कमला गोइन्का फाउण्डेशन द्वारा हिन्दी साहित्य के लिए घोषित एक लाख रुपये का "महादेवी वर्मा हिन्दी साहित्य पुरस्कार" 2016 के लिए इस वर्ष गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) के वरिष्ठ साहित्यकार श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी को उनकी कृति "अस्ति और भवति" के लिए चयन हुआ है।

Bengaluru-based freelance journalist and author PT Bopanna’s book ‘The Romance of Indian Coffee’ has been chosen as the world’s best book on coffee at The Gourmand World Awards function at Yantai in China. The book, earlier shortlisted for the finals of the ‘Best in the World’ books under the ‘coffee books’ category, was picked from the entries of 64 countries, according to Bopanna,  a former journalist of The Pioneer.

: शाहन के शाह : महाराष्‍ट्र से पंजाब तक बज गया नामदेव के नाम का डंका : वह दिल ही क्‍या, पसीज न जाए। भले ही वह दिल किसी संत, गृहस्‍थ का हो या किसी डाकू का। नामदेव के साथ भी यही हुआ। बच्‍चे को पीटती उसकी मां का रूदन और करुणा भरे शब्‍द कुछ यूं दिल पर उतर गये कि नामदेव का जीवन ही बदल गया और शुरू हो गया आत्‍मोत्‍थान का वह भाव जिसने जल्‍दी ही उन्‍हें शीर्ष तक पहुंचा दिया। ऊंचाइयां इतनी हासिल हो गयीं कि उनके 61 भाव आज तक सिख धर्मग्रंथ गुरुग्रंथ साहब में दर्ज हैं। इतना ही नहीं, नामदेव का नाम आज मराठी धर्मक्षेत्र में पांच महा-संतों की संत-पंचायतन में शामिल हैं।

: शाहन के शाह : सूफी संतों ने दिलायी मिटती पहचान एक महामनीषी को : वह पगली-सी महिला तो अपने में मस्‍त थी। लेकिन कुछ शरारती बच्‍चों ने उसे छेड़ना शुरू कर दिया। पगली ने कोई प्रतिकार नहीं किया। यह देखकर बच्‍चे कुछ ज्‍यादा ही वाचाल हो गये। पूरे इलाके में यह माहौल किसी खासे मनोरंजक प्रहसन से कम नहीं था। बच्‍चों के हो-हल्‍ले ने बाजार में मौजूद लोगों को भी आकर्षित कर लिया। कुछ ने शरारती बच्‍चों को उकसाया तो कुछ खुद ही इस खेल में शामिल हो गये। कुछ ऐसे भी लोग थे, जो सक्रिय तो नहीं रहे, लेकिन मन ही मन उस पगली को परेशान देखकर विह्वल हो उठे। मामला भड़कता देख एक दुकानदार ने हस्‍तक्षेप कर ही दिया और शरारती बच्‍चों को डांट कर भगाते हुए पगली को अपनी दूकान पर ले आया। पानी पिलाया, बोला: इन लोगों को तुमने डांटा क्‍यों नहीं।

: शाहन के शाह : दास मलूका कह गये सबके दाता राम : बालमन ही तो था, बस किसी गरीब के साथ हुआ निर्मम व्‍यवहार को वह हजम नहीं कर पाया। खुद को कमरे में बंद किया और जब निकला तो संत श्रृंखला में वह एक बड़े नाम के तौर पर अपना अक्‍स छोड़ गया। लेकिन हाय रे दुर्भाग्‍य। समाज ने उसकी भावनाओं को समझने के बजाय, खुद उसके ही दर्शनों को खुद उसी के ही खिलाफ न केवल हथियार बना डाला, बल्कि उसके नाम पर उपहास की एक ऐसी नयी-नयी इमारतें खड़ी कर दी गयी जहां कोई भी मनमाफिक ठीहा खोज सके। यह थे संत मलूकदास।

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : और यह देखिए सुबह का सूरज सचमुच मुनमुन के लिए खुशियों की कई किरन ले कर उगा। अख़बार में ख़बर छपी थी कि सभी शिक्षा मित्रों को ट्रेनिंग दे कर नियमित किया जाएगा। दोपहर तक डाकिया एक चिट्ठी दे गया। चिट्ठी क्या पी. सी. एस. परीक्षा का प्रवेश पत्र था। मुनमुन ने प्रवेश पत्र चहकते हुए अम्मा को दिखाया तो अम्मा भावुक हो गईं। बोली, ‘तो अब तुम भी अधिकारी बन जाओगी?’ और फिर जैसे उन का मन कांप उठा और बोलीं, ‘अपने भइया लोगों की तरह!’

‘मामला सुलझाने के लिए ही यह सब करने को कह रहा हूं दीपक बाबू।’ घनश्याम राय बोले, ‘पर आप तो बुरा मान गए। और जो आप पारिवारिक मामला बता रहे हैं, वह सचमुच पारिवारिक कहां रहा? समाज में तो हमारी पगड़ी उछल गई है। और बांसगांव में?’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘बांसगांव में आदमी-आदमी की ज़बान पर हैं मुनमुन की कहानियां। विश्वास न हो तो किसी पान वाले, खोमचे वाले, ठेले वाले से जा कर पूछ लीजिए। आंख मूंद कर बता देगा। तो अब भी आप कहंगे कि मामला पारिवारिक है?’

जब भाषा की दृष्टि से आदमी बहुत निर्धन रहा होगा, तब भी उसका जीवन, उसका व्यवहार चलता रहा होगा। जब उसके पास प्रेम शब्द नहीं रहा होगा, तब भी वह प्रेम करता रहा होगा, जब करुणा शब्द नहीं रहा होगा, तब भी उसके मन में कई बार करुणा उपजती रही होगी, जब दुख शब्द नहीं रहा होगा तब भी मनुष्य दुखी होता रहा होगा। इसी मायने में मनुष्य के जटिल जीवन में अनेक अर्थ बिना शब्दों के भी  गतिशील रहते हैं। शब्द इन्हीं अर्थों की पहचान बनते हैं। भाषा की दृष्टि से सभ्य जातियां अनपहचानी जटिलताओं के लिए बराबर नये शब्द गढ़ती रही हैं। शब्द एक खोल भर हैं, अपने खास अर्थ या अर्थ समुच्चय के लिए। इस खोल में प्रभावशाली जातियां या वर्ग मनचाहे अर्थ भरती रही हैं, भर सकती हैं और इस तरह वे शब्दों के अर्थ भी बदल सकती हैं।

: शाहन के शाह : दिलों को जीतने वाले रामकृष्‍ण से भी ककहरा नहीं सीखा लाटू ने : एक बंगाली, तो दूसरा बिहारी। पहला भौतिकी का छात्र तो दूसरा काला अक्षर भैंस बराबर परंतु प्रकृति प्रेमी किशोर। गुरु ने एक की छाती पर पैर रखा तो वह स्‍तब्‍ध रह गया, जबकि दूसरे की आंखों से जलधारा बह चली। पहला समय का मारा था और परिवार त्‍याग आया, जबकि दूसरे का सबकुछ नियति ने ही छीन लिया। पहले ने गुरु के आशीर्वाद से अपने प्राथमिक घरेलू दायित्‍व निपटा लिये, जबकि दूसरे का अक्षर-ज्ञान कराने की सारी कोशिशें धरी रह गयीं और गुरू ने खुद अपना ही माथा फोड़ लिया। लेकिन दोनों ही आजीवन गुरु-सेवा में ही अर्पित रहे।

: शाहन के शाह : चैतन्‍य न होते तो शायद ही कोई पहचानता श्‍याम कान्‍हा को : दक्षिण की वैष्‍णवी आचार्य परम्‍परा ने भक्तिभाव को बंगाल तक पहुंचा कर उसे बेइंतिहा समृद्ध कर दिया, लेकिन इसका ऋण चुकाने में बंगाल ने भी कंजूसी नहीं की। पंद्रहवीं शताब्‍दी में इसी बंगक्षेत्र ने उस भक्तिवीर को जन्‍म दे दिया, जिसने कृष्‍ण के वृंदावन को एक बार फिर फतह कर आबाद कर दिया। भक्ति आंदोलन की तवारीखें गवाह हैं कि पश्चिमोत्‍तर के कान्‍हा श्‍याम की बांसुरी की तान को पुनर्जीवित करने का श्रेय पूरब के गौरांग को जाता है। यह थे चैतन्‍य, जिन्‍हें उनके भक्‍तों ने महाप्रभु के नाम से अंगीकार किया। उनके भक्‍त तो आज भी चैतन्‍य महाप्रभु में दुर्गा या काली के बजाय कृष्‍ण और राधा के सम्‍मेलन का अंश देखते हैं।

यह भी सोचने का एक तरीका है। सीता ने अगर लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण न किया होता तो न रावण मारा जाता, न ही उसकी राक्षसी जमात का विध्वंस होता। यह लक्ष्मण रेखा एक सीमा है, एक सरहद, एक बंधन, एक संकोच, एक मर्यादा, एक वर्जना। सामाजिक या व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए, नियमन के लिए गढ़ी गयी एक अप्राकृत सीमा। नैतिक विवशता थोपने की एक कूटरचना। कोई भी नैतिकता सर्वमान्य, सर्वग्राह्य, सर्वस्वीकार्य नहीं हो सकती। हर समाज की अपनी नैतिकताएं होती हैं, हर व्यक्ति की अपनी। विकासक्रम में जो लोग अब कपड़े पहनने लगे हैं, उन्होंने एक नैतिक मर्यादा गढ़ ली है, नंगा होना ठीक नहीं है, अश्लील है, असामाजिक, वर्जित और गर्हित है।

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : ‘कुछ नहीं कहेंगे।’ मुनमुन बोली, ‘बेटी जब आप की सुख से रहने लगेगी तो सब के मुंह सिल जाएंगे। हां, अगर रोज़ ऐसे ही छोड़-पकड़ लगी रहेगी तो ज़रूर सब के मुंह खुले रहेंगे। अब आप सोच लीजिए कि क्या करना है आप को?’ वह बोली, ‘जल्दबाज़ी में कोई निर्णय मत लीजिए। अभी घर जाइए। सोचिए-विचारिए। और घर में पत्नी से, बेटी से, परिजनों से विचार विमर्श करिए। ठंडे दिमाग़ से। दो-चार-दस दिन में आइए। फिर फ़ैसला करते हैं कि क्या किया जाए?’

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : ‘ख़ुश रहो।’ कह कर दीपक ने फ़ोन रख दिया। वह रमेश की इस सर्द बातचीत से बहुत उदास हो गया। बाद के दिनों में उस ने धीरज और तरुण से भी यह बातें कीं। इन दोनों की बातचीत में भी वही ठंडापन पा कर दीपक समझ गया कि अब मुनमुन की समस्या का समाधान सचमुच बहुत कठिन है। अब उस ने एक दिन मुनमुन को फ़ोन किया और राहुल का फ़ोन नंबर मांगा।

‘क्या इन तीनों भइया से बात हो गई आप की?’

‘हां, हो गई।’ दीपक टालता हुआ बोला।

कवियों, लेखकों, कलाकारों के लिए मेरे मन में बचपन से ही सम्मान और श्रद्धा का भाव रहा है। जब कभी मेरे गृहनगर में कोई कवि-सम्मेलन होता, मैं जरूर पहुंचता और मंच पर मसनदों पर खुद को टिकाये हुए मनोहारी वेश-·भूषा में सजे-धजे, मधु-कंठालापी कविजनों को देखकर अनायास ही उनकी देवदूत छवि से आकर्षित होता, प्रणामातुर उनके पास पहुंचने की कोशिश करता। तब मैं साहित्य और कला के विविध रूपों से लगभग अपरिचित था। जैसे-जैसे थोड़ा बड़ा हुआ; कविता, कहानी, आलोचना की शास्त्रीयता से परिचित हुआ, उनके वादों-विवादों से दो-चार हुआ और आलोचनाचार्यों की पसंद-नापसंद, उनकी सदाशयता-निरंकुशता, उनकी गुटबंदी, बाड़बंदी और घेरेबंदी की चरम कला के आस्वाद को महसूसना शुरू किया, कुछ सवाल त्रस्त करने लगे। उनके जवाब अपने मित्रों से पूछता रहा हूं, बहस करता रहा हूं, उनकी नाराजगी, उनके आरोप भी झेलता रहा हूं।

: शाहन के शाह : ईश-उपासना की इससे बेहतर नजीर और क्‍या हो सकती है कि जब कोई भक्‍त यहां तक कह दे कि भले ही मेरी मां मुझे जन्‍म के फौरन बाद खुद से अलग कर दे, लेकिन हे ईश्‍वर तुम्‍हारा विछोह मैं सहन नहीं कर सकता। लेकिन जब यह बात वह व्‍यक्ति कह रहा हो, जिसके साथ खुद ऐसा ही घट चुका हो, तो बात रोंगटे तो खडे़ कर ही देगी। फिर कौन नहीं बह जाएगा भक्ति की इस जीती-जागती धारा वाली परम्‍परा में। मरण के साथ भी तो यही हुआ था। तब नीच मानी जाने वाली जाति के एक परिवार में जन्‍में इस शिशु को उसके माता-पिता ने केवल इस आधार पर त्‍याग दिया कि उसका चेहरा भयानकता की पराकाष्‍ठा पर था। इतना ही नहीं, घरवालों ने उसका नाम भी रख दिया- मरण। लेकिन यह कुरूप शिशु इतना निर्मल निकला कि बाद के इतिहास में अपने सौंदर्य की अद्भुद मगर अमिट छाप पूरे भारतीय जनमानस में छोड़ गया।

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : फिर सुनीता के पति ने सुनीता को ख़ूब मारा पीटा। और अंततः अपने माता पिता से अलग रहने लगा। सुनीता के साथ शहर में अलग किराए पर घर ले कर। अब सुनीता के उपवास के दिन आ गए। ससुर के घर लाख ताने, लाख मुश्किल थी पर दो जून की रोटी और बेटियों को पाव भर दूध तो मिल ही जाता था। यहां यह भी तय नहीं था। तिस पर मार पीट आए दिन की बात हो गई थी। अंततः हार कर सुनीता के पिता ने बाल पुष्टाहार में एक लिंक खोजा और दस हज़ार रुपए की रिश्वत दे कर बेटी को उस के गांव में आंगनवाड़ी की कार्यकर्त्री बनवा दिया।