‘मामला सुलझाने के लिए ही यह सब करने को कह रहा हूं दीपक बाबू।’ घनश्याम राय बोले, ‘पर आप तो बुरा मान गए। और जो आप पारिवारिक मामला बता रहे हैं, वह सचमुच पारिवारिक कहां रहा? समाज में तो हमारी पगड़ी उछल गई है। और बांसगांव में?’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘बांसगांव में आदमी-आदमी की ज़बान पर हैं मुनमुन की कहानियां। विश्वास न हो तो किसी पान वाले, खोमचे वाले, ठेले वाले से जा कर पूछ लीजिए। आंख मूंद कर बता देगा। तो अब भी आप कहंगे कि मामला पारिवारिक है?’

‘हां, है यह मामला पारिवारिक ही। और परिवार के स्तर पर ही मामला निपटाया जाएगा।’ दीपक बोला, ‘और जो आप को लगता है कि मैं बाहरी हूं तो चलिए मैं अपने को इस बातचीत से अलग कर लेता हूं। मैं नहीं आऊंगा। सिर्फ़ धीरज ही जाएगा।’

‘अरे तब तो ग़ज़ब हो जाएगा!’ घनश्याम राय बोले, ‘आप अवश्य आइए। नहीं धीरज बाबू हों चाहे रमेश बाबू ई लोग तो हरदम ऐसे बात करते हैं जैसे कोई आदेश लिखवा रहे हैं। डिक्टेशन दे देते हैं और बात ख़त्म। अगले पक्ष की बात ही नहीं सुनते।’

‘पर आप के हिसाब से तो मैं बाहरी आदमी हूं।’

‘हैं तो पर आप आइए परिवार के ही बन कर ताकि यह झंझट ख़त्म हो।’

‘चलिए ठीक है।’ दीपक खीझता हुआ बोला, ‘पर कोई वकील नहीं, कोई स्टैम्प पेपर नहीं।’

‘ए भाई, ई तो आप भी डिक्टेशन देने लगे।’ घनश्याम राय बोले, ‘आप भी मास्टर हैं, मैं भी मास्टर हूं। हम लोग तो मास्टरों की तरह बात करें। अधिकारियों की तरह नहीं।’

‘घनश्याम जी मैं प्रोफ़ेसर हूं मास्टर नहीं जैसा कि आप समझ रहे हैं।’

‘चलिए प्रोफ़ेसर साहब अब आप का लेक्चर ही सुन लेते हैं डिक्टेशन की जगह।’ घनश्याम राय बोले, ‘पर बातचीत में कोई सुलहनामा तो करना ही पड़ेगा। भले ही किसी सादे क़ाग़ज पर ही क्यों न किया जाए। और हां, एक बात और जो मैं पहले भी कह चुका हूं कि हमारे घर में रहने के लिए मुनमुन को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ेगी।’

‘चलिए कोई रास्ता निकलेगा तो यह देख लिया जाएगा।’ दीपक ने कहा, ‘तो हम लोग उस दिन, दिन के 11-12 बजे मिलेंगे।’

‘जैसा आप का हुकुम प्रोफ़ेसर साहब!’

‘ओ.के. घनश्याम जी!’ कह कर दीपक ने फ़ोन काट दिया। फिर मुनमुन और धीरज को तारीख़ समय और जगह की सूचना देते हुए एस.एम.एस. कर दिया। धीरज को एक एस.एम.एस. और किया कि वह कौड़ीराम का डाक बंगला उस दिन के लिए आरक्षित करवा ले। बाद में धीरज का कनफ़र्मेशन भी आ गया। पर मुनमुन का कोई जवाब नहीं आया। दीपक ने पत्नी से यह सब बताते हुए घनश्याम राय की वकील, स्टैम्प पेपर और सुलहनामे वाली तफ़सील बताई तो पत्नी बोली, ‘फिर वह आदमी बहुत ही काइयां है और डरपोक भी।’

‘मतलब?’

‘वह एक साथ दो निशाने साध रहा है।’

‘क्या मतलब?’

‘पहला काम वह यह कर रहा है कि विदाई का मामला वह आन रिकार्ड करना चाहता है। ताकि कभी बात और बिगड़ने पर मुनमुन लोग दहेज वाला मुक़दमा लिखवाएं तो उसे ज़मानत के लिए ग्राउंड बना ले कि मामला दहेज का नहीं विदाई का है। दूसरे, विदाई न हो तो इसी ग्राउंड पर वह तलाक़ फ़ाइल कर देगा।’

‘बड़ा धूर्त है साला।’ दीपक खीझ कर बोला।

‘आप असल में हर मामला भावुकता में ले लेते हैं। और यह मामला अब भावुकता का नहीं लगता मुझको। अब यह मामला दांव पेंच का हो गया है। अब वह दहेज विरोधी मुक़दमे से बचने और तलाक़ लेने की जुगत में है।’ दीपक की पत्नी बोली, ‘अब वह मुनमुन नाम की झंझट से छुटकारा पाना चाहता है।’

‘तो अब क्या किया जाए?’ दीपक सिर पकड़ कर बोला।

‘कुछ नहीं। मेरी मानिए तो अभी जाने-वाने का कार्यक्रम कैंसिल कीजिए। नहीं यश मुश्किल से मिलता है और अपयश बहुत जल्दी।’ दीपक की पत्नी बोली, ‘कुछ दिन के लिए मामला यों ही छोड़ दीजिए। भूल जाइए सब कुछ। ठीक होना होगा तो अपने आप सब ठीक हो जाएगा। समय बहुत कुछ करवा देता है। नहीं अभी हड़बड़ी में वह तलाक़ के ग्राउंड तलाश कर तलाक़ का मुक़दमा दायर कर देगा और ठीकरा आप के माथे फूटेगा कि आप ने तलाक़ करवा दिया।’

‘इतनी जल्दी तलाक़ मिलता है कहीं हिंदू विवाह में?’

‘दोनों पक्ष जब तैयार हों तो मिल भी जाता है।’

‘तो?’

‘कुछ नहीं सब कुछ भूल कर सो जाइए।’ दीपक की पत्नी बोली। पर दीपक सोने की बजाय जा कर कंप्यूटर पर बैठ गया। नेट कनेक्ट किया। और राहुल को सारी बातों के मद्देनज़र तफ़सील में एक चिट्ठी लिखी। और बताया कि थोड़े दिन शांत रह जाना ही ठीक है। दूसरे दिन राहुल की संक्षिप्त सी, हताश सी चिट्ठी आई। उस ने लिखा, ‘ठीक है जैसा आप उचित समझिए।’ फिर उसी दिन मुनमुन की मिस काल आई। दीपक ने मुनमुन को तुरंत फ़ोन मिलाया। मुनमुन उधर से बिलकुल फायरी हो रही थी, ‘भइया आप समझौते की बात कर रहे हैं और वह दुष्ट यहां रह-रह कर ख़ुराफ़ात कर रहा है। आज वह फिर आया था।’

‘कौन राधेश्याम?’

‘हां, मैं तो थी नहीं। स्कूल गई थी। बाबू जी कचहरी में थे। उस ने अम्मा की ऐसी पिटाई की कि मुंह फूट गया, हाथ में फ्रै़क्चर हो गया। बचाने आई एक पड़ोसन को भी उस ने पीटा। उस का पैर टूट गया। बताइए अब क्या करूं?’ वह बोली, ‘मन तो करता है जाऊं अभी उस को गोली मार दूं!’

‘गोली कैसे मारोगी?’

‘अरे भइया बांसगांव में रहती हूं। कट्टा खुले आम मिलता है। जिसे आप लोग इंगलिश में कंट्री गन कहते हैं।’

‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात करती हो!’ दीपक बोला, ‘यह सब करने की ज़रूरत नहीं है तुम्हें।’

‘तब?’

‘मैं कुछ करता हूं।’

‘चलिए कर लीजिए आप भी।’

‘कुछ अंट शंट मत करना मुनमुन। मैं तुम्हें बाद में फ़ोन करता हूं। फ़ोन क्या एस.एम.एस. करता हूं।’

‘ठीक है भइया, प्रणाम।’

दीपक ने तुरंत घनश्याम राय को फ़ोन मिलाया। उन की पत्नी ने फ़ोन उठाया और बताया कि, ‘राय साहब तो कहीं गए हैं। रात तक आएंगे।’

‘और राधेश्याम?’

‘हां, ऊ तो है।’

‘ज़रा बात कराएंगी?’

‘आप कौन बोल रहे हैं?’

‘मैं दिल्ली से दीपक राय हूं।’

‘रुकिए बुलाती हूं।’ कह कर उन्हों ने राधेश्याम को आवाज़ दी, ‘देखो कोई दिल्ली से फ़ोन आया है।’ थोड़ी देर में राधेश्याम आया। बोला, ‘हलो कौन बोल रहा है?’

‘मैं दिल्ली से दीपक राय बोल रहा हूं।’

‘तुम कौन हो? क्या काम है?’

‘मुनमुन मेरी ममेरी बहन है।’

‘अच्छा बोलो!’ वह भड़कता हुआ बोला, ‘क्या तुम भी उस के आशिक़ हो?’

‘क्या बेवक़ू़फ़ी की बात करते हो?’ दीपक चिढ़ कर बोला, ‘बता रहा हूं कि मेरी बहन है।’

‘अच्छा बोलो।’ कह कर राधेश्याम ने मां बहन दोनों गालियों से न्यौता।

‘देखो गाली मत बको।’

‘चलो नहीं बकता अब बोलो।’

‘यह बताओ कि आए दिन बांसगांव जा कर तुम गाली गलौज और मार पीट क्यों करते हो?’

‘शौक़ है मेरा। मुझे अच्छा लगता है। तुम से मतलब?’ कह कर फिर उस ने गालियों की जैसे बौछार कर दी।

‘तुम अभी भी पिए हुए हो क्या?’

‘तुम से मतलब?’ गालियां देते हुए राधेश्याम बोला, ‘तुम्हारे बाप ने पिलाई है क्या?’

‘ओ़फ़ तुम से तो बात करना भी मुश्किल है।’

‘तो मत करो।’

‘तुम्हें पता है तुम्हारी हरकतों की पुलिस में रिपोर्ट हो सकती है। तुम गिऱफ्तार भी हो सकते हो?’

‘अभी उस तेलिया ने मुनमुन की मां को पटक कर मारा उस के जने उस तेली का कुछ नहीं कर पाए तो मेरा क्या कर लेंगे साले सब!’ उस ने फिर तीन चार गालियां बकीं और बोला, ‘तुम को भी जो उखाड़ना हो उखाड़ लो।’

‘तुम तो सचमुच बहुत बदतमीज़ हो।’

‘हां, हूं आओ मेरी नोच लो।’

‘ओ़फ़! कह कर दीपक ने फ़ोन काट दिया। थोड़ी देर अनमना हो कर वह बैठा रहा। फिर दुबारा घनश्याम राय के घर फ़ोन मिलाया तो उन की बेटी ने फ़ोन उठाया।

‘बेटी ज़रा अपनी मम्मी से बात कराएंगी?’

‘हां, अंकल होल्ड कीजिए!’ थोड़ी देर में वह फ़ोन पर आईं तो दीपक ने अपना परिचय बताते हुए कहा कि, ‘अभी राधेश्याम ने जो गालियां हमें दी हैं आप ने सुनी ही होंगी।’

‘भइया इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का पढ़ा हुआ लड़का है ज़रा गाली दे भी दिया तो क्या हुआ?’

‘अरे मां हो कर भी आप क्या कह रहीं हैं?’

‘ठीक कह रही हूं।’

‘आप को पता है कि वह बांसगांव भी जा कर गाली गलौज और मारपीट करता है?’

‘करता होगा।’ वह बोलीं, ‘वह लोग भी तो विदाई नहीं कर रहे। कितनी बेइज़्ज़ती हो रही है हमारे ख़ानदान की।’

‘इज़्ज़त है भी आप की और आप के ख़ानदान की?’ दीपक भड़क गया।

‘अब इस का जवाब आप को राधेश्याम और हमारे राय साहब ही दे सकते हैं। हम तो औरत हैं। आप को शोभा नहीं देता यह पूछना हम से। मर्दों से पूछिए।’ वह ज़रा रुकीं और भड़क कर बोलीं, ‘बुलाती हूं राधेश्याम को वही आप को हमारे ख़ानदान की इज़्ज़त कितनी है बताएगा!’

दीपक ने फ़ोन काट दिया। वह समझ गया कि कुएं में ही भांग पड़ी हुई है। किसी से बात करना दीवार में सिर मारना है। फिर भी वह राधेश्याम की गालियों से बुरी तरह आहत हो गया।  उस ने राहुल को एक लंबी मेल लिखी। और बता दिया कि, ‘इस प्रसंग के बाद मुनमुन मामले से मैं अपने को पूरी तरह अलग कर रहा हूं।’ साथ ही उस ने राहुल से अफ़सोस भी जताया कि, ‘बहुत चाहने पर भी यह मामला सुलझने के बजाय और उलझ गया है। सिवाय अफ़सोस के और क्या कर सकता हूं। तुम छोटे हो फिर भी तुम से क्षमा मांगता हूं।’

राहुल का भी लंबा जवाब आया और पूरी तरह खौलता हुआ। उस ने दीपक से राधेश्याम की गालियों के लिए क्षमा मांगी थी और लिखा था कि, ‘यह आप का ही अपमान नहीं हम सब का अपमान है।’ उस ने लिखा था कि मेल पढ़ने के बाद पहला काम उस ने मुनमुन की ससुराल फ़ोन करने का ही किया था। तो राधेश्याम की मां ने उस से भी राधेश्याम के इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़े होने का गौरव गान गाया। तो राहुल ने उन से कहा, ‘आप का बेटा तो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की टुंटपूंजिया और फ़र्ज़ी पढ़ाई किए है जिसका कोई मतलब नहीं है। पर हमारे दीपक भइया दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं और प्रोफ़ेसर हैं।’ तो राधेश्याम की मां बोली, ‘इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बड़ी तो नहीं है न दिल्ली यूनिवर्सिटी।’ राहुल ने भी फिर इस बात का ब्लंटली जवाब दिया था। उस ने लिखा था कि, ‘इतना ब्लंटली और लंठई से भरा वह जवाब था कि उसे मैं आप को लिख नहीं सकता।’

दीपक ने उसे संक्षिप्त जवाब में लिखा कि, ‘जो बीत गया, सो बीत गया। बहुत भावुक होने की ज़रूरत नहीं है। और मामला कैसे सुलझे तथा और क्या विकल्प हो सकते हैं इस पर सोचने की ज़रूरत है।’ उस ने विकल्प पर ज़्यादा ज़ोर देते हुए मुनमुन के दूसरे विवाह के लिए स्पष्ट संकेत दिया था। और तर्क दिया था कि, ‘उस की शादी ग़लत तो हो ही गई है। और जब हम लोग राधेश्याम और उस के परिवार की फ़ोन पर बात नहीं बर्दाश्त कर पा रहे तो वह बेचारी वहां जा कर रहेगी भी कैसे तो भला?’

पर राहुल ने जाने क्यों दीपक के इस पत्र का जवाब नहीं दिया। पी गया यह पत्र। शायद मुनमुन की दूसरी शादी का विकल्प उसे अच्छा नहीं लगा था। लेकिन दीपक से राधेश्याम ने गाली गलौज की है। यह बात उस ने रमेश, धीरज, तरुण, मुनमुन और अम्मा बाबू जी सभी को ज़रूर बताई। और सभी ने दीपक को फ़ोन कर इस बात पर अफ़सोस जताया। राहुल ने घनश्याम राय को भी फ़ोन कर इस पर सख़्त विरोध जताया और उन्हें बताया कि, ‘दीपक भइया हम सब में न सिर्फ़ बड़े हैं हमारी आन और मान भी हैं। राधेश्याम की हिम्मत कैसे हुई उन से गाली गलौज करने की? और फिर जो यही रवैया रहा आप लोगों का तो हम लोगों से संबंध ख़त्म समझिए और नतीजा भुगतने को तैयार रहिए।’ उस ने जोड़ा, ‘ईंट से ईंट बजा देंगे आप के राधेश्याम की और आप के पूरे परिवार की।’ राहुल की इस धमकी से घनश्याम राय डर गया। उस ने राहुल से तो माफ़ी मांगी ही, दीपक को भी ख़ुद फ़ोन कर राधेश्याम के व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी। ग़नीमत थी कि वह फ़ोन पर था, नहीं सामने होता तो पैर पकड़ लेता। राहुल ने घनश्याम राय को डपटते हुए कहा था कि, ‘राधेश्याम को समझा लीजिए। नहीं जो अब वह बांसगांव जा कर हमारे अम्मा बाबू जी या मुनमुन से अभद्रता या बदतमीज़ी करेगा तो उस की ख़ैर नहीं।’

घनश्याम राय ने राधेश्याम के पैर पकड़ कर समझाया, ‘अब मत जाना बांसगांव बवाल काटने। नहीं बड़ा बवाल हो जाएगा।’ राधेश्याम मान गया था। पर कब तक मानता भला? उस दिन मुनमुन अम्मा के हाथ का प्लास्टर कटवा कर घर आई थी। आंगन में बैठी अम्मा के हाथ की सिंकाई मोम से कर रही थी कि झूमता झामता राधेश्याम पहुंचा। मुनमुन उसे देखते ही ऐसे मुसकुराई गोया उस का इंतज़ार ही कर रही थी। बोली, ‘लेने आए हैं?’

‘हां, चल अभी।’ कहते हुए राधेश्याम ने गालियों की बरसात कर दी।

‘ज़्यादा शिष्टाचार की ज़रूरत नहीं है।’ मुनमुन राधेश्याम की गालियों को इंगित करती हुई पर इतराती हुई मुसकुरा कर बोली, ‘चलिए चलती हूं अब की। आप भी क्या कहेंगे!’

‘आ गई न लाइन पर।’ कहते हुए राधेश्याम ने फिर मां की गालियों से उसे नवाज़ दिया।

‘हां, क्या करती!’ मुनमुन फिर इठला कर बोली, ‘आना ही पड़ा।’

‘तो चल!’

‘कपड़ा तो बदल लूं?’ मुनमुन बैठे-बैठे इठलाई, ‘कि ऐसे ही चलूं?’

‘चलो बदल लो!’ अकड़ता हुआ राधेश्याम बोला।

‘आप बाहर ओसारे में बैठिए मैं अभी कपड़ा बदल कर आती हूं।’

‘पर बेटी!’ मुनमुन की अम्मा तड़पड़ाईं।

‘कुछ नहीं अम्मा अब मैं जाऊंगी। मुझे जाने दो।’ मुनमुन फिर राधेश्याम की ओर मुड़ती हुई बोली, ‘आप बाहर बैठिए न!’

‘बैठता हूं। जल्दी आओ।’ गरज कर राधेश्याम ऐसे बोला जैसे उस ने दिल्ली जीत ली हो। फिर आ कर बाहर ओसारे में बैठ गया। कोई गाना गुनगुनाता हुआ। वह बाहर के ओसारे में कुर्सी पर बैठा गाना गुनगुना ही रहा था कि पीछे से मुनमुन हाथ में एक लाठी लिए आई। और राधेश्याम के सिर पर निशाना साध कर तड़ातड़ लाठी से उसे मारने लगी। अचानक लाठी के प्रहार से वह अकबका गया। उस का सिर फूट गया। ख़ून बहने लगा। फिर भी वह कुर्सी से उठ कर गाली बकता हुआ तेज़ी से पलटा और मुनमुन की तरफ़ लपका। लेकिन तब तक मुनमुन उस के पैरों को निशाना बना चुकी थी। वह लड़खड़ा कर गिर पड़ा और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा। इतना कि रास्ता चलते राहगीर रुक गए। अड़ोसी पड़ोसी आ गए। मुनमुन की अम्मा घर में से बाहर आ गईं। लेकिन मुनमुन रुकी नहीं, न ही उस की लाठी। वह मारती रही। राधेश्याम छटपटाता और चिल्लाता रहा, ‘बचाओ-बचाओ मुझे मार डालेगी यह।’ दो एक राहगीर लपके उसे बचाने के लिए लेकिन पड़ोसियों ने उन्हें रोक लिया। मुनमुन मारती रही लाठियों से राधेश्याम को और वह हाथ जोड़ कर रहम की भीख मांगता रहा। फ़रियाद करता रहा, ‘तुम्हारा पति हूं, तुम्हारा सुहाग हूं।’

‘पति नहीं, तुम पति के नाम पर कलंक हो।’ हांफती हुई मुनमुन बोल रही थी और अपनी ताक़त भर उसे पीट रही थी। वह चीख़ रहा था, ‘तुम ने धोखा किया मेरे साथ। धोखे से मुझ पर पीछे से वार किया!’

‘तुम और तुम्हारे बाप धोखा करो तो ठीक, हम करें तो धोखा!’ मुनमुन हांफती और उसे मारती हुई बोली। वह उसे तब तक मारती रही, जब तक वह अधमरा नहीं हो गया। अंततः राधेश्याम ने मुनमुन के पांव पकड़ लिए और बोला, ‘माफ़ कर दो मुनमुन, मुझे माफ़ कर दो।’ मुनमुन के दरवाज़े पर यह वही जगह थी जहां द्वारपूजा में मुनमुन के बाबू जी ने राधेश्याम के पैर धोए थे, भले ही बरसात की वजह से तख़ते पर। और आज उसी जगह धूल धूसरित ख़ून और पिटाई से लथपथ राधेश्याम मुनमुन के पांव पकड़ कर अपनी जान की भीख मांग रहा था। द्वारपूजा में भी भीड़ थी बारात की। इस समय भी भीड़ थी बांसगांव की। जो जहां था, वहीं से भागा आया। पर मुनमुन को रोका किसी ने भी नहीं। और मुनमुन भी थी कि रुकी नहीं। रुकी तो वह बाबू जी के रोकने से। हां, यह ख़बर जब कचहरी में भी पहुंची तो मुनक्का राय भागे-भागे घर आए। मुनमुन का हाथ पकड़ा और उसे रोकते हुए बोले, ‘इस अभागे को मार ही डालोगी क्या?’

‘हां, बाबू जी, आज इस को मार ही डालने दीजिए!’

‘क्यों विधवा हो कर जेल जाना चाहती हो?’ मुनक्का राय बोले, ‘आख़िर तुम्हारा सुहाग है!’

‘सुहाग?’ कहते हुए मुनमुन ने मुंह ऐसे बनाया गोया कोई कड़वी चीज़ मुंह में आ गई हो। और राधेश्याम के मुंह पर ‘पिच्च’ से थूकती हुई बोली, ‘थूकती हूं ऐसे सुहाग पर जिस ने मेरी ज़िंदगी जहन्नुम बना दी।’ और फिर एक लात उस ने राधेश्याम के चूतड़ पर लगा दिया। मुनक्का राय ने पलट कर भीड़ की तरफ़ देखा तो पाया कि ख़ामोश खड़ी भीड़ में अधिकांश की आंखों में मुनमुन के लिए प्रशंसा के भाव थे। वह मंद-मंद मूछों में ही मुसकुराए। और बड़े गर्व से मुनमुन को भर आंख देखा फिर भीड़ की तरफ़ पलटे और बोले, ‘इस नालायक़ को कोई यहां से उठा ले जाओ भाई! कि अइसे ही तमाशा देखते रहेंगे आप लोग?’

पर कोई भी राधेश्याम को उठाने के लिए आगे नहीं बढ़ा। उलटे सब लोग ओसारे में आ बैठी मुनमुन को घेर लिए। एक पड़ोसी औरत बोली, ‘वाह मुनमुन बिटिया वाह। ई काम तुम को बहुत पहले करना चाहिए था। मारे था जीना हराम किए था। जब मन तब दरवाज़ा पीट-पीट कर गरिया जाता था। हम लोग सोचते थे कि वकील साहब का दामाद है क्या बोलें। पर ऐसे पियक्कड़ और बदतमीज़ आदमी की यही दवाई है।’

फिर धीरे-धीरे सब ने मुनमुन के इस काम के क़सीदे पढ़े। और उधर राधेश्याम ज़मीन पर पड़ा-पड़ा दर्द और अपमान से छटपटाता रहा। थोड़ी देर बाद उस ने भीड़ में से एक आदमी को इशारे से बुलाया और कहा कि, ‘कोई रिक्शा या टैम्पू ला दीजिए।’

‘मैं नहीं लाता।’ वह आदमी मुंह पिचका कर बोला, ‘यहीं मरो।’ भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी। मुनक्का राय, मुनमुन और उस की अम्मा भी घर में अंदर जा कर भीतर से दरवाज़ा बंद कर बैठ गईं। थोड़ी देर बाद पुलिस ने मुनक्का राय के घर का दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा मुनक्का राय ने खोला। पूछा, ‘क्या बात है?’

‘कोई घटना हुई है यहां पर?’ दारोगा ने पूछा।

‘नहीं तो।’

‘सुना है कोई मारपीट हुई है?’

‘हां, हां।’ मुनक्का राय ज़रा रुके और बोले, ‘एक पियक्कड़ आ गया था।’

‘अच्छा-अच्छा!’ दारोगा बोला, ‘तो रिपोर्ट लिखवाएंगे।’

‘हमें तो नहीं लिखवानी है।’ मुनक्का राय बोले, ‘वह पियक्कड़ लिखवाना चाहे तो लिख लीजिए!’

‘वह कहां है?’

‘कौन?’

‘वह पियक्कड़?’

‘हमें क्या पता?’

पुलिस चुपचाप चली गई। लेकिन बांसगांव चुप नहीं था। बांसगांव की सड़कों पर मुनमुन की चर्चा थी। मुनमुन की बहादुरी की चर्चा थी। पान की दुकान पर, मिठाई की दुकान और कपड़े की दुकान पर। परचून की दुकान और शराब की दुकान पर। चहुं ओर मुनमुन, मुनमुन, मुनमुन! सांझ होते-होते एक पान वाला बाक़ायदा वीर रस में गा रहा था यह मुनमुन कथा, ‘ख़ूब लड़ी मरदानी यह तो बांसगांव की रानी है।’ फिर धीरे-धीरे जिसे देखो वही, ‘ख़ूब लड़ी मरदानी यह तो बांसगांव की रानी है!’ पूरे बांसगांव की जु़बान पर आ गया। दूसरे दिन कचहरी में जब मुनक्का राय तक यह स्लोगन बन कर बात आई कि ख़ूब लड़ी मरदानी यह तो बांसगांव की रानी है। तो वह मंद-मंद मूछों में ही मुसकुरा कर रह गए। वीर रस का यह स्लोगन पहुंचाने वालों ने रमेश, धीरज और तरुण तक भी फ़ोन कर पहुंचाया। और तीसरे दिन तो एक लोकल अख़बार में पूरी घटना बिना किसी का नाम लिए एक औरत, एक पति कर के ख़ूब ललकार के छपी थी। रमेश और धीरज ने बाबू जी को फ़ोन कर के इस घटना पर अफ़सोस जताया और कहा कि, ‘इसे और तूल नहीं दिया जाना चाहिए। इस से हम लोगों की बदनामी होगी!’

‘क्यों जब तुम्हारी बहन और अम्मा को वह नालायक़ पीट रहा था तब बदनामी नहीं हो रही थी, अब बदनामी हो रही है?’ कह कर मुनक्का राय ने दोनों बेटों को डपट दिया। और यह देखिए इस घटना को बीते अभी हफ्ता भर भी नहीं बीता कि बांसगांव के बस स्टैंड पर मुनमुन के नाम से चनाजोर गरम बेचने वाले तिवारी जी अपना चनाजोर गरम भी बेचने लगे, ‘मेरा चना बना है चुनमुन/इस को खाती बांसगांव की मुनमुन/सहती एक न अत्याचार/चनाजोर गरम!’ वह इस में आगे और जोड़ते, ‘मेरा चना बड़ा बलशाली/मुनमुन एक रोज़ जब खा ली/ खोंस के पल्लू निकल के आई/गुंडे भागे छोड़ बांसगांव बाजा़र/चनाजोर गरम!’ जल्दी ही यह मुनमुन नाम से चनाजोर गरम कौड़ीराम और आस पास के कस्बों में भी फैल गया। और इधर बांसगांव बस स्टैंड पर तिवारी जी इस में और लाइनें जोड़ रहे थे, ‘मेरा चना बड़ा चितचोर/इस का दूर शहर तक शोर/इस के जलवे चारो ओर/इस ने सब को दिया सुधार/बहे मुनमुन की बयार/चनाजोर गरम!’ वह और जोड़ते, ‘मेरा चना सभी पर भारी/मुनमुन खाती हाली-हाली/इस को खाती जो भी नारी/पति के सिर पर करे सवारी/जाने सारा गांव जवार/चना जोर गरम!’

और देखते ही देखते मुनमुन के नाम का चनाजोर गरम सारी हदें लांघ कर शहर में भी बिकने लगा। न सिर्फ़ बस स्टैंड पर शहर के मुख्य बाज़ार गोलघर में भी। लोग चनाजोर गरम खाते हुए पूछते, ‘भइया ये मुनमुन है कौन?’

‘बांसगांव की रानी है साहब अत्याचारियों के पिछाड़ी में भरने वाली पानी है साहब!’

‘अभी तक तो बांसगांव के गुंडों का नाम सुनते थे। अब ये रानी कहां से आ गई?’

‘आ गई साहब, आ गई। बड़े-बड़े गुंडों को पानी पिलाने।’

‘क्या?’

‘और क्या?’

गोया मुनमुन, मुनमुन न हो पतियों के अत्याचार के खि़लाफ बिकने वाली ब्रांड हो! हां, अब मुनमुन ब्रांड हो चली थी। कम से कम बांसगांव में तो वह अत्याचार के खि़लाफ ब्रांड थी ही। ख़ास कर बांसगांव के बस स्टैंड या टैम्पो स्टैंड पर तिवारी जी जब मुनमुन को देख लेते तो अपना स्वर और तेज़ और ओजपूर्ण कर लेते। फिर लगभग पंचम सुर में आ कर उच्चारते, ‘इस को खाती बांसगांव की मुनमुन/सहती एक न अत्याचार/चनाजोर गरम!’ मुनमुन मंद-मंद मुसकाती धीरे-धीरे चलती हुई तेज़-तेज़ चलने लगती। मुनमुन की पहचान पहले एक वकील की बेटी फिर अधिकारी और जज की बहन के रूप में थी। लोग उसे सम्मान से देखते। फिर वह अपनी शोख़ी के लिए जानी जाने लगी। लोग उसे ललक के साथ देखने लगे। बिजलियां गिराती इतराती चलती वह। और जल्दी ही एक सताई हुई औरत हो गई वह। लोग उसे सहानुभूति मिश्रित करुणा या फिर उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे। पर अब उपेक्षा की जगह अपेक्षाकृत सम्मान से देखने लगा बांसगांव। कोई-कोई उसे बोल्ड एंड ब्यूटीफुल कहता, कोई झांसी की रानी, कोई कुछ, कोई कुछ। सब के अपने-अपने पैमाने थे। पर परिवार तथा समाज में सताई हुई, वंचित और अपमानित औरतें मुनमुन में अब अपनी मुक्ति तलाशतीं। ऐसी औरतें उस के पास सलाह लेने आने लगीं। धीरे-धीरे वह शिक्षामित्र ही नहीं सताई हुई औरतों की मित्र भी बन गई। लगभग एक काउंसलर की छवि बन गई उस की।

पास के गांव की एक औरत थी सुनीता। पिता मिलेट्री में थे। अब रिटायर्ड थे। पर सुनीता जब नाइंथ में थी, सेंट्रल स्कूल में पढ़ती थी। उस की किसी कापी में उस की मां ने अमिताभ बच्चन की कोई मैगज़ीन से काटी हुई फ़ोटो पा लिया। उस को बहुत डांटा। पर कुछ दिन बाद फिर आमिर ख़ान की फ़ोटो मिल गई उस की कापी में। मां ने बवाल कर दिया। बात पिता तक पहुंची। आनन फ़ानन उस की शादी कर दी गई। ज़ाहिर है तब लड़का भी छोटा था और इंटर में पढ़ता था। संयोग था कि दुर्भाग्य शादी के दस साल बाद भी कोई बच्चा नहीं हुआ। सास के ताने सुन-सुन कर वह आजिज़ आ गई। पति भी जब-तब तलाक़ की धमकी देने लगा। पर ससुर सरकारी नौकरी में था सो बचा कर रहता था। फिर अचानक जाने क्या हुआ कि वह प्रिगनेंट हो गई। सब के भाव बदल गए। वह कुलच्छिनी से लक्ष्मी हो गई। पर जल्दी ही यह लक्ष्मी का भाव भी उतर गया जब उस ने एक लक्ष्मी को जन्म दे दिया। पर बांझ होने का कलंक उस के माथे से मिट गया। जल्दी ही वह फिर गर्भवती हुई। फिर उम्मीदें बंधीं। पर फिर लक्ष्मी के आ जाने से उस की दुर्दशा बढ़ गई। मार पीट और तानों में इज़ाफ़ा हो गया। ससुर रिटायर हो गए थे। ख़र्चे बढ़ गए थे और पति पियक्कड़ और निकम्मा हो गया था। हार कर सुनीता बेटियों को लेकर मायके आ गई। प्राइवेट हाई स्कूल का इम्तहान दिया। पास हो गई तो दो साल बाद इंटर का इम्तहान दिया। फिर पास हो गई। बी.ए. का प्राइवेट फ़ार्म भरा। अब पति ने सुनीता को मायके में आ कर तंग करना शुरू कर दिया। अंततः सुनीता के पिता ने उसे ससुराल भेज दिया। पर सुनीता का पति एक दिन सुनीता के पिता के पास पहुंचा। बोला, ‘ठेकेदारी शुरू करना चाहता हूं।’

‘तो शुरू करो।’ सुनीता के पिता ने कहा।

‘आप से मदद चाहिए।’

‘क्या मदद चाहते हो?’ सुनीता के पिता बिदके।

‘पैसे की मदद।’

‘वो मैं कहां से दूं?’

‘अभी-अभी आप रिटायर हुए हैं। फंड, ग्रेच्युटी मिली होगी।’

‘तो वह हमारे बुढ़ापे के लिए मिली है। तुम्हें शराब पिलाने के लिए नहीं।’

‘उधार समझ कर दे दीजिए।’ सुनीता का पति बोला, ‘जल्दी ही वापस कर दूंगा।’

‘शराबी पैसा वापस कहां से देगा और कैसे देगा?’ सुनीता के पिता ने स्पष्ट कह दिया, ‘मैं नहीं दूंगा। अपने बाप से मांग लो।’

‘वह नहीं दे रहे, आप ही दे दीजिए।’ कह कर वह ससुर के पैरों पर गिर पड़ा।

‘चलो जहां ख़र्च लगे बताना मैं ख़र्च करूंगा। पर पैसा तुम्हारे हाथ में नहीं दूंगा।’

‘ठीक है आप ही ख़र्च करिएगा। पर कितना एमाउंट देंगे यह तो बता दीजिए।’

‘तुम को चाहिए कितना?’

‘चाहिए तो दस लाख रुपए।’

‘इतना पैसा तो मुझे मिला भी नहीं है।’

‘तो फिर?’

‘मैं तुम्हें ज़्यादा से ज़्यादा पचास हज़ार दे सकता हूं। बस!’

‘पचास हज़ार में कौन सी ठेकेदारी होगी भला?’ वह उदास हो कर बोला।

‘जाओ पहले किसी ठेकेदार के यहां नौकरी करो। ठेकेदारी सीखो। फिर ठेकेदारी करना।’

‘पैसा देना हो तो दीजिए।’ सुनीता का पति बोला, ‘ज्ञान और उपदेश मत दीजिए!’

‘चलो यह भी नहीं देता।’

जारी...

अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। 33 साल हो गए हैं पत्राकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नहीं पर प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह 'एक जीनियस की विवादास्पद मौत' पर यशपाल सम्मान। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, फेसबुक में फंसे चेहरे, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब 'माई आइडल्स' का हिंदी अनुवाद 'मेरे प्रिय खिलाड़ी'  नाम से प्रकाशित। दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है. इस उपन्‍यास के पहले के भागों को पढ़ने के लिए नीचे आ रहे हेडिंगों पर क्लिक करें. दयानंद पांडेय के अन्‍य लेखों को पढ़ने के लिए सर्च बाक्‍स में उनका नाम डालकर खोजें.