मुक्ति व्यक्ति की चेतना का अनन्य सहजता की दिशा में रुपांतरण है। यह व्यक्ति का महत्तम महामौन है, जो अपनी प्रचंड चुप्पी में अप्रतिहत अनहद गरजता रहता है। यह चेतना की सर्वाधिक सकारात्मक सक्रियता का बिंदु है। सामान्यतया शास्त्रीय मानकों से संचालित हमारे समाज में मृत्यु के बाद मुक्ति की अवधारणा का प्रचलन है। वह निहायत पोंगापंथी विश्लेषण है। सारा जीवन किसी ऐसी उपलब्धि के लिए प्रयासरत रहना, जो मृत्योपरांत संभव होगी, जीवन में एक अज्ञानमय अदृश्यलोक रचने के अलावा कुछ और नहीं हो सकता। मृत्यु एक ऐसा सच है, जिसका सामना करने से कोई बच नहीं सकता। इसीलिए उसके भय की अंधेरी छांव में नित्य मरते हुए उसकी प्रतीक्षा करना निरर्थक है। इसी तरह स्वयं को मृत्यु के पूर्व या बाद की काल्पनिक स्मृति में ढकेलकर वर्तमान जीवन को शुष्क, कठोर, नीरस और अनुपयोगी बना देने की भी कोई सार्थकता नहीं है।

मुक्ति, जीवन्मुक्ति और जीवन से मुक्ति के अलग-अलग अर्थ हो जाते हैं। अगर कहा जाय कि मृत्यु जीवन से मुक्ति का क्षण है, तो ऐसी मुक्ति कौन चाहता है? ऐसी मुक्ति की चिंता में आखिर किसे मृत्यु की आकांक्षा है? अगर है तो यह आत्मघात की आकांक्षा के अलावा कुछ और नहीं। मृत्यु के भय से मनुष्य के भीतर असुरक्षा का जो सतत बोध रहता है, वह कई रुपों में प्रकट होता है। वही परिग्रह को जन्म देता है, वही लालच को रास्ता देता है, वही राग और द्वेष की जमीन बनाता है। उदात्त होकर यही भय यशाकांक्षा का भी कारक बनता है। इसी भय के कारण कई लोग एक कल्पित अमरत्व के अन्वेषी बन जाते हैं। इस विराट ब्रह्मांड में निरंतर हर पल क्षरण की कथा तो चल ही रही है, लेकिन उसके समानांतर हर क्षण सृजन का आलोक भी फैल रहा है। सचमुच कोई भी चीज नष्ट नहीं होती, केवल रुपांतरित हो जाती है, अपना कलेवर बदल लेती है। समूचा ब्रह्मांड एक अपरिमित चेतनालोक की तरह है। गति, प्रकाश, ताप और वेग के मूल में ऊर्जा के रुप में यही चेतना काम कर रही है। कोई भी जगह इससे खाली नहीं है।

इस महाचेतना में कहीं भय नहीं है, कहीं ममता नहीं है, कहीं राग नहीं है, कहीं प्रेम नहीं, कहीं आग्रह नहीं है, कहीं निषेध नहीं है। एक अपराजेय सहजता है। नदी कहां किसी को पानी पीने से रोकती है, पहाड़ कहां किसी को अपने गर्भ में छिपी संपदा निकालने से मना करता है, पृथ्वी कहां किसी को अपनी मिट्टी, अपने पानी, अपने सोने-चांदी के भंडार तक पहुंचने से रोकती है। पेड़ कहां कहता है कि केवल सज्जन और निष्पाप ही उसकी छांव में बैठ सकते हैं या कोई दुष्ट उसके फल नहीं खा सकता। प्रकृति अपनी समूची अभिव्यक्ति में सहज और मुक्त है। वह एक महान रचनाकार की तरह अपनी सारी कविताएं, कहानियां, कलासर्जनाएं सुरक्षित रखती है। उन्हें बार-बार जांचती है, उनको परिमार्जित करती है, कभी-कभी किसी अतिरंजना या अधूरेपन के निवारण के लिए पुराना मिटाकर नया भी रचती है।

क्या इस प्राकृत सहजता तक मनुष्य पहुंच सकता है? क्या वह चेतना के उस छोर तक अपना विस्तार कर सकता है, जहां उसका अपना कुछ न हो या सब कुछ हो, जहां उसका सब कुछ दूसरों के अभाव को भरने में काम आ सके, जहां वह अपने बारे में सोचना बंद कर दूसरों के बारे में सोचना शुरू कर सके, जहां वह अपने संकल्पों को पूरी तरह स्थगित कर सके और अधूरे, निर्बल और पीड़ित मनुष्य के भीतर उनके जीवित रहने के संकल्प की तरह जी उठे? वस्तुत: मुक्ति का अर्थ यही है। यह मुक्ति मरने के बाद नहीं, जीतेजी हासिल की जाती है। मृत्यु मुक्त नहीं कर सकती, वह मुक्ति को स्थगित कर सकती है। बेहतर तरीका है कि अपने लिए मर कर, दूसरों के लिए जी उठें। जिनको कछू न चाहिए वे साहन के साह। अपने लिए कोई चाह नहीं, कोई चाह नहीं तो कोई चिंता भी नहीं। पर मन बेपरवाह नहीं होना चाहिए। क्योंकि अपनी चिंताएं खत्म होना मुक्ति की दिशा में आधा सफर है। आधा रास्ता इसके आगे है, क्योंकि दूसरों की चिंताएं, दूसरों के दर्द बाकी हैं।

प्रकृति ने मनुष्य को चेतना दी, तो विवेक और तर्क भी दिया। यह विवेक ही आधे सफर में काम आता है, यही मनुष्य की वेदना, उसके कष्ट को समझने की ताकत देता है और यही उनके निवारण के लिए लड़ने और लड़ते रहने का तर्क भी रचता है। जब तक एक भी आदमी का दुख बाकी है, यह लड़ाई जारी रहेगी। जो इस लड़ाई के लिए पूरा समर्पित हो गया है, जिसने हारते हुए लोगों के संघर्ष-यजन में स्वयं की संपूर्ण आहुति दे दी है, वही मुक्त है। वह जीते हुए मुक्त है। मुक्ति जीवित व्यक्ति की होती है, मरे हुओं की नहीं। केवल अपनी मुक्ति भी स्वार्थ है। अपनी मुक्ति के बाद दूसरों की मुक्ति का संग्राम शुरू होता है। बुद्ध ने इसीलिए अपना निर्वाण स्थगित कर दिया। वे संपूर्ण मानव समाज की मुक्ति चाहते थे। ज्ञान मुक्ति की पहली सीढ़ी है। मनुष्य की पीड़ा का चरम बोध ज्ञान के दरवाजे खोलता है। ज्ञान ही समाज के लिए अपने जीवन और अपनी ऊर्जा के संपूर्ण उपयोग का विवेक पैदा करता है और जो इस रास्ते पर बढ़ जाते हैं, केवल वे ही मुक्ति के सच्चे अधिकारी हैं।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.