बेबाक बोलने वाले विनय कटियार के बोल कुछ लोगों को कटीली छुरी से चुभते हैं। प्रियंका गांधी पर उनके बयान को मीडिया का एक वर्ग शर्मनाक बता रहा है। कुछ टीवी चैनलों में बढ़ा-चढ़ा कर उनकी बात को ऐसे प्रचारित किया जा रहा हो मानो उन्होंने कहीं कोई बम फोड़ दिया हो। निष्पक्ष विवेचन किया जाए तो विनय कटियार का बयान न तो महिला विरोधी है और न ही प्रियंका गांधी के लिए अपमानजनक...

धीरज सिंह

कांग्रेस को एक बार फिर प्रियंका गांधी की ब्रांडिंग करने का मौका मिल गया। मौका चुनाव का है, लगता है कांग्रेस के कुछ नेता हर चुनाव के समय किसी बंद बक्से में रखी प्रियंका की तस्वीर बाहर निकाल लेते हैं और झाड़-पोंछ कर पोस्टर-बैनर छापने वालों को सौंप देते हैं। इस बार तो सपा नेता भी पीछे नहीं, उनके प्रचार वाहनों में भी प्रियंका नजर आ रही हैं। चुनावों के वक्त खास बन जाने वाली प्रियंका क्या कोई फिल्मी अभिनेत्री हैं, क्या वो कोई मॉडल है या वो बहुत अच्छी वक्ता है? सच कहा जाए तो वह इनमें से कुछ भी नहीं है  फिर भी हर चुनाव में कांग्रेस के नेता उन्हें याद करने लगते हैं और चाहते हैं कि प्रियंका पार्टी के लिए ज्यादा से ज्यादा इलाकों में प्रचार करें। तो क्या प्रियंका कोई मंजी हुई राजनीतिज्ञ हैं, अगर लोगों से ये सवाल किया जाए तो लोगों का ईमानदार जवाब होगा- नहीं। उन्होंने तो आज तक कोई चुनाव भी नहीं लड़ा है।

कांग्रेस के लिए चुनाव के दौरान प्रियंका की फेस वैल्यू इतनी क्यों बढ़ जाती है? इसका जवाब उनके लुक में है। देश के लोगों को वह इन्दिरा गांधी की पोती ही दिखती हैं । देश में आज भी तमाम लोग ऐसे है जो इन्दिरा गांधी को सम्मानजनक ढंग से याद करते हैं और प्रियंका को देखने के लिए उनकी सभाओं में पहुंच जाते हैं। कहा जाए तो उनकी यही एकमात्र विशेषता है कि उनकी जनसभाओं में भीड़ जुट जाती है। प्रियंका अपनी दादी की तरह दिखती भर हैं तो क्या ये समझ लिया जाए कि उनमें वो सब खूबियां भी हैं जो इन्दिरा गांधी में थीं।

हर बार चुनावों के दौरान कुछ उत्साही कांग्रेसी नेता प्रियंका गांधी से पार्टी का नेत़ृत्व संभालने की मांग करने लगते हैं मगर आज तक प्रियंका ने राजनीति में कदम रखने में रुचि नहीं दिखायी। कुछ लोग यह भी कह सकते है कि राजनीति में आने का साहस नहीं किया। प्रियंका में राजनैतिक सूझ-बूझ की कमी होगी, ऐसा कहना मूर्खता ही होगी क्योंकि जबसे उन्होंने आंख खोली है, तबसे आज तक उनके चारो ओर राजनीति का ही माहौल रहा है। हालांकि अबतक वह अमेठी और रायबरेली में केवल चुनाव प्रचार तक ही सीमित रही हैं, वो भी केवल अपने भाई और अपनी मां के समर्थन में। कहीं और चुनाव प्रचार करने वो अब तक हिचकती ही रही हैं।

हिन्दूवादी नेता विनय कटियार तो कुछ भी बोल दें, बवाल होना तय है। उन्होंने क्या कहा, सिर्फ यही न कि प्रियंका से सुंदर और भी महिलाएं-लड़कियां हैं जो चुनाव प्रचार करती हैं। क्या यह बात गलत है? अगर चुनावी सभाओं में भीड़ इकट्ठी करने का क्राइटेरिया सिर्फ लुक ही माना जा रहा हो, पैमाना केवल सुंदरता ही हो तो कांग्रेस के पास नगमा और भाजपा के पास हेमा मालिनी जैसी सुंदरियां हैं। नगमा और हेमा मालिनी, जिन्हें कोई भी हिन्दुस्तानी प्रियंका गांधी से असुंदर तो नहीं ही कहेगा। ये दोनों महिलाएं भी जनसभाओं में भारी भीड़ खींचतीं हैं, यूं कहें कि प्रियंका से भी। हेमा मालिनी तो चुनाव जीत कर संसद सदस्य भी बनी हैं।

अगर विनय कटियार ने ऐसा बयान दे दिया तो इसमें इतनी हाय-तौबा क्यों ? तो क्या यह सारी हाय-तौबा सिर्फ टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ाने भर का खेल है या मोल-भाव कर कांग्रेस की टीआरपी बढ़ाने की कोशिश या हिन्दूवादियों और हिन्दुत्व को कोस कर अपने आप को प्रगतिशील बताने का ढकोसला ... सच्चाई तो मीडिया के कीड़े ही जानते होंगे। 

लेखक धीरज सिंह से संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है.