अनामी शरणकथा सम्राट प्रेमचंद की कहानियों के बारे में टिप्पणी करते हुए मशहूर कथाकार मार्कण्डेय ने लिखा है कि जब हम एक बार लौटकर हिन्दी कहानी की यात्रा पर दृष्टि डालते हैं, और पिछले 70-80 वर्षों की सामाजिक विकास की व्याख्या करते हैं, तो बहुत सुविधा पूर्ण तरीके से कह सकते हैं कि कहानी अब तक प्रेमचंद से चलकर प्रेमचंद तक ही पहुंची है। अर्थात सिर्फ प्रेमचंद के भीतर ही हिन्दी कहानियों के इस लंबे समय का पूरा सामाजिक वृतांत समाहित है। समय की अर्थवत्ता जो सामाजिक संदर्भों के विकास से बनती है, वह बहुत मामूली परिवर्तनों के साथ आज भी जस की तस बनीं हुई है। यहां पर एक सवाल हो सकता है कि क्या प्रेमचंद के बाद का समय जहां का तहां ही टिका रह गया है? क्या समय का यह कोई नया स्वभाव है? नहीं ऐसा नहीं है।

अनामी शरण24 मार्च को हमारे प्रकाशक... (पूरा नाम.. .राघव जी ) का फोन आया कि प्रेमचंद की पत्रकारिता 1200 पेज से ज्यादा हो गया है, लिहाजा आप आकर इसे देखें और इसे या तो 900 पृष्ठों में समेटे या दो खंड को तीन खंड़ों में करें। सारा मैटर लगभग पूरी तरह तैयार है, बस आप कोई फैसला करके इसे फौरन फाइनल करें। मेरे लिए बड़ी दुविधा आ खड़ी हो गई। मुझे एक सप्ताह के लिए बाहर जाना है, मगर राघवजी कोई बहाना मानने को राजी नहीं थे। वे खुद पिछले सात माह से इस किताब को लेकर परेशान है। पहले इसे आठ अक्टूबर 2010 को प्रेमचंद के निधन के 75 साल पूरा होने के अवसर पर लाना चाह रहे थे, जो किसी कारणवश साकार नहीं हो पाया। वाकई प्रेमचंद की रचनाओं के साथ रहते हुए काम करना बेहद कठिन सा है। प्रकाशक के फोन आने के बाद एक बार फिर उसी रचना संसार में जाने का मेरा मन नहीं कर रहा था। मगर मजबूरी थी।

सतीश सिंहहाल ही में हिन्दी साहित्य के दिग्गज साहित्यकारों की जन्मशती धूमधाम से पूरे देश में मनाई गई। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, गोपाल सिंह नेपाली, शमशेर बहादुर सिंह, उपेन्द्रनाथ अश्‍क को उनकी जन्मशती पर शिद्दत के साथ याद किया गया। इसी क्रम में महाकवि गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी उनकी 150 वीं जयंती पर हमने याद किया। तकरीबन सभी पत्र-पत्रिकाओं में इनके व्यक्त्वि व रचना-संसार पर प्रकाश डाला गया। दरअसल हमारे देश में अपने विरासत को सहेजने की परंपरा कभी नहीं रही है। आज अधिकांश विरासत या तो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं या खत्म हो चुके हैं। बावजूद इसके न तो सरकार इस मामले को लेकर चिंतित है और न ही हम। नई पीढ़ी हमसे जो सीख रही है, उसका खामियाजा भी हमें ही भुगतना पड़ेगा।

इस आसमान को मेरे आगोश में सिमटना होगा,
क्योंकि मेरी चाहत इक नया आसमान बनाने की है।

हटना होगा तूफानों को मेरे रास्ते से ,
क्योंकि मेरी चाहत मंजिलों को पाने की है।

विद्या मृतमश्नुते. इस्वस्य उपनिषद् से लिया गया यह श्लोक, नेशनल काउन्सिल औफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग, जिसे हम एनसीईआरटी के नाम से ज्यादा जानते हैं, का ध्येय-वाक्य है. यह सूत्र न केवल ज्ञानवर्धन के महत्व को दर्शाता है, बल्कि हमें आश्वस्त भी करता है कि एनसीईआरटी की पुस्तकें इस कार्य में हमारी सहायता करेंगी. हमारे देश में एनसीईआरटी को ज्ञान का भण्डार माना जाता है. आईआईटी-जेईई, एआईईईई, क्लैट, सी-सैट (सिविल सेवा) आदि अन्य कई प्रतियोगिताओं में प्रवेश पाने के लिए एनसीईआरटी पुस्तकें एक नीव प्रदान करती हैं. अविभावक इसे तथ्यों का निष्पक्ष प्रदर्शन मानते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ छात्र इसमें दी गयी हर बात को बिना कोई सवाल किये कंठस्थ कर जाते हैं.

हिंदी में किताबें तो पहले ही आती थीं, लेकिन उनका भव्य विमोचन कम ही होता था। तब लेखकों-कवियों और साहित्य रसिकों की आपसी बैठक में ही कई बार नई रचनाओं और नए प्रकाशनों का विमोचन हो जाता था। बीस-पच्चीस साल पहले तक दिल्ली की सरहद इतनी फैली नहीं थी, कास्मोपोलिटन बनने की राह पर जब तक दिल्ली नहीं रही, रचनाधर्मिता के उत्सवों में एक खास तरह का अपनापन होता था। उनमें आज के जमाने की तरह भव्यता कम ही दिखती थी, लेकिन अपनापे भरे माहौल में रचनाधर्मिता की आत्मीय किस्म की चर्चाएं जरूर हो जाती थीं। 2009 में आई मशहूर लेखिका निर्मला जैन की पुस्तक दिल्ली- शहर दर शहर- में इस आत्मीय साहित्यिक उष्मा को महसूस किया जा सकता है।

दिव्‍यामैं हूँ पेड़।
नीम, बबूल, आम, बड़, पीपल,
सागवान, शीशम और चन्दन का पेड़।
मैं हूँ पेड़।
मैं तुम्हें सब कुछ देता।
फूल देता, फल देता।
सूखने के बाद लकड़ी देता।

डा. सुभाष राय: सुनो भाई साधो - 4 :  ओम तद्भवाय नमः। अखिलेशाय नमः। शब्ददंडधारी स्वामी अखिलेश जी की कृपा से मेरी मुलाकात कासी गुरू की आत्मा से हुई। हालांकि वे स्वयं ई ससुरी आत्मा से बहुत परेशान दिखे। उनका अनुभव है कि यह सहृदय, दयावान, करुण, कातर सी चीज न होती तो वे अपनी मोटरबाइक से हाथ न धो बैठते। हुआ कुछ यूं कि बड़े जुगाड़ से उन्होंने बाइक खरीदी। बड़े जतन से उसे धो-पोंछ कर रखते, संभाल के चलाते। हरदम चमाचम रहती। पर एक दिन वे एक साइकिलवाले से टकरा गये। एक चला रहा था और दूसरा डंडे पर बैठा था। गुरू को पता ही नहीं चला क्या हुआ पर वे दोनों सड़क पर पसर कर खामोश हो गये। गुरू ने पहले तो भागने में ही भलाई समझी पर कुछ दूर जाकर उनकी आत्मा जग गयी। वे लौटे, सोचा बच्चों की मदद कर दें, बेचारे घायल हो गये हैं। वे बच्चों को नादान समझ रहे थे पर जैसे ही बाइक से उतरकर उनके पास आये, समूची करुणा के साथ एक को हिलाने-डुलाने की कोशिश की, दूसरा उनकी बाइक ले उड़ा। वे दौड़े मगर कुछ दूर जाकर मुंह बाकर खड़े हो गये। बाइक गयी सो गयी, यह गुरुआ की बड़ी चिंता नहीं थी, चिंता यह थी कि अगर आत्मा ऐसे ही जगी रही तो न जाने क्या-क्या अनर्थ होगा।

कुमार सौवीर: शाहन के शाह - मुक्ति-मार्ग के ज्ञानी अष्‍टावक्र : विकलांग और कुरूप अष्‍टावक्र ने बदल दी ज्ञान की परिभाषा : सुख-दुख, आशा-निराशा, जीवन-मृत्‍यु को समान भाव से देखो : मोक्ष नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग ही एकमात्र संमार्ग : गेरूए वस्‍त्र और संन्‍यास के बजाय आत्‍मा की शुद्ध जरूरी : राजा ने पहला पैर घोडे के एक पांवडे पर रखा और अगला पैर दूसरे पांवडे में रखने ही जा रहा था कि एक निर्देश ने उसे आत्‍मज्ञानी बना दिया। निर्देश था कि अहंकार को छोडकर मन को मुट्ठी में पकडो। अब सवाल उठा कि आखिर यह दोनों काम कैसे हों। तत्‍काल जवाब मिला और राजा को आत्‍मबोध हो गया।

अनामी शरणपत्रकार प्रेमचंद। क्या प्रेमचंद को पत्रकार कहना, कोई गुनाह है? यदि नहीं तो फिर हिन्दी साहित्य के कथा सम्राट और महान उपन्यासकार प्रेमचंद को पत्रकार कहने पर बहुतों को आपत्ति क्यों होने लगती है? प्रेमचंद के नाम पर वे लोग हैं जिन्होंने आजतक प्रेमचंद की महानता का बखान करते-करते प्रेमचंद के साहित्य के अलावा उनके अन्य लेखन को कभी प्रकाश में लाने की पहल ही नहीं की। शोध और मूल्यांकन के नाम पर संपूर्ण रचनात्मकता को ही गलत सांचे में ढालने का काम किया है। शायद इसे एक गंभीर अपराध की श्रेणी में भी रखा जाए तो किसी को आज आपत्ति नहीं होगी।

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार किया गया हो। तुर्रा यह कि यह घटना उस राजा की सभा में हुई जिसे स्‍वयं भी महान विद्वान माना जाता था। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। परम आत्‍मज्ञानी के तौर प्रतिष्ठित याज्ञवल्‍क्‍य ने झल्‍लाकर आखिर कह ही दिया- ’गार्गी, माति प्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यापप्त्त्’। यानी गार्गी, इतने सवाल मत करो, कहीं ऐसा न हो कि इससे तुम्हारा भेजा ही फट जाए। याज्ञवल्‍क्‍य की इस कटु और अपमानजनक बात शास्‍त्रार्थ के नियमों के सर्वथा प्रतिकूल थी। लेकिन गार्गी ने वह प्रश्‍न छोड़ दिया। मगर ऐसा भी नहीं कि ज्ञानी होने के पुरूष-दंभ के सामने वह विदुषी परास्‍त हो गयी, बल्कि उसने तो किसी साधुमना महानता का परिचय दिया और पूरे सम्‍मान के साथ उस विषय को टालकर दूसरे विषय पर बात शुरू कर दी। बेहद गूढ़ विषय पर शुरू हुई इस नयी चर्चा पर अब पूरी विद्वत सभा में जबर्दस्‍त क्षोभ और विषादजनित सन्‍नाटा फैल गया।

हरे प्रकाशहरे प्रकाश उपाध्याय एक ऐसे युवा कवि हैं, जिन्होंने अपनी और अपने पहले और बाद की पीढ़ियों को एक साथ आकर्षित और प्रभावित किया है. बिहार में 5  फरवरी 1981 को जन्मे इस अग्निधर्मा युवक ने लम्बी अराजक भटकन के बाद अपना दीप्त पथ बना लिया है और उस पर अब आगे बढ़ना जारी है. हरे के शब्दों में मैं हिन्दी का एक गरीब लेखक हूँ, रोटी के लिए पत्रकारिता करता हूँ.  भारतीय ज्ञानपीठ से एक कविता संकलन प्रकाशित है. ये जनसंदेश टाइम्स के फीचर संपादक के रूप में काम कर रहे हैं. उनकी चार कविताएं जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक डा. सुभाष राय ने अपने ब्‍लाग साखी पर प्रकाशित की है तथा लिखा है कि मुझे हरे प्रकाश की कतिवाएं प्रस्‍तुत करते हुए हर्ष और गौरव दोनों हो रहा है.

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : जीवन के हर सुख-दुख में समाए हुए हैं विद्यापति : बादशाह ने कहा- इतने बडे़ ज्ञानी हो तो आज इम्तिहान हो ही जाए। कवि ने चुनौती स्‍वीकार कर ली। बस फिर क्‍या था। एक संदूक में बंद करके उस कवि को कुंए में लटका दिया गया। बाहर एक नृत्‍यांगना अपने करतब दिखा रही थी। सवाल था कि बंद बक्‍से से देखो कि ऊपर क्‍या हो रहा है। और हैरत यह कि उस कवि के होंठों से कविता की धाराप्रवाह सरिता बह निकली। कुंए के बाहर का पूरा ब्‍योरा बखान कर दिया। बोल थे- माधव की कहुं संदर रूपै, कनक कदली पे सिंह चढ़ाइल, देखल नयन सरूपै। सजनि निहुरि फुकु आगि, तोहर कमल भ्रमर मोर देखल, मढन ऊठल जागि। जो तोहें भामिनि भवन जएबह, एबह कोनह बेला, जो ए संकट सौं जौ बांचत, होयत लोचन मेला।

कुमार सौवीर : शाहन के शाह : मशहूर दार्शनिक और शायर डॉक्‍टर अल्‍लामा इकबाल का यह शेर भारत में सूफी-संतों के मामले में तो कम से कम पूरी तरह खरा ही उतरता है। और जब सूफी संतों का जिक्र आता है तो वे इंसानियत और रूहानियत के सर्वाधिक करीब, लेकिन ज्‍यादातर मु‍सलमान धर्म-गुरूओं के रूप में अवतरित होते दिखायी पड़ते हैं। वे ऐसी शख्सियतों के मालिक के तौर पर भारतीय परिदृश्‍य पर उभरे जिसने वक्‍त की नब्‍ज को हर बार बिगड़ने से रोका और हिन्‍दू-मुस्लिम समुदायों को गंगा-जमुनी संस्‍कृति अता फरमायी।

प्रमोद पांडेय: जन्मदिन 20 अप्रैल पर विशेष : समकालीन समाज, राजनीति, इतिहास, साहित्य और संस्कृति पर उनकी दृष्टि हमेशा सचेत, सक्रिय और संघर्षशील रही है। हिन्दी के प्रतिभाशाली प्रगतिवादी समालोचक चंद्रबली सिंह मार्क्‍सवादी समाज-दर्शन की गहरी समझ रखने वाले बौद्धिक अध्येता और व्याख्याकार हैं। समाज से व्यक्ति का व व्यक्ति से समाज के परायेपन की भावना को कैसे खत्म किया जाये- यह कार्ल मार्क्‍स की चिंता थी- इसे चंद्रबली जी ने गहरे अर्थों में आत्मसात किया। चंद्रबली जी ने अपनी सहजता और सादगी से कभी भी बड़प्पन या ऊँचाई का आभास नहीं होने दिया। वे 20  अप्रैल 1924 को गाजीपुर के रानीपुर गांव (ननिहाल) में जन्मे। सन 1944  में अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने बलवन्त राजपूत कालेज (आगरा) और उदय प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय (वाराणसी) में 40  वर्ष तक अध्यापन किया। 1982 में वे जनवादी लेखक संघ (जलेस) के महासचिव चुने गए। उसके बाद अध्यक्ष पद पर पन्द्रह साल तक अपनी भूमिका का बखूबी निर्वाह करते रहे।

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : औरंगजेब का चेहरा तमतमाया और पूरा दरबार बौखलाया हुआ था। मौलानाओं के लिए तो यह कहर की घड़ी थी। कि कब्रिस्‍तान जैसी सर्द खामोशी को तोड़ती हुई बादशाह की कड़कती आवाज गूंजी- बोलो। फकीर बोला- ला इलाह। बादशाह गरजा- पूरा कलमा क्‍यों नहीं पढ़ते। जवाब मिला कि जो दिल में न हो वह जुबान पर कैसे आये,  मैं तो अभी साक्षात्कार की सीमा तक पहुंच ही नहीं पाया। बिना जाने कैसे कहूँ? फिर क्‍या था। नंगे दरवेश पर मौलवी चढ़ बैठे। कहा, यह तो कुफ्र है। और औरंगजेब ने मौत का फरमान सुना दिया। लेकिन दरवेश मौत से बहुत ऊपर था। ठठाकर हंसा, बोला, यह तो सिरदर्द की दवा मिल गयी।