: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : वह क्या करें? किंकर्त्तव्य विमूढ़ हुआ एक वृद्ध पिता सिवाय अफ़सोस, मलाल और चिंता के कर भी क्या सकता था? लोग समझते थे कि उन का परिवार प्रगति के पथ पर है। पर उन की आत्मा जानती थी कि उन का परिवार पतन की पराकाष्ठा पर है। वह सोचते और अपने आप से ही कहते कि भगवान बच्चों को इतना लायक़ भी न बना दें कि वह माता पिता और परिवार से इतने दूर हो जाएं। अपने आप में इतना खो जाएं कि बाक़ी दुनिया उन्हें सूझे ही नहीं। अख़बारों में  वह पढ़ते थे कि अब दुनिया ग्लोबलाइज़ हो गई है। जैसे एक गांव हो गई है समूची दुनिया। पर उन को लगता था कि अख़बार वाले ग़लत छापते हैं।

बेटियों से तो कोई उम्मीद थी नहीं। पर उन के चारों बेटे जाने किस ग्रह पर रहते थे कि उन का दुख, उन की यातना उन्हें दिखती ही न थी। बेटों की इस उपेक्षा और अपमान की बाबत वह किसी से कुछ कह भी नहीं पाते थे। मारे लोक लाज के। कि लोग क्या कहेंगे? वह सोचते यह सब और अपने आप से ही पूछते कि, ‘क्या इसी को ग्लोबलाइजे़शन कहते हैं?’

सवाल तो उन के पास कई थे। पर इन का जवाब एक भी नहीं। कहा जाता है कि दिल पर जब बोझ बहुत हो तो किसी से शेयर कर लेना चाहिए। दिल का बोझ कुछ कम हो जाता है। पर मुनक्का राय यह सोचते कि किस से वह अपने बेटों की शिकायत करें? वह मर न जाएंगे जिस दिन अपने बेटों की शिकायत किसी से करेंगे। उलटे वह तो जब भी कहीं बेटों का ज़िक्र आता तो कहते कि, ‘हमारे बेटे तो सब रत्न हैं रत्न!’

पर यह बेटे सब जाने किस राजा के रत्न बन बैठे थे कि माता पिता के दुखों को देखे बिना बिसार बैठे थे। एक बार धीरज से फ़ोन पर उन्हों ने कहा भी था कि, ‘बेटा जब तुम अध्यापक थे तो ज़्यादा अच्छे थे। हम लोगों का दुख-सुख ज़्यादा समझते थे। तुम्हें याद होगा उन दिनों तुम्हारे नियमित मदद के वशीभूत मैं ने तुम्हारा नाम कभी नियमित प्रसाद तो कभी सुनिश्चित प्रसाद रखा और कहा करता था।’ पर वह इस पर कुछ बोला नहीं उलटे अपनी व्यस्तताएं और ख़र्चे बताने लगा था।

चुप रह गए थे मुनक्का राय। उन्हीं दिनों टी.वी. पर आ रहे कवि सम्मेलन पर एक कवि ने कविता सुनाई थी, ‘कुत्ते को घुमाना याद रहा पर गाय की रोटी भूल गए/साली का जनम दिन याद रहा पर मां की दवाई भूल गए।’ सुन कर वह फिर अपने आप से बोले, ‘हां, ज़माना तो बदल गया है।’ बाद में पता चला धीरज की दो-दो सालियां उस के साथ नियमित रह रही हैं। और वह ससुराल पर ख़ासा मेहरबान है। एक बड़ा सा कुत्ता भी रख लिया है। शायद इसी लिए वह अपने नियमित प्रसाद और सुनिश्चित प्रसाद को भूल गया। भूल गया कि अम्मा बाबू जी खाना भी खाते हैं और दवाई भी। बाक़ी ज़रूरतें भी अलग हैं। नातेदारी, रिश्तेदारी, न्यौता हकारी। सब भूल गया नियमित प्रसाद उर्फ सुनिश्चित प्रसाद उर्फ धीरज राय।

क्या डिप्टी कलक्टरी ऐसे ही होती है?

ऐसे ही होते हैं न्यायाधीश?

ऐसे ही होते हैं बैंक मैनेजर?

और ऐसे ही होते हैं एन.आर.आई?

क्या एन.आर.आई. राहुल भी गाता होगा, ‘हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद।’ और वो पंकज उधास का गाना सुनता होगा कभी क्या कि, ‘चिट्ठी आई है, वतन से चिट्ठी आई है! सात समंदर पार गया तू हम को जिंदा मार गया तू!’ सुनता होगा क्या, ‘मैं तो बाप हूं मेरा क्या है/तेरी मां का हाल बुरा है।’ सुनता होगा इस गाने की तासीर, ‘कम खाते हैं, कम सोते हैं बहुत ज़ियादा हम रोते हैं।’ क्या पता सुनता हो? सुनते हों बाक़ी भी। न्यायाधीश भी, डिप्टी कलक्टर भी और बैंक मैनेजर भी। या हो सकता है यह गाना सुनते ही बंद कर देते हों। सुनना ही नहीं चाहते हों। जैसे कि धीरज अब फ़ोन भी नहीं सुनता। मोबाइल या तो उठता नहीं या स्विच आफ़ रखता है। लैंड लाइन फ़ोन कोई कर्मचारी उठाता है और किसी मीटिंग या बाथरूम में बता देता है। कितनी भी ज़रूरी बात हो वह नहीं सुनना चाहता। क्या वह अपने क्षेत्र की जनता की भी ऐसे ही अनसुनी करता होगा? सोच कर मुनक्का राय कांप जाते हैं।

कांप गई थी मुनमुन भी जब एक दिन अचानक उस का पति राधेश्याम बांसगांव उस के घर आ गया। मुनमुन और अम्मा दोनों ही बाहर दरवाजे़ पर ओसारे में बैठी एक पड़ोसन से बतिया रही थीं। मुनमुन को बुख़ार था। इस लिए स्कूल नहीं गई थी। राधेश्याम आया। मोटरसाइकिल दरवाजे़ पर खड़ी कर ओसारे में आया। ख़ाली कुर्सी पर धप्प से बैठ गया। मुनमुन से बोला, ‘चलो मेरे साथ और अभी चलो!’

‘कहां?’ मुनमुन अचकचा गई। पूछा, ‘आप कौन?’

‘तो अब अपने मर्द को भी नहीं पहचानती?’ राधेश्याम मां की गाली देते हुए बोला, ‘पहचान लो आज से मैं तुम्हारा हसबैंड हूं।’

‘अरे?’ कह कर वह घर में भागी। राधेश्याम शराब के नशे में धुत था। आवाज़ लड़खड़ा रही थी पर उस ने लपक कर, मुनमुन को झपट्टा मार कर पकड़ लिया। बोला, ‘चल कुतिया अभी मेरे साथ चल!’

अम्मा ने हस्तक्षेप किया और हाथ जोड़ कर बोलीं, ‘भइया पहले चाय पानी तो कर लीजिए।’

‘हट बुढ़िया!’ अम्मा को राधेश्याम ने ढकेलते हुए कहा, ‘चाय पीने नहीं आया हूं। आज इस को ‘लेने’ आया हूं।’

अम्मा का सिर दीवार से टकरा कर फूट गया। और वह गिर कर रोने लगीं, ‘हे राम कोई बचाओ मेरी बेटी को।’ मुनमुन ने प्रतिरोध किया तो राधेश्याम ने उसे भी बाल पकड़ कर पीटना शुरू कर दिया। वहां बैठी पड़ोसन बचाव में आई तो उसे भी मां बहन की गालियां देते हुए लातों जूतों से पिटाई कर दी। चूंकि यह मार पीट घर के बाहर घट रही थी सो कुछ राहगीरों ने भी हस्तक्षेप किया और राधेश्याम से तीनों औरतों को छुड़ाया। राधेश्याम को दो तीन लोगों ने कस कर पकड़ा और औरतों से कहा कि, ‘आप लोग घर में चली जाइए।’

मुनमुन और उसकी अम्मा ने घर में जा कर भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। पड़ोसन अपने घर भागी। फिर राहगीरों ने राधेश्याम को छोड़ा। राधेश्याम ने राहगीरों की भी मां बहन की। और बड़ी देर तक मुनमुन के घर का दरवाज़ा पीटता गरियाता रहा। फिर चला गया। घर का दरवाज़ा शाम को तभी खुला जब मुनक्का राय कचहरी से घर आए। उन्हों ने जब यह हाल सुना तो माथा पकड़ कर बैठ गए। बोले, ‘अब यही सब देखना बाक़ी रह गया है इस बुढ़ौती में? हे भगवान कौन सा पाप किया है जो यह दुर्गति हो रही है?’

थोड़ी देर में वह गए एक डाक्टर को पकड़ कर लाए। मां बेटी की सुई, दवाई, मरहम पट्टी कर के वह चला गया। देह के घाव तो दो चार दिन में सूख जाएंगे पर मन पर लगे घाव?

शायद कभी नहीं सूखेंगे। देह के घाव अभी ठीक से भरे भी नहीं थे कि अगले ह़ते राधेश्याम फिर आ धमका। अब की वह मोटरसाइकिल दरवाज़े पर खड़ी कर ही रहा था कि मां-बेटी भाग कर घर में घुस गईं और भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। लेकिन राधेश्याम माना नहीं दरवाज़ा पीट-पीट कर गालियां बकता रहा और कहता रहा, ‘खोलो-खोलो आज ले कर जाऊंगा।’

लेकिन मुनमुन ने दरवाज़ा नहीं खोला। फिर राधेश्याम बगल के एक घर में गया। वहां भी गाली गलौज की। वह लोग जानते थे कि यह मुनक्का राय का दामाद है सो हाथ जोड़ कर उसे जाने को कहा। वह फिर मोटरसाइकिल ले कर गिरधारी राय के घर गया। जब उसे पता चला कि गिरधारी राय मर गए तो भगवान को संबोधित कर के कुछ गालियां बकीं। और चाय पीते-पीते उन की एक बहू को पकड़ लिया और बोला, ‘मुनमुन नहीं जा रही है तो तुम्हीं चलो। तुम पर भी हमार हक़ बनता है।’

गिरधारी राय के बेटे भी पियक्कड़ थे सो उन की बहू पियक्कड़ों से निपटना जानती थी। सो बोली ‘हां-हां क्यों नहीं पहले कपड़ा तो बदल लूं। आप तब तक बाहर बैठिए।’ कह कर उस ने राधेश्याम को बाहर बैठा कर भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। राधेश्याम ने फिर यहां भी तांडव किया। दरवाज़ा पीट-पीट कर गालियों की बरसात कर दी। फिर तो आए दिन की बात हो गई राधेश्याम के लिए। वह पी-पा कर आता। उस को देखते ही औरतें घर के भीतर हो कर दरवाज़ा बंद कर लेतीं। मुनमुन के घर वह दरवाज़ा पीट-पीट कर गालियां बकता, पड़ोसियों के घर और फिर गिरधारी राय के घर भी। जैसे यह सब उस का रूटीन हो गया था। मुनमुन के घर तो वह पलट-पलट कर आता। कई-कई बार। जैसे मुनमुन के घर गाली गलौज कर पड़ोसी के घर जाता। फिर पलट कर मुनमुन के घर आता। फिर गिरधारी राय के यहां जाता। फिर मुनमुन के यहां आता। फिर किसी पड़ोसी, फिर मुनमुन। जब तक उस पर नशा सवार रहता वह आता-जाता रहता।

एक दिन राधेश्याम गाली गलौज के दो राउंड कर के जा चुका था कि मुनमुन का फुफेरा भाई दीपक आ गया मुनमुन के घर। यह फुफेरा भाई दिल्ली में रहता था और दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कालेज में पढ़ाता था। दीपक बहुत दिनों बाद दिल्ली से अपने घर आया था तो सोचा कि मामा-मामी से भी मिलता चले। क्यों कि वह बचपन में अकसर मामा-मामी के पास आता था और मामी बड़े शौक़ से किसिम-किसिम के पकवान बना-बना कर उसे खिलाती रहती थीं। वह मामी के पास ह़फ्ते-ह़फ्ते रह जाता था गरमियों की छुट्टियों में। मामी उसे मानती भी बहुत थीं। तब मामी ख़ूब भरी-पुरी और ख़ूब सुंदर सी दीखतीं थीं। बिलकुल फ़िल्मी हिरोइनों की तरह सजी संवरी रहतीं। मामा भी सब के सामने ही उन से हंसी ठिठोली करते रहते। मुनमुन तब छोटी सी नटखट सी थी। मामा की प्रैक्टिस तब ख़ूब चटकी हुई थी। फ़ौजदारी और दीवानी दोनों में उन की चांदी थी। लक्ष्मी जी की अगाध कृपा थी उन दिनों मामा-मामी पर। कहने वाले कहते कि मुनमुन बड़ी भाग्यशाली है। बड़े भाग ले कर आई है। साक्षात लक्ष्मी बन कर आई है। ऐसा लोग कहते। ज़िले में उन दिनों बाह्मण-ठाकुर बाहुबलियों का बोलबाला था। और बांसगांव के पास सरे बाज़ार एक गुट के सात लोग जीप से उतार कर मार दिए गए थे। अगले ह़फ्ते ही दूसरे गुट ने अगले ग्रुप के नौ लोगों को एक बाज़ार में घेरा। पांच मार दिए सरे बाज़ार और चार नदी में कूद कर तैरते हुए जान बचा कर भाग गए। शहर में सरे शाम एक छात्र नेता की हत्या मुख्य बाज़ार में हो गई तो एक विधायक की हत्या सुबह-सुबह रेलवे स्टेशन पर हो गई। यह सारी ताबड़तोड़ हत्याएं बांसगांव के लोग ही कर करवा रहे थे।

बांसगांव तब तहसील नहीं, अपराध की भट्ठी बन गया था। धर पकड़ की जैसे महामारी मची थी। और इन्हीं दिनों मुनक्का राय की प्रैक्टिस जमी हुई थी। ज़मानत करवाने में वह माहिर थे। उन का कोर्ट में खड़ा होना मतलब ज़मानत पक्की! पर वह और दिन थे, यह और दिन। अब तो मामा की प्रैक्टिस चरमरा गई थी और वह हिरोइन सी दिखने वाली मामी की भरी-पुरी देह हैंगर पर टंगे कपड़े सी हो गई थी। देह क्या हड्डियों का ढांचा रह गई थीं-मामी। उन की देह की ढलान एक बेटे की मृत्यु के बाद जो शुरू हुई तो फिर नहीं रुकी। मामी के आज चार बेटे हैं पर पहले पांच बेटे थे। तरुण और राहुल के बीच का शेखर। शेखर ने बस हाई स्कूल विथ डिस्टिंक्शन पास किया ही था कि उस की तबीयत ख़राब रहने लगी। बांसगांव के डाक्टर इलाज कर-कर के थक गए तो शहर के डाक्टरों को दिखाया मुनक्का राय ने शेखर को। दुनिया भर की जांच पड़ताल के बाद पता चला कि शेखर की दोनों किडनी फेल हो गई हैं। डायलिसिस वग़ैरह शुरू हुई। और अंततः तय हुआ कि बनारस जा कर बी.एच.यू. में किडनी ट्रांसप्लांट करवाया जाए।

मुनक्का राय ख़ुद अपनी एक किडनी देने को तैयार हो गए। बोले, ‘बेटे के लिए कुछ भी करने को तैयार हूं मैं।’ फिर भी वह बेटे से कहते, ‘बाबू शेखर जो भी खाना हो खा लो, जो भी पहनना हो पहन लो फिर पता नहीं क्या हो? पर तुम्हारी कोई इच्छा शेष नहीं रहनी चाहिए। सारी इच्छाएं पूरी कर लो।’ पर शेखर अम्मा-बाबू जी की परेशानी देख कर कहता, ‘नहीं बाबू जी हम को कुछ नहीं चाहिए।’ फिर वह जैसे जोड़ता कि, ‘बाबू जी मत करवाइए हमारा आपरेशन। बहुत पैसा ख़र्च हो जाएगा।’ वह दरअसल देख रहा था कि बाबू जी की लगभग सारी कमाई उस के आपरेशन में दांव पर लगने जा रही थी। क़र्जा अलग से। सो वह कहता, ‘आपरेशन के बाद भी जाने मैं ठीक होऊंगा कि नहीं। रहने दीजिए।’

तो भी मुनक्का राय ने शेखर के किडनी ट्रांसप्लांट में होने वाले ख़र्च के लिए पूरी व्यवस्था जब कर ली तो एक दिन वह शहर गए। शेखर को ले कर। एक हार्ट स्पेशलिस्ट थे डाक्टर सरकारी। वह बी.एच.यू. के ही पढ़े हुए थे। उन के कोई परिचित डाक्टर बी.एच.यू. में थे जो किडनी ट्रांसप्लांट करते थे। उन के लिए सिफ़ारिशी चिट्ठी डाक्टर सरकारी से लिखवाने के लिए मुनक्का राय गए थे उन के पास। डाक्टर सरकारी के सामने शेखर को लिए वह बैठे हुए थे। बातचीत के बाद डाक्टर सरकारी चिट्ठी लिख ही रहे थे कि शेखर की छाती में अचानक ज़ोर से दर्द उठा। वह छटपटाने लगा। डाक्टर सरकारी ने चिट्ठी लिखनी छोड़ दी। दौड़ कर उसे अटेंड किया। उन का पूरा अमला लग गया शेखर को बचाने के लिए। लेकिन सोलह साल का शेखर जो किडनी का पेशेंट था, हार्ट स्पेशलिस्ट के सामने हार्ट अटैक का शिकार हो गया था। और वह हार्ट स्पेशलिस्ट लाख कोशिश के उसे बचा नहीं पाया। शेखर जब मरा तो मुनक्का राय की बाहों में ही था। वह रोते-बिलखते शेखर का शव लिए बांसगांव आए। शेखर की मां पछाड़ खा कर गिर पड़ीं। कई दिनों तक बेसुध रहीं। जवान बेटे की मौत ने उन्हें तोड़ दिया था। मुनक्का राय ख़ुद भी कहते, ‘जिस बाप के कंधे पर जवान बेटे की लाश आ जाए उस से बड़ा अभागा कोई और नहीं होता।’ टूटे फूटे मुनक्का राय बहुत दिनों तक कचहरी नहीं गए।

पर धीरे-धीरे वह संभले। जाने लगे कचहरी-वचहरी। पर शेखर की अम्मा नहीं संभलीं। शेखर की याद में, शेखर के ग़म में वह गलती गईं। फिर पारिवारिक समस्याएं एक-एक कर आती गईं और वह किसी मकान के किसी कच्ची दीवार की तरह धीरे-धीरे भहराती रहीं। गलती रहीं। फिर उन की सुंदर देहयष्टि उन से जैसे बिसरने लगी। रूठ गई। वह बीमार रहने लगीं। रही सही कसर मुनमुन की तकलीफ़, बेटों की उपेक्षा और अचानक आई दरिद्रता ने पूरी कर दी। वह किसी हैंगर पर टंगी कमीज की मानिंद चलता फिरता कंकाल हो गईं। जैसे वह नहीं, उन का ढांचा चलता था। उन की मांसलता, उन की सुंदरता, उन का बांकपन उन से विदा हो गया था। उन की कंटली चाल, उन के गालों के गड्ढे और उन की आंखों की शोख़ी जैसे किसी डायन ने सोख ली थी। तो भी इस मामी का ममत्व दीपक नहीं भूल पाता था। उन के वह सुख भरे दिन याद करता और जब-जब अपने गांव आता मामी के भी चरण छूने ज़रूर आ जाता बांसगांव।

तो इस बार भी आया दीपक बांसगांव। बड़ी देर तक दरवाज़ा पीटने पर धीरे से मुनमुन की मिमियाई हुई आवाज़ आई, ‘कौन?’

‘अरे मैं दीपक!’

‘अच्छा-अच्छा।’ मुनमुन ने पूछा, ‘कोई और तो नहीं है आप के साथ?’

‘नहीं तो मैं अकेला हूं।’

‘अच्छा-अच्छा!’ कहती हुई मुनमुन ने किसी तरह दरवाज़ा खोला। बोली, ‘भइया अंदर आ जाइए।’

दीपक के अंदर जाते ही उस ने तुरंत दरवाज़ा बंद कर लिया। मुनमुन और मामी दोनों के चेहरे पर दहशत देख कर दीपक ने पूछा कि, ‘आखि़र बात क्या है?’

‘बात अब एक हो तो बताएं भइया।’

कहती हुई मामी फफक पड़ीं। बोलीं, ‘बस यही जानो कि मुनमुन का भाग फूट गया और क्या बताएं?’ फिर मामी और मुनमुन ने बारी-बारी आपनी यातना और अपमान कथा का रेशा-रेशा उधेड़ कर रख दिया। सब कुछ सुन कर दीपक हतप्रभ हो गया। उस ने मुनमुन से कहा, ‘अगर ऐसा था तो तुम ने हम को बताया होता मैं चला गया होता शादी के पहले जांच पड़ताल कर आया होता।’

‘कहां भइया आप तो दिल्ली में थे। और फिर मैं ने यहां जितेंद्र भइया से कहा था पर वह भी टाल गए।’ जितेंद्र दीपक का छोटा भाई था और यहीं शहर में रहता था। रेलवे में काम करता था।

‘अच्छा!’ दीपक बोला, ‘ऐसा तो नहीं करना चाहिए था उसे। फिर भी तुम एक बार फ़ोन या चिट्ठी पर हमें बता तो सकती ही थी। और फिर जब शादी में आया था तब भी कह सकती थी।’

‘अब शादी के समय आप भी क्या कर सकते थे?’

‘खै़र, रमेश, धीरज या तरुण को यह सब जो कुछ हो रहा है बताया?’

‘वही लोग जो हम लोगों का ख़याल रखते तो उस पियक्कड़ की हिम्मत थी जो हम लोगों के साथ यह सब करता?’ दीपक के सामने चाय का कप रखती हुई मुनमुन बोली, ‘और फिर जो इतना मेरा ख़याल रखा होता तो यह पियक्कड़ और पागल मेरी जिंदगी में आया ही क्यों होता?’

‘ये तो है!’ दीपक धीरे से बोला।

‘जानते हैं भइया इस पियक्कड़ का चेहरा शादी में जयमाल के बाद फिर पिटाई के बाद ही मैं ने यहां देखा। लगभग पंद्रह दिन वहां ससुराल में रही तो कभी भूल कर भी इस की शकल देखने को नहीं मिली। दो तीन दिन बाद हार कर इस की बहनों और भाइयों से मैं ने पता करना शुरू किया कि तुम्हारे भइया कहां सोते हैं? तो पता चला कभी बाग में सो जाते हैं, कभी टयूबवेल पर, कभी कहीं तो कभी कहीं। क्या तो गंजेड़ियों अफीमचियों और चरसियों की महफ़िल जुटती है जहां तहां। तो लत के चक्कर में इस को अपनी बीवी की तब सुधि ही नहीं थी। अब हुई है तो आ कर मार पीट करने के लिए।’

‘बताओ तमाम नातेदारी, रिश्तेदारी में इस परिवार को लोग रश्क से देखते हैं। भाइयों के गुणगान करते नहीं थकते।’

‘कुछ नहीं भइया चिराग़ तले अंधेरा वैसे ही तो नहीं कहा गया है।’

‘ये तो है।’

यह सब देख सुन कर दीपक का मन ख़राब हो गया। सोचा था कि बांसगांव वह एक रात रह कर जाएगा। मामा-मामी से ख़ूब बतियाएगा। पर यहां का माहौल देख कर वह तुरंत चलने को तैयार हो गया। मामी ने कहा, ‘अरे आज तो रुको। शाम तक मामा भी आ जाएंगे। बिना उन से मिले चले जाओगे?’

‘मामा से अभी कचहरी जा कर मिल लूंगा।’ दीपक ने बहाना बनाया, ‘शहर में कुछ ज़रूरी काम निपटाना है। इस लिए जाना तो पड़ेगा।’

‘अच्छा भइया थोड़ी देर तो रुक जाइए। अम्मा कह रही हैं तो मान जाइए।’

‘चलो ठीक है। थोड़ी देर रुक जाता हूं।’ कह कर वह रुक गया। वह देख रहा था कि घर की समृद्धि, दरिद्रता में तब्दील हो रही थी। विपन्नता देह और देह के कपड़े लत्तों, घर के सामान, भोजन आदि में ही नहीं बातचीत में भी बिखरी पड़ी थी। बात-बात में उस ने मुनमुन से रमेश, धीरज और तरुण के फ़ोन नंबर ले लिए और कहा कि, ‘देखो मैं बात करता हूं फिर बताता हूं। और हां, राहुल का फ़ोन आए तो मेरा नंबर उसे देना और कहना कि मुझ से बात करे। और हां, अपना भी नंबर दो और अपनी ससुराल का भी नंबर दो। ताकि पूछूं कि वह यह हरकत क्यों कर रहा है?’

मुनमुन ने सब के नंबर दे कर दीपक का नंबर ख़ुद ले लिया। और बताया कि, ‘धीरज भइया का फ़ोन मिल पाना बहुत मुश्किल होता है। अव्वल तो उठता नहीं। उठता भी है तो कोई कर्मचारी उठाता है और उन्हें बाथरूम या मीटिंग में भेज देता है। बात नहीं कराता है।’

‘चलो फिर भी देखता हूं।’

‘और हां, जो मेरी ससुराल फ़ोन करिएगा तो हाथ पैर जोड़ कर उन सब का दिमाग़ मत ख़राब कीजिएगा। जो भी बात करिएगा वह सख़्ती से करिएगा।’

‘नहीं-नहीं यह बात तो मैं सख़्ती से करूंगा ही कि वह यहां इस तरह शराब पी कर न आया करे। यह तो कहना ही पड़ेगा।’

‘चाहिए तो अभी कर लीजिए।’ मुनमुन उत्साहित होती हुई बोली।

‘नहीं अभी नहीं।’ दीपक बोला, ‘पहले थोड़ी प्लानिंग कर लूं। रमेश, धीरज वगै़रह से भी राय मशविरा कर लें। तब। जल्दबाज़ी में यह सब ठीक नहीं है।’

‘चलिए जैसा आप ठीक समझिए।’ मुनमुन बोली, ‘पर भइया लोग आप को मेरे मसले पर शायद ही कोई राय मशविरा दें।’

‘क्यों?’

‘अरे कोई राय मशविरा होता तो लोग ख़ुद आ कर कोई उपाय नहीं करते?’ वह बोली, ‘एक बार घनश्याम राय के कहने पर रमेश भइया ज़रूर आए पर समस्या का कोई हल निकाले बिना चले गए। फिर पलट कर फ़ोन पर भी आज तक नहीं पूछा कि तुम लोग जिंदा भी हो कि मर गए? मेरी तो छोड़िए अम्मा बाबू जी की भी कोई ख़ैर ख़बर नहीं लेता। घर का ख़र्च वर्च कैसे चल रहा है, दवाई वग़ैरह का ख़र्च से किसी भइया को काई मतलब नहीं रह गया है।’ कहती हुई मुनमुन बिलकुल फायरी हो गई। और उस की अम्मा यानी दीपक की मामी निःशब्द रोने लग गईं। दीपक भी चुप ही रहा।

माहौल ग़मगीन हो गया था। फिर थोड़ी देर में मुनमुन ने ही सन्नाटा तोड़ा और बोली, ‘जाने किस जनम की दुश्मनी थी जो बाबू जी और भइया लोगों ने मिलजुल कर मुझ से निकाली है। जीते जी मुझे नरक के हवाले कर दिया है। दूसरे, यह आए दिन की मारपीट, बेइज़्ज़ती। अब तो मेरे स्कूल पर भी जब तब आता है और गरिया कर चला जाता है। आगे मेरी जिंदगी का क्या होगा, यह कोई नहीं सोचता।’ मुनमुन किसी बढ़ियाई नदी की तरह बोलती जा रही थी।

‘इस मार-पीट की रिपोर्ट तुम पुलिस में क्यों नहीं करती?’

‘कैसे करूं?’ मुनमुन बोली, ‘इस में भी तो अपनी ही बेइज़्ज़ती है। अभी दो चार घरों के लोग जानते हैं। फिर पूरा बांसगांव, गांव और जवार जान जाएगा। किस-किस को सफ़ाई देती फिरूंगी? फिर अख़बार और समाज हमें बिलकुल ही जीने नहीं देंगे।’

‘ये तो है।’

‘और फिर संबंधों के झगड़े पुलिस तो निपटा नहीं सकती। छिंछालेदर होगी सो अलग।’ वह बोली, ‘बाबू जी के पास ऐसे मामले आते रहते हैं, मैं देखती रहती हूं।’

‘ये तो है!’ दीपक बोला, ‘काफ़ी समझदार हो गई हो।’

‘परिस्थितियां सब को समझदार बना देती हैं।’ मुनमुन बोली, ‘मेरे ऊपर गुज़र रही है। मैं नहीं समझूंगी तो भला कौन समझेगा?’

‘चलो तुम्हारा हौसला ऐसे में भी बना हुआ है तो अच्छी बात है।’ दीपक बोला, ‘यह बड़ी बात है।’

‘अब आप जो कहिए।’ मुनमुन बोली, ‘मेरे नाम तो नरक का पट्टा लिखवा ही दिया है बाबू जी और भइया लोगों ने मिल कर।’

‘ऐसे दिल छोटा मत करो।’ वह बोला, ‘कोई न कोई उपाय निकलेगा ही। बस ऊपर वाले पर भरोसा रखो।’

‘अच्छा यह सब बिना ऊपर वाले की मर्ज़ी से हो रहा है क्या कि उस पर भरोसा रखूं?’

दीपक फिर चुप हो गया। थोड़ी देर में शाम हो गई। मुनक्का राय कचहरी से आए तो घर पर दीपक को देख कर ख़ुश हो गए। ख़ूब ख़ुश। दीपक ने उन के पैर छुए तो ढेरों आशीर्वाद देते हुए उसे गले से लगा लिया। बोले, ‘तब हो दीपक बाबू और क्या हाल चाल हैं? घर दुआर कैसा है? बाल बच्चे सब ठीक तो हैं न? और मेरी दीदी कैसी हैं? और हमारे जीजा जी कैसे हैं?’

‘आप के आशीर्वाद से सभी ठीक हैं।’ दीपक बोला, ‘और आप कैसे हैं?’

‘हम तो दीपक बाबू बस जाही विधि राखे राम ताही विधि रहिए पर हैं।’ वह बैठे-बैठे छत निहारते हुए बोले, ‘बस राम जी ज़रा नज़र फेर लिए हैं आज कल हम से। और क्या कहें!’ मुनक्का राय हताश होते हुए बोले, ‘बाक़ी हालचाल मिल ही गया होगा अब तक!’ वह मुनमुन की ओर आंख से इशारा करते हुए बोले। दीपक ने उदास हो कर मुंह बिचकाते हुए स्वीकृति में सिर हिलाया।

‘बड़े-बड़े मुक़दमे निपटाए। जिरह और बहस की। दुनिया भर का झमेला देखा। सौतेली मां देखी जाने कितनी गरमी बरसात देखी। सब को फे़स किया। बहादुरी से फे़स किया। उस अभागे-नालायक़ गिरधारी भाई को फे़स किया। पर बाबू दीपक, जिंदगी के इस मोड़ पर यहां आ कर हम पटकनी खा गए। पटका गए। इस की कोई काट नहीं मिल रही।’ कहते हुए मुनक्का राय का गला रुंध गया, आंखें बह चलीं। आगे वह कुछ बोल नहीं पाए।

दीपक फिर चुप रहा। मामा के घर आए प्रलय की आंच अब वह और सघन रूप से महसूस कर रहा था। ऐसी विपत्ति में उस ने अभी तक पारिवारिक स्तर पर किसी को भी नहीं देखा था। इस समय मामा के घर में फैला सन्नाटा टूट नहीं रहा था। शाम गहराती जा रही थी, साथ ही डूबते सूरज की लाली भी। कि अचानक बिजली आ गई।

दीपक उठा खड़ा हुआ। बोला, ‘मामा जी आप से भी भेंट हो गई अब आज्ञा दीजिए।’

‘अरे दीपक बाबू आज रहिए। कल जाइएगा।’ मुनक्का राय उसे रोकते हुए बोले, ‘कुछ दुख-सुख बतियाएंगे।’

‘नहीं मामा जी कुछ ज़रूरी काम है शहर में। जाना ज़रूरी है।’

‘ज़रूरी काम है तो फिर कैसे रोक सकता हूं। जाइए।’ किंचित खिन्न होते हुए बोले मुनक्का राय।

दीपक ने मामा मामी के पैर छुए और मुनमुन ने दीपक के। चलते-चलते दीपक ने मुनमुन से फिर कहा, ‘घबराओ नहीं कोई रास्ता निकालते हैं।’

हालां कि दीपक चला था शहर के लिए पर शहर जाने के बजाय वापस अपने गांव आ गया। घर पहुंच कर दीपक ने अपने अम्मा बाबू जी को मामा-मामी और मुनमुन की व्यथा-कथा बताई। दीपक के अम्मा बाबू जी ने भी इस पर अफ़सोस जताया। पर अम्मा धीरे से बोलीं, ‘पर मुनमुन भी कम नहीं है।’

दीपक ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। पर मामा-मामी और मुनमुन का दुख उसे परेशान करता रहा। बाद में उस ने छोटे भाई जितेंद्र से भी इस बारे में बात की। तो जितेंद्र ने भी माना कि, ‘मुनमुन की शादी ग़लत हो गई है।’

‘पर जब मुनमुन ने तुम से कहा कि एक बार शादी के पहले लड़का देख लो तो तुम्हें लड़का देख कर वस्तुस्थिति बता देनी चाहिए थी।’

‘क्या बताता?’

‘क्यों दिक्क़त क्या थी?’

‘दिक्क़त यह थी कि मैं बियहकटवा डिक्लेयर हो जाता।’

‘क्या बेवकू़फी की बात करते हो?’ दीपक बोला, ‘यह शादी होने से अच्छा था कि तुम भले बियहकटवा डिक्लेयर हो जाते यह शादी तो रद्द हो जाती।’

‘मैं ने मामा से बात की थी। मुनमुन के कहने पर कि एक बार मैं भी चलना चाहता हूं लड़का देखने। पर मामा बोले-सब ठीक है तिलक में चल कर लड़का देख लेना। फिर मैं ने धीरज भइया से बात की तो वह बोले रमेश भइया का पुराना मुवक्क़िल है। सब जाना पहचाना है। घबराने की बात नहीं है। तो मैं क्या करता?’ जितेंद्र बोला, ‘जब सारा घर तैयार था मैं अकेला क्या करता?’

‘तुम ने रमेश से बात की?’

‘नहीं। उन से बात करने की हिम्मत नहीं पड़ी मेरी।’

‘तो एक बार मुझ से ज़िक्र किया होता।’ दीपक बोला, ‘तुम क्या समझते हो यह सब जो हो रहा है मुनमुन के साथ इस में क्या हम लोगों की भी बेइज़्ज़ती नहीं हो रही? आख़िर ननिहाल है हम लोगों का। हम लोगों की देह में वहां का भी ख़ून है। उस दूध का क़र्ज़ है हम पर। यह बात तुम कैसे भूल गए? हमारी भी कुछ ज़िम्मेदारी बनती थी।’

‘हां, यह ग़लती तो हो गई भइया।’ जितेंद्र सिर झुका कर धीरे से बोला।

दीपक को उस रात खाना अच्छा नहीं लगा। दिल्ली लौट कर भी वह बहुत दिनों तक अनमना रहा। एक दिन उस ने पत्नी को मुनमुन की समस्या बताई और कहा कि, ‘तुम्हीं बताओ क्या रास्ता निकाला जाए?’

‘उन के घर में एक से एक जज, कलक्टर बैठे हैं। वह लोग नहीं समाधान निकाल पा रहे हैं तो अब आप निकालेंगे?’ वह बोली, ‘अपनी समस्याएं क्या कम हैं?’

‘वो तो ठीक है पर हम लोग भी कोशिश तो कर ही सकते हैं।’

‘चलिए सोचती हूं।’ कह कर दीपक की पत्नी सो गई।

पर दीपक नहीं सोया। उस ने रमेश को फ़ोन मिलाया। और बताया कि, ‘पिछले दिनों बांसगांव गया था। मुनमुन के बारे में जान कर दुख हुआ। तुम लोग आखि़र क्या सोच रहे हो?’

‘हम तो भइया कुछ सोच ही नहीं पा रहे हैं।’ रमेश बोला, ‘हम लोगों में आप सब से बड़े हैं आप ही कुछ सोचिए और कोई रास्ता निकालिए। आप जो और जैसे कहिएगा मैं तैयार हूं।’

‘पर तुम लोगों ने ऐसी बेवक़ूफी की शादी आंख मूंद कर कैसे कर दी?’

‘अब तो भइया ग़लती हो गई।’

‘तुम लोगों को पता है कि मुनमुन का हसबैंड पी पा कर जब-तब बांसगांव आ जाता है और मुनमुन तथा मामी की पिटाई कर, गाली गलौज करता है। जीना मुश्किल किए है वहां वह उन लोगों का?’

‘अरे यह क्या बता रहे हैं आप? यह तो नहीं पता था।’

‘अब सोचो कि तुम अब अपने घर की ख़बर से भी बेख़बर हो। वृद्ध मां बाप और जवान बहन कैसे रह रहे हैं, इस से तुम सभी भाइयों का कोई सरोकार ही नहीं रहा?’ दीपक बोला, ‘भई यह तो ठीक बात नहीं है।’

‘क्या बताऊं भइया।’ रमेश सकुचाते हुए बोला, ‘देखता हूं।’

‘कम से कम तुम घर में सब से बड़े हो, तुम्हें तो यह सब सोचना ही चाहिए।’ दीपक बोला, ‘चलो मुनमुन की समस्या बड़ी है दो चार दिन में तो नहीं सुलझती पर मामा-मामी के वेलफ़ेयर का इंतज़ाम तो तुम लोगों को करना ही चाहिए। समझो कि वह लोग साक्षात नरक जी रहे हैं। और तुम लोगों के जीते जी। यह बात कम से कम मुझे तो ठीक नहीं लगती।’

पर उधर से रमेश चुप ही रहा। दीपक ने ही उसे कोंचा, ‘चुप क्यों हो बोलते क्यों नहीं?’

‘जी भइया।’ रमेश धीरे से बोला।

‘नहीं मेरी बात अगर अच्छी नहीं लग रही तो फ़ोन रखता हूं।’

‘नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है।’

‘तो ठीक है। सोचना इन बातों पर। और हां, मुनमुन के बारे में भी।’

‘ठीक भइया। प्रणाम।’

जारी...

अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। 33 साल हो गए हैं पत्राकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नहीं पर प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह 'एक जीनियस की विवादास्पद मौत' पर यशपाल सम्मान। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, फेसबुक में फंसे चेहरे, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब 'माई आइडल्स' का हिंदी अनुवाद 'मेरे प्रिय खिलाड़ी'  नाम से प्रकाशित। दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है. इस उपन्‍यास के पहले के भागों को पढ़ने के लिए नीचे आ रहे हेडिंगों पर क्लिक करें. दयानंद पांडेय के अन्‍य लेखों को पढ़ने के लिए सर्च बाक्‍स में उनका नाम डालकर खोजें.