देश का अनोखा विकास, जी हाँ मैं विकास की बात कर रहा हूँ,  उसी विकास की जिसकी गूँज हर तरफ है। विकास की चर्चा हर खास व आम की ज़ुबान पर है। हर राजनैतिक पार्टी का यह एजेंडा है। सरकारी खजाने से विकास के नाम पर खूब पैसा खर्च किया जाता है। लेकिन आम जनता है के इतना खर्चा और चर्चा के बाद भी विकास को समझने व देखने में असमर्थ है। विकास कभी चुनावी होता है और कभी सरकारी लेकिन आम नहीं होता। भला खास चीज आम हो सकती है,  इतनी सी बात आम जनता को समझ नहीं आ रही। आम लोग हैं ना खास लोगों की खास बात समझ नहीं आती। खैर आज कल विकास शब्द अपनी कामयाबी पर खूब इतराता है। इतराए भी क्यों न नेताओं का भाषण हो या सरकारी मीटिंग विकास शब्द के बगैर सब अधूरा ही रहता है। विकास शब्द अब तो वीवीआईपी बन गया है। आम लोग हैं कि उसे अब भी अपने शब्दकोश में तलाश रहे हैं।

The second reshuffle or rejig in the Union Council of Ministers by the Prime Minister Man Mohan Singh on July 12,  2011 is disappointing, to say the least. The first such reshuffle was effected in January 2011. Both taken together and as announced by the Prime Minister that it would be the last shuffling of the UPA-11 Government before the next General Elections to the Lok Sabha in May 2014 have come as a damp squib. It seems the UPA-11 has lost the will to govern much less take decisive measures to stem the rots of corruption, inflation and ability to reassure the people, the ultimate sovereign masters that the Government is business like and not adrift. Added to this, the Government appears to have lost the plot.

आलोक कुमार अमेरिका में संसद यानी सीनेट को कांग्रेस कहते हैं। अपने यहां यह सबसे पुरानी सियासी पार्टी का नाम है। दोनों कांग्रेस में एक साम्य है। जिस नीति के लिए अमेरिका में सरकार चलाने वालों की पूरी सीनेट यानी कांग्रेस मिलकर काम करती है अपने यहां वैसी ही नीति और तकरीबन उसी किस्म का काम अकेली सियासी पार्टी के तौर पर कांग्रेस आसानी से कर लेती है। राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के बडे़ कामों की तुलना में अपने संसद का रोल गौण है। आजादी के बाद सरकार की सबसे बड़ी मुसीबत नब्बे की दशक के शुरुआत में आपरेशन ब्लू स्टार के वक्त आई थी। कांग्रेस की नीतियों ने जो बीज बोया था पाकिस्तान से आई हर किस्म की खाद ने नफरत की उस बीज को लहलहाते फसल में तब्दील कर दिया। तब अखबार की सुर्खियां जमीन पर पसरे खून की छीटें होती थीं। अखबार इंसान की आंखों में तैरती खौफ के मंजर की तस्वीरों से अटे रहते थे। अंदर के पन्नों पर आला समीक्षाएं होती कि संत जनरैल सिंह भिंडरवाले जैसे कई डाकुओं को खड़ा करने में कांग्रेस की अहम भूमिका रही।

सर्वप्रथम प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को बधाई कि उन्होंने यह स्वीकार कर ही लिया कि बांगलादेश की 25 फीसदी आबादी जमाते इस्लामी के प्रभाव में है जो भारत के कट्टर विरोधी हैं. हालांकि उन्होंने यह स्वीकारोक्ति देश के वरिष्ठ संपादकों के साथ हुई एक ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में कही. यह टिप्पणी रात को उनकी वेबसाइट पर भी डाली गई तथा लगभग 30 घण्टे तक साइट पर रहने के बाद उसे हटा लिया गया. सरकार को डर था कि इससे दोनों देश के बीच खटास ना पैदा हो जाये क्योंकि विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा जल्द ही बांगलादेश यात्रा पर निकलने वाले हैं.

भोपाल :  राजनीति में बयानों का स्तर गिरता जा रहा हैं। राजनीतिज्ञों की भाषा भारत के सबसे गरीब तबके के व्यक्ति के समकक्ष भी नहीं ठहर रही हैं। इन बयानों की शुरुआत करने का श्रेय पुनः देश को आजादी और संस्कार देने का दावा करने वाली कांग्रेस को ही जाता हैं। कांग्रेस के विद्वान मंत्रियों और पदाधिकारियों ने उस शब्दकोश को खोल दिया हैं, जिसमें अश्‍लीलता और वैचारिक दिवालियापन का स्पष्ट दर्शन होता हैं, फिर भाजपा क्यों पीछे रहती। उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर कई बड़े नेताओं ने भी उसी स्तर पर जाकर कांग्रेस का प्रतिकार करना उचित समझा, जहां कभी राष्ट्रीय कहलाया जाने वाला दल खड़ा हुआ था। दिग्विजय सिंह अपने बयानों में अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, मुरारी बापू,  श्री श्री रविशंकर को न सिर्फ संदेह के घेरे में खड़ा करते हैं, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें ठग साम्प्रदायिकता बढ़ाने वाला और राष्ट्र विरोधी तत्व कहने में भी संकोच नहीं करते।

इतिहास गवाह है जब-जब अति हुई है उसका अंत भी हुआ है। भारत को आजादी के बाद एक सम्पूर्ण लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने का सपना जो देश के महापुरुषों ने देखा था वो पूरा तो हुआ पर एक सपने की तरह। जब आंख खुली तो लोकतान्त्रिक गणराज्य बिखरा हुआ पाया,  जिसका नतीजा आज हम सभी के सामने है। नेताओं के प्रति उमड़ता जनाक्रोश, आये दिन हो रहे धरने, अनशन और विरोध प्रदर्शन ये सभी बिखरे हुए लोकतान्त्रिक देश की तस्वीर है। गणराज्य तो जनता का राज्य होता है, एक ऐसा देश होता है जहां के शासनतन्त्र में सैद्धान्तिक रूप से देश का सर्वोच्च पद पर आम जनता में से कोई भी व्यक्ति पदासीन हो सकता है। इस तरह के शासनतन्त्र को गणतन्त्र कहा जाता है। इसी प्रकार लोकतंत्र या प्रजातंत्र इससे अलग होता है। लोकतन्त्र वो शासनतन्त्र होता है जहाँ वास्तव में सामान्य जनता या उसके बहुमत की इच्छा से शासन चलता है।

स्‍ीपीना संसद ना संविधान से अब देश चलेगा अन्ना के विधान से और देश में केवल नकारात्मक बात करने वाले और भोजपुरी में कहे तो गलचौरी करने वाले इस विधान के लागू होने से पहले तक ताली बजायेंगें, लेख लिखेंगे, फेसबुक सहित सभी ऐसे स्थानों पर नयी आजादी की कहानियां लिखेंगे. ऐसा लगेगा कि महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोस, तिलक, भगत सिंह, आजाद सभी ये लोग ही है. सीमाओं पर कुर्बानियां इन्होंने या इनके परिवारों ने ही दिया है और अब जीत का जश्न मना रहे हैं.  इनकी बातों से ऐसा भी लगता है कि भारत के लिए कुर्बानियां देने वाले आजादी कि लड़ाई लड़ने वाले निहायत नासमझ थे. ऐसा भी लगता है कि संविधान सभा में जो लोग बैठे थे वे देशद्रोही, बिना पढ़े लिखे, और गैर जिम्मेदार लोग थे. बाबा साहब अम्‍बेडकर से लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद हों या एचएन कुंजरू तक सभी को इस सूरमाओं से राय लिए बिना संविधान कि रचना नहीं करना चाहिए था.

गिरीशजी: जम्हूरी संस्कार के पर्याय 'नेहरू' : भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पिछले दिनों यह लिखा कि कश्मीर समस्या भारतीय लोकतंत्र को नेहरू गांधी परिवार की देन है. आडवाणी ने अपने ब्‍लॉग में टिप्पणी की है कि  जवाहरलाल नेहरू में यह साहस ही नहीं था कि वो कश्मीर मसले को हल कर पाते. नेहरू और शेख अब्‍दुल्‍ला के चलते ही कश्मीर का मसला जिंदा रहा, वर्ना यह आजादी के दौरान ही हल हो गया होता, जब 561 रियासतों का भारत में विलय हुआ था. आडवाणी ने नेहरू गांधी परिवार की असफलता के संदर्भ में श्रीमती इंदिरा गांधी का भी जिक्र किया है कि 1971 के युद्ध में जब  लगभग एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों ने बांग्‍लादेश निर्माण के समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में समर्पण किया तब भी कश्मीर समस्या को भारत चाहता तो निपटाया जा सकता था, लेकिन तब भी चूक हुई.

देशपाल सिंह पंवारआजादी मिलने के बाद हिंदुस्तान में सत्ता भरष्टाचारियों, मुफ्तखोरों, दुष्टों, बदमाशों, निकम्मों, घूसखोरों, लुटेरों के हाथों में चली जाएगी। हवा को छोड़कर बाकी हर चीज पर टैक्स होगा। एक टुकड़ा रोटी और एक बूंद पानी तक के लिए वे जनता को चूसेंगे। हिंदुस्तानी नेता कम क्षमता वाले लोग होंगे जो जुबान के मीठे और दिल के काले होंगे। आपस में लड़ेंगे, जनता को लड़ाएंगे, एक दिन हिंदुस्तान राजनीतिक झगड़ों में उलझकर रह जाएगा। विंस्टन चर्चिल (हिंदुस्तान की आजादी से पहले तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री का बयान)। उस वक्त चर्चिल ने जो कहा था, पंडित जवाहर लाल नेहरू समेत तमाम कांग्रेसी नेताओं ने मखौल उड़ाया था। हिंदुस्तान की आजादी की पीड़ा, जलन और ना जाने क्या-क्या आरोपों का राग गाया था।

विष्‍णु गुप्‍त मीडिया मैनेजमेंट से भी मनमोहन सिंह की जनविरोधी छवि साफसुथरी होगी नहीं। क्योंकि मनमोहन सिंह की छवि पर भ्रष्टाचार की कालिख पुत गई है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे मनमोहन सिंह संविधान-लोकतंत्र के रखवाले नहीं बल्कि धृतराष्ट हैं/ मनमोहन सिंह शिखंडी हैं/ भ्रष्टाचार-कालेधन के संरक्षक है/ औद्योगिक घरानों-वैश्विक लुटेरों के सबसे पसंददीदा प्रधानमंत्री हैं? राजसिंहासन पर बैठे धृतराष्ट्र ने जिस दिन द्रौपदी का चिरहरण पर मौन साधा था उसी दिन महाभारत की नींव पड़ी थी और कौरववंश के नाश का समय निर्धारित हो गया था। मनमोहन सिंह ने धृतराष्ट्र की तरह सुरेश कलमाडी /ए राजा/ कारपोरेटेड घरानों को देश का धन लूटते हुए चुपचाप देखा। सिर्फ चुपचाप ही नहीं देखा बल्कि भ्रष्ट राजनेताओं और औद्योगिक घरानों के संरक्षण देने के लिए खड़े भी हुए।

डा. हिमांशु यह सतयुग तो है नहीं कि समाज हित में जीते जी हड्डियों को दान में देने से 'दधिचि' पूज्यनीय हो जाते थे और एक कबूतर के जीवन की रक्षा की खातिर राजा शिवि अपने शरीर का संपूर्ण मांस तराजू पर रखकर ईश्वर की अनुकंपा प्राप्त कर जाते थे। यह दौर तो कलियुग का है लिहाजा 'जन हित-देश हित' में अभियान छेड़ने की गुस्ताखी के एवज में हम अपनी ही चुनी हुई सरकार के द्वारा भेजे गये वर्दी वाले गुंडों से रात के अंधेरे में पहले लाठियों द्वारा हांक दिये जाते हैं और फिर उपेक्षा का शिकार हो अंतत: अनशन तोड़ने के लिए विवश हो जाते हैं। सरकार अभी निहाल हो सकती है कि उसका 'अहं' जीत गया और 'जन' झुक गया लेकिन निश्चित ही यह पड़ाव है मंजिल नहीं। क्योंकि अभी अनशन ही खत्म हुआ है, आंदोलन नहीं।

शेषजी अल्पसंख्यकों के बारे में कांग्रेस पार्टी की सोच एक बार फिर बहस के दायरे में आ गयी है. एक तरफ तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की लाइन है जो मुसलमानों से सम्बंधित किसी भी मसले पर जो कुछ भी कहते हैं, वह आम तौर पर मुसलमानों के हित में होता है और दूसरी तरफ केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद हैं जो मुसलमानों के हित की बात करते समय यह ध्यान रखते हैं कि दिल्ली की काकटेल सर्किट के उनके बीजेपी वाले दोस्त नाराज़ न हो जाएँ. दिग्विजय सिंह सरकार में नहीं हैं और उनके विचारों का विरोध कांग्रेस के ज़्यादातर नेता करते पाए जाते हैं. दिग्विजय सिंह के विचारों को वे कांग्रेसी गलत बताते हैं,  जो कांग्रेस में होते हुए भी हिंदुत्व की राजनीति के पोषक हैं.

देशपाल सिंह पंवार यूं भूखा होना कोई बुरी बात नहीं है, दुनिया में सब भूखे होते हैं/ कोई अधिकार और लिप्सा का, कोई प्रतिष्ठा का, कोई आदर्शों का/ और कोई धन का भूखा होता है, ऐसे लोग अहिंसक कहलाते हैं/ मांस नहीं खाते, मुद्रा खाते हैं (दुष्यंत कुमार)। चौतरफा घपलों-घोटालों का दौर है। तमाम चोर के विदेश में जमा काले धन का शोर है। कोई सियासतदां करता नहीं गौर है। जनता बोर है। छिन रहा कोर है। दिखता नहीं कोई छोर है। कहीं नहीं कोई ठौर है। अब बसंत की नहीं भोर है। मस्ती में नाचता नहीं मोर है। हिंदुस्तान पर घटा घनघोर है। लोकतंत्र का दुखता हर पोर है। पता नहीं, कौन-कौन, किस जगह, किस तरह, लूट की वजह से हर पल सुनहरा कल इस गंदे जल की दलदल में फंसता जा रहा है। धंसता जा रहा है। पूरा देश ही इसमें बसता जा रहा है। आम जन मरता जा रहा है। जमाखोर-घूसखोर-सूदखोर-धनखोर हंसता जा रहा है। लोकतंत्र डरता जा रहा है।

गिरीशजी: हमेशा नैतिक जनशक्ति ही निर्णायक रही है-  गांधी का रास्ता भी यही है : क्या बर्मा की प्रख्यात लोकतांत्रिक गांधीवादी नेता और नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सूकी की तुलना भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल को लेकर आंदोलनरत अन्ना हजारे से की जा सकती है? जाहिर है यह सवाल चौकाता है. लेकिन इस पर विचार के पहले सूकी के बारे में इस खबर पर कृपया गौर करें कि सूकी ने बर्मा में लोकतंत्र लाने के लिए गांधी के अहिंसक रास्ते को छोड़ने तक की बात कही है. उन्होंने हिंसा की वकालत की है.

नमिता शरण "प्रणव मुख़र्जी ने कहा है कि सामाजिक कार्यकर्ता लोकतंत्र को कमजोर कर रहे है. माफ़ कीजिये,  राजनेता तो बहुत पहले ही लोकतंत्र को नष्ट कर चुके है. देश में लूटमार के बाद नेताओं ने अचानक 'लोकतंत्र का सिद्धांत' खोज लिया. सिद्धांत और नेता, अजी छोडि़ए." - ये कहना है बंदित कुईन जैसी फिल्म बनानेवाले फ़िल्मकार शेखर कपूर का. अन्ना और बाबा रामदेव ने कांग्रेस को उसकी औकात दिखा दी. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का गैर जिम्मेदाराना बयान और बाबा के अनशन को नौटंकी कहना, दरअसल कांग्रेस की बौखलाहट और लाचारी को दर्शा रहा है.

निरंजन परिहार गोपीनाथ मुंडे के बारे में लोग अपना ज्ञान दुरुस्त कर लें। ज्ञान यह है कि वे कहीं नहीं जाएंगे। ना कांग्रेस में, ना राष्ट्रवादी कांग्रेस में और ना ही शिवसेना में। वे लोग, जो चीख- चीख कर कह रहे हैं कि मुंडे बीजेपी छोड़ देंगे, वे सिर्फ मुंडे की हवा बना रहे हैं। जो लोग थोड़ी बहुत राजनीतिक समझ रखते हैं, वे यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बीजेपी के अलावा उनके लिए कहीं कोई ठिकाना नहीं है। ज्यादा साफ साफ सुनना है तो सच यह है कि प्रमोद महाजन ने किसी भी दूसरी पार्टी में ऐसा कोई खेत नहीं खरीदा, और ना ही उसमें कोई फसल बोई कि उसे काटने मुंडे वहां पहुंच जाएं।