जब भाषा की दृष्टि से आदमी बहुत निर्धन रहा होगा, तब भी उसका जीवन, उसका व्यवहार चलता रहा होगा। जब उसके पास प्रेम शब्द नहीं रहा होगा, तब भी वह प्रेम करता रहा होगा, जब करुणा शब्द नहीं रहा होगा, तब भी उसके मन में कई बार करुणा उपजती रही होगी, जब दुख शब्द नहीं रहा होगा तब भी मनुष्य दुखी होता रहा होगा। इसी मायने में मनुष्य के जटिल जीवन में अनेक अर्थ बिना शब्दों के भी  गतिशील रहते हैं। शब्द इन्हीं अर्थों की पहचान बनते हैं। भाषा की दृष्टि से सभ्य जातियां अनपहचानी जटिलताओं के लिए बराबर नये शब्द गढ़ती रही हैं। शब्द एक खोल भर हैं, अपने खास अर्थ या अर्थ समुच्चय के लिए। इस खोल में प्रभावशाली जातियां या वर्ग मनचाहे अर्थ भरती रही हैं, भर सकती हैं और इस तरह वे शब्दों के अर्थ भी बदल सकती हैं।

प्रगति या प्रगतिशीलता को भी इसी तरह समझा जाना चाहिए। जब गति एक संज्ञा के रूप में नहीं रही होगी, तब भी  मनुष्य नदियों को बहते हुए, बूंदों को आसमान से गिरते हुए, पहाड़ों को टूटकर लुढ़कते हुए, भयातुर जानवरों को भागते हुए देखकर उनके अर्थ जानता-समझता रहा होगा, उससे आनंदित या दुखी होता रहा होगा। प्रगति उसी गति की दिशाबोधी व्यंजना है। एक खास दिशा में, एक खास दृष्टि के साथ गति। पर जब इन शब्दों का प्रयोग शुरू हुआ होगा, उससे पहले भी मनुष्य के जीवन में, उसके व्यवहार में प्रगति अपनी अर्थसत्ता के साथ विद्यमान रही होगी। अर्थ की अनुपस्थिति में शब्द असहाय हो सकता है मगर शब्द की अनुपस्थिति के बावजूद अर्थ अपनी शक्ति से चमत्कृत कर सकता है। प्रगतिशीलता, चाहे समाज में हो या साहित्य में या राजनीति में, वह किसी खेमे में नहीं बंध सकती, न ही वह किसी झंडे की मोहताज होती है। जब झंडे नहीं रहे होंगे, तब भी प्रगतिशील चेतना रही होगी।

कबीर, दादू, वाजेद, रज्जब या इसी तरह के अनेक संत कवि जिस तरह सामाजिक रूढ़ियों और पाखंड पर धावा बोलते हैं, जिस तरह अपने समय को लांघकर हमारे समय में भी खड़े दिखते हैं, क्या वे प्रगतिशील नहीं थे। यह अलग बात है कि वे किसी प्रगतिशील संत कवि संघ के सदस्य नहीं थे और उन्होंने कभी कोई कवि या लेखक सम्मेलन नहीं किया। प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की होगी तो उनके मन में भी रहा होगा कि प्रगतिशील रचनाधर्मिता की अपनी परंपरा को समझते हुए उसे और समृद्ध करने में इससे मदद मिलेगी। जब परंपरा की बात करते हैं तो यह एक गतिशील दृष्टि, निरंतरता भरी एक समझ की तरह सामने आती है। वह किसी राजनीतिक दल के खाते में जमा निधि नहीं है। केवल किसी राजनीतिक दल से लेखक की संबद्धता उसे प्रगतिशील बना देगी, यह सोच भी घातक है। तमाम लेखक, कवि जो जनता की तकलीफों, उनकी यातनाओं के प्रति संवेदनशील हैं और उन पर जुल्म करने वाली ताकतों को ठीक से पहचानते हैं, उनके षड्यंत्र, आडंबर और धोखाधड़ी को अपनी गहरी और सूक्ष्म दृष्टि से भेदने की क्षमता से संपन्न हैं, वे बिना किसी राजनीतिक संगठन की बैसाखी के स्वतंत्र रूप से व्यवस्था के समूचे छद्म के खिलाफ अपनी कलात्मक संवेदना, अपनी धारदार रचना से लड़ रहे हैं, बेहतर रच रहे हैं। यह सोचना कि वे प्रगतिशील नहीं हैं, क्योंकि वे किसी खास संगठनी आडंबर से बाहर हैं, बिल्कुल गलत होगा।

एक रचनाकार का या रचनाकारों का संगठन बनाना या संगठन में होना कोई बुराई नहीं है पर रचना कर्म और सांगठनिक गतिविधियों को अलग-अलग रख पाने की खतरनाक चुनौती को निभा पाना बहुत मुश्किल काम है। जब संगठन की सत्ता के आगे रचना की सत्ता बौनी होने लगे, संगठन की औपचारिकताओं में रचनाधर्म का तिरस्कार होने लगे तो लेखक को अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता के आगे सांगठनिक प्रतिबद्धता का विसर्जन कर देना चाहिए। संगठन एक सीमा खड़ी करता है, बांधता है और कई बार अपने सांगठनिक हित में संकीर्ण और प्रतिगामी होने में भी संकोच नहीं करता। किसी रचनाकार के लिए ऐसी स्थितियां मारक होती हैं, वह संगठन को बचाये या अपनी रचनाधर्मिता को। शैली अलग-अलग हो सकती है लेकिन हर बड़ा रचनाकार अपनी परंपरा में कुछ न कुछ जोड़ता है, उसका विस्तार करता है, उसे समकाल के दुख-दर्द की संवेदना से संपन्न, समृद्ध करता है।

चिंतन, रचना और साहित्य की प्रगति में जिसका जितना बड़ा योगदान समय स्वीकार करता है, वह उतना ही बड़ा रचनाकार होता है। वह 'दुखी एक निज भाई' को देखता है तो उसके हृदय पर दुख की छाया पड़े बिना नहीं रहती, भीतर वेदना उमड़े बिना नहीं रहती। उसे 'खुद को ही दिए-दिए फिरना' होता है, बेवकूफ बनने की खातिर ही सब तरफ 'अपने को लिए-लिए फिरना' होता है, यह जानते हुए भी  कि वह ठगा जाने वाला है, उसे 'ठगे जाने का मजा' उठाना ही पड़ता है। उसके शब्द एक 'अकेले आदमी को भी अनेक कालों और अनेक संबंधों मे एक समूह में बदल' देते हैं। निराला हों या मुक्तिबोध या धूमिल, बड़ी रचना हमेशा 'अकेले को सामूहिकता देती है और समूह को साहसिकता।' यही सच्चे अर्थों में प्रगतिशीलता है और यह निर्बंध संवेदना के बूते ही संभव हो पाती है, यह किसी सीमा को नहीं मानती, किसी घेरे को स्वीकार नहीं करती।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.