: शाहन के शाह : चैतन्‍य न होते तो शायद ही कोई पहचानता श्‍याम कान्‍हा को : दक्षिण की वैष्‍णवी आचार्य परम्‍परा ने भक्तिभाव को बंगाल तक पहुंचा कर उसे बेइंतिहा समृद्ध कर दिया, लेकिन इसका ऋण चुकाने में बंगाल ने भी कंजूसी नहीं की। पंद्रहवीं शताब्‍दी में इसी बंगक्षेत्र ने उस भक्तिवीर को जन्‍म दे दिया, जिसने कृष्‍ण के वृंदावन को एक बार फिर फतह कर आबाद कर दिया। भक्ति आंदोलन की तवारीखें गवाह हैं कि पश्चिमोत्‍तर के कान्‍हा श्‍याम की बांसुरी की तान को पुनर्जीवित करने का श्रेय पूरब के गौरांग को जाता है। यह थे चैतन्‍य, जिन्‍हें उनके भक्‍तों ने महाप्रभु के नाम से अंगीकार किया। उनके भक्‍त तो आज भी चैतन्‍य महाप्रभु में दुर्गा या काली के बजाय कृष्‍ण और राधा के सम्‍मेलन का अंश देखते हैं।

चैतन्य महाप्रभु का नाम वैष्णव सम्‍प्रदाय के भक्तियोग शाखा के शीर्ष कवियों और संतों में होती है। वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की शुरुआत का श्रेय भी चैतन्‍य महाप्रभु को ही जाता है। भजन गायकी की अनोखी शैली प्रचलित कर उन्‍होंने तब की राजनैतिक अस्थिरता से अशांत जनमानस को सूफियाना संदेश दिया। लेकिन वे कभी कहीं टिक कर नहीं रहे, बल्कि लगातार देशाटन करते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ ईश-प्रेम और भक्ति की वकालत करते रहे। जाति-पांत, ऊंच-नीच को तो उन्‍होंने भर्त्‍सना की, लेकिन जो सबसे बड़ा काम उन्‍होंने कर दिखाया, वह था वृन्‍दावन को नये सिरे से भक्ति आकाश में स्‍थापित करना। सच बात तो यह है कि तब लगभग विलुप्‍त हो चुके वृंदावन को चैतन्‍य महाप्रभु ने ही नये सिरे से बसाया। अगर गौरांग के चरण वहां न पड़े होते तो कृष्‍ण-कन्‍हाई की यह किल्‍लोल-भूमि केवल एक मिथक बन कर ही रह जाती।

बंगाल का नादिया जिला। सन 1486 को एक नये सिरे से आबाद होने लगा। तब इसे नवदीप कहा जाता था। फाल्गुन शुक्‍ल पूर्णिमा को यहां के मायापुर में चैतन्‍य का जन्‍म हुआ। काल था संध्या में सिंह लग्‍न का और चंद्रमा का ग्रहण लगा हुआ था। नाम रखा गया विश्‍वम्‍भर, लेकिन प्‍यार से निमाई की बुलाया जाने लगा। कारण यह कि इनका जन्‍म नीम के पेड़ के नीचे हुआ था। पिता जगन्‍नाथ और मां शचि थीं। बचपन से ही निमाई की मुखाकृति सरल, सहज और आकर्षक थी। रंग था गोरा। इसीलिए कुछ लोग इन्‍हें गौरांग, गौर हरि और गौर सुंदर आदि भी कहने लगे। कैशोर्यावस्‍था तक निमाई न्‍याय और व्‍याकरण में पारंगत हो गये। कुछ दिन विद्यालय भी चलाया। इसी बीच लक्ष्‍मीप्रिया से विवाह भी हो गया। पत्‍नी का निधन हो जाने के बाद दूसरा विवाह विष्‍णुप्रिया के साथ हुआ। इसी बीच पिता भी चल बसे।

23 साल की उम्र में पिता का श्राद्ध करने जब निमाई गया पहुंचे तो ईश्‍वरपुरी नामक एक संत के सानिध्‍य में कृष्‍ण नाम का जाप करने लगे। नाम के साथ ही उन्‍होंने कृष्‍ण के भाव को भी जी लिया। केशव भारती से दीक्षा लेने के बाद मात्र 24 साल की उम्र में ही निमाई ने संन्‍यास ले लिया और चैतन्‍य देव हो गये। गौरांग के भक्‍तों की तादात तेजी से बढ़ने लगी। इतना ही नहीं, तब के प्रसिद्ध संत नित्यानंद प्रभु और अद्वैताचार्य महाराज ने भी इनसे दीक्षा ले ली तो जैसे पूरा आर्यावर्त कृष्‍ण भक्ति में लीन हो गया। निमाई ने इनकी सहायता से अपने आंदोलन में ढोल, मृदंग, झाँझ और मजीरा आदि वाद्य यंत्र बजाकर व उच्च स्वर में नाच-गाकर हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया।

संन्यास लेने के बाद जब गौरांग पहली बार जगन्नाथ मंदिर पहुंचे और भगवान की मूर्ति देखते ही भाव-विभोर होकर उन्मत्त नृत्य करने लगे। अचानक बेहोश हो गये। वहां मौजूद एक विद्वान सार्वभौम भट्टाचार्य ने चैतन्‍य को उठाया और अपने घर ले आये। शास्त्र-चर्चा छिड़ी तो गौरांग ने भक्ति का महत्त्व ज्ञान से कहीं ऊपर सिद्ध कर सार्वभौम को षड्भुजरूप का दर्शन करा दिया। सार्वभौम सीधे गौरांग के चरणों में गिर पड़े। बाद में सार्वभौम ने गौरांग की शत-श्लोकी स्तुति की जिसे आज चैतन्य शतक के नाम से पहचाना जाता है। अपनी उपासना विधि में निमाई ने 18 शब्‍दों का एक तारक-ब्रह्म-महामंत्र शामिल किया। हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे॥ उनका तर्क था कि कलियुग में जीवात्‍माओं के उद्धार के लिए केवल यही एक मंत्र है। दरअसल, निमाई जब पूजा करते थे तो ऐसा लगता था कि वे साक्षात ईश्‍वर की आराधना कर रहे हैं। अब तक वे चैतन्‍य महाप्रभु बन चुके थे।

चैतन्य महाप्रभु इसके बाद दक्षिण के श्रीरंग क्षेत्र व सेतु बंध होते हुए उत्‍तर की ओर बढ़े और विजयादशमी के दिन वृंदावन के लिए निकले। अपार जनसमुदाय उनके साथ था। कहते हैं कि इनके हरिनाम धुन से रास्‍ते में जंगली जानवर तक उन्मत्त हो कर नृत्‍य करने लगे। कार्तिक पूर्णिमा को वे वृंदावन पहुंचे, जहां आज भी इस दिन गौरांग का आगमनोत्सव मनाया जाता है। गौरांग ने हरिद्वार, प्रयाग होते हुए काशी, हरिद्वार, शृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु),  द्वारिका, मथुरा तक पहुंच कर कृष्‍ण का डंका बजा दिया। आखिरी दौर में वे पुरी पहुंचे और महज 47 बरस की आयु में श्रीकृष्ण के परम धाम की ओर निकल गये।

दरअसल, चैतन्‍य और उनके भक्‍तों की टोली भजन-कीर्तन में कुछ यूं लीन और भाव-विभोर हो जाती थी कि अविरल अश्रुधारा बहने लगती थी। प्रेम, आस्‍था और रूदन का यह अलौकिक दृश्‍य हर किसी को स्‍तब्‍ध कर देता था। कृष्‍ण में समर्पण की इस पराकाष्ठा ने चैतन्य महाप्रभु की कीर्ति को और भी धार दिला दी। उड़ीसा के सूर्यवंशी सम्राट गजपति महाराज प्रताप रुद्रदेव तो चैतन्‍य को अवतार तक मानकर उनके चरणों में लोट गया जबकि बंगाल के एक शासक का मंत्री रूपगोस्वामी तो पद त्यागकर उनके शरणागत हो गया। गौड़ीय वैष्‍णव संप्रदाय के आदि-आचार्य माने जाने वाले चैतन्‍य महाप्रभु ने अनेक ग्रंथों की रचना की, लेकिन आज आठ श्‍लोक वाले शिक्षाष्‍टक के सिवा कुछ नहीं है। शिक्षाष्‍टक में वे कहते हैं कि श्रीकृष्ण ही एकमात्र देव हैं। वे मूर्तिमान सौन्दर्य हैं, प्रेमपरक है। उनकी तीन शक्तियाँ परम ब्रह्म, माया और विलास हैं। वे नारद की भक्ति से प्रभावित थे और उन्‍हीं की तरह कृष्‍ण-कृष्‍ण जपते थे। लेकिन गौरांग पर बहुत ग्रंथ लिखे गए, जिनमें प्रमुख है श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी का चैतन्य चरितामृत, श्रीवृंदावन दास ठाकुर का चैतन्य भागवत, लोचनदास ठाकुर का चैतन्य मंगल, चैतन्य चरितामृत, श्री चैतन्य भागवत, श्री चैतन्य मंगल, अमिय निमाइ चरित और चैतन्य शतक आदि।

चैतन्‍य महाप्रभु ईश्वर को एक मानते है। उन्‍होंने नवद्वीप से अपने छह प्रमुख अनुयायियों को वृंदावन भेजकर वहां सप्त देवालयों की स्‍थापना करायी। उनके प्रमुख अनुयाइयों में गोपाल भट्ट गोस्वामी बहुत कम उम्र में ही उनसे जुड़ गये थे। रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी, रूप गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी आदि उनके करीबी भक्‍त थे। इन लोगों ने ही वृंदावन में सात वैष्णव मंदिरों की स्थापना की। मौजूदा समय में इन्‍हें गोविंददेव मंदिर, गोपीनाथ मंदिर, मदन मोहन मंदिर, राधा रमण मंदिर, राधा दामोदर मंदिर,राधा श्यामसुंदर मंदिर और गोकुलानंद मंदिर कहा जाता है। इन्हें सप्तदेवालय के नाम से भी पहचाना जाता है।

चैतन्य मत के व्यूह-सिद्धान्त का आधार प्रेम और लीला है। गोलोक में श्रीकृष्ण की लीला शाश्वत है। प्रेम उनकी मूल शक्ति है और वही आनन्द का कारण है। यही प्रेम भक्त के चित्त में स्थित होकर महाभाव बन जाता है। यह महाभाव ही राधा है।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों एस टीवी के यूपी ब्‍यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.