Prabhat Dabral : आपने कई बार अफसरों की अंध- स्वामिभक्ति के कारण सरकारों को शर्मिंदा होते हुए देखा होगा. केंद्रीय सूचना आयोग में काबिज़ रिटायर्ड सरकारी अफसर प्रधान मंत्री और कपड़ा मंत्री (स्मृति ईरानी) की डिग्रियों के मामले में ऐसा ही कुछ कर रहे हैं जिससे लगने लगा है कि डिग्रियों के मामले में दाल में कुछ काला ज़रूर है. पूरा किस्सा सुनिये, ध्यान से पढ़ेंगे तो आने वाले समय में जब ये विवाद और बढ़ेगा, तो समझने में आसानी होगी.

सूचना आयोगों में आमतौर पर साल में एक बार सभी आयुक्तों के कार्यभार, यानि वे विभाग जिनकी उन्हें सुनवाई करनी है बदल जाते हैं.. इस फेरबदल में दिसम्बर में शिक्षा विभाग (HRD) आयुक्त श्रीधर आचार्युलू को मिल गया. आचार्युलू पूरे केंद्रीय सूचना आयोग में अकेले गैर-अफसर आयुक्त हैं...बाकी सभी रिटायर्ड अफसर हैं..

किसी व्यक्ति ने दिल्ली विश्वविद्यालय में १९७८ (मोदी जी ने इसी साल डी यू से डिग्री ली थी) की डिग्री परीक्षाओ के रिजल्ट से सम्बंधित कागजात देखने की इज़ाज़त मांगी थी(कापियां नहीं सिर्फ रिजल्ट). लोक सूचना अधिकारी ने मना कर दिया तो आवेदक ने अपीलकी और फिर भी असफल रहने पर सूचना आयोग पहुँच गया. मामला आचार्युलू के समक्ष पहुंचा तो उन्होंने निर्णयदिया कि लोक सूचना अधिकारी का निर्णय गलत था और आदेश दिया कि आवेदक को ये कागज़ात देखने का अधिकार है..

मैं पांच साल तक सूचना आयुक्त रहा हूं. अपने अनुभव के आधार पर कहता हूं कि इस आदेश के बाद डी यू के पास सिर्फ दो रास्ते बचे हैं - या तो वो आयोग के आदेश का पालन करे या इसे हाई कोर्ट में चुनोती दे. आयोग का आदेश सही है या गलत ये फैसला हाई कोर्ट करेगी. मैने केस की फाइल नहीं देखी है इसलिए मैं टिप्प्णी नहीं कर रहा लेकिन इतना जानता हूं कि परीक्षा के परिणामो को सेना या IB की तरह RTI से बाहर नहीं रखा गया है. एक प्रकरण में मैंने स्वयं परिणामों के निरीक्षण का आदेश दिया था जिसका अनुपालन किया गया..

आदेश का पालन नहीं हुआ तो लोक सूचना अधिकारी पर जुरमाना लगा दिया गया...ये सब तो ठीक है पर मुख्या सूचना आयुक्त की स्वामिभक्ति का आलम देखिये, उन्होंने आनन फानन में आचार्युलू से HRD विभाग वापस ले लिया जिससे अब ये विवाद और गहरा गया है. कोई भी यही सोचेगा कि ये काम सरकार के दबाव में ही हुआ है क्योंकि एक और मामला है जो सुनवाई में आना बाकी है - स्मृति ईरानी की डिग्री का मामला. आमतौर पर पार्ट-हर्ड केसेस का तबादला नहीं होता. लेकिन अब खुद आचार्युलू ने कह दिया है कि ईरानी वाला केस भी ट्रांसफर कर दिया जाना चाहिए..

आचार्युलू हैदराबाद के प्रतिष्ठित लॉ कॉलेज के प्रोफेसर रहे हैं...ज़ाहिर है उन्हे कानून की जानकारी है ... उनका निर्णय कानूनी तौर पर तो सही होगा ही , ये मान लेना चाहिए. ऐसा न होता तो उसे चुनौती दी जा सकती थी, पर दी नहीं गयी .....फिर इस आदेश पर अमल क्यों नहीं हो रहा - दाल में कुछ काला लगेगा कि नहीं...

वरिष्ठ पत्रकार और कई चैनलों के संपादक रहे प्रभात डबराल की एफबी वॉल से.