आचार्य संजय प्रसाद द्विवेदी सिर्फ पंद्रह साल की बाली उमर में बनारस के एक मंदिर के पुजारी बन गए थे। बाद में तो खैर, उन्होंने अपनी पूजन प्रतिभा के बल पर बिडला ग्रुप के मंदिरों के मुख्य पुजारी का पद भी प्राप्त कर लिया था और हिंदुत्व में अपनी आखरी सांस लेने तक वे ऑल इंडिया ब्राह्मण असोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। मगर, आचार्य संजय द्विवेदी अब अहमद पंडित हैं। मौलवी बन गए हैं और देश भर में घूम घूम कर वेदों की पवित्र  ऋचाओं और उपनिषद की धाराओं की खिल्ली उडाते हुए अपने कट्टरतापूर्ण प्रतिवेदनों में हिंदुत्व पर प्रहार करके लोगों को इस्लाम स्वीकारने की प्रेरणा देते हैं। परंतु उनके नाम के साथ पंडित अब भी जुड़ा हुआ है। बनारस में संजय प्रसाद एक दिन शाम के कर्मकांड और पूजा पाठ करने के बाद रात को सोए थे, तो और सोते सोते ही अचानक उनका हृदय परिवर्तन हो गया। वे सुबह उठे, और मुसलमान बन गए।

नारायण दत्त तिवारी के बीजेपी की तरफ अचानक अपने प्रेम की पेंगे बढ़ाने पर आचार्य संजय प्रसाद द्विवेदी की याद आना इसलिए स्वाभाविक है, क्योंकि तिवारी का भी समय समय पर फायदे के समीकरणों में हृदय परिवर्तन होता रहा है। तिवारी अपने इसी ताजा परिवर्तित हृदय को लेकर बीजेपी के दरवाजे पर पहुंच गए। रिश्ते में तिवारी आचार्य संजय प्रसाद के दादा हैं, और हृदय परिवर्तन इसीलिए संजय प्रसाद के लहू में भी है। खैर, अब इक्यानवे साल की उमर में नारायण दत्त तिवारी एक बार फिर अपने हृदय परिवर्तन को लेकर चर्चा में हैं। तिवारी हाल ही में एक दिन अचानक मजबूरी में स्वीकार किए गए अपने बेटे रोहित शेखर को लेकर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के घर पहुंचे और बीजेपी में प्रवेश कराके यूपी से उनके लिए टिकट भी मांग आए। बीजेपी ने तिवारी को पार्टी में शामिल नहीं किया, फिर भी वे बीजेपी को अपने समर्थन का ऐलान कर आए। जीवन के इस मुकाम पर राजनीति के समंदर में तैर कर तिवारी का बीजेपी की तरफ जाना बीजेपी के ताकतवर और कांग्रेस के कमजोर होने की कथाएं कम कहता है। लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए तिवारी के दिल बदल लेने की कथा को ज्यादा बयान करता है।

देश के अत्यंत रसिया किस्म के राजनेताओं में सबसे ज्यादा ख्याति बटोरनेवाले नारायण दत्त तिवारी तीन बार यूपी के सीएम रहे है। कांग्रेस की सरकारों में कई बार केंद्र में विदेश, वित्त और ऐसे ही भारी भरकम विभागों के मंत्री भी रहे, और उत्तराखंड जब नया प्रदेश बना तो उसके पहले सीएम भी वे ही बने। इक्यानवे साल के तिवारी को अपने रसिक प्रसंगों की वजह से आंध्र प्रदेश के राज्यपाल का पद भी छोड़ना पड़ा था और इतिहास गवाह है कि तिवारी देश के पहले राज्यापाल रहे, जिन्हें राजभवन से बाकायदा बहुत बेआबरू होकर निकलना पड़ा था। जिस कांग्रेस ने जीवन में हर बार बहुत कुछ दिया, बहुत सम्मानित पदों पर बिठाया, उन तिवारी ने कांग्रेस को तोड़कर अपने नाम से अलग कांग्रेस बना डाली। फिर कुछ वक्त बाद असली कांग्रेस में शामिल भी हो गए। लेकिन इधर - इधर हाथ पांव मारना तिवारी की आदत में हमेशा से रहा है। इधर उधर हाथ पांव मारने के ये किस्से अब लगभग बूढ़ी हो चुकी अनेक महिलाओं के जीवन की कथाओं के निहायत निजी पन्नों पर भी दर्ज हैं।

अपने राजनेता होने के प्रभाव में अनेक तत्कालीन नव यौवनाओं को धन्य करनेवाले तिवारी अब जिस बेटे को बीजेपी को सौंप आए हैं, वह रोहित शेखऱ भी उन्हीं अनेक में से एक का बेटा है। कुछ वक्त पहले तक नारायण दत्त तिवारी इन्ही रोहित और उनकी मां उज्जवला शर्मा पर ब्लैकमेल करने का दावा कर रहे थे। यह तो भला हो कानून का, जिसके तहत कोर्ट ने यह आदेश दे दिया कि नारायण दत्त तिवारी से रोहित शेखर का डीएनए जांचा जाए। तब जाकर पकड़े जाने के डर से तिवारी के तेवर ढीले पड़े और रोहित और उनकी मां को तिवारी ने बेटे और पत्नी का दर्जा दिया। रोहित पेशे से वकील हैं और यह सब हासिल करने के लिए उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। रोहित की यह मां कभी केंद्र में मत्री रहे शेरसिंह की बेटी है। जो, किसी जमाने में तिवारी की अत्यंत अंतरंग संगिनी हुआ करती थीं। अब वयोवृद्ध हैं और इस उमर में भी खुश है कि जीवन के उतार पर ही सही, उन्हें एक पति और उनके बेटे को पिता का नाम मिल गया है। अब तिवारी को अपने बेटे के उज्जवल राजनीतिक भविष्य की उम्मीद है।

वैसे, रह रह कर रातों को रंगीन करते रहने की भूल करनेवाले तिवारी उम्र के तकाजे की वजह से भले ही इन दिनों हर बात भूल जाते हैं। मगर, आंध्र प्रदेश के राजभवन के दरवाजों और दीवारें पर तिवारी की आशिक मिजाजी के किस्से अभी भी अंकित हैं। राजभवन के कर्मचारियों से बात करें, तो वे रस ले लेकर अपने महामहिम की रंगीन रातों के रंगबिरंगे किस्से सुनाते हैं। ऐसे ही बहुत सारे किस्सों का एक हिस्सा यह भी है कि दिल्ली की रहनेवाली राधिका नाम की एक बेहद खूबसूरत अधेड़ महिला पर तिवारी ने महामहिम के रूप में जमकर महिमा बरसाई। राधिका को राजभवन में कभी भी आने जाने की खुली छूट थी और रहती तो वे अकसर वहां पर ही थी। बाद में तो यह सब पुलिस के पन्नों पर कानून की धाराओं के साथ अंकित भी हुआ कि राधिका राजभवन में महिलाएं सप्लाई करती थीं। और इस सप्लाई को कानूनी जामा पहनाने के लिए उन महिलाओं को राजभवन में काम करने के लिए वहां मजदूर के रूप में लाया जाता था। लेकिन इस बात का तिवारी जी ने आज तक कोई जवाब नहीं दिया है कि वे सारी मजदूर महिलाएं बहुत खूबसूरत, गोरी और जवान ही क्यों हुआ करती थीं। और मजदूर थीं, तो राज्यपाल के शयनकक्ष में आधी रात को किस तरह की मजदूरी करने जाया करती थीं।

राजभवन से रुखसत होने के लगभग सात साल बाद अब जब निजी चर्चाओं में मजे लेने के लिए लोग जब तिवारी से इस बारे में पूछटे हैं, तो वे मुस्कुराकर टाल जाते हैं, लेकिन उनकी शरारत भरी मुस्कान अनायास ही राजभवन के सारे राज उगल देती है। आंध्र प्रदेश के राजभवन को अय्याशी के अड्डे के रूप में अलंकृत करने का काम तिवारी ने जमकर किया। इसीलिए राजभवन से विदाई की आखरी सलामी के वक्त एक रसिया किस्म के राज्यपाल को सामने सलामी लेता देख सिपाहियों के दिल में क्या चल रहा होगा, इस बात का अंदाज सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि वे सलामी का संयम खोकर वे हंस रहे थे। अब इक्यानवे साल की उमर पार करने की देहरी पर भी युवा महिलाओं को देख लार टपकानेवाले नारायण दत्त तिवारी की रंगीन मिजाजी का एक किस्सा और सुन लीजिए। राजभवन से तिवारी की शर्मिंदगी भरी विदाई हो चुकी थी। देश भर में एक बूढ़े राजनेता के राजभवन में व्यभिचार की कथाएं कही –सुनी जा रही थी। और होली आ गई थी। उत्तराखंड में रंग उड़ रहे थे। कुछ महिलाएं झुंड में नाच रही थी, तो तिवारी जी भी उनके बीच घुस गए और गाल पर गुलाल लगवाने के साथ लाली बिखेरने के बहाने उनसे लिपटने का सुख भी जी आए। तिवारी अपने भाषणों में जब यह कहते हैं कि शौक सचमुच अजब किस्म का होता है, छूटता ही नहीं। तो, लगता है कि वे अपने अनुभव बयान कर रहे हैं।

इतना सब जानने के बाद भी वे लोग धन्य हैं जो कहते हैं कि नारायण दत्त का राजनीति में बहुत सम्मान है। कांग्रेस में तो खैर तिवारी की कोई कदर बची नहीं है। लेकिन वैसे भी अब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में न तो नारायण दत्त तिवारी की और न ही उनके नाम की कोई ऐसी हैसियत बची है कि उसके दम पर राजनीति की जा सके। सो, बीजेपी और उसके अध्यक्ष अमित शाह ने ठीक ही किया कि नारायण दत्त तिवारी को बीजेपी लेने का उपकार नहीं किया। सत्ता में रहने की वजह से वैसे भी बीजेपी के सर पर अनेक आफत सवार है। हालांकि बहुत शानदार प्रशासक के रूप में तिवारी विख्यात रहे हैं, इसी कारण लगातार बड़े पदों पर भी रहे। लेकिन व्यभिचार और रंगीन मिजाजी की कथाएं किसी की मनुष्य की हर तरह की सारी कमाई एक साथ खा जाती है। सो, नारायण दत्त तिवारी भले ही दल बदले या दिल, अब क्या फर्क पड़ता है?

(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं)