यह भी सोचने का एक तरीका है। सीता ने अगर लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण न किया होता तो न रावण मारा जाता, न ही उसकी राक्षसी जमात का विध्वंस होता। यह लक्ष्मण रेखा एक सीमा है, एक सरहद, एक बंधन, एक संकोच, एक मर्यादा, एक वर्जना। सामाजिक या व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए, नियमन के लिए गढ़ी गयी एक अप्राकृत सीमा। नैतिक विवशता थोपने की एक कूटरचना। कोई भी नैतिकता सर्वमान्य, सर्वग्राह्य, सर्वस्वीकार्य नहीं हो सकती। हर समाज की अपनी नैतिकताएं होती हैं, हर व्यक्ति की अपनी। विकासक्रम में जो लोग अब कपड़े पहनने लगे हैं, उन्होंने एक नैतिक मर्यादा गढ़ ली है, नंगा होना ठीक नहीं है, अश्लील है, असामाजिक, वर्जित और गर्हित है।

परंतु अभी भी तमाम जंगली जातियों का कपड़ों से परिचय नहीं नहीं है। वे चाहकर भी अपना पूरा शरीर नहीं ढंक सकते। उनके लिए अधनंगा या नंगा रहना अनैतिक नहीं है। वे नग्न रहते हुए भी असहज नहीं होते, शर्माते नहीं। हर आदमी कुछ खास तरह की सामाजिक, पारंपरिक नैतिकताओं, अनैतिकताओं के साथ जन्म लेता है, बढ़ते हुए उन्हें सीखता है और अपने स्वभाव में इस तरह संश्लेषित कर लेता है कि वह उनके बाहर देख ही नहीं पाता। अक्सर उन वर्जनाओं के पालन का प्रयास करता है और नहीं कर पाता है तो भी एक छद्म खड़ा करके उनके समर्थन में खड़ा दिखने की कोशिश तो करता ही है।

यही नैतिकताएं, वर्जनाएं  कई समाजों में कठोर होकर धीरे-धीरे धर्म का रूप ले लेती हैं, जो उनके जीवन को अलिखित कानून की तरह नियंत्रित करता है। कोई भी उनका अतिक्रमण करे तो वे बर्दाश्त नहीं करते, लड़ने-मरने के लिए आमादा रहते हैं। यह जैसे समाज-समाज में बदलती रहती हैं, वैसे ही व्यक्ति-व्यक्ति में भी। इन्हीं अर्थों में ये नैतिकताएं जड़ होती हैं, इनका कोई शाश्वत और सार्वभौम मूल्य नहीं होता। कोई भी आदमी इस बात के लिए स्वतंत्र होता है कि अपने लिए नैतिकता का कितना आग्रह स्वीकार करे। इसी प्रकार कोई भी आदमी नैतिकता के अपने मानकों पर किसी दूसरे व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं कर सकता। वह जिन मूल्यों को, जिस जीवन-शैली को नैतिक मानता है, वह सबके लिए नैतिक होगी, यह दुराग्रह व्यर्थ है।

सबकी अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखाएं हैं। यह सुरक्षा की दीवारें हैं, यह कठिन बंधन हैं, चट्टानी वर्जनाएं है, जो अनजाने खतरों की दुनिया में दाखिल होने से रोकती हैं, बचाती हैं। पर सचाई यह है कि जहां खतरे हैं, वहीं कुछ नया है, वहीं कोई संभावना है, वहीं कुछ अनाविष्कृत दबा पड़ा है, वहीं कुछ अनखोजा मिलने की उम्मीद है। जब तक लक्ष्मण रेखा के भीतर है, जीवन ठहरा हुआ है, सड़ता हुआ। उसके आगे रोमांच है, परिवर्तन है, सहस्त्ररंगी इंद्रधनुष हैं, नवगंधखचित पुष्पघाटियां हैं, हहराते झरने हैं, पहाड़ों से खेलती, इठलाती नदियां हैं, सूरज की स्वर्णरश्मियों में नहाये ग्लेशियर हैं। लक्ष्मण रेखा के उस पार ही नये आविष्कार हैं, नयी खोजें हैं, वहीं है नव गति, नवलय, ताल छंद नव। अगर आदमी लक्ष्मणरेखाएं पार न करता तो कुछ नया नहीं हो पाता। जब पहली बार किसी ने कहा कि सूर्य स्थिर है, पृथ्वी उसके चारों ओर घूमती है तो हलचल क्यों मच गयी? जब पहली बार किसी ने बिना संभोग के गर्भ में जीवन बोना सिखाया, किसी की भी जीवित प्रतिकृति उत्पन्न करने की कला का रहस्यभेदन किया तो तूफान क्यों मच गया? क्योंकि तब उसने हमारी गढ़ी हुई कृत्रिम नैतिकताओं को चुनौती दी, उन पर पत्थर फेंके। जब लक्ष्मणरेखा टूटती है तो हो सकता है कोई राम दुखी हो, कोई लक्ष्मण आहत महसूस करे लेकिन तभी खतरों के इलाके में प्रवेश होता है, तभी चुनौतियों के दरवाजे खुलते हैं। मर्यादाएं भी सुरक्षा और सचेष्टता की भावना के  साथ रची हुई सीमाओं के अलावा कुछ नहीं है। एक पागल सारी मर्यादाओं, सारे बंधनों से मुक्त रहता है। वह बिना शर्माये नंगे सड़क पर दौड़ सकता है, किसी को भी पत्थर मार सकता है, दबोच सकता है। यह मुक्ति है। नये क्षितिज तक पहुंचने के लिए मुक्ति जरूरी है पर पागल की मुक्ति नहीं, उन्मादी की मुक्ति नहीं, एक सचेत, जाग्रत, अनाग्रही मुक्ति।

यह मुक्ति किसी मर्यादा को नहीं स्वीकारती पर यह पागल की मर्यादामुक्ति की तरह जड़ नहीं होती। इसमें निरंतरता होती है, गति होती है, दिशा होती है। मनुष्य जब मर्यादाओं की जड़ता से और मर्यादाहीनता के बोध से मुक्त होता है, तभी उसके सामने नया आसमान खुलता है। किसी भी बड़ी शुरुआत के लिए मर्यादा, नैतिकता और वर्जना की लकीरें रौंदनी ही पड़ती हैं। जब मनुष्य अपनी मेधा के साथ घने जंगलों से गुजरता है, खुले नीले आकाश में उड़ता है, सागर की तलहटी में उतरता है, शब्द और भाषा में मानवीय वेदना की व्यंजना तलाशता है तो वह कुछ नया खोजता है, कुछ नया रचता है। इस यात्रा में हो सकता है कई बार उसे अपने जड़ीभूत  मनश्चित्रों को तोड़ना पड़े, अपनी ही कष्टप्रद चीर-फाड़ करनी पड़े पर इस सारे युद्ध की थकान एक नयी खोज, एक नयी रचना से मिट जाती है। कोई लक्ष्मणरेखा सीता का अपहरण रोक पाये, द्रोपदी का चीरहरण टाल पाये, इसकी संभावना बहुत कम है पर सीताएं और द्रोपदियां जब भी लक्ष्मणरेखा पार करती हैं, रावणों, दुर्योधनों का विनाश निश्चित है।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.