इतिहास खुद को दोहरा रहा है... ये ना आदि है ना अन्त है..ये चक्र है जो अनन्त है ...ये वक्त है जो चल रहा ..खुद अपनी कहानी कह रहा ..आज से लगभग 25 साल पहले जिस जगह चन्द्रशेखर थे, आज उस जगह मुलायम सिंह यादव हैं। जिस जगह मुलायम सिंह यादव थे आज उस जगह पर अखिलेश यादव है । सियासत में विश्लेषण निर्मम होता है और ये किसी को नहीं बख्शता। मुलायम सिंह यादव सहानुभूति के पात्र हो सकते हैं उम्र के लिहाज से लेकिन आज जो घट रहा है उसके सूत्रधार तो स्वयं मुलायम सिंह यादव ही है। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाय या फिर जैसी करनी वैसी भरनी। अंतर सिर्फ इतना हो गया कि आज सियासत में पुत्र ने ही वो कर दिया जो वो हमेशा करते आए है तो इसमें पुत्र का दोष कैसा? क्या कोई मुलायम सिंह यादव से ये पूछ सकता है कि चन्द्रशेखर की पार्टी समाजवादी जनता पार्टी तोड़ने का सिद्धान्त क्या था ..क्या जिन उद्देश्यों और विचार को लेकर सजपा को मुलायम ने तोड़ा, क्या उनकी प्राप्ति हुई?

देश में यह किस तरह का वातावरण तैयार किया जा रहा है, जिसमें एक व्यक्ति की सत्ता की हनक के आगे सभी नत-मस्तक नजर आ रहे हैं। एक-एक कर सारे प्रशासनिक नीति, नियम, कायदे-कानून, मर्यादाऐं, परंपराऐं पूरी निर्लज्जतापूर्वक ध्वस्त की जा रही हैं और एक आदमी के आगे सभी बेबस व बौने दिखाई दे रहे हैं। देश के प्रशासनिक अमले में सत्ता के शीर्ष पर विराजमान एक व्यक्ति का खौफ गहराता जा रहा है। यदि ऐसा नहीं है तो फिर क्यों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वर्ष 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास करने सम्बंधी रजिस्टर को सार्वजनिक करने का आदेश देने वाले सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु की भूमिका बदल दी गई? मुख्य सूचना आयुक्त आरके.

भले ही प्रियंका को आगे लाने में कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने अहम भूमिका निभाई हो, लेकिन चर्चा यह भी चल रही है कि कांग्रेस अपने रणनीतिकार प्रशांत किशोर से छुटकारा पाने की कोशिश कर रही है। गत दिनों दिल्ली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ यूपी कांग्रेस के नेताओं की एक अहम बैठक में पीके के मसले पर खुलकर चर्चा हुई तो इस अहम रणनीतिक बैठक में पीके की नामौजूदगी ने कई सवाल खड़े किये। इसी बैठक के बाद पीके और कांग्रेस के रास्ते अलग होने की चर्चाएं तेज हो गईं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस के तमाम नेता पिछले कुछ अर्से से प्रशांत किशोर के कामकाज के तरीके से नाखुश हैं। वैसे, मामला एक तरफा भी नहीं है।  पीके के करीबियों की तरफ से भी उनके कांग्रेस से अलगाव की खबरें आ रही हैं।

राजेश ज्वेल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस नेकनियती के साथ महीनेभर पहले नोटबंदी लागू की थी उसका फायदा फिलहाल तो मिलता नजर नहीं आ रहा है... आम आदमी को अपना सफेद धन पाने के लिए जहां अभी भी कतार में खड़े होना पड़ रहा है, वहीं काले कुबेरों ने भ्रष्ट बैंक मैनेजरों के साथ सांठगांठ करने के अलावा सोने, प्रॉपर्टी से लेकर चालू, बचत और जन धन खातों सहित अन्य तरीकों से कालाधन ठिकाने लगाने में काफी हद तक सफलता पा ली है। 80 प्रतिशत से ज्यादा बंद हुए 500 और 1000 के नोट बैंकों में जमा हो चुके हैं। साढ़े 14 लाख मूल्य के नोट बंद किए गए थे और अभी तक 12 लाख करोड़ से ज्यादा बैंकों में आ चुके हैं।  शेष बचे 21 दिनों में 1 लाख करोड़ से अधिक की राशि और जमा हो जाएगी।

अक्टूबर 2013 और नवम्बर 2014 में क्रमशः सहारा और आदित्य बिड़ला के ठिकानों पर इनकम टैक्स के छापे पड़े थे। यहां से आयकर अधिकारियों को दो महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले थे । जिनमें सरकारी पदों पर बैठे कई लोगों को पैसे देने का जिक्र था। इसमें प्रधानमंत्री मोदी का नाम भी शामिल था। बिड़ला के यहां से जब्त दस्तावेज में सीएम गुजरात के नाम के आगे 25 करोड़ रुपये लिखा था। इसमें 12 करोड़ दे दिया गया था। बाकी पैसे देने थे। इसी तरह से सहारा के ठिकानों से हासिल दस्तावेजों में लेनदारों की फेहरिस्त लम्बी थी । जिसमें सीएम एमपी, सीएम छत्तीसगढ़, सीएम दिल्ली और बीजेपी नेता सायना एनसी के अलावा मोदी जी का भी नाम शामिल था।

आज से 30 दिन पूर्व ,आठ नवम्बर की रात बारह बजे से उठी नोटबंदी की सुनामी का कहर पूर्ववत जारी है.किन्तु इससे जिस तरह विपक्ष में मोदी सरकार से मुक्ति चाह पैदा हुई है,उससे उनके तुगलकी फैसले से त्रस्त कुछ लोग भारी राहत महसूस कर रहे हैं.ऐसे लोगों में बहुतायता बहुजन छात्र और बुद्धिजीवियों की है जो रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद से ही मोदी राज के खात्मे की कामना करने लगे थे.ऐसे में जब राहुल गाँधी और मायावती के साथ खास तौर से लाल दुर्ग ध्वस्त करने जैसा कठिन कार्य अंजाम देने वाली ममता बनर्जी और काले धन तथा भ्रष्टाचार-विरोधी जनांदोलन की जठर से निकले केजरीवाल ने नोटबंदी के मुद्दे पर जनांदोलन खड़ा करने का एलान किया,उनमें मोदी राज से मुक्ति की चाह हिलोरे मारने लगी.नोटबंदी को ‘ब्लैक इमरजेंसी’ करार देते हुए इसके खिलाफ अभियान को ‘आजादी की लड़ाई’ का नाम देने वालीं ममता बनर्जी ने कह दिया है कि जीऊँ या मरूं पीएम मोदी को भारतीय राजनीति से हटा कर रहूंगी.

साथियों!

पिछले 8 नवम्बर की रात से देश भर में अफरा-तफरी का आलम है। बैंकों के बाहर सुबह से रात तक लम्बी-लम्बी कतारें लगीं हैं,  सारे काम छोडकर लोग अपनी ही मेहनत और बचत के पैसे पाने के लिए धक्के खा रहे हैं। अस्पतालों में मरीजों का इलाज नहीं हो  पा रहा, बाज़ार बन्द पड़े हैं, कामगारों को मज़दूरी नहीं मिल पा रही है, आम लोग रोज़मर्रा की मामूली ज़रूरतें तक पूरी नहीं कर पा रहे हैं। देश में कई जगह सदमे से लोगों की मौत तक हो जाने की ख़बरें आयीं हैं। दिलचस्प बात यह है कि देश के बड़े पूँजीपतियों, व्यापारियों, अफसरशाहों-नेताशाहों, फिल्मी अभिनेताओं में काले धन पर इस तथाकथित “सर्जिकल स्ट्राइक” से कोई बेचैनी या खलबली नहीं दिखायी दे रही है। जिनके पास काला धन होने की सबसे ज़्यादा सम्भावना है उनमे से कोई बैंकों की कतारों में धक्के खाता नहीं दिख रहा है। उल्टे वे सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं। आखिर माज़रा क्या है?

लोकसभा ठप है। चल नहीं रही है। हंगामा हो रहा है। सरकार सदन चलाना चाहती है। लेकिन विपक्ष अड़ा हुआ है। सरकार के आगे खड़ा हुआ है। जनता के लिए भिड़ा हुआ है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तरीके से चल रहे हैं। कहावतें भले ही सौ दिन में अढाई कोस चलने की हो। लेकिन पंद्रह दिन से ज्यादा वक्त हो गया हैं। सदन कुछ घंटे भी नहीं चला है। देश कतार में खड़ा है। और राहुल गांधी नए अवतार में।

मोदी पर तानाशाह होने के आरोप यों ही नहीं लगते। उन्हें बहुत करीब से जानने वाले तथा उनकी कार्यशैली को समझने वाले जानते हैं कि वे न केवल अपने विरोधियों को बहुत चालाकी से ठिकाने लगाने के उस्ताद हैं, बल्कि वे अलोकतांत्रिक भी हैं और मनमाने फैसले लेकर अपने आगे किसी की नहीं चलने देते चाहे उसकी बात कितनी ही उपयोगी क्यों न हो। मोदी के तानाशाही रवैये के कारण ही सरकार और संगठन में उनका विरोध करने का साहस कोई नहीं करता, बल्कि स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि सभी उनके सामने साष्टांग करते नजर आते हैं। यहाँ तक कि गौ-हत्या, श्रम कानून में संशोधन आदि अनेक मुद्दों पर तो रा.स्व.से. संघ भी उनके समर्थन में उतर आया।

-निरंजन परिहार-

मुंबई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले ने देश में और भले ही कुछ किया हो या नहीं, लेकिन कांग्रेस को सबसे सक्रिय पार्टी की शक्ल जरूर बख्श दी है। संसद चल नही पा रही है। इससे राहुल गांधी की राजनीति को लगातार चमकने का मौका मिल गया है। राज्यों में भी कांग्रेस जमकर प्रदर्शन कर रही है और जिलों तक में कांग्रेस संगठन सक्रिय हो रहे हैं। देश देख ही रहा है कि 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ और हजार के नोट बंद करने का ऐलान किया, उस दिन से आज एक महीने तक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सबसे ज्यादा सक्रिय दिखे हैं। संसद में विपक्षी पार्टियों के विरोध का नेतृत्व भी राहुल गांधी ही कर रहे हैं। उन्ही की पहल पर सभी विरोधी सांसदों ने प्रदर्शन किया।

अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में अपना ’झंडा’ ऊंचा करने के लिये मशक्कत कर रहीं बसपा सुप्रीमों मायावती के समाने थ्री (तीन) एम फैक्टर (मोदी, महागठबंधन और मुलसलमान ) चुनौती बनकर खड़े हैं। वह पल-पल बदलती यूपी की सियासत तस्वीर ने हैरान-परेशान कर रखा है। एक पल उन्हें सत्ता बेहद करीब नजर आती है तो दूसरे ही पल उन्हें सत्ता की चाबी दूर नजर आने लगती है। वह विरोधियों के हर कदम पर नजर रखे हैं। सपा-कांग्रेस के अन्य छोटे-छोटे दलों को साथ लेकर महागठबंधन बनाये जाने की सुगबुगाहट से बसपा सुप्रीमों परेशान हैं तो सपा में चल रहे सिरफुटव्वल में उन्हें अपनी सियासी रोटियां सेंकने में मजा भी आ रहा है। बेहद सलीके के साथ बीएसपी सुप्रीमों अपने ‘सियासी मोहरे’ आगे बढ़ा रही हैं। संभावित महागठबंधन  की खबरों,मुस्लिम वोटरों के साथ-साथ माया प्रबल प्रतिद्वंदी भाजपा की भी हर ‘चाल’ पर  चौकन्नी हैं। वह मोदी और उनकी सरकार पर  मुसलमानों-दलितों के उत्पीड़नं को लेकर लगातार हमला बोल ही रही हैं तो सपा से मुसलमानों को एलर्ट कर रही हैं।

मुंबई। जयललिता के जाने के तत्काल बाद ही राजनीति ने अपना खेल शुरू कर दिया है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों तमिलनाड़ु की तस्वीर में अपनी शक्ल फिट करने के सपने देखने लगी हैं। वजह यही है कि जयललिता जैसी करिश्माई नेता के स्वर्ग सिधारने के बाद उनकी पार्टी एआईएडीएमके को राष्ट्रीय राजनीति में कोई तो साथी चाहिए ही। सो, दक्षिण भारत की राजनीति मे अपना अस्तित्व खो चुकी कांग्रेस भी अपने लिए संभावना के सपने देखने लगी है और भाजपा को भी लग रहा है कि वह अपने पुराने साथियों के माध्यम से तमिलनाड़ु में अपना असर बना लेगी। जयललिता के अंतिम दर्शन करने चेन्नई पहुंचे राहुल गांधी के मुकाबले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गले लगकर मुख्यमंत्री पनीर सेल्वम का धार धार रोना नई राजनीतिक संभावनाओं के उभरने का संकेत भी था। उससे पहले जयललिता की सखी और एआईएडीएमके की सबसे मजबूत नेता शशिकला को मोदी की सांत्वना के संकेतों को समझनेवाले जानते हैं कि कांग्रेस चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, लेकिन एआईएडीएमके का रास्ता अब किधर जाएगा।

-निरंजन परिहार-

आप जब ये पंक्तियां पढ़ रहे होंगे, तब तक संभव है नवजोत सिंह सिद्धू को नया राजनीतिक ठिकाना मिल गया होगा। लेकिन सियासत के चक्रव्यूह में सिद्धू की सांसे फूली हुई दिख रही हैं। पहली बार वे बहुत परेशान हैं। जिस पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया, और जिसे वे मां कहते रहे हैं, उस बीजेपी से वे अलग हो चुके हैं। कांग्रेस में भाव नहीं मिल रहा है और केजरीवाल की पार्टी सौदेबाजी स्वीकारने को तैयार नहीं लगती। गुरू के साथ राजनीति के मैदान में कोई गेम हो गया लगता है...!

संजय सक्सेना, लखनऊ 
उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में अन्य मुद्दों के अलावा पाकिस्तान के खिलाफ की गई मोदी सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी का फैसला भी अहम भूमिका निभा सकता है। यह वो ‘आग’ है जिसमें सभी राजनेता अपनी ‘ सियासी रोटियां’ सेंकना चाहते हैं, लेकिन सबको चिंता इस बात की भी है कि इस आग मंें कहीं उनकी ‘रोटियां’ जल न जाये। अजब इतिफाक है कि जहां भाजपा को लगता है कि नोटबंदी यूपी में उनकी चुनाव नैया पार लगा देगी, वहीं विपक्ष को लगता है कि नोटबंदी बीजेपी के लिये गले की फांस बन सकता है। हो सकता है कि नोटबंदी के कारण जनता को जो परेशानी हो रही है,वह कुछ दिनों में दूर हो जाये, मगर नोटबंदी से हुई परेशानी जनता के जहन से दूर हो जाये यह बात विपक्ष कभी होने नहीं देना चाहता है। इस बात का अहसास बीजेपी और पीएम मोदी को भी है, इसीलिये वह भी काले धन और सर्जिकल स्ट्राइक के बहाने विरोधियों पर तंज कसकर ‘आग में घी डालने’ का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।

जिस किस्म का राष्ट्रवाद आया है भाजपा राज में, यही राष्ट्रवाद पाकिस्तान में दशकों से है

Shayak Alok : यह जिस किस्म का राष्ट्रवाद आया है भाजपा राज में, यही राष्ट्रवाद पाकिस्तान में दशकों से है. कोई कुछ नहीं पूछता और इंशाल्लाह माशाल्लाह करते रहते हैं. हसन निसार, नज्म सेठी, हुडबोय, रउफ क्लसरा, मोईद युसूफ टाइप लोग सेन्स बक देते हैं तो सोशल मीडिया पर गालियों के शिकार होते हैं. एक एक पाकिस्तानी इस पर यकीन रखता है कि भारत से सब युद्ध पाकिस्तान ने जीते. वे सेना को भारी पवित्र मानते हैं.

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में जब भी किसी चुनाव का आगाज होता है, उस समय कांग्रेस मंे प्रियंका गांधी वाड्रा के नाम का जाप शुरू हो जाता है। यह सिलसिला 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार जारी है। 2009 मतलब वो साल जब लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का परचम फहराने के लिये उसके उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ‘वन मैन आर्मी’ की तरह पूरे प्रदेश को ‘नाप’ डाला था। उनकी बड़ी-बड़ी जनसभाएं हुईं थी। इसमें भीड़ भी जुट रही थी।  कांग्रेसियों को लगने लगा था कि यूपी में 20 वर्षो का ‘सूखा’ राहुल खत्म कर देंगे। केन्द्र में मनमोहन की यूपीए सरकार पदारूढ़ थी। इस वजह से कांग्रेस के पास संसाधनों और धनबल की कोई कमी नहीं थी।