वह वास्‍तव में सत्‍य का प्रकाश था। नाम का ही नहीं, बल्कि समाज के उलाहनों से अलग खुद को बनाने वाला सत्‍यकाम। पिता का पता नहीं, लेकिन मां के प्रति मन में कोई घृणा-भाव नहीं। बल्कि अपने अज्ञात पितृत्‍व के प्रश्‍न को अतीत के अंधकार में दफ्न करके उसने अपनी मां के नाम को ही गोत्र बना लिया। और यह तब हुआ जब शायद समाज उसकी हालत कुबूल करने को तैयार नहीं था। लेकिन उसने अकेले ही अपनी निष्‍ठा, समर्पण, अदम्‍य इच्‍छाशक्ति और जुझारूपन से वह इबारत लिखी, जो महिला सशक्तिकरण के इतिहास में स्‍वर्णाक्षरों में है। उसने साबित कर दिया कि अतीत का गुण क्षयमान और नश्‍वर होता, जबकि वर्तमान में हुए प्रयास ही मनुष्‍यत्‍व तय करते हैं।

: वीर दुर्गादास जयन्ती पर विशेष : ख्यातो में दुर्गादास मारवाड़ के रक्षक की उपाधि से विभूषित राष्ट्रीय वीर दुर्गादास राठौड़ का व्यक्त्वि कृतित्व ना केवल ऐतिहासिक दृष्टि से उल्लेखनीय है बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अभिनन्दनीय है। वीर दुर्गादास इस जिले के गौरव पुरुष है। जिन्होने इतिहास रचा। मुगलों के दमन चक्र को कुचल कर मारवाड़ राजघराने का अस्तित्व बनाए रखा। वीर दुर्गादास की कर्मभूमि के रुप में कोरना में (कनाना) का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। सौभाग्य से कनाना बाड़मेर जिले का हिस्सा है। बाड़मेर जिले में जन्म लेकर वीर दुर्गादास ने बाड़मेर की धरा पर उपकार किया। 13 अगस्त 1638 को सालवा कला में द्वितीय सावन सुदी 14 वि.स. 1695 में उनका जन्म आसकारण जी के परिवार में हुआ। जोधपुर नरेश जसंवतसिंह के सामान्त एवं सेना नायक का पुत्र होने को गौरव उनके साथ था। सादगी पसन्द दुर्गादास बचपन से निडर थे।

सौवीरएक क्रूर और आततायी शासक ने वयोवृद्ध आचार्य का मूल्‍य तीन करोड़ लगा कर उन्‍हें खरीद तो लिया, लेकिन इसके बस कुछ ही बरस बाद वह समझ ही नहीं पाया कि आचार्य के उस तरूण शिष्‍य को वह किस भाव खरीदे, जिसकी मसें भले ही तब तक न भींग पायीं थीं, लेकिन कीर्ति-पताका सर्वोच्‍च थी। यह शिष्‍य भी इतना दिव्‍य निकला, कि महज 21 साल की उम्र में ही उसने उस आततायी शासक का निर्मूल विनाश कर दिया और पूरे आर्यावर्त में भारतीयता की एक बेमिसाल इमारत खड़ी कर दी। इसके बाद का समय देश में उस स्‍वर्ण-काल के रूप में कई दशकों तक ऊंचाइयों की बुलंदियों पर लगातार चढ़ता ही रहा जिसे देश-विदेश के इतिहासकार आज भी निर्विवाद तौर पर गुप्‍त-काल के तौर पर चिन्हित करते हैं।

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : संयोग ही था कि विवेक का बड़ा भाई भी थाईलैंड में था। विवेक और मुनमुन की दोस्ती की ख़बर जब उस तक पहुंची तो उस का माथा ठनका। उस ने राहुल से बात की और कहा कि, 'भई अपनी बहन को समझाओ, मैं भी अपने भाई को समझाता हूं। नहीं, जो कहीं ऊंच-नीच हो गई तो दोनों परिवारों की बदनामी होगी।'  राहुल विवेक के भाई की बात सुन कर बौखला गया। उस ने पहला फ़ोन विवेक को ही किया और जितना भला-बुरा उस को कह सकता था कह गया। और बोला, 'मेरी ही बहन मिली थी तुम्हें दोस्ती करने के लिए। बाइक पर बिठा कर घुमाने के लिए? क्यों मेरी पीठ में छुरा घोंप रहे हो?'

दयानंद पांडेयअपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय को 33 साल हो गए हैं पत्रकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के गांव बैदौली में जन्‍में दयानंद पांडेय हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए थे। अपनी लेखनी से अलग पहचान रखने वाले दयानंद पांडेय के नए उपन्‍यास ''बांसगांव की मुनमुन'' का भड़ास पर प्रकाशन होने जा रहा है। उनके इस नए उपन्‍यास को प्रत्‍येक रविवार को प्रकाशित किया जाएगा। इसके पहले भी दयानंद पांडेय के कई उपन्‍यासों का प्रकाशन भड़ास पर किया जा चुका है। जिसे उनके नाम को सर्च में डालकर पढ़ा जा सकता है।

सौवीर : शाहन के शाह : कुमारिल भट्ट ने दी आदिशंकराचार्य को ऊंचाई : उनके तर्क और आस्‍था के अनुसार वेदांत का अध्‍ययन और चिंतन ही मोक्ष की प्राप्ति का सहायक तत्‍व है, लेकिन उसने देह-त्‍याग का जो तरीका अपनाया, वह किसी के भी रोंगटे खड़े कर देगा। जिस दर्शन की जड़ें खोदने के लिए उसने जिस गुरु से विद्या का अध्‍ययन किया था, उसके प्रति अपने अपराध के प्रायश्चित के लिए उसने आत्‍मदाह का फैसला किया। जरा कल्‍पना कीजिए कि लोगों का हुजूम हाहाकार कर रहा हो, तब के श्रेष्‍ठतम विद्वान उससे अपनी रचनाओं की समीक्षा का अनुरोध कर रहे हों, और वह शख्‍स खुद की बनायी धधकती चिता पर लेटा अपनी ही जान देने पर आमादा हो। सारे अनुरोध और आग्रह बेकार गये और आखिरकार देखते ही देखते वह शख्‍स भस्‍म हो गया।

डा. सुभाष राय: सुनो भाई साधो- 8  : कविता और बांसुरी : कविता और बांसुरी का क्या संबंध है? कोई कविता पढ़े और बांसुरी भी बजाये तो कैसा लगेगा? आप बांसुरी पसंद करेंगे या कविता? बांसुरी मुग्ध करती है। कृष्ण के अद्वितीय सम्मोहन में रुप के साथ बांसुरी का भी बड़ा योगदान था। बांसुरी उनके व्यक्तित्व की सांगीतिक पहचान थी। उनकी बांसुरी केवल गोपियों को ही आकर्षित नहीं करती थी बल्कि उसकी मधुर स्वर लहरी से गायें भी खिंची हुई उनके पास तक आ जाती थीं, कदम्ब के तने, उसकी पत्तियां नाच उठती थीं, यमुना में लहरें उठने लगती थीं, मानों तट को पार कर उन्हें छू लेना चाहती हों। राधा का हाल तो बांसुरी की धुन सुनते ही बेहाल हो जाता था। उनके गौर वर्ण पर बांसुरी का कृष्ण आकाश छा जाता था। कहां भागें, मुरलीधर की तलाश में, वंशीबजैया की खोज में। वे जहां होतीं थीं, वहीं बज उठती थीं, बांसुरी की तरह।

बांसगांव : दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : हालां कि आर्थिक स्थिति पूरी तरह डांवांडोल हो चुकी थी। छुटपुट क़र्जे भी कोई नहीं देता था। बीवी के सारे जे़वर बिक चुके थे। लेकिन मनोबल उस का पूरा बना रहा। बाबू जी की प्रैक्टिस भी डांवांडोल थी। उधर ओमई अब किसी मंत्री से सिफ़ारिश करवा कर सरकारी वकील बन गया था। बाबू जी को और परेशान करने लगा। धीरज और तरुण की मदद से घर का ख़र्च चल रहा था। राहुल भी तरुण के साथ रह कर पढ़ने लगा था। अब बांसगांव में बाबू जी, अम्मा और मुनमुन थी। मुनमुन अब इंटर में थी। रमेश का मन हुआ कि धीरज और तरुण से वह भी कुछ दिनों के लिए ख़र्च मांग ले पर उस का ज़मीर गवारा नहीं हुआ। अंततः पत्नी गई अपने मायके और अपने भाइयों से थोड़ा-थोड़ा कर के कुछ पैसे ले आई। कुछ किताबों और कोचिंग का काम हो गया।

मंजूजब मैं सुबह अख़बार पढ़ती हूँ

शुरू होती है खबर

तो सहम जाती हूँ...  खबर को पढ़ कर.

सुभाष राय : सुनो भाई साधो - 10 : क्या प्रेमचंद एक रचनाकार के रूप में उतने उदार और दृष्टिसंपन्न नहीं थे, जितना उन्हें साहित्य के धुरंधर आलोचकों ने समझा? क्या उनका राष्ट्रवाद हिंदू चेतना से लैस था और वे अपने समूचे चरित्र में एक सांप्रदायिक व्यक्ति थे? क्या वे सवर्ण मानसिकता के अहंकार और दबाव से मुक्त नहीं हो सके थे और इसीलिए दलितों को हेय दृष्टि से देखते थे? क्या महात्मा गांधी के आंदोलन को जनता की आकांक्षाओं से जोड़कर उन्होंने कोई गलती की? क्या वे वैचारिक अंतर्विरोध के शिकार थे? इतने वर्षों बाद ये सवाल अगर उठाये जा रहे हैं तो हम जानते हैं कि इनके जवाब देने प्रेमचंद नहीं आने वाले। सवाल हमने उठाये हैं और जवाब भी हमें ही ढूंढने पड़ेंगे। जातीय राजनीतिक चेतना के इस उदयकाल में दलित साहित्य और दलित लेखन का आंदोलन धीरे-धीरे मुखर होता जा रहा है।

विनोद विप्‍लवडैड ने अपनी नवजात बेटी को चूमते हुए कहा,'आहा! यह देखो हमारी न्यू मिस इंडिया।'  मॉम ने इस पर ऐतराज करते हुए कहा,'न्यू मिस इंडिया क्यूं, न्यू मिस वर्ल्ड कहो!' उक्त संवाद किसी विज्ञापन या फिल्म का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह वह संवाद है जो सुष्मिता सेन के 'मिस यूनिवर्स' और ऐश्वर्य राय के 'मिस वर्ल्ड' बनने के बाद अनेक घरों में बोला गया। हो सकता है कि कुछ घरों में बोले गये संवाद का स्वरूप कुछ यूं हो - मॉम (अपनी बेटी को चूमते हुए)- 'मेली प्याली-प्याली खूबछूलत गुलिया बली होकल क्या बनेगी?'  बेटी (तुतलाते हुए)- 'मिछ बल्द!' मॉम- 'हां, मेरी बेटी मिस वर्ल्ड बनेगी।'  डैड- 'मेरी बेटी मिस वर्ल्ड नहीं मिस यूनिवर्स बनेगी।'

अमिताभ मनोज कुमार और जीनत अमान पर यह गाना एक पुरानी सफल फिल्म रोटी, कपडा और मकान में फिल्माया गया था. क्या इस समय यह गाना कहीं और फिल्माया जा रहा है? दरअसल कुछ इतनी ज्यादा समानताएं दिखने लगीं कि स्वतः ही उस मूल गाने के बोल बदलते गए. ऐसा महसूस  होने लगा जैसे संतोष आनंद ने यह गाना परवर्ती इतिहास को ही दृष्टिगत रखते हुए लिखा था. इसी गाने की पैरोडी को नीचे लिखने की कोशिश की गई है.

कुमार सौवीर : शाहन के शाह : आधुनिक भारत में दो महान संत हुए। एक ने समाज के सांस्‍कृतिक व धार्मिक मूल्‍यों से हटकर खुदा को हासिल करने का रास्‍ता खोजा, जबकि दूसरे ने भारतीय सांस्‍कृति के मूलभूत तत्‍वों को पुनर्जीवित कर मानव में देवत्‍व और धरा पर स्‍वर्ग के अवतरण की कल्‍पना की। पहले संत का डंका तो शुरुआत में अमेरिका से गूंजा और बाद में भारत तक फैला, जबकि दूसरे ने बीहड़नुमा अपने गांव से निकलकर स्‍वतंत्रता संग्राम व पत्रकारिता जैसे अनेक दायित्‍व निभाये। लेकिन वह भारत के कोने-कोने में अपनी जमीन मजबूत करने में सफल हो गया। उसके बाद तो देश-विदेश तक में उसका सिंहनाद गूंजा।

कुमार सौवीर : शाहन के शाह : वह धर्म के शीर्ष तक पहुंचा, फिर खरीद कर दास बनाया गया। लेकिन उसने अपनी श्रेष्‍ठता प्रमाणित करते हुए सत्‍ता के शीर्ष पद को सम्‍भाला। अपने ही मालिक का महामंत्री बन गया। इतना ही नहीं, उसने बाकायदा अपने ही राजा को दीक्षित किया और धर्म के प्रचार-प्रसार का वह अभियान शुरू करा दिया जो इसके पहले इतिहास में कहीं नहीं दिखायी देता है। उसने चीन से लेकर पर्शिया तक सत्‍ता और धर्म के झण्‍डे गाड़े। भारतीय ज्ञान और उसके सिद्धांतों का पूरी दुनिया में लोहा मनवा दिया। इतना ही नहीं, अपने धर्म की इतनी बड़ी संसद का आयोजन करा दिया कि लोगों ने दांतों तले ऊंगलियां दबा लीं।

सुभाष राय : सुनो भाई साधो - 5 : हरि अनंत, हरि कथा अनंता। इस देश में जो हरि के गुन गाता है, बाबा कहलाता है, जो हरिमय हो जाता है, बापू कहलाता है। हमारे यहां न तो बाबाओं की कमी है, न ही बापुओं की। । राम देव बाबा, जयगुरुदेव बाबा, पायलट बाबा, ड्राइवर बाबा, आशाराम बापू, तमाशाराम बापू। एक ऐसा भी शख्स इस देश में हुआ, जो एक साथ महात्मा भी था, बाबा भी और बापू भी। बापू केवल अपने बच्चों का नहीं, पूरे देश का। वह था गांधी बाबा। हमारे देश में किसी न किसी बहाने इस बाबा की चर्चा होती ही रहती है। भ्रष्टाचार जितना बढ़ रहा है, रघुपति राघव राजाराम का पारायण भी उतना ही बढ़ रहा है। बलात्कार, अपहरण, लूट की घटनाएं बढ़ेंगी तो गांधी का नाम लेने वाले भी बढ़ेगे। यह गांधी का देश है। यहां हर बुराई को ढंकने के लिए गांधी को चादर की तरह तान दिया जाता है। सचाई यह भी है कि गांधी का नाम ज्यादा लिया जा रहा हो तो समझो कोई बड़ा घपला, घोटाला होने वाला है, बड़ी विपदा आने वाली है।

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास :  पिता के इस व्यवहार पर मुनक्का राय का यह बड़ा बेटा हतप्रभ था। क्यों कि अभी तक की ज़िंदगी में पिता ने कभी उस से ऐसी और इस तरह बात नहीं की थी। ख़ैर, रमेश ने एम.एस.सी. मैथ का इम्तहान डिस्टिंक्शन के साथ पास किया और अगले सेशन में एल.एल.बी. में एडमिशन ले लिया। इसी बीच उस का एक बैंक में भी सेलेक्शन हो गया। पर मुनक्का राय ने मना कर दिया। कहा कि, 'जो बात वकालत में है, वह बैंक में कहां?'  मुनक्का राय को गिरधारी के बेटे को शिकस्त देने के सिवाय कुछ सूझता ही नहीं था उन दिनों। उन्हें लगता था कि उन का बेटा रमेश ओमई से पढ़ने लिखने तथा तमाम और मामलों में अव्वल है। वह कचहरी में आएगा और आते ही ओमई को पस्त कर के मुनक्का राय का झंडा फिर से लहरा देगा।