने दिलायी मिटती पहचान एक महामनीषी को : वह पगली-सी महिला तो अपने में मस्‍त थी। लेकिन कुछ शरारती बच्‍चों ने उसे छेड़ना शुरू कर दिया। पगली ने कोई प्रतिकार नहीं किया। यह देखकर बच्‍चे कुछ ज्‍यादा ही वाचाल हो गये। पूरे इलाके में यह माहौल किसी खासे मनोरंजक प्रहसन से कम नहीं था। बच्‍चों के हो-हल्‍ले ने बाजार में मौजूद लोगों को भी आकर्षित कर लिया। कुछ ने शरारती बच्‍चों को उकसाया तो कुछ खुद ही इस खेल में शामिल हो गये। कुछ ऐसे भी लोग थे, जो सक्रिय तो नहीं रहे, लेकिन मन ही मन उस पगली को परेशान देखकर विह्वल हो उठे। मामला भड़कता देख एक दुकानदार ने हस्‍तक्षेप कर ही दिया और शरारती बच्‍चों को डांट कर भगाते हुए पगली को अपनी दूकान पर ले आया। पानी पिलाया, बोला: इन लोगों को तुमने डांटा क्‍यों नहीं।

पगली ने कोई जवाब देने के बजाय दुकानदार से थोड़ा कपड़ा मांगा। मिलते ही उसके दो टुकडे कर दोनों को तुलवा लिया। दोनों का वजन बराबर था। अब एक को दाहिने और दूसरे को बायें कंधे पर रख कर बाजार निकल गयीं। कोई निंदा करता तो दाहिने टुकड़े पर गांठ लगा लेतीं और प्रशंसा करने पर बांयें कंधे के टुकड़े पर। शाम को वापस लौटीं तो दोनों टुकड़े दुकानदार को देते हुए बोली : इसे तौल दीजिए।

दोनों टुकड़ों को गौर से दुकानदार ने देखा एक में गांठें ही गांठें थी, जबकि दूसरे में बस चंद ही गांठ। बहरहाल, तौल कर बताया कि दोनों टुकड़ों के वजन में कोई अंतर नहीं है। पगली ने जवाब दिया : किसी की निंदा या प्रशंसा की गांठों से क्‍या असर पड़ता है। दुकानदार अवाक रह गया। फौरन पगली के पैरों पर गिर पड़ा। यह थीं लल्‍लेश्‍वरी उर्फ लालदेई। बस इसी एक घटना से लल्‍लेश्‍वरी के सामने कश्‍मीरी लोग नतमस्‍तक हो गये। इसके बाद तो इस महिला के ज्ञान के मानसरोवर से वह अद्भुत बातें लोगों के सामने फूट पड़ी जिसकी ओर लोग अब तक अज्ञान बने हुए थे। उनकी वाणी से फूटे काव्‍य रूपी वाक्‍यों को कश्‍मीरी समाज ने वाख के नाम से सम्‍मानित कर बाकायद पूजना शुरू कर दिया। यह परम्‍परा आज तक कायम है।

यह चौदहवीं शताब्‍दी की बात है। श्रीनगर में पोंपोर के पास ही है सिमपुर गांव। मात्र 15 किलोमीटर दूर। यहां के एक ब्राह्मण परिवार में जन्‍मी थीं ललदेई। शुरू से ही शिव की उपासना में लीन रहने के चलते वे अपने आसपास की घटनाओं के प्रति बहुत ज्‍यादा लिप्‍त नहीं रहती थीं। पास के ही पद्यपुरा गांव के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में उनका विवाह हुआ। हालांकि लल्‍लेश्‍वरी खुद भी पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन वे अपने अनपढ़ पति को स्‍वीकार नहीं कर सकीं। उन्‍हें लगता था कि स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त कर पाने लायक क्षमता तो मानव में होनी ही चाहिए। बस, उन्‍होंने घर-परिवार को छोड़ दिया और शिव-साधना का मार्ग अख्तियार कर लिया। भावनाओं का समंदर हिलोरें तो ले ही रहा था, अब वह जन-जन तक पहुंचने लगा। बस कुछ ही समय के भीतर ललद्यद की रचनाएं घर-घर पहुंच गयीं। बाद में तो उन्‍हें कश्‍मीरी भाषा और साहित्‍य की विधात्री देवी तक की उपाधि जन-जन ने दे दी।

यह वह दौर था जब कश्‍मीर में दो परस्‍पर विरोधी संस्‍कृतियों में घमासान मचा हुआ था। राजनीतिक अशांति जनमानस को बुरी तरह मथ रही थी। प्रताड़ना के नये-नये किस्‍से लिखे और सुने जा रहे थे। लेकिन इसके साथ ही एक ओर जहां ब्राह्मण भक्तिवाद लोगों को एकजुट कर ताकत दे रहा था, वहीं सूफीवाद भी लोगों में प्रेम और अपनत्‍व का भाव पैदा करने का अभियान छेड़ हुए था। अचानक ही कश्‍मीर में इन दोनों भक्ति-संस्‍कृतियों का मिलन हो गया। शिवभक्ति में लीन ललद्यद को सूफी शेख नूरउद्दीन का साथ मिल गया। लेकिन अब तक ललदेई ने कुण्‍डलिनी योग के साथ हठयोग, ज्ञान योग, मंत्रयोग और भक्तियोग में महारथ हासिल कर ली थी। इधर-उधर भटकने के बजाय वे ईश्‍वर को अपने आसपास ही खोजने की वकालत करती हैं।

उनका कहना था कि मैंने शिव को पा लिया है, और यह मुझे कहीं और नहीं, बल्कि खुद अपनी ही जमीन पर खड़ी आस्‍थाओं में मिल गया। बाद के करीब छह सौ वर्षों तक उन्‍हें केवल हिन्‍दू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम धर्मगुरुओं ने पूरे सम्‍मान के साथ याद किया। चाहे वे 18 वीं शताब्‍दी की रूपा भवानी रही हों या फिर 19 वीं सदी के परमानन्‍द, सभी ने ललदेई की जमकर प्रशंसा की और जाहिर है इनकी लीकें ललद्यद की राह से ही गुजरीं। लेकिन यह कहना गलत होगा कि वे हिन्‍दुओं तक ही सीमित रहीं। बल्कि हकीकत तो यह रही कि हिन्‍दू तो उनका नाम तक बिगाड़ चुके थे। ललिता का नाम बिगड़ कर लाल हो गया। पहचान तक खत्‍म हो जाती अगर सूफियों ने उन्‍हें न सहेजा होता। वह तो सन 1654 में बाबा दाउद मुश्‍काती ने अपनी किताब असरारूल-अबरार में उनके बारे में न लिखा होता। सन 1746 में लिखी वाकियातेकश्‍मीर में भी उन पर खूब लिखा गया।

दरअसल, ललद्यद ने कश्‍मीर में तब प्रचलित सिद्धज्ञान के आधार पर पनपे प्रकाश में स्‍वयं की शुद्धता, मसलन सदाचार व मानव कल्‍याण को न केवल खुद अपनाया, बल्कि अपने भाव-व्‍यवहार से दूसरों को भी इसी राह पर चलने की प्रेरणा दी। बाद के साहित्‍यकारों और आलोचकों ने उन्‍हें कश्‍मीरी संस्‍कृति का कबीर तक मान लिया। लल्‍लेश्‍वरी के नाम एक नहीं, अनेक हैं। लोगों ने उन्‍हें मनमाने नामों से पुकारा है। जिसमें जो भाव आया, उसने उन्‍हें इसी भाव से पुकार लिया। किसी ने उन्‍हें ललेश्‍वरी कहा, तो किसी ने लल्‍लेश्‍वरी, ललद्यद, ललारिफा, लला अथवा ललदेवी तक कह दिया। किसी की निगाह में वे दैवीय क्षमताओं से युक्‍त साक्षात भगवान की प्रतिमूर्ति हैं तो कोई उन्‍हें कश्‍मीरी भाषा की महान कवि मानता है। एक ओर जहां उनके नाम पर स्‍थापित प्रचीन मंदिर में बाकायदा उनकी उपासना होती है, वहीं लाल-वाख के नाम से विख्‍यात उनके प्रवचनों का संकलन कश्‍मीरी साहित्‍य का एक बेहद महत्‍वपूर्ण अंग समझा जाता है।

दरअसल, संत परम्‍परा को कश्‍मीर में श्रेष्‍ठ बनाने के लिए लल्‍लेश्‍वरी का योगदान महानतम माना जाता है। कहा जाता है कि शिव की भक्ति में हमेशा लीन रहने वाली इस कवयित्री के जीवन में सत्य, शिव और सुंदर का अपूर्व समन्वय और संयोजन था। वह विरक्ति के साथ ही भक्ति की भी प्रतीक थीं। उन्‍होंने विरक्ति की ऊंचाइयों का स्पर्श किया और इसी माध्‍यम से शिव स्वरूप में स्‍वयं को लीन करते हुए वे अपने तन-मन की सुध तक भूल जाती थीं। वे गली-कूचों में घूमती रहती थीं। शेख नूरउद्दीन को ललदेई के बारे में यह बात महज यूं ही नहीं कहनी पड़ी होगी:- उन्‍होंने ईश्‍वरीय प्रेम का अमृत पिया, और हे मेरे मौला, मुझे भी वैसा ही तर कर दे। सन 1320 में जन्‍मी लाल अरीफा यानी ललद्यद सन 1389 में परमशिव में स्‍थाई आश्रय पा गयीं। लेकिन किंवदंती कि अनुसार अंत समय में उनके हिन्‍दू-मुसलमान भक्‍त उनके पास भीड़ की शक्‍ल में मौजूद थे कि अचानक ही उनकी देह से एक शिव-आकार की ज्‍योति निकली और इसके पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वह अनंत आकाश में शिवलीन हो गयी।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों एस टीवी के यूपी ब्‍यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.