: शाहन के शाह : ईश-उपासना की इससे बेहतर नजीर और क्‍या हो सकती है कि जब कोई भक्‍त यहां तक कह दे कि भले ही मेरी मां मुझे जन्‍म के फौरन बाद खुद से अलग कर दे, लेकिन हे ईश्‍वर तुम्‍हारा विछोह मैं सहन नहीं कर सकता। लेकिन जब यह बात वह व्‍यक्ति कह रहा हो, जिसके साथ खुद ऐसा ही घट चुका हो, तो बात रोंगटे तो खडे़ कर ही देगी। फिर कौन नहीं बह जाएगा भक्ति की इस जीती-जागती धारा वाली परम्‍परा में। मरण के साथ भी तो यही हुआ था। तब नीच मानी जाने वाली जाति के एक परिवार में जन्‍में इस शिशु को उसके माता-पिता ने केवल इस आधार पर त्‍याग दिया कि उसका चेहरा भयानकता की पराकाष्‍ठा पर था। इतना ही नहीं, घरवालों ने उसका नाम भी रख दिया- मरण। लेकिन यह कुरूप शिशु इतना निर्मल निकला कि बाद के इतिहास में अपने सौंदर्य की अद्भुद मगर अमिट छाप पूरे भारतीय जनमानस में छोड़ गया।

केवल विषमताओं से ही जन्‍मी घटना ने भारत के दक्षिणी समुद्र तट पर आस्‍था की ऐसी ऊंची-ऊंची लहरें फेंकनी शुरू कर दी, कि बस कुछ ही समय में भारत के अधिकांश इलाके में आडम्‍बरों से कसमसाता जनमानस तृप्‍त हो गया। भक्ति का यह निनाद रणभेरी की तरह पूरे देश को ऐसी बेमिसाल स्‍वरलहरियां थमा गया कि अगले करीब आठ-नौ सौ बरसों तक कोई और धुन अपना पैर तक नहीं रख पायी। इसमें भक्ति तो थी, लेकिन वह एकाकी नहीं, बल्कि हर-एक को खुद से जोड़ कर चलने के हौसले के साथ।

कोई इन्‍हें आडवार के नाम से पहचानता है तो कोई आलवार के तौर पर। दक्षित से उफनायी यह भारत की अनूठी हिन्‍दू संत परम्‍परा ठीक वैसी ही रही जैसे उत्‍तर पश्चिम में उभरी इस्‍लामी सूफी परम्‍परा। कहने की जरूरत नहीं कि सूफीवाद का विस्‍तार तेजी से तब बढ़ा, जब शासन और आश्रय के लिए नए इलाकों की खोज में इस्‍लामी फौजों ने अपने कदम बढ़ाये। इन फौजों की मारकाट ने इन्‍हें नये इलाकों के मूल समाज से जब काटना शुरू कर दिया और इंसान के साथ इंसानियत भी जिबह की जाने लगी, धर्म के नाम पर क्रूरतम और विभेदकारी बंदिशें थोपी जाने लगीं, तो उसके खिलाफ खुद इस्‍लाम के वे झंडाबरदार खड़े हो गये, जो मानवतावाद को सर्वोच्‍च मानते थे। जाहिर है, इनका रवैया देख प्रताडितों ने इन पर आस्‍था न्‍योछावर कर दी। भारत में भी यही हुआ।

लेकिन आलवारों का यह उफान भारत के दक्षिण से उभरा और देखते ही देखते आंध्र, मध्‍यप्रदेश, महाराष्‍ट्र, गुजरात, उत्‍तर प्रदेश और पंजाब होते हुए पूरे उत्‍तर भारत में फैल गया। कुल जमा एक दर्जन आलवार संतों ने इस काल में ईश्‍योपासना के अपने अनूठे तरीके को कुछ इस तरह प्रसारित कर दिया कि अगले करीब नौ सौ बरसों तक इसने भारत में एकछत्र राज किया। माना जाता है कि यह अभियान ईसा की सातवीं शताब्‍दी से लेकर बारहवीं शताब्‍दी के आसपास तक कायम रहा। हैरत की बात तो यह है कि सदियों के अपने इस लम्‍बे अंतराल में इन दर्जन भर संतों ने केवल बोल-गाकर ही अपनी धाक जमायी। न किताब थी और न पोथी। सुना, याद किया और फिर उसे जनजन तक पहुंचा दिया। और जब इनके भावों को संजोया गया तो जैसे उनका दम ही निकल गया। बारहवीं सदी के आसपास दक्षिण में उभरे वैष्‍णव सम्‍प्रदाय ने इनके गीतों और भावों को संग्रहीत करना शुरू कर कुछ ही समय में जब उसे प्रबन्‍धम नाम से एक पुस्‍तक का आकार दे दिया, तो यह सम्‍प्रदाय ही समाप्‍त हो गया। आज आलवारों का नाम केवल चंद लोगों तक भले ही सिमटा हो, लेकिन इस प्रबन्‍धम के लेकिन उनके गीत और भावों का वह प्रबन्‍धम आज भी तमिल वेद के तौर पर बाकायदा मान्‍यता प्राप्‍त है।

तो यह मरण ही थे, जिन्‍होंने अपने भजनों से दिग्‍काल जागृत कर दिया। बताते है कि घर से त्‍यागे जाने के बाद यह अनाथ से ही गांव के बाहर एक दरख्‍त पर ही पड़े रहे। कई स्‍थानों पर उनका नाम नम्‍न या शठकोप भी सुना गया है। कुरूपता के चलते कोई पास तो नहीं जाता था, लेकिन उनकी सुरक्षा और भोजन आदि की व्‍यवस्‍था गांववाले ही करते थे। एकाकी और उपेक्षा के माहौल में बड़े होने के चलते वे भगवान के ध्‍यान में ही लीन रहने लगे। किंवदंतियों के मुताबिक सोलह साल तक इसी हालत में रहने के बाद अचानक एक ब्राह्मण ने उन्‍हें दीक्षा दी और भगवद-भजन को प्रेरित किया। आवाज में दम था और भावों में जीवंतता। बस मरण का नाम देखते ही देखते सीधे लोगों के दिलों में छा गया। जिसके माता-पिता या गांववाले उसे देखने से भी कतराते रहे हों, उसको देखने-सुनने वालों का तांता लगने लगा। अनुमानों के अनुसार यह ईसा की दूसरी सदी की बात है। जल्‍दी ही मरण शब्‍द जीवन्‍तता का पर्याय बन गया और साथ ही एक नये सम्‍प्रदाय का सूरज उगा। नाम पड़ा आलवार। कुछ लोग इसे आडवार के नाम से भी जानते हैं। मरण के बाद तो इस सम्‍प्रदाय में कम से कम ग्‍यारह और लोग शीर्ष तक पहुंचे लेकिन उनका कालक्रम निर्धारित नहीं हो सका है, सिवाय मरण के। इनकी मूल जातियों को लेकर भी कुछ निश्चित नहीं है, लेकिन माना जाता है कि इनमें ज्‍यादातर नीची जाति के ही लोग थे।

दरअसल, आलवारों का यह सम्‍प्रदाय बहुत पढ़ा लिखा नहीं रहा। वैसे भी यह भजन पर ही ध्‍यान देते थे। परम्‍परा थी बस। इससे सुना, उसको सुनाया। आलवार सम्‍प्रदाय की शुरुआत तो भक्ति के साथ भजन में मधुर रस के समावेश से ही हुई, लेकिन बाद के गुरुओं ने इसमें वात्‍सल्‍य और संख्‍य भाव को भी पर्याप्‍त जगह देकर ऐसा प्रेम-भक्ति-स्‍वाद युक्‍त पेय पदार्थ बना दिया, जिसे चखकर हर कोई बेसुध हो गया। जरा इस भाव को देखिये:- हे ईश्‍वर। तुम मां हो मेरी और मैं तुम्‍हारी सन्‍तान। अब अगर कोई मां किसी बच्‍चे पर यदि कुपित हो जाए या उसे झटक दे तो क्‍या वह शिशु अपनी मां को छोड़ देगा। जाहिर है कि यह ईश्‍वर के प्रति निश्‍छल साधना ही तो थी जिसने आलवार सम्‍प्रदाय के भक्‍तों को परमात्‍मा के दिव्‍य प्रेम का प्रसाद जीभर कर बांटा। लेकिन इसे क्‍या कहा जाए कि जो सम्‍प्रदाय केवल श्रुतियों-गीतों पर अपनी जड़ें गहरी जमाए खड़ा था, वैष्‍णवों ने जब इनके गीतों को अपने पंथ को मजबूत करने के लिए प्रबन्‍धम के रूप में संग्रहीत कर लिया, उसके बाद से ही आलवार सम्‍प्रदाय की इमारत डगमगाने लगीं।

इस सम्‍प्रदाय के लोग ईश्‍वर के प्रति बेहद आस्‍था रखने वाले सरल और सात्विक माने जाते हैं। मान्‍यता है कि प्रबन्‍धम का पाठ दक्षिण के धार्मिक या मांगलिक उत्सवों पर खूब होता रहा है। इसके पाठ का तरीका भी विशिष्‍ट है। मंडप के बार खड़ा होकर इसका पाठ किया जाता है और पाठ करने वाले यानी अडैयार पर जाति बंधन कत्‍तई नहीं। कुछ भी हो, तब के समाज में इस सम्‍प्रदाय के प्रति सम्‍मान के भाव का अंदाजा केवल इसी से लगाया जा सकता है कि दक्षिण और मध्‍यभारत के अधिकांश देव-मंदिरों में आलवारों की भी मूर्तियां प्रतिष्‍ठापित की गयी हैं। इतना ही नहीं, त्रावणकोर के राजा कुलशेखर तक इस सम्‍प्रदाय के सामने नतमस्‍तक थे। और ऐसा होता भी क्‍यों न, जब आलवारों का नेता खुलेआम ईश्‍वर को प्रेममय चुनौती दे रहा हो कि:- तुम मेरे बिना नहीं हो। हां, मैं भी तुम्‍हारे बिना कहां हूं भगवान।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.