भ्रष्ट सरकार की जड़ों में मट्ठा भरने वाले और उसे आकाश से रसातल में लाने वाले अन्ना हजारे एक पखवाड़े तक अख़बारों और चैनलों की 'हेडिंग' बने रहे. अन्ना रोज अख़बारों के कई-कई पन्ने देशभक्ति के रंग में रंगवाते और चैनलों पर घंटों जनतंत्र की शक्ति दिखाते दिखे. पुंछ से कन्याकुमारी और तिनसुकिया (असम) से पोरबंदर तक सभी प्रमुख शहरों में लगी 'अन्नामयीं होर्डिंगें' युवाओं में जोशोखरोश पैदा करती रहीं. तो पानी को मम बोलने वाले बच्चे से लेकर बोलने को तरसने वाले बुजुर्ग तक की जुबान पर 'अन्ना हजारे' और सिर पर 'मैं अन्ना हूँ' की टोपी छाई रही. पूरे देश में लाखों मोमबत्तियों ने देशहित में क़ुरबानी दी. वहीं दक्षिणपंथियों, चरमपंथियों और सेकुलरों ने सुर में सुर मिलाये.

मेरे कई मित्रों और परिचितों के सन्देश इस बीच मुझे मिले हैं जो इस बात से असहज महसूस कर रहें हैं कि मैंने और मेरे जैसे कई लोगों ने न केवल अन्ना हजारे के आन्दोलन से दूरी बनाये रखी, उसका समर्थन नहीं किया बल्कि उसका वैचारिक स्तर पर विरोध भी किया.. 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद आरक्षण विरोधी आन्दोलन के दिनों में भी हमारे आरक्षण का समर्थन करने पर ढेरों मित्र हैरान होते थे और उन में से अनेकों तो हमारे दुश्मन बन गए थे.. उन्हें इस बात से भारी परेशानी होती थी कि एक ऐसा छोटा सा समूह जिन में अधिकांश आरक्षित श्रेणियों में नहीं आते, आरक्षण के पक्ष में दलीलें कैसे दे सकता है.. हमारे असहज मित्रों की दृष्टि में अन्ना के आन्दोलन के कई मायने हैं.. अन्ना का आन्दोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ है और उनके सुझाये जन लोकपाल से भ्रष्टाचार पूरी तरह ख़तम न भी हुआ तो जैसा अन्ना का कहना है कि इस से भ्रष्टाचार में 90% कमी आ जाएगी..

अन्ना के आगे एक बार फिर सरकार बौनी साबित हुई। अन्‍ना की तैयारी के आगे वह पानी भरती नजर आयी। हालांकि अन्ना की गिरफ्तारी तक वह आत्मविश्वास से लवरेज थी,  पर दिन ढलते-ढलते लोटती-पलटती नजर आने लगी। अन्‍ना की गिरफ्तारी के 12 घंटे के अंदर सरकार इतनी असमंजस में पड़  गयी कि उसे अन्ना की रिहाई के आदेश जारी करवाने पडे़,  लेकिन अन्ना ने जेल से बाहर आने से मना कर दिया। कहा- सरकार बिना शर्त अनशन की इजाजत दे तभी बाहर जाएंगे। रात भर वह तिहाड़ परिसर में ही रहे। इधर रही सही कसर बुधवार को संसद सत्र के दौरान निकलती दिखी। सत्तापक्ष पूरी तरह से हथियार डाले दिखा और विपक्ष पूरी तरह से एकजुट। विपक्ष ने खूब खरीखोटी सुनायी।

सरकारों के भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और प्रभावी कार्रवाई के लिए शक्तिशाली लोकपाल आवश्यक है। आज अन्ना के आंदोलन पर बुद्धिजीवी वर्ग पिल पड़ा है। एक सवाल ये है कि वे अन्ना के आंदोलन से पहले क्या कर रहे थे? क्या अन्ना का इंतजार कर रहे थे. तुम आओगे तब हम विमर्श का तिरंगा खड़ा करेंगे। सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति राय जनलोकपाल से सहमत नहीं हैं। अन्ना के जनलोकपाल विधेयक को अति शक्तिशाली बताते हुए कई और लोग भी वैचारिक स्तर पर खिलाफत कर रहे हैं। जनता के इस आंदोलन से बुद्धिजीवियों का एक वर्ग चिढ़ा है। यह वर्ग क्यों चिढ़ा है? इसके चिढ़ने के कारण क्या हैं। क्योंकि चीजें बहुत सरलीकृत तरीके से सामने नहीं आतीं। अरुंधति राय देश दुनिया की बड़ी हस्ती हैं लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि अन्ना  के आंदोलन को इतना समर्थन क्यों मिला?

आखिर हो क्या गया है कांग्रेस को? वह असंयमित व असहज क्यों है? उनके नेता आपा खोते नजर क्यों आ रहे हैं?  क्या जाने-अनजाने किसी ने उसकी कमजोर नस पकड़ ली है? और अगर ऐसा है तो फिर क्यों नहीं वह खुद को उससे छुड़ा पा रही है? क्या किसी अनहोनी का डर है?  ये ऐसे कुछ सवाल हैं जिसका जवाब फिलहाल न तो आपके पास है और न ही मेरे पास। हां, इससे जुडे कुछ क्लू जरूर हैं। अब आप पर निर्भर करता है कि उन्हें आपस में जोडकर आप कहां तक पहुंच पाते हैं?   इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस बौखलायी है उसे बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी है। चाहे वह आजादी के बाद जनता की आवाज दबाने के लिए इमरजेंसी लगाने का मामला हो या फिर बोफोर्स घोटाले के उजागर होने के बाद की स्थिति। इन दोनों मामलों में उसने पावर दिखाने की कोशिश की और दोनों दफा पावरलेस (सत्ताच्युत) होना पड़ा।

जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है,  उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है,  बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधों का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया।

कहने को तो स्वतंत्र हुए हम 64 बसंत देख चुके हैं लेकिन जब भी जालिम अंग्रेजों का ख्याल आता है तब-तब अनायास ही हमें अपने भारतीय जल्लाद तथाकथित नेता अनायास ही याद आ जाते हैं, जब भी मैं दोनों के मध्य तुलना करती हूं तो भारतीय नेताओं को सबसे निचले पायदान पर ही पाती हूं। ऐसा भी नहीं है कि इन दोनों समूहों से मेरी कोई व्यक्तिगत रंजिश हो, पर न जाने क्यों भारतीय नेताओं में ईमानदारी की कमी ही पाती हूं। रहा सवाल देशभक्ति का तो वो इन्हें दूर-दूर तक नहीं छू पाती हैं। कभी-कभी इसकी एक्टिंग जरूर अच्छी कर लेते हैं। ऐसा भी नहीं है कि सभी बेकार है, निकृष्ट हैं, जनता के धन के लुटेरे हैं, बलात्कारी या अपराधी हैं लेकिन हां ऐसे नेताओं की जमात निःसंदेह अधिक है। इन 64 वर्षों में नेताओं के चाल-चरित्र में गजब की रिकार्ड गिरावट देखी जा रही हैं।

परिवर्तन के नारे के बूते बंगाल की सत्ता में आईं ममता बनर्जी ने राज्य का नाम बदल दिया है. अब इसे पश्चिम बंगाल के बदले पश्चिम बंग कहा जाने वाला है. विधानसभा में प्रस्ताव पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी की औपचारिकता ही बाकी है. इस तरह एक और परिवर्तन होने वाला है. हालांकि कुछ लोग इसे खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसी कवायद बता रहे हैं तो कुछ इसे राज्य को क्षेत्रवाद की तंग गलियों में ले जाकर आत्ममुग्ध होने वाली बंगाली भावुकता का ही एक रूप कह रहे हैं. अंग्रेजी में वेस्ट बंगाल कहा जाता है और बांग्ला बोलचाल में नया प्रस्तावित नाम पहले से ही प्रचलित है. तो फिर इसे तय करने के लिए तमाम बहस और बैठकों की क्या जरूरत थी? राज्य में चली खुली बहस में बंग, बंगाल, बंगभूमि, सोनार बांग्ला, बंग प्रदेश जैसे कई नाम सुझाये गये.

पिछले दिनों दिल्ली के एक कद्दावर नेता के सालिड चमचे महाराज बड़ी सीरियसली दिल्ली सरकार के अगले मंत्री मंडल की रूप रेखा समझाते मिले। नये मंत्री मंडल में कौन-कौन मंत्री होगा, क्या-क्या समीकरण बैठाये जायेंगे और न जाने क्या-क्या होगा। अचानक मुझे अपने बीच पाकर खिसियानी हंसी-हंसते हुए बोले, आओ भई पण्डित जी, अब तो मान जाओ कि शीला दीक्षित जा रही हैं, अब तो शुंगलू के बाद कैग रिपोर्ट में भी खुलासा हो गया। मंत्री जी ने भी कह दिया कि किसी को भी बख्शा नहीं जायेगा। टी.वी. चैनल आई.बी.एन-7 ने तो काफी विस्तार से खबर प्रसारित कर दी है, आपकी नजर में अगला मुख्यमंत्री कौन होगा।

बुद्धिजीवी समुदाय से हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि वह समाज को दिशा देगा। एक बेहतर, मानवीय और लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में उसकी कारगर भूमिका होगी। लेकिन इस समुदाय के एक हिस्से द्वारा ऐसे तर्क और विचार दिये जा रहे हैं,  जिससे यही बात सामने आ रही है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम द्वारा संचालित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तथा जनलोकपाल की मांग बेबुनियाद, गलत तथा संविधान विरुद्ध है। अन्ना के आंदोलन का विरोध ऐसे किया जा रहा है जैसे यह कोई अपराधजन्य कार्रवाई है तथा इसके द्वारा संसद, संविधान, कानून के हमारे भव्य व सर्वोच्च 'लोकतांत्रिक' मन्दिर को ढहा देने की साजिश रची जा रही है।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी को क्या बीमारी है?  सवाल अहम है। इसलिए क्यों कि वह कांग्रेस नीत गठबंधन की अध्यक्ष है। साथ ही अहम यह भी है कि वह सात समंदर पार ज़ेरे इलाज क्यों है?  दुनिया में दूसरी आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा मेरा भारत महान ऐशिया का मेडिकल हब भी है, फिर सोनिया जी को अमेरिका में इलाज की जरूरत क्यों महसूस हुई? कांग्रेस का तर्क है कि देश को लोगों को अपने इलाज में दुविधा न हो इसलिए सोनिया जी सात समंदर पार यानी अमेरिका में ज़ेरे इलाज है। क्या आम आदमी के गले कांग्रेस का यह तर्क आसानी से उतर जाएगा? इसमें संशय है। सोनिया जी विदेशी मूल की है। मुद्दा खत्म हुए अर्सा हो गया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है कि वे बहुत दुखी हैं क्योंकि लोग उनकी सरकार को देश की अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार कह रहे हैं। मनमोहन जी धन्यवाद और आभार। यह खुशी और राहत की बात है कि हमारे देश के मुखिया (अन्ना की भाषा में पंत प्रधान) की संवेदना मरी नहीं, उसे भी दुख और ग्लानि सताती है। यह बातें सुकून देती हैं कि हमारे प्रधानमंत्री को देश, अपनी सरकार की चिंता है। इससे यह तो लगता ही है कि आज नहीं तो कल वे दलों के दलदल और कानूनी पेंचीदगियों से आगे उठ कर अपने दिल और दिमाग की सुनेंगे। गहराई से सोचेंगे कि अन्ना की मांगे वाजिब हैं। दरअसल ये बातें तो खुद उनके विधेयक में आनी चाहिए थीं, ऐसा होता तो न अन्ना को इसके लिए लड़ना पड़ता और न ही सिंह साहब को आज आत्मग्लानि झेलनी पड़ती।

वर्तमान दूषित राजनीतिक वातावरण के लिए अधिकांश लोग राजनेताओं को ही जिम्मेवार मानते हैं, जबकि ऐसा सोचने वालों के साथ आम आदमी भी कम जिम्मेवार नहीं है और अगर कोई पूरी तरह जिम्मेवार है ही, तो वह वास्तव में प्रबुद्ध वर्ग है। ऐसे में सोचने की बात यह है कि राजनीतिक वातावरण स्वच्छ बनाने के लिए शुरुआत कहां से की जाये? समाज के प्रबुद्ध वर्ग का यह दायित्व है कि वह आम आदमी को लोकतंत्र के प्रति जागरूक करे और उसे राजनीतिक भागीदारी के लाभ बतायें। आम आदमी की समझ में अगर अपने वोट की कीमत आ जायेगी, तो वास्तव में सुधार होगा और वह सुधार ही वास्तविक सुधार होगा। कोई कानून या कानून के तहत बने आयोग अथवा मंत्रालय, योजनायें या कोई भी कार्यक्रम आम आदमी को नागरिकता का महत्व व दायित्व नहीं समझा सकते।

वर्तमान में भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा है। अन्ना के इस आंदोलन का ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो कहा नहीं जा सकता है, लेकिन इस आंदोलन के कई राजनैतिक अर्थ लगाए जा सकते हैं। अन्ना एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। अन्ना ने अपने आंदोलन को किसी भी पार्टी को ध्यान में रखकर शुरू नहीं किया है। यह आंदोलन जितना सत्ताधारी कॉंग्रेस के विरोध में है उतना ही भाजपा और अन्य राजनैतिक दलों के लिए भी है। वास्तव में यह आंदोलन वर्तमान व्यवस्था के विरोध में है।

सुनील यह पहले से ही पता था कि निर्यात की अनुमति देते ही चीनी के दाम बढ़ जाएंगे, बावजूद इसके केन्द्र सरकार ने चीनी निर्यात पर लगी रोक पिछले सप्ताह हटा ली और तत्काल ही खुदरा बाजार में चीनी के दाम में चार रुपया प्रति किलो की वृद्धि हो गयी। व्यापारियों को कालाबाजार सरीखा लाभ पहुँचाने वाले वायदा कारोबार पर भी गत वर्ष तब रोक लगा दी गई थी जब चीनी का दाम 50 रुपये प्रतिकिलो तक पहुँच गया था, लेकिन इधर वह भी खोल दिया गया है। इसके साथ ही पेट्रो पदार्थों की मूल्य वृद्धि ने भी वही काम किया है जिसकी अपेक्षा थी। उधर योजना आयोग के उपाध्यक्ष जनाब मोंटेक सिंह आहलूवालिया हैं,  जिन्होंने गत दिनों देशवासियों को अपना अर्थशास्त्र बताया है कि पेट्रो मूल्यों में वृद्धि से मॅहगाई घटेगी। यहाँ यह जानना दिलचस्प होगा कि स्कूटर-मोटरसायकिल के पेट्रोल के मुकाबले हवाई जहाज का पेट्रोल (यानी एटीएफ.) लगभग 15 रुपया प्रति लीटर सस्ता है।

गिरीशजीअन्ना हजारे-  महात्मा गांधी या जेपी नहीं हैं. लेकिन सच है कि उनके आंदोलन ने देश में ही नहीं, विदेशों में भी लोकतंत्र को लेकर बहस तेज कर दी है. इस माहौल में एक विचारक की ये पंक्तियां ताजी हो गई हैं कि - 'लोकतंत्र एक ऐसा हैट है जिसे हर किसी ने लगाया है. यह हैट अब शेपलेस हो गया है और हालत यह है कि यह हर किसी के सिर में फिट हो जाता है.'  सरकार कह रही है कि संसदीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है. उसे निर्देशित या ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता. देश के सबसे बडे़ कानून संविधान ने उसे यह स्थिति प्रदान की है. उधर, अन्ना के साथ आंदोलित व्यापक तबका भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हुए देश को इस बीमारी से निजात दिलाना चाहता है.