भारत में सर्जिकल स्ट्राईक सबूत की मांग से क्या सेना का मनोबल नहीं गिरेगा?

अपने ही देश के लोग सेना की सर्जिकल स्ट्राईक का सबूत मांग रहे हैं। यह सेना और देश दोनों को शर्मशार करने वाली बात है। किसी पार्टी या नेता विषेष पर आरोप-प्रत्यारोप पुरानी कहानी है लेकिन इस बहाने से देश की सेना पर अविश्वास की नई तस्वीर बनाई जा रही है। इससे सेना का मनोबल तो गिरता ही है साथ में देश की छवि को पाकिस्तान में जमकर उछाला जा रहा है। हाल ही के एक वीडियो संदेश में अरविन्द केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ करते हुये जो सर्जिकल स्ट्राईक के सबूत देकर पाकिस्तान को चुप करने की सामान्य सी बात कही वह असल में इतनी गंभीर साबित हुई कि पाकिस्तान में अरविन्द हीरो बनकर ऑनएयर हो रहे हैं। उनके बाद सरकार से सर्जिकल स्ट्राईक का सबूत मांगने के लिये कई कांग्रेसी नेताओं सहित कथित बुद्धिजीवियों की कतार बढ़ती जा रही है। इससे पाकिस्तान को जबरदस्त  कूटनीतिक लाभ पहुंच रहा है। वहॉं का मीडिया भारतीय नेताओं के इन बयानों के हवाले से भारतीय सैन्य कार्यवाही की हवा निकालने में लगा है। हाल ही में उसने विदेशी मीडिया को उस क्षेत्र का दौरा करा कर भारत के दावे को झूठा साबित करने की कोशिश की थी जहॉं भारतीय सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राईक अंजाम दी गई।

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त करते हैं और परिवार की जवाबदारी उठाने के लिए वकालत की पढ़ाई करते हैं लेकिन कब और कैसे वे इस नाम से परे होकर महात्मा बन जाते हैं और उनका परिवार पीछे छूट जाता है और पूरे भारत वर्ष के लिए वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से पुकारे जाते हैं. एक व्यक्ति से महात्मा हो जाना और हो जाने के बाद लोगों के दिलों में बसे रहना, उनके कहे अनुरूप जीवन जीना और दूसरों को सिखाना कि बापू कैसे सादगी भरा जीवन जीते थे,संभवत: इनके बाद शायद ही कोई दूसरा होगा. गांधी विश्व पुरुष हैं। स्वाधीनता, स्वदेशी, स्वराष्ट्र, स्वतंत्रता और समता, अहिंसा, सत्याग्रह और स्वच्छता सहित सारे मूल्य गांधीजी के लिए शब्द भर नहीं थे। उन्होंने सभी मूल्यों को सत्याग्रह की अग्नि आंच में तपाया था।

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में चुनावी रणभेरी बज चुकी है। कौन होगा यूपी का अगला सीएम। यह जिज्ञासा चौतरफा देखी जा सकती है। सबके अपने-अपने दावे हैं, लेकिन इतिहास के पन्नोें में जो सिमटा हुआ है उसके आधार पर कहा जाये तो अखिलेश यादव के दोबारा सीएम बनने की उम्मीद न के बराबर है। इतिहास तो यही बताता है कि यूपी की जनता ने किसी को भी लगातार दो बार सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठाया है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि अगर अखिलेश नहीं तो कौन? क्या बसपा की फिर से सरकार बनेगी ? या कांग्रेस के सितारे चमकेंगे अथवा पीएम और बीजेपी के बड़े नेता नरेन्द्र मोदी का जादू यूपी में भी चलेगा। सियासी की बिसात पर सभी प्रमुख दल अपना वोट बैंक मजबूत और विरोधियो के वोट बैंक में बिखराव होता देखना चाहते हैं। नेताओं की इसी चाहत ने यूपी को एक बार फिर जातिवादी राजनीति के दलदल में ढकेल दिया है। मगर अबकी से मुसलमानों को लेकर यूपी की सियासत का रूख कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। बसपा हो या समाजवादी पार्टी अथवा कांग्रेस सभी दल अबकी से मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने के चक्कर में ज्यादा उतावलापन नहीं दिखा रहे हैं। शायद इन दलों के रणनीतिकारों के दिलो-दिमाग मंे 2014 के लोकसभा चुनाव वाला मंजर निकल नहीं रहा होगा। इस लिये अबकी से कोई गलती न दोहराते हुए यह दल मुस्लिम सियासत के चक्कर में फंस कर हिन्दू वोट बैंक को लामबंद होते नहीं देखना चाहते  है। इसी वजह से प्रदेश में अल्पसंख्यकों को लेकर की जाने वाली सियासत का चेहरा अब बदलने लगी है।

किसी समय समाजवादी पार्टी में पूरी तरह से दखल रखने वाले राज्यसभा सदस्य अमर सिंह की दूसरी पारी में नहीं चल पा रही है तो वह कुछ न कुछ तो जरूर करेंगे। कैसे पार्टी में उनका हस्तक्षेप बढ़े, कैसे वह पुराना रुतबा कायम करें। इसी उधेड़बुन में वह पूरी से लगे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने जहां कभी उनके सबसे ज्यादा मुखर विरोधी रहे शिवपाल सिंह यादव साधा है वहीं नेताजी पर भी पूरी तरह से पकड़ बना ली है। यही वजह रही कि जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनसे फोन पर बात नहीं की तो इस मलाल को लेकर वह मीडिया के सामने आ गए। अखिलेश का 'चाचा से ही बात करता रहूंगा तो काम कब करूंगा' के बयान ने आग में घी डालने का काम किया। हर जगह घुसपैठ रखने वाले अमर सिंह को जब गायत्री प्रजापति पर सीबीआई का शिकंजा कसने की खबर पहुंची तो उन्होंने इस बारे में तत्कालीन मुख्य सचिव दीपक सिंघल से नेताजी को कहलवाया। नेताजी के कहने पर अखिलेश यादव ने गायत्री प्रजापति व किशोर सिंह को मंत्री पद से हटा दिया। क्योंकि गायत्री प्रजापति नेताजी के करीबी थे तो तरह-तरहके कयास लगाए गए। गायत्री प्रजापति के नेताजी के मिलने पर उन्होंने दीपक सिंघल की बात का हवाला दिया।

-डॉ.शशि तिवारी

अरूणाचल प्रदेश में नवाब तुकी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को राज्यपाल द्वारा बर्खास्त कर दिया गया था। 19 फरवरी को असंतुष्ट घड़े के नेता कलिखों पुल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। इनके पास कांग्रेस के 20 असंतुष्ट विधायकों ने 11 भाजपा विधायकों का समर्थन जुटा सरकार बनाई। यूं तो राज्यपाल का संवैधानिक पद है इसलिए उन्हें न केवल राजनीति पार्टियों के समर्थन वालों से न केवल बचना चाहिए बल्कि निष्पक्ष भी दिखना चाहिए। लेकिन राजनीति में राज्यपालों की भूमिका केन्द्र सरकार के एक एजेन्ट के रूप में जा रही है यही कारण है कि केन्द्र की सत्ता बदलने के साथ राज्यपालों को भी बदला जाता है। कुछ राज्यपाल अपनी सीमाओं से बढ़ पार्टी वफादारी सिद्ध करने में भी पीछे नहीं रहते है अरूणाचल वाले प्रकरण में राज्यपाल का व्यवहार संवैधानिक दायित्वों के अनुकूल नहीं कहा जा सकता मसलन विधान सभा का सत्र एक माह पहले ही बुला एक स्थानीय कम्युनिटी हॉल में बिना मुख्यमंत्री एवं विधान सभा अध्यक्ष की सलाह लिए आछूत किया जाना किसी भी दृष्टि से संवैधानिक पद के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।

भूमि अधिकार और स्वाभिमान की लड़ाई इस देश की लड़ाई, यूपी में गूंजा ‘गाय की पूंछ तुम रखो, हमको हमारी जमीन दो’....

लखनऊ । ऊना, गुजरात में गौरक्षकों द्वारा दलितों की पिटाई के बाद ‘गाय की पूंछ तुम रखो, हमको हमारी जमीन दो’ के नारे के साथ पूरे देश में दलित अत्याचारों के खिलाफ आवाज बने जिग्नेश मेवाणी ने यूपी प्रेस क्लब में ऐलान किया कि भूमि अधिकार और स्वाभिमान की लड़ाई इस देश की लड़ाई होगी। गुजरात से आए ऊना दलित अत्याचार लड़त समिति के संयोजक जिग्नेश मेवाणी ने कहा कि पूरे देश में एक संघर्ष का मंच बनाना चाहते हैं जो गुजरात, यूपी ही नहीं पूरे देश में दलितों के लिए जमीन के सवाल पर आंदोलन खड़ा कर सके। जो दलित आंदोलन सिर्फ अस्मिता की राजनीति में फस गया है उसको अपने अस्तित्व बोध के साथ खड़ा होना होगा। उन्होंने ऊना से शुरु हुए आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि जिस तरह से ऊना में जिलाधिकारी कार्यालय पर मृत पशुओं को ले जाकर छोड़ दिया गया उसने साफ किया कि दलित अब पिटेगा नहीं वह अपने अधिकारों के लिए लड़ेगा।

Abhishek Parashar : 2015 में माननीय मुलायम सिंह यादव ने मायावती के चरित्र को लेकर कहा था, 'मैं उसे कुंवारी कहूं, श्रीमती कहूं, या बहन कहूं.' इसके बाद मायावती ने यादव को दिमागी तौर विक्षिप्त करार दिया था. निश्चित तौर पर ऐसा कोई बयान दिमागी तौर पर दिवालिया ही दे सकता था. बात यहीं खत्म नहीं हुई.

मायावती का बयान सपा को रास नहीं आया और फिर शिवपाल सिंह यादव ने एक कदम आगे बढ़ते हुए यह कहा, 'हर कोई बीएसपी नेता कांशीराम और मायावती के रिश्तों के बारे में जानता है. हर कोई उसके चरित्र के बारे में जानता है. कैसे वह यहां तक पहुंची और क्यों कांशीराम ने उसे यह कुर्सी दी.'

Ravish Kumar : शनिवार को भारतीय राजनीति में दो बड़ी दुर्घटना हुई हैं. एक दुर्घटना उत्तर प्रदेश के इटावा में हुई है और दूसरी दिल्ली में हुई. इसे दुर्घटना इसलिए कह रहा हूं कि दो जगहों से दो बड़े नेताओं ने बयान जारी कर अपनी पार्टी और समर्थकों के विशाल हुजूम को अपराधी घोषित कर दिया है. अपने समर्थकों या चुनावी जीत में मदद करने वालों को अपराधी बताने की ऐसी व्यापक दुर्घटना बहुत कम हुई है. कद से तो समाजवादी पार्टी के नेता और कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से छोटे हैं लेकिन उन्होंने जो कहा है वह प्रधानमंत्री के बयान से भी ज़्यादा साहसिक है.

Samar Anarya : BJP will repent for its VP Dayashankar Singh's abuse to Bahan Mayawati much more in UP than it repented Mohan Bhagwat's attack on reservations in Bihar. Period. भाजपा अपने उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह की बहन मायावती को दी गयी गाली पर उत्तर प्रदेश में उतना पछतायेगी जितना वह मोहन भागवत के आरक्षण पर हमले पर भी नहीं पछतायी थी। बस।

युवा हिंदुओं में हिन्दू धर्म के आधारभूत मूल्यों और भावनाओं की पुनर्स्थापना के लिए वर्ष 1952 में आरएसएस के सरसंघ चालक गुरु यमयस गोलवरकर : be readily prepared to sacrifice our all for the honour and glory of the motherland. --- such a point of honour in our national life is none els but MOTHER COW , the living symbol of the Mother Earth - that deserves to be the sole object of devotion and worship.

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में अब चंद माह का समय बचा हैं। यह चंद महीने सभी सियासी दलों के लिये महत्वपूर्ण हैं। समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच पिछले कई विधान सभा चुनावों से बारी-बारी सत्ता का बंदरबांट होता रहा है। किन्तु इस बार 2012 के विधान सभा चुनाव में नंबर तीन रही भाजपा और नंबर चार रही कांग्रेस में भी सत्ता के लिये जर्बदस्त सरगर्मी देखने को मिल रही है। बीजेपी अगर जीत का दावा करती है तो इसके पीछे की वजह 2014 के लोकसभा चुनाव हैं,जिसमें बीजेपी ने सभी विरोधियों को धूल चटा दी थी, मगर यूपी में हाशिये पर पड़ी कांग्रेस की तेजी देखने लायक है।कांग्रेस यूपी में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिये हर हथकंडा अपना रही है। कांग्रेस में आजकल रेवड़ियों की तरह पद बांटने का काम चल रहा है।

संजय सक्सेना, लखनऊ

वाराणसी में सोनिया गांधी का रोड शो सफल रहा, लेकिन रोड शो के दौरान उनकी तबीयत खराब होने से चर्चा रोड शो की जगह सोनिया की बीमारी और मोदी सरकार द्वारा जिस तत्परता से सोनिया को चिकित्सीय सुविधा और दिल्ली लाने तक के लिये सुविधा उपलब्ध कराई गई उस पर खिसक गई। मोदी सरकार के मंत्री तक ने अस्पताल जाकर सोनिया गांधी की कुशलक्षेम पंूछी। ऐसा पहले भी होता रहा है, लेकिन जब मामला सियासतदारों से जुड़ा हो तो हर एंगिल तलाशा जाता है। सभी पहलुओं पर चर्चा होती है। स्थिति यह है कि अब सोनिया के रोड शो से अधिक चर्चा सोनिया की बीमारी के समय मोदी सरकार द्वारा दिखाई गई दरियादिली पर हो रही है। क्रिकेट की भाषा में कहा जाये तो कांग्रेस के चौके पर मोदी ने दरियादिली दिखाकर छक्का जड़ दिया।

कमलेश पांडे, नई दिल्ली

यह अजीब संयोग नहीं तो और क्या है कि जिन भ्रष्टाचार की लहरों को गिन-गिना कर आयकर अधिकारी अरविन्द केजरीवाल पहले समाज सेवा में और फिर देश की राजनीति में आये और अकस्मात् दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण प्रदेश के मुख़्यमंत्री बन गए, उसी भ्रष्टाचार का आईना जब उनको और उनके अपेक्षाकृत 'ईमानदार' समर्थकों को केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अथक प्रयास किये जाने के बाद दिखाया जाने लगा तो अब 'टीम केजरीवाल' या तो अगली-बगली झांक रही है या फिर अनर्गल दलील देती दिखाई दे रही है।

अजय कुमार, लखनऊ

चुनावी बेला में सभी सियासी जमात अपनी ताकत बढ़ाने के लिये हाथ-पैर मार रही हैं। सबके अपने-अपने दावे हैं। कौन बाजी मारेगा ? किसको हार का मुंह देखना पड़ेगा ? कहां किसका किस पार्टी के साथ गठबंधन होगा ? इसको लेकर कयासों का बाजार गर्म है,लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अबकी से यूपी में मुकाबला चौतरफा होगा। पिछले कई चुनावों में मुख्य मुकाबले में रहने वाली सपा-बसपा को इस बार कांग्रेस-भाजपा कड़ी टक्कर देने के लिये मशक्कत कर रहे हैं। कांग्रेस अपने रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) के बल पर ताल ठोंक रही है तो बीजेपी मोदी के सहारे यूपी में अपनी नैया पार लगाना चाहती है। पार्टियां तो सभी ताल ठोंक रही हैं लेकिन इधर कांग्रेस की तेजी ने सबको अचंभित कर दिया है।

जहां चाह वहा राह। अंत में वही हो भी गया। यूपी चुनाव में मायावती की राजनितिक केमिस्ट्री दलित और मुसलमान को खबदित करने के लिए बीजेपी रास्ता तलाश रही थी। बीजेपी को पता था की बिना दलित और मुस्लिम को खंडित किये बिना चुनाव जितना संभव नहीं है। यानि दलितों के वोट बैंक में बीजेपी की भी हिस्सेदारी हो। खोजते खोजते बीजेपी ने अपने बाबा साहब आंबेडकर के ही समकालीन और पकिस्तान के संविधान निर्माता जोगेंद्र नाथ मंडल को निकाल लाई है। मंडल दलित समुदाय से है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की सक्रियता यूपी में लगातार बढ़ रही है. इसकी शुरुआत शराबबंदी को लेकर सम्मान समारोह से हुई. नीतीश का लखनऊ में महिलाओं ने सम्मान किया. ये सिलसिला अब मण्डलों में कार्यकर्ता सम्मेलन के नाम पर जारी है. इस बीच उन्हें जब भी मौका मिल रहा है वे यूपी आने को आतुर दिख रहे हैं. बसपा छोड़ चुके आरके चौधरी के बुलावे पर नीतीश का लखऩऊ आना तो इसी ओर इशारा कर रहा है. लेकिन, लोगों के मन में सवाल ये है कि आखिर नीतीश यदि यूपी में दो चार सीटें जीत भी जायें तो इससे क्या फर्क पड़ेगा. लेकिन, फर्क पड़ेगा....