कवियों, लेखकों, कलाकारों के लिए मेरे मन में बचपन से ही सम्मान और श्रद्धा का भाव रहा है। जब कभी मेरे गृहनगर में कोई कवि-सम्मेलन होता, मैं जरूर पहुंचता और मंच पर मसनदों पर खुद को टिकाये हुए मनोहारी वेश-·भूषा में सजे-धजे, मधु-कंठालापी कविजनों को देखकर अनायास ही उनकी देवदूत छवि से आकर्षित होता, प्रणामातुर उनके पास पहुंचने की कोशिश करता। तब मैं साहित्य और कला के विविध रूपों से लगभग अपरिचित था। जैसे-जैसे थोड़ा बड़ा हुआ; कविता, कहानी, आलोचना की शास्त्रीयता से परिचित हुआ, उनके वादों-विवादों से दो-चार हुआ और आलोचनाचार्यों की पसंद-नापसंद, उनकी सदाशयता-निरंकुशता, उनकी गुटबंदी, बाड़बंदी और घेरेबंदी की चरम कला के आस्वाद को महसूसना शुरू किया, कुछ सवाल त्रस्त करने लगे। उनके जवाब अपने मित्रों से पूछता रहा हूं, बहस करता रहा हूं, उनकी नाराजगी, उनके आरोप भी झेलता रहा हूं।

क्या रचनाएं बदलाव में कोई भूमिका निभाती हैं? क्या जिनकी पीड़ा, जिनके कष्ट, जिनकी यातना के बीज से रचना उपजती है, उनके दर्द को कुछ कम कर पाती है? गोष्ठियों, सेमिनारों में हम चाहे कला और रचना की शैली, उसकी भाषा, उसके माध्यम, उसके कथ्य पर जितनी बातें कर लें, उनकी श्रेष्ठता के जितने व्याकरण गढ़ लें पर क्या उन मानकों में कहीं भी उसके सामाजिक प्रभाव, परिवर्तन में उसकी भूमिका और यातनाग्रस्त जन की पीड़ामुक्ति में उसके दखल को भी शामिल किया जाता है? क्या रचना केवल रचनाकार के मूल्यांकन का उपकरण भर तो नहीं रह गयी है? कहीं इसीलिए तो लेखक और कवि बनने की होड़ नहीं मची हुई है? कुछ कविताएं, कुछ कहानियां किसी को भी अमर कर देंगी, इस प्रत्याशा में उन लोगों ने भी कलम उठा ली हैं, जो जनता की पीड़ा बढ़ाने वाली व्यवस्था में स्वयं शामिल हैं, जो स्वयं शोषक की भूमिका में हैं। ऐसे साक्षर लोग, जो किसी लिपि में लिखना भर जानते हैं लेकिन जिनके पास किताबें छपवा लेने की कूवत है, जो आर्थिक रुप से संपन्न है, उनका भी लेखक और कवि बन जाना सहज संभाव्य है। वे महान कवि हैं, अनूठे साहित्यकार हैं, ऐसी टिप्पणी वे आसानी से किसी आचार्य से हासिल कर लेते हैं।

बेशक समय उन्हें कचरे की तरह फेंक देगा, जो कूड़े हैं, उन्हें कूड़ेदान में जाना होगा लेकिन जिनमें रचना की शक्ति है, जिनके शब्दों में चमक है, जिनमें जनता के दर्द को प्रस्तुत करने का चमत्कारिक कौशल है, उनकी रचनाओं का क्या? क्या वे सिर्फ उसी तरह के कुछ रुचिसंपन्न, संवेदनशील लोगों को पढ़ते समय आह्लाद, उत्तेजना और रोमांच से भर देने भर का काम करती हैं, कुछ तुकांतप्रेमी साहित्यानुरागियों के मनोरंजन तक सीमित रहती हैं या फिर कोई और बड़ा काम करती हैं। साहित्य और कला समूची दुनिया में, जीवन और भूगोल के लगभग हर क्षेत्र में अपना महत्व रखती रही है, इसलिए उसके कलात्मक महत्व से किसी को इनकार नहीं है पर इससे परे जीवन को बदलने में उनका कितना हस्तक्षेप है? ये सवाल अनायास नहीं हैं, आज की परिस्थितियों में मेरे जैसे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के मन में उठ सकते हैं।

कितना अजीब लगता है कि कोई भी भ्रष्ट, बेईमान और उचक्का टाइप नेता अपनी सभाओं में गालिब, मीर, दिनकर, दुष्यंत, धूमिल और तमाम कवियों की चमकदार पंक्तियों का इस्तेमाल कर तालियां बटोर लेता है। भीड़ में से उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती, कोई हाथ नहीं उठता। कोई यह कहने का साहस नहीं दिखाता कि इस तरह दुष्यंत या धूमिल को किसी झूठ, पाखंड या षड्यंत्र के पक्ष में इस्तेमाल करने का उसे कोई अधिकार नहीं है। इसी तरह दूसरों का हक मारने वाले, आततायी और जनविरोधी पापाचार में संलिप्त तमाम लोग सूफी संगीत और मानस पाठ की आड़ में अपनी असली छवि छिपाये रखने की कोशिश करते दिखते हैं। परहित सरिस धरम नहिं भाई या झीनी-झीनी रे बीनी चदरिया के साप्ताहिक या मासिक कोलाहल में वे तप जाते हैं, सोने की तरह निखर कर प्रस्तुत होते हैं। निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय या आज के कवियों की रचनाएं अगर आम लोगों की समझ के दायरे में होतीं तो बे भी  समाजविरोधी सफेदपोशों की महफिलों में इस्तेमाल की जा रही होतीं।

इससे भी बड़ा संकट है रचनाओं के लोक तक पहुंचने का, उनकी समझ को भेद पाने का। छोटी-छोटी पत्रिकाएं ये जिम्मेदारी निभाने का दावा तो करती हैं लेकिन उनकी पहुंच कितनी है, कहां तक है। संपादकों और लेखकों तक। जो रचनाकार हैं, वही पाठक भी हैं, वही आस्वादक भी हैं। कला या रचना का जो सबसे महत्वपूर्ण धर्म है, वह उसी से छूटती जा रही है, वह किताबों में, पुस्तकालयों में बंद होकर रह जाती है। लेखकों, रचनाकारों, कवियों की भरमार है लेकिन सामर्थ्य की दृष्टि से बड़ी संभावना कहीं दिखायी नहीं पड़ती। मूल्यांकन के स्थापित मानकों के अभाव में रचना की श्रेष्ठता निजी पसंद-नापसंद के आधार पर तय होने लगी है। बड़े आलोचकों के अपने-अपने खेमे हैं, मठ हैं। मिजाज और व्यवहार में वे उन्हीं धर्माधिकारियों की तरह काम करते दिखायी पड़ते हैं, जो जनता को गुमराह कर, लोगों को बांटकर लड़ाते रहने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते हैं। वे जिसे चाहें कालजयी घोषित कर दें, जिसे चाहें खारिज कर दें। ऐसे परिदृश्य में जिन्हें समय से सवाल करना चाहिए, वे रचनाएं क्या स्वयं ही सवालों में नहीं हैं?

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.