: शाहन के शाह : दिलों को जीतने वाले रामकृष्‍ण से भी ककहरा नहीं सीखा लाटू ने : एक बंगाली, तो दूसरा बिहारी। पहला भौतिकी का छात्र तो दूसरा काला अक्षर भैंस बराबर परंतु प्रकृति प्रेमी किशोर। गुरु ने एक की छाती पर पैर रखा तो वह स्‍तब्‍ध रह गया, जबकि दूसरे की आंखों से जलधारा बह चली। पहला समय का मारा था और परिवार त्‍याग आया, जबकि दूसरे का सबकुछ नियति ने ही छीन लिया। पहले ने गुरु के आशीर्वाद से अपने प्राथमिक घरेलू दायित्‍व निपटा लिये, जबकि दूसरे का अक्षर-ज्ञान कराने की सारी कोशिशें धरी रह गयीं और गुरू ने खुद अपना ही माथा फोड़ लिया। लेकिन दोनों ही आजीवन गुरु-सेवा में ही अर्पित रहे।

अब यह दीगर बात है कि पहले शिष्‍य का फलक उसके बोध-ज्ञान के स्‍तर पर अंतर्राष्‍ट्रीय हो गया, जबकि निरक्षर ने भारत के जनगणमन में अपनी सरलता का आधिपत्‍य स्‍थापित कर लिया। पहले ने शिकागो में अपना डंका बजवा लिया, जबकि दूसरे ने आम अबोध ग्रामीणों में अपनी पैठ बना ली। पहले ने आभिजात्‍य लोगों के दिलों को छू जाने वाले आभिजात्‍य शब्‍दों को गढ़ना शुरू किया, जबकि दूसरे ने निपट गंवारू भाव में अपनी बात कह दी।

आजीवन गुरु के दाहिने-बायें रहे इन दोनों चेलों को समझना हो तो आइये। चलते हैं करीब सवा सौ साल पहले के कलकत्‍ता में। पास के ही दक्षिणेश्‍वर में मां काली को अपना अराध्‍य मान कर उपासना के शिखर को पार कर चुके ठाकुर रामकृष्‍ण परमहंस का आश्रम था। कहते हैं कि वे सीधे मां काली से बात किया करते थे। मां के प्रति प्रेम और रूदन उनके जीवन का अनिवार्य अंग था। और तो और, उन्‍होंने खुद अपनी ही पत्‍नी में मां का रूप देख लिया था। सम्‍पन्‍न परिवार का नरेंद्र दत्‍त नाम का युवक जब उनसे मिलने आया तो, फिर कभी वापस नहीं लौटा और स्‍वामी विवेकानंद बन कर बस ठाकुर के ही हो गये। जबकि बिहार के सारण क्षेत्र यानी छपरा जिले में एक गांव के गड़रिया परिवार में जन्‍मा एक बच्‍चा अभी जानवर चराना ही सीख रहा था कि एक दिन अनाथ हो गया। जानवरों की सुरक्षा के नाम पर ही उसका नाम पड़ गया था रखतूराम। अनाथ को चाचा का आसरा मिला, मगर अपनी फिजूलखर्ची के चलते गांव-बदर हुए चाचा उसे लेकर कलकत्‍ता पहुंचे और रामचंद्र दास के घर उसे घरेलू नौकरी दिला कर लापता हो गये।

कसरती शरीर वाले रखतूराम ने एक दिन अपने मालिक की प्रार्थना सुनी, तो विचलित हो गया। पता चला कि यह रामचंद्र दास के गुरू रामचंद्र परमहंस की वाणी है। एक दिन ठाकुर के दर्शन करने मालिक के साथ पहुंचा रखतूराम ठाकुर से इस कदर प्रभावित हुआ कि हमेशा-हमेशा के लिए वहीं का होकर रह गया। यह दौर था सन 1880 के आसपास का। राजनैतिक उथलपुथल ने सामाजिक विसंगतियों को भी जन्‍म देना, मथना शुरू कर दिया था। धन ने कुछ का जीवन तो शीर्ष तक पहुंचा दिया जबकि गरीब लगातार असहाय सा अपनी बदहाली को भोगता रहा। धर्म के नाम पर अनेक बंदिशें भी असहाय और गरीब के ही खाते में आयीं। महिलाओं की हालत तो और भी बुरी होती जा रही थी। ऐसा भी नहीं कि सम्‍पन्‍न लोग प्रसन्‍न थे। विलासिता का नशा उतरते ही उनमें भी खिन्‍नता का भाव जाग रहा था। ऐसे में बंगाली समाज को ठाकुर के नाम पर एक महान उद्घारक मिल गया। और इस उद्घारक को विवेकानंद और रखतूराम जैसा अनन्‍य उपासक। ठाकुर ने इन दोनों ही शिष्‍यों में कभी विभेद नहीं किया, ठीक वैसे ही जैसे अपने उपासकों और भक्‍तों के प्रति प्रेम समान रूप से बांटा। हालांकि विवेकानंद की ही तरह रखतूराम को भी उन्‍होंने अद्भुतानंद का नाम दिया, लेकिन रखतू अद्भुतानंद के बजाय लाटू महाराज के नाम पर विख्‍यात हुए।

इन दोनों गजब की समानता रही। विवेकानंद ने जहां देश-दुनिया में ठाकुर का भाव पहुंचाने की जिम्‍मेदारी ली, तो लाटू ने दक्षिणेश्‍वर में ही रह कर ठाकुर को बाकायदा जीते रहने का दायित्‍व सम्‍भाला। कुछ लोगों ने कहा भी कि अनपढ़-गंवार होने के कारण ही लाटू ने ठाकुर के समक्ष आत्‍मसमर्पण कर दिया था। लेकिन हकीकत में ऐसा था नहीं। नारायण अयंगर से बातचीत में लाटू ने साफ कहा कि ठाकुर उनके गुरु हैं, भगवान के अवतार नहीं। अवतार होते तो उनकी सेवा मैं कैसे कर पाता। उन्‍हें केवल पूजता ही रहता, सेवा तो गुरु की ही हो सकती है। और यह सेवा दोनों हाथ उठाकर कुल्‍हाड़ी-प्रणाम से नहीं, साष्‍टांग अभिवादन से ही सम्‍भव है। जो मैं करता हूं। और एक दिन तो ऐसा आ गया जब लाटू को ध्‍यानमग्‍न देख विवेकानंद ने परिहास में हंगामा कर उन्‍हें जगाना चाहा तो ठाकुर ने टोक दिया : यह ध्‍यान की उच्‍चतर अवस्‍था है। इसे सीखने में तुम्‍हें समय लगेगा। लाटू ने भगवान को गुरू से बड़ा नहीं माना। बोले:- जिस प्रकार कोई बच्‍चा अपने माता-पिता की गोद में निश्चिंत भाव से सो जाता है, उसी तरह मैं भी ठाकुर की गोद में सम्‍पूर्ण सुरक्षा, संतोष और आनंद महसूस करता हूं। गुरु के चरण की उपासना ही भगवद-भक्ति मानते रहे लाटू। उनका कहना था कि शिव या राम की प्राप्ति का मार्ग केवल गुरू के चरणों से होकर है और गुरु के चरणों तक पहुंचने के लिए पहले माता-पिता की सेवा करनी पड़ती है।

अपने अनपढ़ होने पर लाटू को कोई शर्मिंदगी नहीं, वरन गर्व ही था। खुद को महसूस करने और किताबें पढ़ने में बड़ा फर्क होता है। किताबें पढ़ने से किसी की मूर्खता नहीं भागती। इसके लिए खुद को खोलने की जरूरत पड़ती है। केवल ज्ञान नहीं, बोध होना जरूरी है और इसके लिए जरूरी होता है उस अलौकिक प्रकाश में आना जो समर्पण-मार्ग पर है। एक भक्‍त से वे बोल पड़े:- धूल-गर्दा साफ करते रहा करो। कभी इसे खुद पर जमने मत देना। यहां धूल-गर्दा से उनका मतलब अहंकार था। मंत्रों का जाप अब एक अनपढ़ आदमी कैसे करे। सो, लाटू ने इसका निदान खोज लिया। श्राद्ध-कर्म के दौरान वे खुद ही अपने पितरों से बातचीत और तर्पण-अर्पण शुरू कर देते थे। मसलन:- ए मेरे बाप जी, माता जी। आओ, इधर आओ। यहां इस आसन पर बैठो। यह पूजा लो, यह पिण्‍ड लो, यह पानी पी लो। वगैरह-वगैरह। जीवन के प्रति उनके नजरिये को इससे बेहतर और कैसे समझा जा सकता है कि:- मन मिले तो मेला, चित्‍त मिले तो चेला, मगर सबसे भला अकेला।

सरलता-मिश्रित चपलता की इससे बड़ी मिसाल और क्‍या होगी जब उनके किसी बात पर विवेकानंद ने हंसते हुए कह दिया:- तुझ अनपढ़ को कैसे समझाऊं। लाटू महाराज ठठाकर हंसे, बोले:- ओह, समझ गया। तुम इतने बड़े विद्वान हो गये हो कि मेरे जैसे बज्रमूर्ख को भी नहीं समझा सकते। मुसलमानों की निंदा पर उन्‍होंने लोगों को फटकारा:- वे तो पांच वक्‍त की नमाज पढ़ते हैं, तुम कितनी बार हरिनाम जपते हो। एक ईसाई से बोले:- ईसा को छोड़ना मत। और गुरुनाम की खूंटी पकड़े यह संन्‍यासी 25 अप्रैल 1925 को काशी में गैगरीन से कुछ दिन पीडित रहने के बाद प्रशांत भाव से स्‍वधाम पधार गया। लाटू महाराज पर आस्‍था और हास्‍यमिश्रित काला-पहाड़ नामक नाटक लिखने वाले गिरीशचंद्र का कहना था:- चंद्रमा पर भी दाग है, मगर लाटूजी शुद्ध सोना निकले।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.