: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : वह क्या करें? किंकर्त्तव्य विमूढ़ हुआ एक वृद्ध पिता सिवाय अफ़सोस, मलाल और चिंता के कर भी क्या सकता था? लोग समझते थे कि उन का परिवार प्रगति के पथ पर है। पर उन की आत्मा जानती थी कि उन का परिवार पतन की पराकाष्ठा पर है। वह सोचते और अपने आप से ही कहते कि भगवान बच्चों को इतना लायक़ भी न बना दें कि वह माता पिता और परिवार से इतने दूर हो जाएं। अपने आप में इतना खो जाएं कि बाक़ी दुनिया उन्हें सूझे ही नहीं। अख़बारों में  वह पढ़ते थे कि अब दुनिया ग्लोबलाइज़ हो गई है। जैसे एक गांव हो गई है समूची दुनिया। पर उन को लगता था कि अख़बार वाले ग़लत छापते हैं।

वह संत तो महान दार्शनिक और प्रचारक थे। लेकिन एक महिला के सामने अपने होने को साबित करना अचानक उनके जेहन में उतर आया। महिला के सामने खुद का बड़प्‍पन साबित करने के लिए वे बोले :- चलो, ऐसा करते हैं कि नदी पर अपनी चटाई बिछाकर ईश्‍वर की आराधना की जाए। महिला ने इस संत की बात को ताड़ लिया। तपाक से जवाब दिया :- नहीं, हम लोग अपनी चादर को हवा में बिछाकर ईश्‍वर की उपासना करें तो बेहतर होगा। संत स्‍तब्‍ध। यह कैसे हो सकता है :- सवाल उछला। महिला ने जवाब दिया :- पानी में तो यह काम मछली का है, जबकि हवा में करामात तो मक्‍खी दिखाती है। ऐसी बाजीगरी वाले काम में क्‍या दम। असली काम तो ईश्‍वर की उपासना है और यही असली काम इन जादुई करामातों के करने के अहंकार से लाखों दर्जा ऊपर है। कहने की जरूरत नहीं कि संत का सिर शर्म से झुक गया।

: नंदलाल भारती के उपन्‍यास चाँदी की हँसुली की समीक्षा :  नन्दलाल भारती सामाजिक सरोकारों और अपने लेखकीय दायित्व के प्रति भी वे सचेत हैं। इसी का प्रतिफल है, इनका उपन्यास 'चाँदी की हँसुली'। दरअसल यह लोक जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज है। मनुष्य का सम्बंध संस्कारों से है और समाज का संस्कृति से। जहाँ मनुष्य होंगे, वहाँ समाज होगा। अकेले मनुष्य से समाज का निर्माण नहीं होता। गाँव, ग्रामीणजन, प्रकृति और परम्पराओं से निर्मित होती है संस्कृति। समाज के आचार-विचार, तीज-त्यौहार, जीवन-शैली संस्कृति के लिये जिम्मेवार हैं। 51 कड़ी के उपन्यास चाँदी की हँसुली की कथा के जीन पक्ष हैं - पहले में गरीब खेतिहर मजदूर गुदरीराम एवं उसकी पत्नी मंगरी है। दूसरे में मुख्यतः प्रेमनाथ और पत्नी सोनरी का प्रेमालाप है तो उनका जीवन संघर्ष भी है। तीसरे में नई पीढ़ी के राजू-रूपमती हैं।

मुक्ति व्यक्ति की चेतना का अनन्य सहजता की दिशा में रुपांतरण है। यह व्यक्ति का महत्तम महामौन है, जो अपनी प्रचंड चुप्पी में अप्रतिहत अनहद गरजता रहता है। यह चेतना की सर्वाधिक सकारात्मक सक्रियता का बिंदु है। सामान्यतया शास्त्रीय मानकों से संचालित हमारे समाज में मृत्यु के बाद मुक्ति की अवधारणा का प्रचलन है। वह निहायत पोंगापंथी विश्लेषण है। सारा जीवन किसी ऐसी उपलब्धि के लिए प्रयासरत रहना, जो मृत्योपरांत संभव होगी, जीवन में एक अज्ञानमय अदृश्यलोक रचने के अलावा कुछ और नहीं हो सकता। मृत्यु एक ऐसा सच है, जिसका सामना करने से कोई बच नहीं सकता। इसीलिए उसके भय की अंधेरी छांव में नित्य मरते हुए उसकी प्रतीक्षा करना निरर्थक है। इसी तरह स्वयं को मृत्यु के पूर्व या बाद की काल्पनिक स्मृति में ढकेलकर वर्तमान जीवन को शुष्क, कठोर, नीरस और अनुपयोगी बना देने की भी कोई सार्थकता नहीं है।

: शाहन के शाह : महमूद गजनवी की बोलती बंद कर दी अबुल हसन ने :  महमूद गजनवी के इशारे पर गुलामों ने अशर्फियों के टोकरे दरवेश के सामने रख दिये, बदले में दरवेश ने बादशाह को जौ का एक दाना थमा कर चबाने की गुजारिश की। गजनवी ने दाना मुंह में रख कर चबाने और निगलने की कोशिश की, लेकिन दाना उसके गले में ही फंस गया। बेहाल बादशाह को देखकर दरवेश हंसा, बोला:- जब अल्‍लाह का दिया यह दाना तुमसे नहीं निगला जा रहा, तो अशर्फियों के यह टोकरे मैं कैसे बर्दाश्‍त कर पाऊंगा। बातचीत का मकसद महमूद गजनवी समझ गया। इशारा हुआ और टोकरे हटा लिये गये। लेकिन इसके बावजूद गुजारिश की कुछ तो तोहफा कूबूल कर लीजिए। दरवेश बोला:- मुझे दुनियावी चीजों में मत भटकाओ।

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : ‘क्या?’ रमेश बिदका।

‘आई लव यू। आई लव मुनमुन। आई लव बांसगांव। आल आफ़ बांसगाव। लव-लव-लव!’

‘क्या बक रहे हो?’ रमेश फिर बिदका।

‘चोप्प साले!’ राधेश्याम लड़खड़ाई आवाज़ में मां बहन की गालियां भी उच्चारने लगा। और बोला, ‘लव यू आल मादर..।’

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : ‘चलो अगर तिलक में लूला-लंगड़ा, काना-अंधा या ऐसा वैसा दिखा तो शादी कैंसिल कर देंगे। बस!’ राहुल बोला, ‘तुम इतना शक क्यों कर रही हो बाबू जी के फ़ैसले पर?’ ‘इस लिए कि यह मेरी ज़िंदगी है, मेरे भविष्य का सवाल है। ज़माना बदल गया है। पर बाबू जी नहीं। वह अभी भी पुराने पैटर्न पर चल रहे हैं जब बाल विवाह का ज़माना था और लोग मां-बाप, घर दुआर देख कर शादी कर देते थे।’ ‘ओह इतनी सी बात?’ राहुल बोला, ‘बाबू जी पर इतना अविश्वास करना ठीक नहीं है। ख़ुशी-ख़ुशी शादी करो सब ठीक होगा।’ कह कर राहुल ने अपनी ओर से बात समाप्त करनी चाही। ‘आप लोग दीदी लोगों की शादी में तो इतने निश्ंिचत नहीं थे। एक-एक चीज़ खोद-खोद कर ठोंक पीट कर तय कर रहे थे।’

: शाहन के शाह : नाम जपो, हरिनाम जपो, सत्‍तनाम जपो/ साधु जपो, कबीर जपो और इंसान जपो। किसी भी इंसान में यह गुण उसे कहां से कहां नहीं पहुंचा सकते। लेकिन ईश्‍वर में अगाध श्रद्धा रखने वाले व्‍यक्तियों के इस समूह को शासक समाज कहां सहन कर सकता है। वह तो अपने से कमतर लोगों को अपने चरण चांपते, उपासना करते यानी भांट-भाड़गिरी करते ही देखने में अपने अहं की तुष्टि मानता है। इससे इनकार की सजा होती है और सजा कुछ भी हो सकती है। सजा का प्रकार तो शासक ही तय करता है ना। तो साध सम्‍प्रदाय के साथ भी यही हुआ। जिधर से भी यह निकलते, पीटे जाते। खासकर अंग्रेजी हुकूमत के अलम्‍बरदार और सैनिक इनसे बहुत चिढ़ते थे। कारण यह कि अपने सम्‍प्रदाय के अनुसार यह किसी अन्‍य को उपास्‍य मानते ही नहीं थे।

: शाहन के शाह : यह तो सामान्‍य सी बात थी, हर किसी के मुंह से निकलती ही रहती है। मकसद भी भला ही होता है, लेकिन ऐसी ही भलाई में मिला सबक किसी को महान भी बना सकता है। इतिहास की तवारीख में सोने के अक्षरों में ताजा नजीर के तौर पर दर्ज हैं अबू हनीफा। तो पहले एक नजर उस घटना पर। अबू हनीफा ने एक दिन एक मासूम से बच्‍चे को कीचड़ पर से निकलते देखा। उस बच्‍चे पर अचानक ही उनका स्‍वाभाविक प्रेम उमड़ पड़ा और बोल उठे:- जरा सम्‍भल कर बेटा। देखना कि कहीं पैर फिसलने से तुम कीचड़ में न गिर जाओ। बच्‍चा अपने उसी अंदाज में फौरन ही बोल पड़ा:- मैं गिरूंगा तो अकेले ही कीचड़ में जाऊंगा। सम्‍भलकर चलने की जरूरत तो आप जैसे विद्वानों को है, जो अगर फिसले तो पूरी इंसानियत ही कीचड़ में जा गिरेगी।

आस्था और विश्वास, दोनों शब्दों के अपने गहरे अर्थ हैं। आस्था एक विश्वास को जन्म देती है, वह एक पड़ाव है, जहां से कोई यात्रा शुरू कर सकता है। परंतु हर विश्वास सच होगा, ऐसा समझना मूर्खता के अलावा कुछ और नहीं  है। आस्था की ही तरह अनास्था भी एक तरह का विश्वास ही है। यह भी कहना ठीक नहीं कि अनास्था हमेशा सच की जमीन पर खड़ी रहती है। आगे की यात्रा के बिना अनास्था भी आखिरकार जड़ता की ओर ही ले जाती है, गहरे अंधेरे कुएं में ढकेल देती है। हर व्यक्ति अपनी कुछ आस्थाओं के साथ जीता है। कुछ परंपरा से मिली हुईं, कुछ उसकी खुद की गढ़ी हुईं। आस्था हो या अनास्था, अगर उसकी यात्रा विश्वास या अविश्वास पर जाकर खत्म हो जाय, तो समझो वह अंधविश्वास की जड़ता से बाहर नहीं है। बिना तर्क के विश्वास और अविश्वास, दोनों ही व्यक्ति को जड़ता की पथरीली जमीन पर ला पटकते हैं।

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : पर हफ़्ते-दस दिन की आवभगत के बाद ही राम किशोर और उस के लड़कों का दबाव बढ़ गया कि जल्दी से जल्दी बैनामा लिख दें। वह आज कल पर टालते रहे। अंततः राम किशोर के बेटों ने उन्हें कमरे में बंद कर पीटना शुरू कर दिया। पीट कर दबाव बनाना शुरू किया। अंततः उन्हों ने घुटने टेक दिए। गए रजिस्ट्री आफ़िस। लिखत पढ़त की कार्रवाई शुरू हुई। ऐन समय पर वह बोले, 'बैनामा नहीं लिखूंगा। बैनामा की जगह वसीयत लिखूंगा।' वापसी में बीच रास्ते में उन की ख़ूब पिटाई हुई। राम किशोर के बड़े बेटे ने एक जगह उन का गला दबा कर मारने की कोशिश की। हाथ पैर जोड़ कर राम निहोर ने जान बचाई। बोले, 'छोड़ दो मुझे! बैनामा ही लिख दूंगा।'

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : एस.डी.एम. ने फिर से सी.ओ. की तरफ़ घूर कर देखा। पर सी.ओ. ने इशारों-इशारों में संकेत दिया कि यहां से निकल लिया जाए। पर एस.डी.एम. बुदबुदाया, ‘तुम सब कायर हो।’ और ख़ुद पूर्व विधायक पर झपट पड़ा। तड़ातड़ तीन चार थप्पड़ जड़े और गरेबान पकड़ कर नीचे ज़मीन पर ढकेल दिया। ज़मीन पर गिरते ही एस.डी.एम. ने तीन चार लात भी रसीद कर दिए। और बोला, ‘बहुत बड़े गुंडे हो, बहुत बड़ी ताक़त समझते हो अपने आप को?’

हाथ खोलो, घर से निकलो, कब तलक खामोश रहोगे
बात अपनी अब तो कह दो, कब तलक खामोश रहोगे
बढ़ के अपना मांग लो हक़, किस बात का है खौफ तुमको
कब तलक मिमयाते रहोगे, कब तलक खामोश रहोगे ..

कुछ आत्मकेन्द्रित शुद्धतावादी लोग यद्यपि खुद गलत काम करने से बचते हैं लेकिन वे किसी भी गलत काम का तब तक विरोध नहीं करते जब तक वे स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। देखते हैं, महसूस भी करते हैं कि अन्याय हो रहा है, दमन हो रहा है, हक मारा जा रहा है, लेकिन उनका नहीं, इसलिए बोलने की क्या जरूरत है, ऐतराज करने की क्या आवश्यकता है। ऐसे लोग चाहे जितने सच्चे हों, जितने नैतिक हो, जितने ईमानदार हों, पर स्वार्थी होते हैं, अपने लिए जीते हैं। कुछ लोग हर ऐसी घटना में उत्पीड़क ताकतों के साथ खड़े होकर लाभ  में हिस्सा बंटाने की जुगत में जुट जाते हैं। वे उतने ही बड़े धूर्त, वंचक और अपराधी होते हैं, जितना दमनकारी या अन्यायी स्वयं। वे समाज के दुश्मन होते हैं। कुछ लोग भयवश तटस्थ या चुप रहने में ही अपना भला समझते हैं। वे कायर, डरपोक या मरे हुए लोग होते हैं। वे जब स्वयं ऐसे किसी संकट में पड़ते हैं तो मिमियाने, घिघियाने या रेंगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाते। ऐसे कीड़े-मकोड़े बड़ी संख्या में हमारे चारों ओर मिल जायेंगे।

देख लीजिए क्या हालत हो गयी है हिंदुस्तान की
अब चोर भी देने लगे हैं दुहाई संविधान की

ओसामा ओसमाजी और अन्ना जी  से  तू- तडाक
रजनीति कैसे  बदल देती  है  कीमत इंसान की

यश: वरिष्‍ठ पत्रकार यश गोयल के व्‍यंग्‍य संग्रह भ्रष्‍टाचार डॉट कॉम की समीक्षा :यश गोयल का यह व्यंग्य- संग्रह सभी दृष्टियों से बेजोड़ है। यशजी जिस सामर्थ्य के व्यंग्यकार हैं, इस बात का परिचय उनके व्यंग्य-संग्रह से सहज ही मिल जाता है। विभिन्न विषयों पर लिखे गए व्यंग्यों को इस संकलन में समाहित किया गया है। प्रायः सभी रचनाओं में आज की जीवन शैली, व्यवस्था व यथार्थ से उत्पन्न विसंगतियां विद्रूपताएं देखने को मिलती है जिन पर वे बार-बार लेखनी से प्रहार करते चले जाते हैं। लेखक ने केवल पारंपरिक व्यंग्य ही नहीं लिखे, वरन लीक से हटकर कार्य करने का जज्बा भी दिखाया है। उनके व्यंग्य में कुछ हटकर करने की चाहत साफ दिखाई देती है।