एक पुरानी कहावत है - ‘नाच न आवै आँगन टेढ़ा’। इसका सीधा सा अर्थ है -- अपनी त्रुटि अथवा अक्षमता के लिए अन्य को दोषी ठहराना । यह बड़ी सहज मानव प्रवृत्ति भी है कि मनुष्य स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने और आरोप मुक्त बनाने के लिए अपनी गलतियाँ दूसरों के सिर पर मढ़ देता है। विगत कुछ महीनों में आए चुनाव परिणामों के अनन्तर ई.वी.एम. पर किया गया आक्षेप भी ऐसी ही मानवीय निम्नवृत्ति का परिचायक है। रोचक यह है कि हारे हुए लोग एक स्वर से ई.वी.एम. को दोषी ठहराने लगे हैं जबकि विजयी पक्ष दलीय भेदभाव त्यागकर ई.वी.एम. से चुनाव की निष्पक्षता का समर्थन कर रहें हैं। इस संदर्भ में उ.प्र. और पंजाब के चुनावों में विजयी नेता एकमत हैं , जबकि पराजित दलों के नेता परस्पर सर्मथन करते हुए अपनी पराजय का ठीकरा ई.वी.एम के माथे पर फोड़ रहे हैं।

ई.वी.एम. से प्राप्त चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर बहुत पहले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने संदेह प्रकट किया था। उल्लेखनीय है कि उस समय उनकी पार्टी चुनाव हारी थी। वही संदेह अब पूरे दमखम से पराजित पार्टियाँ व्यक्त कर रही हैं और वैलेट पेपर से मतदान कराने की पुरानी प्रक्रिया बहाल करने की अनावश्यक माँग कर रही हैं।  यह रेखांकनीय है कि जब इसी ई.वी.एम. से बिहार का चुनाव जीतकर राजद ने सरकार बनायी तब इसकी प्रामाणिकता पर संदेह नहीं किया गया। भारी बहुमत से दिल्ली में विजयी होने पर ‘आप’ के नेताओं ने ई.वी.एम. में गड़वड़ी की बात नहीं की। इसी ई.वी.एम. ने सपा, बसपा, और कांग्रेस की सरकारें बनवाईं और तब इसे ठीक माना जाता रहा किन्तु उत्तरप्रदेश में हुई करारी हार और अब दिल्ली नगर निगम में मिली पराजय से बौखलाए नेता अपनी गलत बयानवाजी, अनाप-शनाप व्यय और मनमानियों पर आत्मनिरीक्षण करने के बजाय ई.वी.एम. को दोष दे रहे हैं। यह अनुत्तरदायित्वपूर्ण बयानवाजी है; जिम्मेदार लोगों के गैर जिम्मेदाराना बयान हैं।

यह नहीं कहा जा सकता कि बैलेट पेपर पर होने वाले चुनाव सर्वथा निष्पक्ष और ईमानदारी भरे ही होते हैं। बाहुबली उस समय भी मतपत्रों, मतपेटियों को लूटकर मतदान दलों को धमकाकर, मतदान केद्रों पर बलात कब्जा करके चुनावों को दूषित करते थे। चुनाव आयोग और प्रशासन हर संभव प्रयत्न कर ऐसे अपराधी-तत्त्वों को नियंत्रित करता था; चुनाव प्रक्रिया दूषित पायी जाने पर पुनर्मतदान होता था। आज भी चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े लोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं तथापि यदि कहीं चूक होती है तो उसे सुधारने और दोषियों को दण्डित करने के लिए पर्याप्त प्रावधान चुनाव प्रक्रिया में उपलब्ध हैं। अतः हारने पर चुनाव-प्रक्रिया अथवा ई.वी.एम. पर दोषारोपण निरर्थक है।

ई.वी.एम. एक यन्त्र है। यन्त्रों में गड़बड़ी नहीं होती या नहीं की जा सकती; उन्हें अपने मनोनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए परिवर्तित नहीं किया जा सकता यह कहना गलत होगा। यह सब कुछ संभव है किन्तु हमारी चुनाव प्रक्रिया में किए गए प्रावधान ऐसी किसी भी गड़बड़ी को रोकने में पर्याप्त समर्थ हैं। व्यवस्था इस प्रकार सुनिश्चित की गई है कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े लोग चाहकर भी ई.वी.एम. व्यवस्था में गड़बड़ी नहीं कर सकते। वैलेट पेपर के मतदान में मतदान दल दबाब, लोभ अथवा अन्य किन्हीं कारणों से गड़बड़ी कर सकता है जबकि ई.वी.एम. में यह संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में वैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने की माँग ,माँग करने वालों की नीयत पर ही संदेह उत्पन्न करती है।

ई.वी.एम. से मतदान की एक सुनिश्चित प्रक्रिया है। चुनाव से पूर्व ई.वी.एम. जिला मुख्यालय पर लायी जाती हैं जहाँ प्रत्येक मशीन की जाँचकर उसके सही पाये जाने पर उसमें चिन्हांकित मतपत्र लगाकर सील कर दिया जाता है। सील करने वाला दल यह नहीं जानता कि यह मशीन किस मतदान केन्द्र के लिए तैयार की गई है। मतदान से एक या दो दिन पूर्व ई.वी.एम. सम्बंधित मतदान दल के पीठासीन अधिकारी को आवश्यक सीलबंद स्थिति में मिलती है। वह उसका परीक्षण करता है। यदि त्रुटिपूर्ण हो तो वहीं उसे वापस करके दूसरी ई.वी.एम. प्राप्त करता है। यहाँ तक ई.वी.एम. की सही स्थिति का निर्धारण चुनाव प्रक्रिया में संलग्न अधिकारियों कर्मचारियों तक सीमित रहता है किन्तु मतदान वाले दिन मतदान प्रारंभ होने से पूर्व ई.वी.एम. की सही स्थिति सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के उपस्थित अभिकत्र्ताओं के समक्ष उनसे बनावटी मतदान (माकपोल) कराते हुए उनके मतों की गणना करके ई.वी.एम. के सही पाये जाने पर उनके समक्ष ई.वी.एम. में आवश्यक सीलें लगायी जाती हैं और यदि वे चाहें तो पेपर सीलों पर अपने हस्ताक्षर भी करते हैं।

मतदान समाप्ति पर भी यही अभिकत्र्ता ई.वी.एम. अपने सामने सील कराते हैं। मतगणना के दिन संबंधित अभिकत्र्ता पुनः अपनी सीलों का निरीक्षण करते हैं। उनके सामने ही गणनाकार्य सम्पन्न होता है। सम्पूर्ण प्रक्रिया पारदर्शितापूर्ण और सुव्यवस्थित हैं जिसमें हेरफेर की गुंजाइश नहीं है। तथ्य यह भी है कि ई.वी.एम. की कार्यवाही में नेताओं के प्रतिनिधि अभिकत्र्ता भी स्वयं उपस्थित रहकर प्रक्रिया सम्पन्न कराते हैं फिर चुनावों में प्रयुक्त किसी ई.वी.एम. का दोषपूर्ण होना कैसे संभव है ?

ई.वी.एम. पर दोषारोपण करने वाले नेताओं की बयानवाजी सुनकर लगता है कि या तो इन्हें ई.वी.एम. की प्रक्रिया के सम्बंध में पूर्ण जानकारी ही नहीं है अथवा वे जानबूझकर गलत बयानवाजी कर रहे हैं। उन्हें ई.वी.एम. पर और मतदान से जुड़े अधिकारियों-कर्मचारियों की विश्वसनीयता पर संदेह हो सकता है किन्तु अपने अभिकत्र्ताओं, जिनकी उपस्थिति में ई.वी.एम. प्रयुक्त होती हैं, पर तो भरोसा होना चाहिए। प्रश्न यह है कि जब किसी मतदान केन्द्र के किसी नेता या उसके अभिकत्र्ता ने चुनाव के दिन ई.वी.एम. के त्रुटिपूर्ण होने की शिकायत दर्ज नहीं करायी तो चुनाव परिणाम घोषित होने के पश्चात ई.वी.एम. अचानक कैसे अविश्वसनीय हो गयी ? जब तक अपनी जीत की आशा शेष थी तब तक ई.वी.एम. भी ठीक थी और जैसे ही अपनी हार सामने आयी वैसे ही ई.वी.एम. की विश्वसनीयता संदिग्ध हो गयी ? देश के कर्णधारों का यह कैसा आचरण है ? ऐसी सत्तालोलुप अपरिपक्व मानसिकता का प्रदर्शन निश्चय ही लज्जास्पद है।   

जनता को लुभाने और बहकाने के लिए आरोप प्रत्यारोप की भ्रामक राजनीति छोड़कर हमारे नेता मर्यादा, संयम, शील और मितव्ययिता के आदर्श प्रस्तुत करके ही आगामी चुनावों में विजयी हो सकते हैं। अन्ना के आन्दोलन में ईमानदारी और भ्रष्टाचार के विरोध का नारा उछालकर सत्ता में आया जा सकता है लेकिन मनमाने ढंग से सोलह हजार की थाली में भोजन करते हुए जनता की गाढ़ी कमाई को बरवाद करके सत्ता में देर तक टिक पाना अब संभव नहीं है। काठ की हाँडियाँ बार-बार नहीं चढ़तीं, चाहें वे किसी भी दल की क्यों न हों। राजनेताओं की मनमानियाँ और विलासिताएँ बहुत परवान चढ़ चुकी हैं अब देश सेवा और संयम की राजनीति का स्वागत करने को आतुर है। हमें ‘नेहरू’ नहीं ‘शास्त्री’ चाहिए।
         
डा. कृष्णगोपाल मिश्र
सहायक-प्राध्यापक (हिन्दी)                              
उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान,
भोपाल
म.प्र.