राजेश ज्वेल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस नेकनियती के साथ महीनेभर पहले नोटबंदी लागू की थी उसका फायदा फिलहाल तो मिलता नजर नहीं आ रहा है... आम आदमी को अपना सफेद धन पाने के लिए जहां अभी भी कतार में खड़े होना पड़ रहा है, वहीं काले कुबेरों ने भ्रष्ट बैंक मैनेजरों के साथ सांठगांठ करने के अलावा सोने, प्रॉपर्टी से लेकर चालू, बचत और जन धन खातों सहित अन्य तरीकों से कालाधन ठिकाने लगाने में काफी हद तक सफलता पा ली है। 80 प्रतिशत से ज्यादा बंद हुए 500 और 1000 के नोट बैंकों में जमा हो चुके हैं। साढ़े 14 लाख मूल्य के नोट बंद किए गए थे और अभी तक 12 लाख करोड़ से ज्यादा बैंकों में आ चुके हैं।  शेष बचे 21 दिनों में 1 लाख करोड़ से अधिक की राशि और जमा हो जाएगी।

अब सभी यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर कालाधन गया कहां? नोटबंदी का यह ऐतिहासिक निर्णय और अधिक कारगर हो सकता था, अगर इसमें कुछ सावधानी बरतने के साथ मैदानी तैयारियां कर ली जातीं। मसलन अभी नोटबंदी से सबसे ज्यादा त्रस्त समाज का निचला तबका हुआ है, जिसके पास न तो बैंक खाता है और न ही मोबाइल फोन और न ही उसे इतनी समझ है कि वह नेट बैंकिंग या पेटीएम को अपना सके। खोमचे, रेहड़ी या ठेले अथवा फुटपाथ पर छोटा-मोटा कारोबार कर 100-50 रुपए रोज कमाने वाले से कैशलेस हो जाने की कल्पना करना ही शेखचिल्ली जैसी बातें हैं। क्या चप्पल सुधारने वाला या पंक्चर पकाने वाले को अभी कैशलेस किया जा सकता है..? देश के वित्तमंत्री, अफसर और टीवी चैनलों पर ज्ञान बांटने वालों को सुनकर ऐसा लगता है मानों देश की असलियत इन्हें पता ही नहीं है...

प्रधानमंत्री खुद इतनी आसानी से कह देते हैं कि भिखारी भी अब पेटीएम इस्तेमाल करने लगा है... किसी दो-चार उदाहरणों को देने से 125 करोड़ की आबादी को उसी अनुरूप मान लेना सरासर नासमझी ही कही जा सकती है। मोदी जी को नोटबंदी से पहले उसकी पुख्ता तैयारी कर लेना थी और काले कुबेरों को भी 51 दिन देने की बजाय मात्र 10-15 दिन ही देना थे। पहले बाजार में 50, 100 और 500 रुपए के नोट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करा देना थे, जिससे आम आदमी से लेकर वेतनभोगियों को दिक्कत नहीं आती और साग-भागी बेचने वाले से लेकर छोटे-मोटे कारोबारियों को भी हाथ पर हाथ धरेे नहीं बैठना पड़ता। यह भी समझ से परे है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने सबसे बड़ा 2000 का नोट पहले बाजार में उतार दिया, जो आज तक किसी काम नहीं आ रहा है, सिवाय काले कुबेरों के। आम आदमी के पास तो यह नोट महज शो पीस ही बनकर रह गया, क्योंकि इसका छुट्टा किसी के पास नहीं मिलता। बजाय 2000 के नोट को पहले जारी करने के, 50, 100 और 500 का नोट जारी किया जाना था। इस गलती को अब सुधारा जा रहा है।

अगर बाजार में छोटे नोट पर्याप्त उपलब्ध करा दिए जाते तो आम आदमी की भीड़ भी बैंकों और एटीएम के सामने से जल्दी ही छट जाती और उनका काम-धंधा भी चलता रहता। इसके अलावा बैंक मैनेजरों पर कड़ी निगरानी रखना थी, जिन्होंने काले कुबेरों से मिलकर नोट रातों रात बदल डाले। यही कारण है कि आम जनता को तो ये नोट मिले नहीं और अभी नेताओं से लेकर अभिनेताओं और काले कुबेरों के पास से लाखों-करोड़ों के नए नोट बरामद हो रहे हैं। हालांकि दोषी बैंक मैनेजरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई है। अमीरों ने तो घर बैठे कई तरह की जुगाड़ निकालकर अपने बोरे भर-भरकर पड़े बड़े नोटों को पिछले दरवाजे से बदलवा लिया या सोने से लेकर प्रॉपर्टी अथवा शुरुआत में 20 से 25 प्रतिशत कमीशन देकर बचत या जन धन खातों में खपा डाला।

अब तो बाजार में पुराने नोट ब्याज पर भी उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में नोटों को बहाने, जलाने की खबरें भी बोगस है, जाली नोट अवश्य बहाए जा सकते हैं। जब आम आदमी से लेकर कालाधन रखने वालों के पास 30 दिसम्बर तक का समय है तो वह अभी से अपने नोट क्यों बहाएगा या जलाएगा..? बैंकों में 80 प्रतिशत से ज्यादा नोट जमा हो चुके हैं, ऐसे में जलाने और बहाने की बात ही समझ से परे है। हालांकि मोदी सरकार भी नोटबंदी की असफलता की हकीकत को समझ चुकी है, यही कारण है कि अब भ्रष्टाचार और कालेधन की बात नहीं कही जा रही है और कैशलेस से लेकर लेस कैश का हल्ला मचाया जा रहा है। आतंकवादियों को नोटबंदी से बड़े नुकसान की बातों का भी असर अधिक नजर नहीं आया। एक तरफ जहां आतंकी हमले जारी हैं, वहीं नए नोट भी इन आतंकियों के पास पहुंचने लगे और अब तो वे बैंकें भी लूटने लगे हैं।

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं. वे 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय हैं. संपर्क : 9827020830