गिरीशजी: जम्हूरी संस्कार के पर्याय 'नेहरू' : भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पिछले दिनों यह लिखा कि कश्मीर समस्या भारतीय लोकतंत्र को नेहरू गांधी परिवार की देन है. आडवाणी ने अपने ब्‍लॉग में टिप्पणी की है कि  जवाहरलाल नेहरू में यह साहस ही नहीं था कि वो कश्मीर मसले को हल कर पाते. नेहरू और शेख अब्‍दुल्‍ला के चलते ही कश्मीर का मसला जिंदा रहा, वर्ना यह आजादी के दौरान ही हल हो गया होता, जब 561 रियासतों का भारत में विलय हुआ था. आडवाणी ने नेहरू गांधी परिवार की असफलता के संदर्भ में श्रीमती इंदिरा गांधी का भी जिक्र किया है कि 1971 के युद्ध में जब  लगभग एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों ने बांग्‍लादेश निर्माण के समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में समर्पण किया तब भी कश्मीर समस्या को भारत चाहता तो निपटाया जा सकता था, लेकिन तब भी चूक हुई.

वैसे तो आडवाणी ने ऐसे अनेक मुद्दों पर नेहरू की तीखी आलोचना की है, और ये कोई बहुत चौंकाने वाली बात भी नहीं है क्योंकि हिंदुत्व, भाजपा, पूर्व में जनसंघ, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू महासभा और आरएसएस यानी संघ परिवार से जुडे लोग पहले भी ऐसा कहते रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि आडवाणी इसी समय ऐसा क्यों बोल रहे हैं? क्या वह यह भूल रहे हैं कि 1971 में विजय के लिए खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने ही कभी इंदिरा गांधी को 'दुर्गा'  तक कहा था, या फिर वो जानबूझ कर वाजपेयी की उदार छवि से खुद को दूर दिखाते हुए संघ को खुश करने के लिए नियोजित आडवाणीतरीके से ऐसा कह रहे हैं? क्या वो कायदे आजम जिन्ना का गुणगान करने वाली अपनी छवि की भरपाई करने की कोशिश कर रहे हैं? या हिंदुत्व के नए सियासी एजेंडे के तहत अब कश्मीर को मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़  कर नया आधार तलाश रहे हैं? या फिर से 'पीएम इन वेटिंग' की तैयारी शुरू हो गई है?

ऐसे अनेक सवालों के बीच क्या दो दशक पहले की उन कड़वी यादों को भुलाया जा सकता है जब सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा शुरू हुई थी और जिसकी परिणति अनेक सांप्रदायिक दंगों में हुई, सैकड़ों की जान गई और फिर बाबरी मस्जिद विध्वंस हुई? ये घटनाएं सिर्फ भारी खून खराबों और आर्थिक क्षति के हादसे भर नहीं थीं-  अफगानिस्तान के बमियान में कट्टरपंथी तालिबानियों ने जिस तरह से सैकड़ों साल पुरानी बुद्ध की प्रतिमाओं को तोड़ा था, उसी तर्ज पर कट्टरपंथियों की जमात ने सैकड़ों साल पुरानी अयोध्या की मस्जिद के ढांचे को भी ध्वस्त किया था, बल्कि इससे भी ज्यादा यह भारतीय लोकतांत्रिक आत्मा, देश के संविधान और उनके उन मूल्‍यों पर भी कुठाराघात था, जो आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी की रहनुमाई में निर्मित हुए थे. तब अयोध्या के साथ ही मथुरा और वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर की बात ही नहीं उठी थी बल्कि तीन हजार मस्जिदों-मजारों-दरगाहों के अस्तित्व का सवाल भी उठा था. और, इन सब की शुरुआत उसी रथ यात्रा से हुई थी, जिसकी अगुवाई खुद आडवाणी कर रहे थे.

आडवाणी आज अगर भारतीय लोकतंत्र के लिए मौजूदा कश्मीर को 'नेहरू की देन' बता रहे हैं, तो तुल्‍नात्मक यह भी विचार करना चाहिए कि गांधी-नेहरू ने कभी भी सांप्रदायिक और घृणा आधारित सियासत नहीं की. यह नेहरू की उदार जम्हूरी दृष्टि थी जिसने खुले मन से दुनिया की पंचायत में कश्मीर के सवाल पर विचार में संकोच नहीं किया और उतने ही बड़े  दिल से वहां जनमत संग्रह और लोगों की रायशुमारी की बात भी सुनी. और यही रायशुमारी दृष्टि आज दुनिया भर में लोकतंत्र का आधुनिक संदर्भ और आधार है, न कि पाक की सैनिक तानाशाही. आडवाणी की तरह लोग कह सकते हैं कि सियासत में बडे़ दिल और बडे़ मन की बात नहीं चलती और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तो एकदम नहीं चलती. लेकिन समझा जाना चाहिए कि यही फर्क नेहरू को दूसरों से आग करता है. जब नासिर-टीटो-सुकर्ण के साथ नेहरू तीसरी दुनिया और निर्गुट देशों का नेतृत्व ही नहीं करते बल्कि उनमें नयी आस भी जगाते हैं. तत्‍कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी और सोवियत राष्ट्रपति खुश्चेव जैसी अनेक शख्सियतें शांति प्रयास में नेहरू की कायल होती हैं. संभवतः नेहरू के इसी बडे़ मन ने उन्हें आम हिंदुस्तानियों के दिल में जगह दी थी और इसीलिए नेहरू को इस देश में जितना प्यार मिला उतना किसी और को नहीं. महात्मा गांधी को भी नहीं. गांधी को अपूर्व सम्मान मिला. जो आज भी है. लेकिन जनता का प्यार तो नेहरू के ही खाते और नसीब में था. आडवाणी की तरह ही संघ प्रमुख रहे सुदर्शन जैसे लोगों ने पहले भी नेहरू की आलोचना की है, लेकिन नेहरू हमेशा नेहरू ही रहे.

ऐसा लिखने का आशय ये है कि नेहरू लोकतांत्रिक धारा के साथ ही हिंदुस्तानियत के भी प्रतीक हैं. वो हिमालय, गंगा, सम्राट अशोक, बादशाह अकबर के साथ ही भारत की सांस्कृतिक विरासत,  बुद्ध, शंकराचार्य और अमीर खुसरो को एक साथ जीते हैं. दरअसल, यही उनकी पूंजी है और यही द्वंद्व भी.  संभव है कि आज  विशेषण में हम उन्हें कश्मीर जैसे मुद्दों पर कटघरे में भी खड़ा करेंगे, लेकिन नेहरू कभी समाज को बांटने वाली रथयात्राओं का नेतृत्व नहीं करते, मस्जिद के 'विध्वंस'  की परिणति पर द्विअर्थी रूप से उसे सिर्फ 'दुर्भाग्यपूर्ण' नहीं कहते, बल्कि यदि ऐसा हुआ होता तो उनके शर्म की पराकाष्ठा का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है.

ऐसा लिखने की वजह ये है कि ऐसा नहीं है कि सोमनाथ और अयोध्या प्रकरण सिर्फ लगभग दो दशक की कहानी है. दरअसल 1947 में आजादी के कुछ समय बाद ही सोमनाथ और अयोध्या के मुद्दे उठे थे. नेहरू नहीं चाहते थे कि उनके गृहमंत्री और हैसियत में लगभग बराबर वल्लभ भाई पटेल और तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार कार्यक्रम से समद्ध हों, लेकिन वे दोनों भी आजादी के उसी आंदोलन में तपे बढे़ थे, जो नेहरू की भी थाती थी. नतीजतन दोनों ही वहां गए लेकिन साफ कहा कि 'हम पुराने जख्मों को कुरेदने नहीं, लुप्त होती सांस्कृतिक विरासत की स्थापना के लिए आए हैं.'  जब कि लगभग उसी समय एक काली रात अयोध्या में गुपचुप तरीके से मस्जिद में मूर्ति रख दी गई. और संयोग देखिए! इसके ठीक 40 साल के बाद दोनों ही जगहों पर एक नए रूप में आंदोलन ही नहीं शुरू हुआ, एक कोने से दूसरे कोने तक रथयात्रा की योजना भी बनी. कोई पूछे कि आडवाणी की निजी सुरक्षा अधिकारी अंजू गुप्ता ने आयोध्या विवाद पर लिब्रहान जांच आयोग और रायबरेली की विशेष अदालत के सामने क्या यह बयान नहीं दिया था कि मस्जिद विध्वंस के समय आडवाणी के सामने ही क्या हिंदुत्ववादी नेता आपस में एक दूसरे को बधाइयां नहीं दे रहे थे, क्या वहां मिठाइयां नहीं बंट रहीं थीं-  और यदि उनका 'दुर्भाग्यपूर्ण'  बयान सही है, तो क्या उन्होंने ढांचा तोड़ते कारसेवकों को और खुशियां मनाते नेताओं को एक बार भी रोकने की कोशिश की थी? नहीं न. तो ये दृष्टि नेहरू की कभी नहीं हो सकती.  नेहरू तो उस गांधी के वैचारिक आभामंडल से अभिभूत थे, जो हिंदू-मुसमान में फर्क नहीं जानता था और फख्र से कहता था-

'ईश्वर अल्ला तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान'

तथा बंटवारे के बाद इसी श्रृंखला में नोआखबी से दिल्ली लौटने के बाद गांधी ने कहा था कि आ वो पदयात्रा करते हुए पाकिस्तान जाएंगे और वहीं रहना चाहेंगे. वहां रहकर पाकिस्तान के मुस्लिम भाइयों को बता देंगे कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान में रहने वाले एक हैं, आपस में भाई हैं, और दोनों को कोई अलग नहीं कर सकता. लेकिन दुर्भाग्य. तभी गांधी को कट्टरपंथ का शिकार होना पड़ा. दिलचस्प पहालू यह भी है कि जब आडवाणी कश्मीर पर धारा 370 पर आपत्ति करते हैं तो उसी क्रम में धारा 371 को क्यों भूल जाते हैं, जो उत्तरपूर्व के संदर्भ में है, यह भी क्या दोहरापन नहीं है? वैसे मजे की बात तो यही है कि हिंदुत्ववादी धारा सिर्फ अपसंख्यक मुसामानों का ही विरोध करती हो, ऐसा नहीं है, ईसाइयों के गिरजाघरों और उनकी बस्तियों पर भी हमले हुए हैं, खास कर इनके प्रभाव वाले अनेक इलाके इसके गवाह हैं. नेहरू की दृष्टि कभी भी ऐसी संकीर्ण नहीं रही. वो सारे हिंदुस्तान को अपना ही मानते थे, और दृष्टि में ऐसी व्यापकता थी जो किसी को पराया नहीं समझती थी- इसे विश्व दृष्टि ही कहा जा सकता है. उनके हंसने पर देश हंसता था और रोने पर देश रोता था. माना कि 1962 में चीन ने धोखे से पीठ पर वार किया. इस सदमे की भूमिका 1964 में उनकी मौत में हो सकती है पर नेहरू की लोकतांत्रिक देन देश की बड़ी पूंजी है-  और कश्मीर ही नहीं दुनिया भर में आज उसी रास्ते को स्वीकार किया जा रहा है, जिसे उस 'जवाहर' ने कभी सोचा और जीया था.  दरअसल, आज की तारीख में जब भारत-पाक शांति वार्ता जारी है, ऐसे समय चर्चा में इस तरह कश्मीर को लाने के निहितार्थ क्या हैं, इस मुद्दे पर भी क्या गहरे विचार की जरूरत नहीं?

लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.