मान्यवर कांशीराम की 83 वीं जयंती पर विशेष लेख... आज बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम की 83 वीं जयंती है, किन्तु उनके अनुसरणकारी बहुत उदास मन से इसका जश्न माना रहे हैं.कारण हर कोई जानता है कि साहब कांशीराम ने भारत में समतामूलक समाज निर्माण के लिए 1984 में जिस पार्टी का गठन किया था ,आज उसके वजूद पर संकट खड़ा हो गया है और यह इससे उबार जाएगी, इसकी फिलहाल सम्भावना भी नहीं दिख रही है.हजारों साल के दासों, शुद्रातिशूद्रों में शासक बनने की महत्वाकांक्षा पैदा करने का चमत्कार घटित करने वाले साहब ने बहुजन समाज के जिन लाखों सक्षम लोगों को ‘पे बैक टू द सोसाइटी’के मन्त्र से दीक्षित कर समाज परिवर्तन के मोर्चे पर लगाया,आज वे बसपा की कल्पनातीत हार से खुनके आंसू रो रहे हैं  हैं;उन्हें चारो ओर अँधेरा ही अँधेरा नजर आ रहा है.बहरहाल निराश-हताश बहुजन अगर इस अँधेरे से निकलना चाहते हैं,तो उन्हें कांशीराम साहब के उस दर्शन का नए सिरे से अध्ययन कर लेना चाहिए,जिसमें सिर्फ उनकी ही नहीं,सम्पूर्ण मानवता की मुक्ति के बीज छिपे हैं.     

आज निराशा की इस घड़ी में हमें यह याद करना होगा कि कांशीराम साहब सिर्फ बसपा के संस्थापक ही नहीं थे,बल्कि वे गौतम बुद्ध से लगाये आधुनिक विश्व के मार्क्स,माओ ,लेनिन,फुले,बाबा साहेब आंबेडकर ,पेरियार इत्यादि उन महामानवों की श्रृंखला की कड़ी थे जिन्होंने मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या-आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी-से निजात दिला कर उसे सुखी बनाने में अपना सर्वस्व झोंक दिया.मानव जाति को सुखी बनाने के लिए दुनिया के विभिन्न महामानवों ने न सिर्फ अपने- अपने तरीके से संघर्ष चलाया, बल्कि अपने परिवर्तनकामी दर्शन से जनगण को उद्वेलित करने के लिए समय-समय पर तरह-तरह के नारे भी गढे.इन नारों के साथ उनकी पहचान जुड़ गयी.इन नारों के उल्लेख मात्र से उनके सम्पूर्ण संघर्ष की झलक हमारे जेहन में कौंध जाती है.बहरहाल महान परिवर्तनकामी नायकों के नारे की प्रभावकारिता पर कोई  तुलनात्मक अध्ययन हुआ है या नहीं,बताना मुश्किल है. किन्तु अगर नहीं हुआ तो जरुर होना चाहिए.खासकर आज उद्भ्रांत बहुजनों को इस दिशा में जरुर आगे बढ़ना चाहिए ,कारण,यह प्रमाणित हो चुका है कि नारों ने सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई के चक्के में ग्रीस का काम किया.

सर्वश्रेष्ठ नारे की तलाश में निकलने पर जो नारे परिवर्तनकामी लोगों को  खास तौर से आकर्षित करते हैं ,वे हैं-बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय,दुनिया के मजदूरों एक हो,स्वधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है,अंग्रेजों भारत छोड़ो,तुम मुझे खून दो-मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा,राजसत्ता का जन्म बन्दूक की नली से होता है,सभी समस्यायों का समाधान राजसत्ता की चाबी है,मैं हिन्दू के रूप में पैदा हुआ,पर हिन्दू के रूप में मरूंगा नहीं.किन्तु तमाम खूबियों के बावजूद इनमें से किसी को भी सर्वोत्तम नारे के रूप में चिन्हित करने में मुझे झिझक है,यद्यपि इनके साथ गौतम बुद्ध,मार्क्स,गांधी,तिलक,सुभाष,माओ,बाबासाहेब जैसे महामानवों तक का नाम जुड़ा है.मेरे  विचार से अगर किसी नारे में इतिहास के सर्वश्रेष्ठ नारे के रूप में चिन्हित होने की कूवत है तो वह है,जिसकी जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी,जिसके जनक आज ही के दिन ,1934 में पंजाब के रोपड़ के खवासपुर गाँव में जन्मे,वह मान्यवर कांशीराम रहे, जिनका आज लोग जयंती मना रहे हैं.

जिसकी जितनी संख्या भारी नारे का प्रभाव सार्वदेशिक है.यह नारा प्राचीन समाजों में जितना उपयोगी हो सकता था,आज के लोकतान्त्रिक युग में भी उतना ही प्रभावी है.अगर यह शाश्वत सचाई है कि सारी दुनिया में ही जिनके हाथों में हाथों में सत्ता की बागडोर रही,उन्होंने शक्ति के स्रोतों (आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक) का विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारा कराकर ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या - आर्थिक और  सामाजिक गैर-बराबरी- को जन्म दिया तो इससे उबरने में जिसकी जितनी संख्या भारी से बेहतर कोई सूत्र हो ही नहीं सकता.राजतंत्रीय व्यवस्था के खिलाफ लगभग 500 सालों तक सुदीर्घ संघर्ष चलाकर अंग्रेज जनगण ने मानव जाति को जो लोकतान्त्रिक प्रणाली उपहार दिया,उसके सुदृढ़ीकरण के लिए लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों ने जिस रास्ते अवलम्बन किया वह शक्ति के स्रोतों में जिसकी जितनी संख्या भारी –उसकी उतनी भागीदारी लागू करने का ही रास्ता था .इसी रास्ते ही अमेरिका ,इंग्लैंड,आस्ट्रेलिया,फ्रांस,न्यूजीलैंड,मलेशिया,दक्षिण-अफ्रीका इत्यादि ने विभिन्न वंचित नस्लीय समुदायों और महिलाओं को शक्ति के भिन्न-भिन्न स्रोतों में भागीदारी देकर अपने लोकतंत्र को अनुकरणीय बनाया.जिन देशों ने ऐसे सिद्धांत का अनुसरण नहीं किया वहां का लोकतंत्र संकटग्रस्त है तथा समतामूलक समाज एक सपना बनकर रह गया है,जिनमें सर्वोपरि स्थान भारतवर्ष का है.

भारत समाज सदियों से ही  वर्ण-व्यवस्था के प्रावधानों द्वारा परिचालित होता रहा है.धर्म के आवरण में लिपटी वर्ण-व्यवस्था विभिन्न तबकों (वर्णों) के स्त्री –पुरुषों के मध्य शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही.इस व्यवस्था के विदेशागत प्रवर्तकों ने स्व-धर्म पालन की आड़ में ऐसी व्यवस्था किया जिससे शक्ति के सारे स्रोत पीढ़ी दर पीढ़ी तीन उच्चतर वर्णों-ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्यों-के लिए आरक्षित होकर रह गए.इसमें शुद्रातिशूद्रों को शक्ति के सभी स्रोतों अर्थात शासन-प्रशासन,और धन-धरती-शिक्षा के साथ पौरोहित्य इत्यादि से पूरी तरह तो बहिष्कृत किया ही गया,खुद शक्तिशाली वर्णों की महिलाओं तक इसमें स्वतंत्र रूप से भागीदारी नहीं दी गई.इससे प्राचीनकाल से ही इस देश में विषमता का कोई और-छोर नहीं रहा.इस देश में जैसी विषमता सहस्रों वर्ष पूर्व राजतंत्रीय व्यवस्था में रही ,प्रायः वैसी ही 21 वीं सदी की गणतांत्रिक व्यवस्था में भी दिख रही है.यहां आज भी सदियों के परम्परागत रूप से विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न  वर्ग का शक्ति के समस्त स्रोतों पर प्रायः  एकाधिकार  है.

इस समस्या से राष्ट्र को निजात न तो मार्क्सवादी और न ही गाँधीवादी व राष्ट्रवादी आर्थिक दर्शन दिला सकता है.भारत से अगर विषमता का विलोप कोई आर्थिक दर्शन कर सकता है तो वह है कांशीराम का आर्थिक दर्शन जिसकी जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी.चूंकि परिवर्तनशील श्रेणी समाज ही नहीं,भारत जैसे  जड़ जाति - समाज में भी कांशीराम का राम का भागीदारी दर्शन सुखद बदलाव लाने में समान रूप से सक्षम है इसलिए जिसकी जितनी संख्या भारी... ही मानव जाति के सर्वोत्तम नारे के रूप में मान्य हो सकती है.किन्तु भारी अफ़सोस की बात है कि मानव जाति का यह सर्वश्रेष्ठ नारा खुद कांशीराम द्वारा स्थापित पार्टी में ही पूरी तरह उपेक्षित रहा है.

कांशीराम उत्तरकाल में बसपा नेतृत्व यह भूल गया हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से वंचित दलित,आदिवासी,पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित लोगों का बसपा से तेजी से जुडाव इसलिए हुआ कि उनमे यह विश्वास जन्मा था कि एक दिन यह पार्टी केंद्र की सत्ता पर काबिज होकर शक्ति के स्रोतों में कांशीराम का भागीदारी दर्शन लागू कर, उन्हें उनका हको-हुकुक दिला देगी .किन्तु बसपा नेतृत्व  ने इस व्यापकतम नारे को सिर्फ सत्ता में भागीदारी तक सीमित रखा गया.यदि इस नारे को समस्त आर्थिक गतिविधियों,राज-सत्ता की सभी संस्थाओं इत्यादि  तक प्रसारित किया गया होता,बसपा अतीत का विषय बनने की ओर अग्रसर नहीं होती.दुःख के साथ कहना पड़ता है 2007 में शिखर पर पहुँचने के बाद जिस तरह बसपा नेतृत्व ने बहुजन से सर्वजन की ओर विचलन करने के साथ ही शक्ति के स्रोतों में साहेब कांशीराम के भागीदारी दर्शन की निरंतर अनदेखी किया,उसका कुफल लोकसभा चुनाव-2009  से ही सामने आना शुरू किया.किन्तु बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा लगातार सावधान किये जाने के बावजूद नेतृत्व लगातार बेरहमी से इसकी अनदेखी करता रहा,जिसका चरम दुष्परिणाम 11 मार्च ,2017 को सामने आ गया.किन्तु वजूद पर संकट आने के बावजूद यदि पार्टी सर्वजन से बहुजन की ओर पुनः लौटने के साथ भविष्य में शक्ति के समस्त स्रोतों में कांशीराम का भागीदारी दर्शन लागू करने का आश्वासन देने का प्रयास करें,तो 2009 पूर्व युग में जाना खूब कठिन नहीं होगा.क्या समाज के ऋण से मुक्त होने का संकल्प लेने वाले लोग बसपा नेतृत्व को इसके लिए राजी करेंगे! 

जय-भीम, जय-भारत 

लेखक एचएल दुसाध वरिष्ठ दलित चिंतक और सोशल एक्टिविस्ट हैं.