सौवीरहरि, हौं सब पतितनि को नायक/ प्रभु, हौं सब पति‍तनि को टीकौ। बात में दम था, लयबद्धता थी, गायन में शैली और रस था। और इन सबसे ऊपर हृदय से निकली और दिल को झकझोरी मौलिक रचना थी। लेकिन सच्‍चे गुरु के मन को खटक गया यह पद। वजह यह कि इसमें विनय की पराकाष्‍ठा तो थी, लेकिन प्रेम का वह हिलोरे मारता महासागर नदारत था,  जिसमें पस्‍त और त्रस्‍त पीडित जन गोते लगा सकते। बल्‍लभाचार्य तो सूर की कविता और गायन पर मुग्‍ध हो ही चुके थे, लेकिन इस सिद्ध कवि की वाणी में दैन्‍यता का बहता नाला उन्‍हें रास नहीं आ रहा था। सो आचार्य श्रीबल्‍लभाचार्य ने शिष्‍य को प्रेम से लताड़ते हुए कोसा:- सूर ह़वै कै ऐसी घिघियात काहे को हौ। सोतासौं कछु भगवत लीला बरनन करि।

: पुस्तक समीक्षा : पत्रकारिता जन संचार का सबसे सुलभ, सस्ता और सशक्त साधन है। महान सेनापति नेपोलियन तक मानते थे कि चार विरोधी अखबारों की मारक क्षमता के आगे हजारों बंदूकों की ताकत भी बेकार है। यही बात मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने यूं कही थी, 'जब तोप मुकाबिल हो अखबार निकालो।'  अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जेफरसन का यह कथन भी पत्रकारिता की दुनिया में मंत्र की तरह उच्चारित होता है कि आजाद प्रेस के बगैर लोकतंत्र एक कदम भी नहीं चल सकता। अपने एक ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें अगर पत्रकारिताविहीन सरकार और सरकार विहीन पत्रकारिता में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाए, तो वह सरकार विहीन पत्रकारिता को चुनना पसंद करेंगे। कोई शक नहीं कि पत्रकारिता लोकतंत्र की ऑक्सीजन है।

शेष नारायण सिंह: उनकी नई किताब का संकलन आया : गीतकार नक्श लायलपुरी की नज्मों का एक संकलन आया है. 'आँगन-आँगन बरसे गीत' नाम की यह किताब उर्दू में है. पिछले 50 से भी ज्यादा वर्षों से हिन्दी फिल्मों में उर्दू के गीत लिख रहे नक्श लायलपुरी एक अच्छे शायर हैं. कविता को पूरी तरह से समझते हैं लेकन जीवनयापन के लिए फ़िल्मी गीत लिखने का काम शुरू कर देने के बाद उसी दुनिया के होकर रह गए. रस्मे उल्फत निभाते रहे और हर मोड़ पर सदा देते रहे. उनकी कुछ नज्मों के टुकड़े तो आम बोलचाल में मुहावरों की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं. नक्श लायलपुरी ने भारत के बँटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था. 1947 में वे शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में पैदल दाखिल हुए थे. कुछ दिन रिश्तेदारों के यहाँ जालंधर में रहे लेकिन वहां दाना-पानी नहीं लिखा था. उनके पिता जी इंजीनियर थे.

मिली कुंए में भांग आज फिर होली में
काम हुए सब रॉंग आज फिर होली में
सजी-धजी मुर्गी की देख अदाओं को
दी मुर्गे ने बांग आज फिर होली में

आरके सचानरिजवानलोगों की भावनाओं को छूने और उनके विचारों को आंदोलित करने वाली कविता भले ही आज दुनिया भर में छोटे से वर्ग तक सिमटती जा रही है लेकिन समीक्षकों के अनुसार साहित्य की इस विधा का कोई विकल्प नहीं हो सकता। प्रस्तुत है कविता की भूमिका, महत्व व लोकप्रियता पर वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं प्रशासनिक अधिकारी वर्तमान में अपर आयुक्त, आजमगढ़ राजकुमार सचान ‘होरी’ से जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव रिजवान चंचल द्वारा की गई वार्ता के प्रमुख अंश।

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : पूरे आदर-सम्‍मान के साथ आवभगत हुई और जूनागढ के नवाब ने हीरे-जवाहरातों से भरा थाल सामने रखकर उसे कुबूल करने का अनुरोध किया। सामने ऊंचे आसन पर बैठे महात्‍मा ने थाल में से दो-चार जवाहरात उठाकर अपने मुंह में डाले और फिर अचानक थूक कर बोल उठे - क्‍यों रे धूर्त, यह क्‍या दे रहा है, यह ना तो मीठा है और ना ही खट्टा। सख्‍त भी इतना है कि दांत टूट जाएं। फिर क्‍या था। नवाब नतमस्‍त हो गया। बोला, हमें सेवा का कुछ तो मौका दें महाराज। इस पर आदेश हुआ कि ठीक है, आज से ही तू यह नियम बना ले कि कोई भी साधु-फकीर अब से भूखा नहीं रहेगा। हर एक को ढाई पाव आटा दिया जाएगा। गरीब रियाया के साथ भी यही सुलूक होना चाहिए। और इस हुक्‍म को जूनागढ के नवाब ने फर्शी सलाम बजाकर मंजूर कर लिया।

काश मैं एक दिन का मुख्यमंत्री बन जांऊ,

प्रदेश में प्याज़ के लिए नई-नई नीतियां बनाऊं,

जगह-जगह विशाल पार्कों का निर्माण कराऊं,

उसमे फुलवारी की जगह प्याज़ लगवाऊं,

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : अपने पति के शव पर बिलखती नि:सन्‍तान रानी के वैधव्‍य से दुखी होकर गुरू को दया तो आ गयी लेकिन बाद में यही दया-भाव उस रानी के प्रति उनकी आसक्ति में बदल गया। जाहिर था कि गुरू ने गुरू-दायित्‍वों को गृहस्‍थ जीवन में तिरोहित कर दिया। गुरू को टोकने का साहस किसी में नहीं था, लेकिन वह चेला ही क्‍या, जो अनाचार को सहन कर जाए। भले ही वह अनाचार खुद उसके गुरू ही करने पर आमादा क्‍यों ना हों। बस फिर क्‍या था, चेले ने लगायी भभूत, उठाया त्रिशूल और लगा दिया हुंकारा :- उठ जाग मछन्‍दर गोरख आया। यह गाथा है उस सात्विकता की जिसकी रक्षा का संकल्‍प किया गोरक्षनाथ ने। बाद में गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध इस चेले ने अपने ही गुरू को उसके गुरूत्‍व का आभास कराने के लिए किसी भी सीमा तक जाने में तनिक भी संकोच नहीं किया। यही वजह रही कि गोरखनाथ संप्रदाय का एक बड़ा खेमा मुसलमानों का है जो पाकिस्‍तान के रावलपिण्‍डी में है।

दिव्या नाम था उसका,
दिव्य थी ज्योति सी,
कक्षा छह की छात्रा,
अभी आगे लंबा भविष्य,
अपनी माँ का सपना,
अपने पिता की धरोहर,
औकात से बढ़ कर,

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : शिवधनुष तोड़क राम के उपासक तुलसी ने शिव से लगवायी मानस पर मोहर : जो प्रेम में भी नकारा गया और भक्ति में भी दुत्‍कारा गया, उसकी बदतर हालत की कल्‍पना तो हर कोई कर सकता है। ऐसे लोगों को आम तौर पर तो लोग यह कह कर खारिज कर सकते हैं कि माया मिली ना राम। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा ही एक शख्‍स आखिरकार ऊंचाई के उस मुकाम तक पहुंच गया, जहां सोच पाने तक का साहस शायद कोई नहीं कर सकेगा। उसे राम का वह नाम मिल गया जहां उसके बिना कोई राम का नाम तक नहीं ले सकता है। चार शताब्‍दी बीत जाने के बावजूद उसका नाम राम के साथ ठीक वैसा ही जुड गया है, जैसा सीता या हनुमान का नाम। बिलकुल सही पहचाना आपने। हम शाहों के उस शाह का जिक्र कर रहे हैं जिसे आज पूरी दुनिया गोस्‍वामी तुलसीदास के नाम से जानती है।

काश!
एक कोरा कैनवास ही रहता
मन… ।
न होती कामनाओं की पौध
न होते रिश्तों के फूल
सिर्फ सफेद कोरा कैनवास होता
मन… ।

कौन है जो फसल सारी इस चमन की खा गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया
प्यार कहते हैं किसे है कौन से जादू का नाम
आंख करती है इशारे दिल का हो जाता है काम
बारहवें बच्चे से अपनी तेरहवीं करवा गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया

अमूमन मां अपने बच्चे को बहुत कुछ देने के लिए अथक मेहनत करती है। उस दौर में बच्चे को जीवन की सभी सुविधाएं तो मिल जाती है, नहीं मिलता तो सिर्फ मां का प्यार और जीवन की इस आपाधापी में बच्चा जब बड़ा होता है और उस प्यार के बारे में सोचकर, जो उसे नहीं मिल पाया , दुखी हो रहा होता है, तब मां की एक आवाज उसके जीवन में किस तरह एक नई उम्मीद लेकर आती है, यही इस कविता का सारांश है।

भूली बिसरी चितराई सी
कुछ यादें बाकी हैं अब भी
जाने कब मां को देखा था
जाने उसे कब महसूस किया
पर, हां आज मां ने फिर याद किया।।।

सैयद हाशम शाह की सदाओं ने जगदेव कलां को दरवेश बना दिया है। यह देखने में भले ही आम गांवों की तरह लगता हो मगर इसकी घुमावदार गलियों में अमन और भाईचारे की दरिया बहती है। हरे भरे खेतों से घिरे इस गांव की मिट्टी में सस्सी और पुन्नूं की मोहब्बत की सौंधी खुशबू है और हवाओं में फिरकापरस्ती के खिलाफ बगावत का पैगाम। पंजाब में अमृतसर से अजनाला की ओर जाने वाली सड़क पर बसा है जगदेव कलां। मशहूर सूफी शायर हाशम शाह का जन्म 1753 में इसी गांव में हुआ था। मौजूदा पाकिस्तान में नरोवाल जिले के थरपल गांव में 1823 में इंतकाल से पहले हाशम शाह ने अपनी ज्यादातर जिंदगी जगदेव कलां में ही गुजारी। सूफियों के कादिरी सिलसिले से ताल्लुक रखने वाले हाशम शाह को पंजाब का कबीर कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा।

राहत इंदौरी : इंटरव्यू : राहत इंदौरी (शायर) :  रवायतों के सफे तोड़ के आगे बढ़ो... वरना तुमसे जो आगे हैं वो जगह नहीं देंगे... अपनी शायरी से लोगों का हौसला आफजाई करने से लेकर उन्हें अपने समय के बड़े मुद्दों को आसानी से समझा देना राहत इंदौरी के शायरी की सबसे खासियत है। मुशायरों के डायस पर उन्हें सुनने वालों की कमी नहीं है। फिर चाहे वो बनारस में बेनियाबाग का मशहूर इंडो-पाक मुशायरा हो या फिर कनाडा, दुबई, पाकिस्तान में आयोजित होने वाले मुशायरे। राहत इंदौरी की शायरी, सुनने वालों को राहत पहुंचाती है। जितना बेहतर वो शेर बोलते हैं, उतने ही बेहतरीन अंदाज में वो उसे पेश भी करते हैं। 1972 से लोगों के बीच शायरी को अपनी जुबान बना कर देश-दुनिया के मसायल से लेकर घर-आंगन की बात करने वाले राहत की शायरी का सफर जारी है। उनके शायरी के कोलाज में जिदंगी का हर एक रंग मौजूद है। ‘‘चांद ज्यादा रोशन है तो रहने दो जुग्नू भैया जी मत भारी किया करो’’ कहकर सबको अपनी अहमियत समझाने वाले राहत बेनियाबाग के आल इंडिया मुशायरे में शिरकत करने बनारस आए तो भाष्‍कर गुहा नियोगी ने उसे बातचीत किया। प्रस्‍तुत बातचीत के प्रमुख अंश-

एमके टेंग : इंटरव्यू : प्रो. मोहन कृष्‍ण टेंग (लेखक एवं राजनीतिक विश्‍लेषक) : डॉ. मोहन कृष्ण टेंग कश्मीर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे दिसम्बर 1991 में विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने जम्मू-कश्मीर समस्या का गहनतम अध्ययन किया है। उनकी कश्मीर मामले पर कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं; जिनमें- कश्मीर अनुच्छेद-370, मिथ ऑफ ऑटोनामी, कश्मीर स्पेशल स्टेटस, कश्मीर : कांस्टीट्यूशनल हिस्ट्री एंड डाक्यूमेंट्स, नार्थ-इस्ट फ्रंटियर ऑफ इंडिया, प्रमुख हैं। उनका मानना है कि कश्मीर की वर्तमान समस्या के पीछे पंडित नेहरू और भारत का राजनैतिक प्रतिष्ठान प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा न फहराने देने के प्रति उमर सरकार की प्रतिबद्धता और केंद्र सरकार की अपील को भी वे उचित नहीं मानते। उनका कहना है कि दोनों सरकारों का यह रवैया भारतीय संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ है।