: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : ‘ख़ुश रहो।’ कह कर दीपक ने फ़ोन रख दिया। वह रमेश की इस सर्द बातचीत से बहुत उदास हो गया। बाद के दिनों में उस ने धीरज और तरुण से भी यह बातें कीं। इन दोनों की बातचीत में भी वही ठंडापन पा कर दीपक समझ गया कि अब मुनमुन की समस्या का समाधान सचमुच बहुत कठिन है। अब उस ने एक दिन मुनमुन को फ़ोन किया और राहुल का फ़ोन नंबर मांगा।

‘क्या इन तीनों भइया से बात हो गई आप की?’

‘हां, हो गई।’ दीपक टालता हुआ बोला।

‘क्या बोले ये लोग?’ मुनमुन उत्सुक हुई।

‘वह बाद में बताएंगे पर पहले तुम राहुल का नंबर दो।’ दीपक खीझ कर बोला।

‘लीजिए लिखिए।’ कह कर उस ने राहुल का नंबर आई.एस.डी. कोड सहित लिखवा दिया। फिर दीपक ने राहुल का फ़ोन मिलाया। राहुल बोला, ‘भइया प्रणाम। अभी गाड़ी ड्राइव कर रहा हूं। थोड़ी देर में मैं ख़ुद आप से बात करता हूं।’ कह कर उस ने फ़ोन काट दिया। दीपक परेशान हो गया। बावजूद इन परेशानियों के वह मुनमुन समस्या का समाधान चाहता था। यह समस्या जैसे उस के दिल पर बोझ बन गई थी। वह जैसे एक घुटन में जी रहा था। उस की आंखों के सामने एक गहरी धुंध थी और इस धुंध में से ही उसे कोई रास्ता ढूंढना था। दिल्ली की व्यर्थ की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और इस की आपाधापी से वह इन दिनों यों ही तनाव में रहता था। तिस पर मुनमुन उस के दिलो-दिमाग़ पर सांघातिक तनाव बन कर सवार थी। उसे लगता था जैसे उस के दिमाग़ की नसें फट जाएंगी। जब-तब तिल-तिल कर मरती मुनमुन उस के सामने आ कर खड़ी हो जाती और पूछती, ‘भइया कुछ सोचा आप ने मेरे लिए?’

और वह हर बार निरुत्तर हो जाता।

यह क्या था?

बचपन में मामी के खिलाए पकवानों का कर्ज़ था?

या ननिहाल के नेह और मां के दूध का दर्द था?

कि मुनमुन ही के साथ हुए अन्याय के प्रतिकार का जुनून था?

या यह सब कुछ एक साथ मिश्रित था? जो भी हो उस की जिंदगी गडमड हो गई थी। थोड़ी देर बाद राहुल का फ़ोन आया तो उस ने राहत की सांस ली। राहुल कहने लगा, ‘भइया आप का फ़ोन पा कर मैं तो चकित रह गया। पहली बार यहां आप का फ़ोन आया और माफ़ कीजिए उस वक्त बात नहीं कर पाया।’

‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं।’ दीपक ने कहा।

‘और भइया सब ठीक तो है न!’

‘राहुल अगर सब ठीक होता तो मैं तुम्हें फ़ोन क्यों करता भला?’

‘हां, भइया बताइए क्या हो गया?’

‘मैं पिछले महीने बांसगांव गया था।’

‘अच्छा-अच्छा।’ राहुल ने पूछा, ‘क्या हालचाल है वहां का?’

‘तो तुम को कुछ भी नहीं मालूम?’

‘नहीं इतना तो मालूम है कि बाबू जी मुनमुन को विदा करवा लाए हैं।’

‘बस!’

‘क्या कुछ और गड़बड़ हो गया क्या?’

‘हो तो गया है।’ कह कर दीपक ने वह सारी बातें राहुल से भी कहीं जो रमेश, धीरज और तरुण से कही थीं।

राहुल ने पूरी बात सुनी और परेशान हो गया। बाक़ी तीनों भाइयों की तरह ठंडापन नहीं दिखाया उस ने जब कि आई.एस.डी. काल का ख़र्चा था। फिर भी वह बोला, ‘भइया मामला तो बहुत गंभीर हो गया है। अगर राधेश्याम घर पर आ कर अम्मा और मुनमुन की पिटाई और गाली गलौज कर रहा है तब तो बात और भी गंभीर हो गई है। रही बात अम्मा बाबू जी के वेलफ़ेयर की तो उधर तो मैं जब तब पैसा भेजता ही था। आप जानते ही हैं कि मुनमुन की शादी में सारा ख़र्च लगभग मुझे ही करना पड़ा था तो वह क़र्ज़ा निपटाने में लगा हूं। और मैं सोचता था कि भइया लोग ख़याल रख रहे होंगे।’

‘देखो तुम्हारा पैसा बहुत ख़र्च हो रहा होगा फ़ोन पर।’ राहुल की उत्सुकता देखते हुए दीपक बोला, ‘तुम अपनी आई.डी. बताओ हम लोग मेल के थ्रू बात करते हैं या फिर तुम याहू मैसेंजर पर भी आ सकते हो। तब हम लोग सीधी बातचीत कर सकेंगे।’

‘हां, भइया आप ठीक कह रहे हैं। कह कर उस ने अपनी याहू आई.डी. लिखवा दी और दीपक की भी आई.डी. लिख ली। और कहा कि, ‘हम लोग फिर नेट पर ही बात करते हैं।’

‘हां, क्यों कि बात लंबी है और मामला गंभीर!’

‘ठीक भइया। प्रणाम!’ कह कर उस ने फ़ोन काट दिया।

राहुल की इस बातचीत से दीपक जो गहरे डिप्रेशन में जा रहा था, उबर आया। उस को लगा कि अब कोई रास्ता ज़रूर निकल जाएगा। घुप्प अंधेरे में कोई रोशनी दिखी तो थी। और सचमुच दूसरे दिन राहुल की लंबी मेल दीपक को मिली। राहुल ने विस्तार से सारी बातें रखी थीं घर के प्लस-माइनस बताए थे और माना था कि मुनमुन के साथ पूरे घर ने मिल कर अनजाने में सही अन्याय कर दिया था। जिस में कि सब से ज़्यादा दोषी वह ख़ुद है। कि सिर्फ़ पैसा ख़र्च करना ही अपनी ज़िम्मेदारी समझी। घर बार और वर देखने की भी ज़िम्मेदारी उसे निभानी चाहिए थी जो समय की कमी और बाक़ी घर वालों पर विश्वास के चलते नहीं निभा पाया। फिर उस ने मुनमुन का एक तर्क भी जोड़ा था विवाह पूर्व का कि आदमी एक कपड़ा भी ख़रीदता है तो दस कपड़े देख कर और ठोंक बजा कर फिर हम लोग तो उस का लाइफ़ पार्टनर तय कर रहे थे। और फिर भी नहीं देखा। जब कि मुनमुन लगातार आशंका जता रही थी और सब से चिरौरी कर रही थी कि लड़के को ठीक से देख जांच लिया जाए। पर सब एक दूसरे पर टाल गए। और मान लिया गया कि बाबू जी ने देख लिया है तो सब ठीक ही होगा। शायद अति विश्वास और संयुक्त परिवार में ज़िम्मेदारियों को एक दूसरे पर टालने की त्रासदी है यह। फिर एक लड़के से मुनमुन का बढ़ता मेल जोल एक बड़ा दबाव था जो उस की शादी में जल्दबाज़ी का कारण बना और सब ने एक ड्यूटी की तरह शादी शायद नहीं की, शादी की कार्रवाई की। यह नहीं सोचा किसी ने कि अगर मुनमुन के साथ कुछ अप्रिय होगा, और वह हो भी गया है तो वह इसी परिवार की ज़िम्मेदारी होगी और कि जो एक दाग़ लगेगा वह सभी के दामन पर लगेगा। फिर राहुल ने अपनी चिट्ठी में दीपक से इस बात पर बेहद ख़ुशी और संतोष जताया था कि हमारे परिवार और इस पीढ़ी में आप सब से बड़े हैं और आप इस में जो इस शिद्दत से जुड़ाव महसूस कर रहे हैं तो ज़रूर इस समस्या का कोई सम्मानजनक समाधान भी निकलेगा। फिर उस ने सुझाया था कि उस की राय में मुनमुन की ससुराल में बातचीत कर के उस की सम्मानजनक ढंग से विदाई करवा कर इस समस्या को सुलझाना ठीक रहेगा। मुनमुन वहां जा कर अपने बिगड़ैल पति को सुधार भी सकती है। ऐसा कई बार देखा भी गया है कि पत्नी के प्यार में बहुत सारे बिगड़े लोग सुधर भी गए हैं। बस प्रयास सकारात्मक होना चाहिए।

राहुल की इस साफ़गोई, सुझाव और मेच्योरिटी का दीपक क़ायल हो गया। और रमेश को फ़ोन किया कि, ‘थोड़ा समय निकालो तो बांसगांव चल कर मुनमुन के ससुराल वालों के साथ मिल बैठ कर कोई रास्ता निकाला जाए।’ रमेश सहमत हो गया और बोला, ‘मैं आप को बताता हूं। ख़ुद फ़ोन करूंगा।’

दीपक को लगा कि अब तो बात बन ही जाएगी। कुछ दिन बाद रमेश का फ़ोन आया कि, ‘भइया मैं ने मुनमुन की विदाई का दिन तय कर दिया है। आप भी फला तारीख़ को पहुंचिए विदाई संपन्न करवा दीजिए।’

‘चलो यह बहुत अच्छा काम किया।’ दीपक बोला, ‘पर मेरा पहुंचना कोई ज़रूरी तो है नहीं। और फिर जब विदाई का दिन तय हो गया है तो विदाई हो ही जाएगी। मेरे आने न आने से क्या फ़र्क़ पड़ता है?’

‘फ़र्क़ पड़ जाएगा भइया।’ रमेश बोला, ‘मैं ने मुनमुन की ससुराल वालों को विदाई के लिए राज़ी किया है। अपने घर वालों को नहीं।’

‘तो उन्हें भी राज़ी कर लो।’

‘कैसे राज़ी करूं?’ रमेश चिढ़ कर बोला, ‘मुनमुन किसी सूरत तैयार नहीं है और अम्मा उस को शह दे रही हैं। जबकि बाबू जी हमेशा की तरह तटस्थ हो गए हैं।’

‘तो फिर कैसे होगी विदाई?’ दीपक चिंतित हो कर बोला।

‘कुछ नहीं भइया आप आ जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा।’

‘कैसे भला?’ दीपक ने आश्चर्य से पूछा, ‘मेरे पास कोई जादू की छड़ी है क्या?’

‘हां है न!’

‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात करते हो?’

‘अरे भइया आप को नहीं पता पर मैं जानता हूं कि आप की बात न तो मुनमुन टालेगी, न अम्मा, न बाबू जी। आप को शायद पता नहीं कि हमारे घर में जितनी आप की एक्सेप्टेंस है शायद किसी और की नहीं। भगवान झूठ न बोलवाए और माफ़ करे तो मैं कहूंगा कि शायद उतनी भगवान की भी नहीं।’ वह बोला, ‘बस आप उस दिन पहुंच भर जाइए।’

‘भई मुझे तो यह बात नहीं जम रही।’ दीपक बोला, ‘अगर मुनमुन की सहमति नहीं है तो मैं नहीं समझता कि विदाई होनी चाहिए।’

‘फिर?’ रमेश हताश हो कर बोला।

‘फिर क्या?’ दीपक बोला, ‘पहले तो मुनमुन को ही समझाना ज़रूरी है। वह छोटी है और हम लोग बड़े। उस को समझाना, बताना हम लोगों का धर्म है। फिर वह वयस्क है, पढ़ी लिखी है, अपना अच्छा-बुरा समझती है, उस की अपनी जिंदगी और अपना स्वाभिमान है। तुम भी पढ़े लिखे हो। एक ज़िम्मेदार पद पर हो। किसी के साथ इस तरह ज़ोर ज़बरदस्ती! भई मुझे तो नहीं समझ में आती और न ही तुम्हें शोभा देती है।’ वह बोला, ‘फिर यह मसला इतना नाज़ुक है कि इस में बहुत जल्दबाज़ी भी ठीक नहीं लगती मुझे।’

‘कुछ नहीं भैया आप पहुंचिए।’

‘अच्छा चलो मैं पहुंचूं और मुनमुन मामी वग़ैरह मेरी भी बात टाल गईं तो?’

‘तो क्या?’ रमेश बोला, ‘झोंटा पकड़ कर, खींच कर जबरिया घसीट कर विदा कर दूंगा।’

‘फिर तो भई मैं ऐसी विदाई में बिलकुल नहीं आऊंगा।’ दीपक बोला, ‘और तुम्हें भी सलाह दूंगा कि तुम भी हरगिज़ ऐसा मत करो।’

‘फिर क्या करूं?’

‘दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठा कर सम्मानजनक हल निकालने की कोशिश करो।’

‘कर चुका हूं यह कोशिश भी पर हल निकलने के बजाय बात और बिगड़ गई।’

‘एक बार फिर कोशिश करो। दो बार, तीन बार, चार बार, हज़ार बार कोशिश करो।’ दीपक बोला, ‘ऐसे हार मान जाने से और इस तरह हड़बड़ाने से तो बात नहीं बनने वाली है।’

‘पर मुनमुन का क्या करूं तब तक?’ रमेश बोला, ‘वह तो पतंग हुई जा रही है। पतंग बन कर परिवार की इज्ज़त पूरे बांसगांव में उड़ा रही है!’

‘मतलब?’

‘मतलब यह भइया!’ रमेश रुआंसा होता हुआ बोला, ‘कहते हुए अच्छा भी नहीं लगता पर कहना भी पड़ रहा है कि मुनमुन चरित्रहीन हो गई है। और क्या कहूं?’

‘ओह!’

‘इसी लिए कह रहा हूं कि येन केन प्रकारेण उसे विदा कर देना ही परिवार के हित में है।’ रमेश बोला, ‘आप को बताऊं भइया कि इसी चक्कर में हड़बड़ा कर ही उस की आनन-फानन शादी भी करनी पड़ी। और शादी में भी उस ने क्या-क्या नाटक नहीं करवाया। वह तो धीरज ने मामला संभाला किसी तरह। और क्या-क्या बताऊं आप को!’

‘चलो थोड़ा धीरज और रखो।’ दीपक बोला, ‘बात बिगड़ी हुई है तो थोड़ा समय लगेगा और समझदारी से काम लेना पड़ेगा।’

‘अब क्या बताऊं?’

‘नहीं सोचो कि अभी जल्दबाज़ी में शादी ग़लत हो गई। और जल्दबाज़ी में कहीं बात कुछ और न बिगड़ जाए। वो कहते हैं न कि पेंच ज़्यादा कसने से पेंच टूट भी जाता है।’

‘हां, यह तो है।’

‘चलो तुम भी कुछ सोचो, मैं भी कुछ सोचता हूं।’

‘ठीक भइया प्रणाम!’ कह कर रमेश ने फ़ोन काट दिया।

दीपक ने रमेश से हुई सारी बात राहुल को लिख भेजी। राहुल बहुत आशान्वित हुआ। उस ने अपनी मेल में लिखा कि, ‘अब आप दोनों भइया इस काम में लग गए हैं तो मुझे पूरी उम्मीद है कि बात बन जाएगी और कोई न कोई सम्मानजनक हल निकल आएगा।’ दीपक ने इस के जवाब में राहुल को लिखा, ‘मामला इतना आसान नहीं है और बहुत जल्दी नतीजे की उम्मीद करना भी बेमानी है।’

फिर दीपक ने धीरज को फ़ोन किया। पर धीरज का फ़ोन नहीं उठा। मुनमुन को मिलाया तो उस का फ़ोन स्विच आफ़ मिला। कुछ दिन बाद रमेश का फ़ोन आया और वह पूछने लगा, ‘भइया क्या सोचा?’

‘सोचना क्या है मैं ने तुम्हें पहले ही बता दिया है कि मुनमुन की इस तरह विदाई के ख़िलाफ हूं मैं। इस में मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।’ दीपक ने कहा, ‘हां, तुम जब चाहो दोनों पक्षों को आमने सामने बैठ कर बातचीत से पहले कोई हल निकालने की कोशिश की जाए फिर विदाई की बात आए तो मेरे हिसाब से ठीक रहेगा।’

‘भइया मैं आप से फिर कह रहा हूं कि विदाई ही एकमात्र हल है। नहीं मुनमुन कुछ अनर्थ करवा कर ही छोड़ेगी।’

‘तो करो विदाई मैं क्या कर सकता हूं?’

‘आप विदाई के समय आ सकते हैं।’

‘मैं तुम्हें कैसे और कितनी बार बताऊं रमेश कि ऐसे और इस तरह से विदाई से मैं सहमत नहीं और न ही आ सकता हूं।’

‘चलिए भइया मैं फिर फ़ोन करूंगा। आप फिर इस पर सोचिएगा। प्रणाम।’

रमेश के फ़ोन के बाद उस ने मुनमुन का फ़ोन मिलाया। लेकिन उस का फ़ोन पहले ही की तरह स्विच आफ़ मिला। वह जब-जब मिलाता हर बार स्विच आफ़ मिलता। अंततः एक दिन उस ने मुनमुन को एस.एम.एस. किया कि, ‘ज़रूरी बात करनी है और तुम्हारा फ़ोन हरदम स्विच आफ़ मिलता है। मुझे फ़ोन करो।’

दूसरे दिन ही मुनमुन की मिस काल मिली। दीपक ने तुरंत उसे फ़ोन मिलाया। उधर से मुनमुन ने फ़ोन रिसीव भी कर लिया। दीपक ने उस से पूछा, ‘तुम्हारा फ़ोन जब मिलाओ स्विच आफ़ रहता है। आखि़र बात क्या है?’

‘क्या बताएं भइया वह दुष्ट फ़ोन कर-कर के गालियां बकता रहता है। अनाप-शनाप बकता रहता है। इस लिए स्विच-आफ़ रखना पड़ता है।’

‘ऐसे तो सब से कट जाओगी।’ बताओ कोई तुम्हें मेसेज देना चाहे तो कैसे देगा। औरों की छोड़ो मैं ही परेशान हो गया।’

‘तो करूं क्या?’

‘सीधी बात नंबर बदल लो। और परिचितों को जिन को ज़रूरी समझो नंबर बता दो। जिन को न बताना हो मत बताओ।’

‘और यह परिचित ही नया नंबर फिर से उस राक्षस को दे देंगे। भइया कोई फ़ायदा नहीं।’

‘तो यह स्विच आफ़ तो कोई रास्ता नहीं है।’ रमेश बोला, ‘ख़ैर, छोड़ो यह बताओ कि रमेश से तुम्हारी कोई बात हुई है?’

‘हां, हुई तो थी, उधर दो बार।’

‘क्या कह रहा था?’

‘अब क्या बताऊं?’ कह कर मुनमुन रोने लगी। बोली, ‘ज़बरदस्ती मेरी विदाई करना चाहते हैं। मैं ने मना किया तो मुझे रंडी, कुत्ती बनाने लगे। कहने लगे झोंटा खींच कर, घसीट कर घर से बाहर कर दूंगा। कैसे नहीं जाओगी अपनी ससुराल।’

‘अरे?’ दीपक ने हैरत में आते हुए पूछा, ‘फिर?’

‘बताइए बहन से कोई इस तरह भला बात करता है?’ मुनमुन बोली, ‘मैं ने तो फिर भी मना कर दिया और कह दिया कि जो भी करना हो कर लीजिए। चाहिए तो मेरा गला दबा कर यहीं मार डालिए। पर ऐसे तो मैं उस राक्षस के यहां नहीं जाऊंगी। हां, भइया अगर आप की रमेश भइया से फिर कभी बात हो तो उन्हें बता दीजिएगा कि झोंटा पकड़ कर ज़बरदस्ती मेरी विदाई की कोशिश नहीं करें। वह जज हैं घरेलू हिंसा का क़ानून वह जानते ही होंगे। मैं उन पर आज़मा भी सकती हूं यह क़ानून। फिर उन की सारी जजी धरी की धरी रह जाएगी। मैं भी थोड़ा बहुत क़ानून जानती हूं।’

‘ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है। तुम भी थोड़ा पेशेंस रखो।’ वह बोला, ‘अच्छा ज़रा मामी से बात करवाओ!’

‘करवाती हूं ज़रा रुकिए!’ कह कर उस ने कहा, ‘अम्मा दीपक भइया का फ़ोन है।’

‘अच्छा-अच्छा!’ कह कर मामी बोलीं, ‘हां, दीपक भइया!’

‘मामी जी प्रणाम।’ दीपक ने पूछा, ‘और क्या हालचाल है?’

‘हालचाल तो भइया तुम को मालूम ही है सब आगे क्या बताऊं? बस बुढ़ापा है।’

‘वो तो है। पर यह बताइए रमेश से बात हुई आप की?’

‘हां, हुई तो है। मुनमुन की विदाई ज़बरदस्ती करने को कह रहा है। भइया उस को समझाओ जज है, जज ही रहे, जानवर न बने।’ वह बोलीं, ‘बताओ वह इतना बौखला गया है कि बहन के घाव पर मरहम लगाने के बजाय गालियां दे रहा है। तमाम ऊल जलूल बक रहा है। उस का घाव और गहरा कर रहा है। यह ठीक नहीं है।’

‘अच्छा मामी समझाता हूं रमेश को।’ दीपक बोला, ‘आप चिंता मत करिए।’

‘चिंता कैसे न करूं? आखि़र करूं भी क्या?’

‘अच्छा मामी प्रणाम!’ कह कर दीपक ने फ़ोन काट दिया। अब वह चिंता में पड़ गया कि क्या करे?

अंततः उस ने सोचा कि अब वह मुनमुन की ससुराल वालों से ख़ुद बात करेगा। इस बारे में दीपक ने पत्नी से भी राय मशविरा किया। पत्नी बोली, ‘यह सब तो ठीक है पर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बहुत ठीक नहीं है।’

‘मतलब?’

‘मुनमुन के भाई लोग ख़ुद इतने सक्षम हैं और वह लोग कुछ नहीं कर रहे हैं और आप हैं कि अब की जब से बांसगांव से लौटे हैं पगला गए हैं। जब देखो तब मुनमुन-मुनमुन! मुनमुन न हो आप का ओढ़ना बिछौना हो! कहिए तो किसी चैनल वालों से कहूं कि सब एक ख़बर चला दें कि आग लगी है बांसगांव में, फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ियां दौड़ रही हैं दिल्ली में।’

‘क्या बेवक़ूफी की बात करती हो वह मेरी भी बहन है।’ दीपक तमतमा गया, ‘मेरी भी ज़िम्मेदारी है।’

पत्नी चुप हो गई। दीपक ने फिर राहुल को एक मेल लिखा। और सारा हाल बताते हुए पूछा कि, ‘क्या मुनमुन की ससुराल से सीधे मेरा बात करना ठीक रहेगा?’

राहुल का जवाब उसी दिन आ गया। उस ने रमेश की गाली गलौज वाली भाषा पर हैरत जताते हुए अफ़सोस किया। और लिखा कि उन को इस तरह मुनमुन से पेश नहीं आना चाहिए। लेकिन अब वह बड़े हैं सो कुछ कहते भी नहीं बनता। अम्मा बाबू जी का हाल सुन कर वह दुखी हुआ। लेकिन मुनमुन का फ़ोन हरदम स्विच आफ़ रहने के कारण वह बांसगांव बात नहीं कर पा रहा। रही बात मुनमुन के ससुराल से बात करने की तो इस से अच्छी बात क्या होगी? उस ने लिखा था कि, आप के पास कोई पूर्वाग्रह नहीं है, कोई गांठ या कोई इगो नहीं है आप के पास। आप बात करिए दोनों पक्ष से। मेरा मतलब है मुनमुन से भी और मुनमुन की ससुराल वालों से भी। क्या पता कोई बात बन जाए, कोई रास्ता निकल जाए। दीपक दो एक दिन तक लगातार राहुल की चिट्ठी पर सोचता रहा। सोचता रहा कि वह करे तो क्या करे? अंततः उस ने मुनमुन की ससुराल फ़ोन किया। मुनमुन के ससुर घनश्याम राय फ़ोन पर मिले। वह बड़े ख़ुश हुए कि, ‘इतने लंबे गैप के बाद कोई तो बातचीत के लिए आगे आया।’ वह बोले, ‘नहीं मैं ही दो बार गया और बेइज़्ज़त हो कर लौट आया।’

‘ऐसा तो नहीं है।’ दीपक बोला, ‘रमेश ने इस बीच आप से विदाई के बाबत बात की है।’

‘हां-हां। फ़ोन आया तो था जज साहब का। लेकिन फिर वह भी भभक कर बुता गए।’

‘मतलब?’

‘मतलब यह कि विदाई हुई नहीं और वह कहते रहे कि यह कर दूंगा, वह कर दूंगा।’

‘देखिए बात अचानक विदाई की करना ठीक भी नहीं है।’ दीपक बोला, ‘पहले जो राह के रोड़े हैं उन्हें साफ़ कर लिया जाए फिर बात आगे बढ़ाई जाए।’

‘समझा नहीं मैं।’ घनश्याम राय थोड़ा बिदक कर बोले।

‘मतलब यह कि जिन कारणों से विदाई रुकी पड़ी है या मुनमुन को आप के यहां से लौटना पड़ा है, पहले उन समस्याओं का वाजिब हल ढूंढ लिया जाए। समाधान हो जाए तो फिर विदाई में कोई समस्या ही नहीं है।’

‘देखिए दीपक जी मेरा मानना है कि विदाई हो जाएगी तो बाक़ी समस्याएं स्वतः हल हो जाएंगी।’

‘नहीं मुझे लगता है पहले कोर इशू जो है, जो रूट काज़ है पहले उसे सुलझाया जाए।’

‘क्या है रूट काज़? क्या है कोर इशू?’ बिदकते हुए घनश्याम राय बोले, ‘आप तो पाकिस्तानी मुशर्रफ की तरह बोल रहे हैं कि जैसे वह आतंकवाद पर ब्रेक लगाने के बजाय कश्मीर-कश्मीर चिल्लाता था और कोर इशू, रूट काज़ कश्मीर बताता था। आप वैसे ही बोल रहे हैं। बताइए आप का कश्मीर, आप का रूट काज़, कोर इशू क्या है?’

‘देखिए हमारा नहीं आप का ही है कश्मीर, आप का ही है रूट काज़ और कोर इशू।’

‘मतलब?’

‘आप का बेटा राधेश्याम है कश्मीर। राधेश्याम की पियक्कड़ई है रूट काज़ और उस की बदतमीज़ी है कोर इशू। इस को निपटा लीजिए। सारी समस्याओं का समाधान हुआ समझिए!’

‘कोशिश तो हम कर रहे हैं दीपक बाबू।’ घनश्याम राय बोले, ‘पर अकेले हमारे बेटे का ही क़सूर नहीं है।’

‘समझा नहीं।’

‘समझना यह है कि पहले मेरा बेटा पियक्कड़ नहीं था। शादी के बाद बल्कि गौने के बाद जब बहू चली गई तो लोग ताना देने लगे। किसिम-किसिम का ताना। हम से ही लोग कहते हैं कि का घनश्याम बाबू आप की पतोहू भाग गई क्या? तो मैं तो सिर झुका कर सुन लेता हूं। वह नहीं सुन पाता। फ्रस्ट्रेट हो जाता है। फ्रस्ट्रेशन में पीने लगता है। बवाल करने लगता है। घर में भी। बाहर भी। तो इसी लिए बार-बार मैं कहता हूं कि विदाई हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा।’

‘चलिए कुछ सोच विचार करता हूं। फिर आप को फ़ोन करता हूं।’

‘ठीक है दीपक बाबू मैं इंतज़ार करता हूं आप के फ़ोन का।’ घनश्याम राय बोले, ‘अरे दीपक बाबू एक बात और कह दूं कि हमारे घर में रहने के लिए मुनमुन को अपनी नौकरी छोड़नी पडे़गी। और इस में कोई तर्क-वितर्क नहीं। कोई इफ़-बट नहीं। क्यों कि मेरा मानना है कि उस की यह शिक्षा मित्र की टुंटपुंजिया नौकरी ही सारी समस्याओं की जड़ है। इसी ने उस का दिमाग़ ख़राब कर रखा है। नहीं हमारे घर रही होती तो अब तक बाल बच्चे हो गए होते। उसी में उलझी रहती। बग़ावत नहीं करती इस तरह। तो कोर इशू यह भी है।’

‘चलिए देखते हैं।’

‘देखते नहीं यह फ़ाइनल है।’

‘बिलकुल।’ कह कर दीपक ने फ़ोन काट दिया। फिर बांसगांव फ़ोन मिलाया। जो हमेशा की तरह स्विच आफ़ मिला। अंततः उस ने एक एस.एम.एस. कर दिया मुनमुन को कि बात करे। दूसरे दिन मुनमुन का मिस काल आया। सुबह-सुबह। दीपक मार्निंग वाक की तैयारी में था तब। लेकिन उस ने मुनमुन का मोबाइल तुरंत मिलाया। यह सोच कर कि फिर जाने कब तक बंद रहे। फिर मुनमुन को घनश्याम से हुई सारी बात बताई और पूछा कि, ‘तुम्हारी क्या राय है? आमने सामने एक बार बात हो जाए?’

‘आप भी भइया क्यों पानी पीट रहे हैं?’ मुनमुन बोली, ‘मुझे नहीं लगता कि वह सुधरेगा और कोई रास्ता निकलेगा।’

‘क्यों? ऐसा क्यों लगता है?’ दीपक ने पूछा।

‘अभी कल ही वह आया था। गाली गलौज कर के दरवाज़ा पीट कर गया है। और आप हैं कि सुधार की उम्मीद कर रहे हैं!’

‘देखो मुनमुन उम्मीद पर दुनिया क़ायम है। तो यहां भी हम नाउम्मीद नहीं हैं।’ दीपक बोला, ‘इतना सब के बावजूद भारत-पाकिस्तान से बात कर सकता है तो हम लोग भी उन लोगों से बात क्यों नहीं कर सकते?’

‘बिलकुल कर सकते हैं आप कह रहे हैं तो।’ मुनमुन बोली, ‘पर भइया यह जान लीजिए कि बातचीत के बाद जो नतीजा पाकिस्तान-भारत को देता है वही नतीजा यहां भी वह सब देंगे।’

‘ठीक है चलो देखते हैं एक बार बात कर के भी।’

‘हां पर यह बातचीत किसी तीसरी जगह रखिएगा। न मेरे घर बांसगांव में न उस के घर।’ मुनमुन बोली, ‘और हां, यह भी कि वह पी कर नहीं आए।’

‘ठीक बात है।’ दीपक बोला, ‘अच्छा एक बात और। वह लोग चाहते हैं कि तुम यह शिक्षा मित्र की नौकरी छोड़ दो।’

‘यह नौकरी तो भइया हरगिज़ नहीं छोडूंगी।’ मुनमुन बोली, ‘यही तो एक आसरा है मेरे पास जीवन जीने का। यही तो एक हथियार है मेरे पास अपनी जंग लड़ने का। और इसी को छोड़ दूं?’

‘तो इस टुंटपुंजिया नौकरी के लिए पति और घर बार छोड़ दोगी?’

‘टुंटपुंजिया ही सही है तो मेरी नौकरी!’ मुनमुन बोली, ‘ऐसे अभागे पति के लिए मैं अपनी यह नौकरी नहीं छोडूंगी। पति छोड़ दूंगी पर नौकरी नहीं। हरगिज़ नहीं।’ मुनमुन पूरी सख़्ती से बोली, ‘आप लोग चाहते हैं कि मैं जियूं और अपने पंख काट लूं। ताकि अपने खाने के लिए उड़ कर दाना भी नहीं ला सकूं। माफ़ कीजिए भइया ऐसा मैं नहीं कर पाऊंगी। जान दे दूंगी पर नौकरी नहीं छोड़ूंगी। यही तो मेरा स्वाभिमान है।’

‘ठीक बात है।’ दीपक बोला, ‘ पर मुनमुन एक बात बताऊं कि थोड़ा झुक जाने में कोई नुक़सान नहीं है।’

‘किस के आगे?’

‘अपने पति और ससुराल के आगे।’

‘आप भी भइया!’

‘देखो मुनमुन जो औरत अपने पति के आगे नहीं झुकती उसे अंततः सारी दुनिया के आगे झुकना पड़ता है। और बार-बार झुकना पड़ता है।’

‘क्या भइया!’ वह बोली, ‘चाहे जो हो मैं नहीं झुकने वाली किसी के भी आगे।’

‘चलो ठीक है पर सोचना ज़रूर मेरी बात पर एक बार।’ कह कर दीपक ने फ़ोन काट दिया। मुनमुन की बात पर चिंता में पड़ गया। यह एक नया बदलाव था। दूसरे दिन धीरज को फ़ोन मिलाया। इत्तफ़ाक़ से धीरज ने फ़ोन उठा लिया। दीपक ने अब तक रमेश, राहुल, मुनमुन, घनश्याम राय से हुई बातचीत के डिटेल्स देते हुए उसे बताया कि, ‘एक फ़ाइनल बातचीत आमने सामने की होनी है। और मैं चाहता हूं कि इस मौक़े पर तुम भी रहो तो अच्छा रहेगा।’

‘ठीक है भइया मैं रह जाऊंगा पर बातचीत का ज़िम्मा आप ही संभालिएगा।’

‘ठीक है। बस तुम आ जाओ।’ कह कर दीपक ने धीरज का फ़ोन काट कर घनश्याम राय का फ़ोन मिलाया। और कहा कि, ‘भई देखिए अगले महीने के सेकेंड संडे को हम लोग बातचीत के लिए मिलेंगे। बातचीत में मुनमुन और उस के अम्मा पिता जी, धीरज और मैं रहूंगा। और आप अपनी तरफ़ से राधेश्याम और उन की मम्मी को ले कर आइएगा। यह बातचीत न आप के यहां होगी न बांसगांव में। बल्कि कौड़ीराम के डाक बंगले में होगी। और हां, राधेश्याम को समझा लीजिएगा कि पी कर नहीं आएंगे।’

‘ठीक है दीपक जी। ऐसा ही होगा। पर अब की बात फ़ाइनल हो जानी चाहिए। और जो कहिए तो एक वकील भी लेते आऊं। फिर जो भी फ़ैसला हो वह स्टैम्प पेपर पर दर्ज कर दिया जाए। ताकि रोज़-रोज़ की चिक-चिक ख़त्म हो जाए।’ घनश्याम राय बोले।

‘यह बताइए पारिवारिक बातचीत में वकील या स्टैम्प पेपर की बात कहां से आ गई भला?’ दीपक बिदक कर बोला।

‘अब बात पारिवारिक कहां रही?’ घनश्याम राय बोले, ‘बात पारिवारिक होती तो अब तक विदाई हो गई होती। पारिवारिक बात होती तो आप को बीच में नहीं आना पड़ता।’

‘घनश्याम जी आप भूल रहे हैं कि मैं परिवार का ही हूं। परिवार से ज़रा भी अलग नहीं हूं। ननिहाल है मेरा। मेरी देह में दूध और ख़ून वहीं का है।’

‘ननिहाल है आप का दीपक बाबू! रिश्तेदारी हुई। घर नहीं। वहां की विरासत आप नहीं मुनक्का राय के लड़के संभालेंगे।’ घनश्याम राय तल्ख़ हो कर बोले, ‘क्या मुनक्का राय के लड़कों ने चूड़ियां पहन रखी हैं जो अब आप को बात करनी पड़ रही है?’

‘घनश्याम जी आप की बात में मामला सुलझाने की नहीं उलझाने की गंध आ रही है। क्षमा करें ऐसे तो मैं बात नहीं कर पाऊंगा। न ही आ पाऊंगा।’

जारी...

अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। 33 साल हो गए हैं पत्राकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नहीं पर प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह 'एक जीनियस की विवादास्पद मौत' पर यशपाल सम्मान। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, फेसबुक में फंसे चेहरे, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब 'माई आइडल्स' का हिंदी अनुवाद 'मेरे प्रिय खिलाड़ी'  नाम से प्रकाशित। दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है. इस उपन्‍यास के पहले के भागों को पढ़ने के लिए नीचे आ रहे हेडिंगों पर क्लिक करें. दयानंद पांडेय के अन्‍य लेखों को पढ़ने के लिए सर्च बाक्‍स में उनका नाम डालकर खोजें.