: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : ‘कुछ नहीं कहेंगे।’ मुनमुन बोली, ‘बेटी जब आप की सुख से रहने लगेगी तो सब के मुंह सिल जाएंगे। हां, अगर रोज़ ऐसे ही छोड़-पकड़ लगी रहेगी तो ज़रूर सब के मुंह खुले रहेंगे। अब आप सोच लीजिए कि क्या करना है आप को?’ वह बोली, ‘जल्दबाज़ी में कोई निर्णय मत लीजिए। अभी घर जाइए। सोचिए-विचारिए। और घर में पत्नी से, बेटी से, परिजनों से विचार विमर्श करिए। ठंडे दिमाग़ से। दो-चार-दस दिन में आइए। फिर फ़ैसला करते हैं कि क्या किया जाए?’

‘ठीक बहिनी!’ कह कर वह बेटी को ले कर चला गया। दो दिन बाद फिर वह आया। बेटी को साथ ले कर। और मुनमुन से बोला, ‘हम ने फ़ैसला कर लिया है। अब आप जो कहिए, जैसे कहिए हम सब कुछ करने को तैयार हैं।’

‘अच्छी बात है।’ मुनमुन उस की बेटी की तरफ़ देखती हुई बोली, ‘क्या तुम भी तैयार हो?’

पर वह कुछ बोली नहीं। चुपचाप कुर्सी पर बैठी नीचे की ज़मीन पैर के अंगूठे से कुरेदती रही। ऐसे गोया कुछ लिख रही हो पैर के अंगूठे से।

‘पैर के अंगूठे से नहीं, हौसले से अपनी क़िस्मत लिखनी होती है।’ मुनमुन बोली, ‘अगर तुम तैयार हो तो स्पष्ट रूप से हां कहो और नहीं हो तो ना कहो। बिना तुम्हारी मंज़ूरी या मर्ज़ी के कुछ नहीं करने वाली मैं।’

वह फिर चुप रही। हां, अंगूठे से ज़मीन कुरेदना बंद कर दिया था उस ने।

‘तो तैयार हो?’ मुनमुन ने अपना सवाल फिर दुहराया।

‘जी दीदी!’ वह धीरे से बोली।

‘तो चलो फिर थाने चलते हैं।’ वह ज़रा रुकी और बोली, ‘पर पहले एक वकील पकड़ना पड़ेगा।’

‘वह किस लिए?’ लड़की के पिता ने अचकचा कर पूछा।

‘एफ़.आई.आर. का ड्रा़ट लिखवाने के लिए।’

‘तो वकील तो पैसा लेगा।’

‘हां लेगा तो।’ मुनमुन बोली, ‘पर ज़्यादा नहीं।’

‘पर मैं तो अभी किराया भाड़ा छोड़ कर कुछ ज़्यादा पैसा लाया नहीं हूं।’

‘कोई बात नहीं।’ मुनमुन बोली, ‘वकील को पैसे बाद में दे दीजिएगा। अभी सौ पचास रुपए तो होगा ही, वह टाइपिंग के लिए दे दीजिएगा।’

‘ठीक है!’

वकील के पास जा कर पूरा डिटेल बता कर, नमक मिर्च लगा कर एफ़.आई.आर. की तहरीर टाइप करवा कर मुनमुन बाप बेटी को ले कर थाने पहुंची। थाने वाले ना नुकुर पर आए तो वह बोली, ‘क्या चाहते हैं आप लोग सीधे डी.एम. या एस.एस.पी से मिलें इस के लिए? या थ्रू कोर्ट आर्डर करवाएं?’ वह बोली, ‘एफ़.आई.आर. तो आप को लिखनी ही पड़ेगी। चाहे अभी लिखें या चार दिन बाद!’

अब थानेदार थोड़ा घबराया और बोला, ‘ठीक है तहरीर छोड़ दीजिए। जांच के बाद एफ़.आई.आर. लिख दी जाएगी।’

‘और जो एफ़.आई.आर. लिख कर जांच करिएगा तो क्या ज़्यादा दिक्क़त आएगी?’ मुनमुन ने थानेदार से पूछा।

‘देखिए मैडम हमें हमारा काम करने दीजिए!’ थानेदार ने फिर टालमटोल किया।

‘आप से फिर रिक्वेस्ट कर रहे हैं कि एफ़.आई.आर. दर्ज कर लीजिए। मामला डावरी एक्ट का है। इस में आप की भी बचत ज़्यादा है नहीं। और जो नहीं लिखेंगे अभी एफ़.आई.आर. तो इसी वक्त शहर जा कर डी.एम. और एस.एस.पी. से मिल कर आप की भी शिकायत करनी पड़ेगी। आप का नुक़सान होगा और हमारी दौड़ धूप बढ़ेगी बस!’ थानेदार मान गया। रिपोर्ट दर्ज हो गई। लड़की के ससुराल पक्ष का पूरा परिवार फ़रार हो गया। घर में ताला लगा कर जाने कहां चले गए सब। रिश्तेदारी, जान-पहचान सहित तमाम संभावित ठिकानों पर छापा डाला पुलिस ने। पर कहीं नहीं मिले सब। महीना बीत गया। महीने भर बाद ही पारिवारिक अदालत में मुनमुन ने लड़की की ओर से गुज़ारा भत्ता के लिए भी मुक़दमा दर्ज करवा दिया। अब ससुराल पक्ष की ओर से एक वकील मिला बाप बेटी से। वकील ने लड़की के पिता से कहा कि, ‘सुलहनामा कर लो और वह लोग तुम्हारी बेटी को विदा करा ले जाएंगे।’

लड़की के पिता ने मुनमुन से पूछा कि, ‘क्या करें?’

‘करना क्या है?’ वह बोली, ‘मना कर दीजिए। और कोई बात मत कीजिए। अभी जब कुर्की की नौबत आएगी तब पता चलेगा। देखें, कब तक सब फ़रार रहते हैं।’

‘पर वह लोग बेटी को विदा कराने के लिए तैयार हैं।’

‘कुछ नहीं। यह मजबूरी की पैंतरेबाज़ी है। कुछ भी कर लीजिए वहां अब आप की बेटी जा कर कभी ख़ुश नहीं रह पाएगी।’

‘क्यों?’

‘क्यों कि गांठ अब बहुत मोटी पड़ गई है।’ मुनमुन बोली, ‘थोड़े दिन और सब्र कीजिए। और दूसरे विवाह के लिए रिश्ता खोजिए। इन सब को भूल जाइए।’

और अंततः सुलहनामा हुआ। मुनमुन के कहे मुताबिक़ लड़की के पिता ने दस लाख रुपए बतौर मुआवजा मांगा। बात पांच लाख पर तय हुई। दोनों के बीच तलाक़ हो गया। लड़की के पिता ने इस पांच लाख रुपए से लड़की की दूसरी शादी कर दी। लड़की के बारे में सब कुछ पहले से बता दिया। कटी अंगुली से लगायत पूर्व विवाह तक। कोई बात छुपाई नहीं। एक दिन लड़की अपने दूसरे पति के साथ मुनमुन से मिलने आई। लिपट कर रो पड़ी। मुनमुन भी रोने लगी। यह ख़ुशी के आंसू थे। बाद में लड़की बोली, ‘दीदी आप ने मुझे नरक से निकाल कर स्वर्ग में बिठा दिया। ये बहुत अच्छे हैं। मुझे बहुत मानते हैं।’ फिर उस ने धीरे से जोड़ा, ‘दीदी अब आप भी शादी कर लीजिए!’

मुनमुन चुप रह गई। कुछ देर तक दोनों चुप रहीं। और वो जो कहते हैं न कि इतिहास जैसे अपने को दुहरा रहा था। मुनमुन कुर्सी पर बैठे-बैठे पैर के अंगूठे से नीचे की मिट्टी कुरेद रही थी।

‘दीदी बुरा न मानिए तो एक बात कहूं?’ चुप्पी तोड़ती हुई लड़की बोली।

‘कहो।’ मुनमुन धीरे से बोली।

‘छोटा मुंह और बड़ी बात!’ लड़की बोली, ‘पर दीदी आप ने ही एक बार यहीं बैठे-बैठे मुझ से कहा था कि पैर के अंगूठे से नहीं, हौसले से अपनी क़िस्मत लिखनी होती है!’

‘अच्छा-अच्छा!’ कह कर मुनमुन धीरे से मुसकुराई।

‘तो दीदी आप भी शादी कर लीजिए!’ लड़की ने जैसे मनुहार की।

‘अब मेरे नसीब में जाने क्या लिखा है मेरी बहन!’ कह कर उस लड़की को पकड़ कर वह फफक पड़ी, ‘समझाना आसान होता है, समझना मुश्किल!’ कह कर वह उन दोनों से हाथ जोड़ती हुई, रोती हुई घर के भीतर चली गई। रोना घोषित रूप से छोड़ देने के बाद आज मुनमुन पहली बार ही रोई थी। सो ख़ूब रोई। बड़ी देर तक। तकिया भीग गया। जल्दी ही मुनमुन फिर रोई। चनाजोर गरम बेचने वाले तिवारी जी का निधन हो गया था। वह पता कर के उन के घर गई और तिवारी जी की विधवा वृद्धा पत्नी के विलाप में वह भी शामिल हो गई। फिर बड़ी देर तक रोई। तिवारी जी ने उस के नाम से चनाजोर गरम बेच कर जो मान, स्वाभिमान और आन बख़्शा था, वह उस की ज़िंदगी का संबल बन गया था, यह बात वह तिवारी जी के निधन के बाद उन के घर जा कर महसूस कर पाई। शायद इसी लिए उस का रुदन श्रीमती तिवारी के रुदन में अनायास मिल गया था। ऐसे जैसे छलछलाती यमुना गंगा से जा मिलती है। मिल कर शांत हो जाती है। फिर साथ-साथ बहती हुई एकमेव हो गंगा बन जाती है। और वो जो कहते हैं न कि पाट नदी का यमुना की वजह से चौड़ा होता है, पर नाम गंगा का होता है। तो यहां भी बाद में रोई ज़्यादा मुनमुन पर श्रीमती तिवारी का विलाप सब ने ज़्यादा सुना। गंगा के पाट और श्रीमती तिवारी के विलाप का यह एकमेव संयोग भी जाने क्यों मुनमुन का रुदन नहीं रोक पा रहा था। घर में तो तकिया भीग गया था। पर यहां क्या भीगा? क्या यह बहुत दिनों तक मुनमुन के नहीं रोने की ज़िद थी? कि सावन भादो में सूखा पड़ा था और क्वार कार्तिक में बाढ़ आ गई। इतनी कि बांध टूट गया! यह कौन सा मनोभाव था?

समझा रही हैं मुनमुन की अम्मा भी मुनमुन को कि, ‘अब तुम या तो अपनी ससुराल जाने का मन बनाओ और जाओ। और जो वहां न जाने की ज़िद है तो दूसरा विवाह ढूंढ कर कर लो। इस-उस के साथ घूमने से तो यही अच्छा है!’

‘क्या करें अम्मा!’ मुनमुन कहती है, ‘साथ घूमने-सोने के लिए तो सभी तैयार रहते हैं हमेशा! पर शादी के लिए कोई नहीं।’ वह जोड़ती है, ‘इस के लिए तो सब को दहेज चाहिए!’

‘तो दूसरों को दहेज बटोरने का टोटका बता सकती हो। दहेज का मुक़दमा लिखवा कर, गुज़ारा भत्ता का मुक़दमा लिखवा कर लाखों का मुआवज़ा दिलवा कर दहेज जुटा कर दूसरी शादी का रास्ता सुझा सकती हो तो ख़ुद अपने लिए यह रास्ता क्यों नहीं अख़्तियार कर सकती हो?’

‘इस लिए नहीं कर सकती अम्मा कि यह सब कर के मैं अपने तौर पर उस शादी को मान्यता दे बैठूंगी जिस को कि मैं शादी नहीं मानती!’ मुनमुन कहती है, ‘मैं यह नहीं करने वाली!’

‘लोग बदल गए, चीज़ें बदल गईं। तुम्हारे सब भाई तक बदल गए। पर तुम और तुम्हारे बाबू जी नहीं बदले।’

‘ऐसे तो बदलेंगे भी नहीं अम्मा।’ वह बोली, ‘कि बेबात सब के आगे घुटने टेक देंगे। स्वाभिमान और आन गिरवी रख देंगे? हम इस तरह तो नहीं बदलेंगे अम्मा!’

क्यों नहीं बदलती मुनमुन? और उस के बाबू जी! यह एक नहीं, अनेक जन का यक्ष प्रश्न है! घनश्याम राय का भी यह प्रश्न है। भले ही वह इस प्रश्न का उत्तर भी साथ ले कर घूमने लगे हैं। जैसे कि कहीं बात चली कि, ‘आप का लड़का जब लुक्कड़, पियक्कड़ और पागल है तो मुनमुन जैसी लड़की कैसे रह सकती है उस के साथ?’ तो घनश्याम राय का जवाब था कि, ‘लड़का हमारा पागल और पियक्कड़ है। मैं तो नहीं। मैं रख लूंगा मुनमुन को। दिक्क़त क्या है?’

सवाल करने वाला शर्मिंदा हो गया पर घनश्याम राय नहीं। सवाल करने वाले ने टोका भी कि, ‘क्या कह रहे हैं राय साहब, बहू भी बेटी समान होती है।’

‘तो?’ घनश्याम राय ने तरेरा।

घनश्याम राय का यह जवाब बड़ी तेज़ी से सब तक पहुंचा। मुनमुन तक भी। सुन कर वह बोली, ‘मैं शुरू से ही जानती हूं कि वह कुत्ता है। अघोड़ी है।’

फिर उस ने घनश्याम राय को फ़ोन कर उन की जितनी लानत-मलामत कर सकती थी किया। और कहा कि, ‘आइंदा जो ऐसी वैसी बात कही तो तुम्हारे बेटे को तो अपने दरवाज़े पर जुतियाया था, तुम्हें तुम्हारे दरवाज़े पर ही जुतियाऊंगी!’

‘इतनी हिम्मत हो गई है तेरी!’ घनश्याम राय ने हुंकार तो भरी पर डर भी गए और फ़ोन काट दिया।

फिर एक वकील से मशविरा किया। और मुनमुन की विदाई के लिए मुक़दमा दायर कर दिया। मुनमुन को जब इस मुक़दमे का सम्मन मिला तो वह मुसकुराई। वकील की बेटी थी सो तुरंत जवाब दाखिल करने के बजाय तारीख़ें लेने लगी। तारीख़ों और आरोपों के ऐसे मकड़जाल में उसने घनश्याम राय को उलझाया कि वह हताश हो गए। मुनमुन कचहरी में घनश्याम राय और उस के बेटे राधेश्याम राय को ऐसे तरेर कर देखती कि दोनों भाग कर अपने वकील के पीछे छुप जाते। कि कहीं मुनमुन भरी कचहरी में पीट न दे। लेकिन मुनमुन का सारा जोश, सारी बहादुरी घर में आ कर दुबक जाती। अम्मा तो पहले ही कंकाल बन कर रह गई थीं, बाबू जी भी कंकाल बनने की राह पर चल पड़े थे। कंधा और कमर भी उन की थोड़ी-थोड़ी झुकने लगी थी। चेहरा पिचक गया था। एक तो मुनमुन की चिंता, दूसरे बेटों की उपेक्षा, तीसरे विपन्नता और बीमारी ने उन्हें झिंझोड़ कर रख दिया था। यह सब देख कर मुनमुन भी टूट जाती। इतना कि अब वह मीरा बनना चाहती थी। ख़ास कर तब और जब कोई अम्मा बाबू जी से पूछता, ‘जवान बेटी कब तक घर में बिठा कर रखेंगे?’

]वह मीरा बन कर नाचना चाहती है। मीरा के नाच में अपने तनाव, अपने घाव, अपने मनोभाव को धोना चाहती है। नहीं धुल पाता यह सब कुछ। वह अम्मा बाबू जी दोनों को ले कर अस्पताल जाती है। दोनों ही बीमार हैं। डाक्टर भर्ती कर लेते हैं। एक वार्ड में बाबू जी, एक वार्ड में अम्मा। वह चाहती है कि दोनों को एक ही वार्ड मिल जाता तो अच्छा था। डाक्टरों से कहती भी है। पर डाक्टर मना कर देते हैं कि पुरुष वार्ड में पुरुष, स्त्री वार्ड में स्त्री। अब उस के अम्मा बाबू जी पुरुष और स्त्री में तब्दील हैं। तो वह ख़ुद क्या है? वह सोचती है। सोचते-सोचते सुबकने लगती है। हार कर रीता दीदी को फ़ोन कर के सब कुछ बताती है। बताती है कि, ‘अकेले अब वह सब कुछ नहीं संभाल पा रही है। पैसे भी नहीं हैं अब।’

‘भइया लोगों को बताया?’ रीता ने पूछा।

‘मैं भइया लोगों को बताने वाली भी नहीं रीता दीदी। तुम्हें जाने कैसे बता दिया। और अब मेरे फ़ोन में पैसा भी ख़त्म होने वाला है। बात करते-करते कभी भी बात कट सकती है!’

‘ठीक है तुम रखो मैं मिलाती हूं।’ रीता बोली।

लेकिन फिर रीता का फ़ोन नहीं आया। मुनमुन ही अम्मा बाबू जी को ले कर वापस घर आती है। स्कूल के हेड मास्टर ने मदद की है। पैसे से भी और अस्पताल से आने में भी। घर आ कर बाबू जी पूछ रहे हैं आंख फैला कर मुनमुन से, ‘बेटी ऐसा कब तक चलेगा भला?’

‘जब तक चल सकेगा चलाऊंगी। पर अगर आप चाहते हैं कि अन्यायी और अत्याचारी के आगे झुक जाऊं, तो मैं हरगिज़ झुकूंगी नहीं। चाहे जो हो जाए!’ कह कर वह किचेन में चली गई। चाय बनाने।

बिजली चली गई है। वह किचेन से देख रही है आंगन में चांदनी उतर आई है। वह फुदक कर आंगन में आ जाती है, चांदनी में नहाने। ऐसे जैसे वह कोई मुनमुन नहीं गौरैया हो! उधर किचेन में भगोने में चाय उबल रही है और वह सोच रही है कि सुबह सूरज उगेगा तो वह क्या तब भी ऐसे ही नहाएगी सूरज की रोशनी में, जैसे चांदनी में अभी नहा रही है। उधर चांदनी में नहाती अपनी बिटिया को देख कर श्रीमती मुनक्का राय के मन में उस के बीते दिन, बचपन के दिन तैरने लगे हैं किसी सपने की तरह और वह गाना चाह रही हैं मेरे घर आई एक नन्हीं परी, चांदनी के हसीन रथ पे सवार! पर वह नहीं गा पातीं। न मन साथ देता है, न आवाज़! वह सो जाती हैं। किचेन में चाय फिर भी उबल रही है!

जारी...

अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। 33 साल हो गए हैं पत्राकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नहीं पर प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह 'एक जीनियस की विवादास्पद मौत' पर यशपाल सम्मान। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, फेसबुक में फंसे चेहरे, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब 'माई आइडल्स' का हिंदी अनुवाद 'मेरे प्रिय खिलाड़ी'  नाम से प्रकाशित। दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है. इस उपन्‍यास के पहले के भागों को पढ़ने के लिए नीचे आ रहे हेडिंगों पर क्लिक करें. दयानंद पांडेय के अन्‍य लेखों को पढ़ने के लिए सर्च बाक्‍स में उनका नाम डालकर खोजें.