-निरंजन परिहार-
कांग्रेस की हालत खराब होती जा रही है। लगातार होती हार पर हार राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। यूपी में कांग्रेस की हाल ही में हुई हालत में राहुल गांधी की जिम्मेदारी क्यों तय नहीं होनी चाहिए। सवाल यह है कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस अब कैसे फिर से पैरों पर खड़ी होगी।  

कांग्रेस के लिए यह विश्लेषण का दौर है। लेकिन कितनी बार, किस किस तरीके से, किसी किस के केंद्र में रखकर आखिर किस दह तक कितने विश्लेषण और किए जाने चाहिए। यह भी तय करना होगा। राहुल गांधी अगर दमदार हैं, तो चुनाव दर चुनाव कांग्रेस का दम क्यों निकलता जा रहा है। वैसे, कांग्रेसियों को तो समझ में आ गया है कि राहुल गांधी में दम नहीं है। लेकिन कांग्रेस को कब समझ में आएगा, यह अब तक साफ नहीं है। हालांकि, यूपी में कांग्रेस के बुरी तरह से साफ हो जाने के बाद यह पूरी तरह से साफ हो गया है कि अगले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के भरोसे कांग्रेस का अब फिर से पैरों पर खड़े होना लगभग असंभव है। कांग्रेस की नैया के खिवैया के रूप में राहुल गांधी सिर्फ बंसी बजैया ही साबित हो रहे हैं।

विचारधारा पर मंथन की जरूरत... उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलना सपा, बसपा, कांग्रेस व रालोद के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है। इन पार्टियों के लिए आम चुनाव के बाद यह दूसरा बड़ा झटका है। इस जनादेश ने धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाली इन पार्टियों की विचारधारा और संगठन दोनों पर समीक्षा करने के लिए मजबूर कर दिया है। इन चुनाव में सबसे बड़ी परीक्षा समाजवादी पार्टी के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की थी। तो यह माना जाए कि विकास, संगठन और विचारधारा को लेकर पार्टी के मुखिया अपने पिता मुलायम सिंह यादव से बगावत करने वाले अखिलेश यादव को कांग्रेस से गठबंधन करना भारी पड़ गया। ऐसे अखिलेश यादव को गंभीरता के साथ परिवार विवाद के पूरे प्रकरण, संगठन और विचारधारा पर मंथन करने की जरूरत है।

बेबाक बोलने वाले विनय कटियार के बोल कुछ लोगों को कटीली छुरी से चुभते हैं। प्रियंका गांधी पर उनके बयान को मीडिया का एक वर्ग शर्मनाक बता रहा है। कुछ टीवी चैनलों में बढ़ा-चढ़ा कर उनकी बात को ऐसे प्रचारित किया जा रहा हो मानो उन्होंने कहीं कोई बम फोड़ दिया हो। निष्पक्ष विवेचन किया जाए तो विनय कटियार का बयान न तो महिला विरोधी है और न ही प्रियंका गांधी के लिए अपमानजनक...

धीरज सिंह

कांग्रेस को एक बार फिर प्रियंका गांधी की ब्रांडिंग करने का मौका मिल गया। मौका चुनाव का है, लगता है कांग्रेस के कुछ नेता हर चुनाव के समय किसी बंद बक्से में रखी प्रियंका की तस्वीर बाहर निकाल लेते हैं और झाड़-पोंछ कर पोस्टर-बैनर छापने वालों को सौंप देते हैं। इस बार तो सपा नेता भी पीछे नहीं, उनके प्रचार वाहनों में भी प्रियंका नजर आ रही हैं। चुनावों के वक्त खास बन जाने वाली प्रियंका क्या कोई फिल्मी अभिनेत्री हैं, क्या वो कोई मॉडल है या वो बहुत अच्छी वक्ता है? सच कहा जाए तो वह इनमें से कुछ भी नहीं है  फिर भी हर चुनाव में कांग्रेस के नेता उन्हें याद करने लगते हैं और चाहते हैं कि प्रियंका पार्टी के लिए ज्यादा से ज्यादा इलाकों में प्रचार करें। तो क्या प्रियंका कोई मंजी हुई राजनीतिज्ञ हैं, अगर लोगों से ये सवाल किया जाए तो लोगों का ईमानदार जवाब होगा- नहीं। उन्होंने तो आज तक कोई चुनाव भी नहीं लड़ा है।

रिलायंस जियो और पेटीएम ने अपने विज्ञापनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने ब्रांड एम्बेस्डर की तरह पेश करने पर अंततः सरकार से माफी मांगकर अपना पल्ला इस प्रकरण से झाड़ दिया है। दोनों कंपनियों द्वारा जिस प्रकार अपने उत्पादों व सेवाओं के प्रचार-प्रसार के लिए प्रधानमंत्री के चेहरे का प्रयोग किया गया, उस पर राजनीतिक दलों ने काफी हो हल्ला मचाया था और बौद्धिक जगत में भी खासी बहस शुरू हुई थी। खासकर पत्रकारिता और मीडिया शिक्षा से जुड़े मंचों पर यह प्रकरण कई दिनों तक विमर्श का मुद्दा बना रहा। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या दोनों कंपनियों द्वारा केवल माफी मांग लेने से ही इस प्रकरण का पटाक्षेप हो जाएगा। प्रधानमंत्री को अपने ब्रांड एम्बेस्डर की तरह जनता के सामने पेश करके अपना उल्लू सीधा करने वाली इन कंपनियों को क्या इतने सस्ते में छोड़ दिया जाना चाहिए।

आज़मगढ़। कभी नेता जी सुभाष चंद्र बोस के साथ रहे 117 वर्षीय कर्नल निजामुद्दीन को आज तक स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं मिल पाया है। ये वही निजामुद्दीन  है जिनका लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में अपना भाषण शुरू करने से पहले  पैर छूकर आशीर्वाद लिया था. पूर्वी उत्तर प्रदेश के  बहुचर्चित जनपद आज़मगढ़ के मुबारकपुर के पास ढकवा गाँव के रहने वाले है निजामुद्दीन। 117 वर्ष की उम्र भले ही हो गई हो लेकिन आज भी उन्हें नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की यादें ताजा है. उम्र के साथ ही साथ अब शरीर भी साथ नहीं देता।लगभग एक दर्जन भाषाओँ के जानकर निजामुद्दीन के पिता इमाम अली सिंगापुर में व्यापारी थे. २४ वर्ष की उम्र में निजामुद्दीन अपने गाँव से सिंगापुर चले गए.

-निरंजन परिहार-

क्या यूपी में नरेंद्र मोदी ने खुद आगे बढ़कर चुनाव लड़ा, वैसे अगर कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी इज्जत दांव पर लगाकर नहीं लड़ते, तो क्या पंजाब में कांग्रेस जीत पाती ? अगर पंजाब में भी राहुल गांधी और प्रशांत किशोर को खुली छूट मिल जाती, तो क्या इतना बहुमत मिल पाता ?  

जो लोग यह मान रहे हैं कि पंजाब में कांग्रेस की जीत हुई है, वे जरा अपना राजनीतिक ज्ञान सुधार लें। और वे भी, जो यह मान रहे हैं कि राहुल गांधी के युवा नेतृत्व की वजह से पंजाब का युवा कांग्रेस से जुड़ गया। दरअसल, पंजाब के पूरे चुनाव में न तो कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के परंपरागत ढांचे के मुताबिक चुनाव लड़ा और न ही वे राहुल गांधी की मेहरबानियों के मोहताज रहे। दिखने में भले ही यह कांग्रेस की जीत है, और कैप्टन भी इसे पंजाब की जनता की जीत बताकर धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं।

राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर विशेष :  आज राष्ट्रीय मतदाता दिवस है। आने वाले महीनों में चुनाव होने हैं। हमें अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार लेकिन मजबरी नहीं है कि गुंडों-बदमाशों, लुच्चो-लफंगो, दलबदलुओं-अवसरवादियों व धनपशुओं मे से हम किसी को चुने ही। ज्यादातर पार्टियों ने इन्हीं में से अपना प्रत्याशी बनाया है। लगभग सभी बड़ी दलों ने नेता पुत्र, नेता-पुत्री, नेता के भाई-भतीजों को टिकट दिया है तो कुछ पार्टियों ने नेता की सखी को टिकट दिया है। अब इन पार्टियों की मजबूरी हो सकती है पर हमारी मजबूरी है क्या?

-एच.एल.दुसाध-
उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव शेष दो चरणों की ओर अग्रसर है.यह चुनाव लगभग पूरी तरह मुद्दाविहीन है.विगत कई चुनावों की भांति इसमें भी शक्ति के स्रोतों के विभिन्न सामाजिक समूह और उनकी महिलाओं में बंटवारे के बजाय शुरू में भीखनुमा घोषनाओं के साथ बिजली-सड़क-पानी पर निर्भर विषमतावादी विकास का मुद्दा हावी रहा.पर,बाद में इन मुद्दों के जरिये सत्ता में आने के प्रति आश्वस्त न होकर पार्टियों के मध्य बदजुबानी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया ,जो अबतक बरक़रार है.बहरहाल प्रत्यक्ष में यूपी में चुनाव भले ही मुद्दाविहीन हों ,लेकिन चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बहुत पहले से ही इसमें एक ऐसा अघोषित मुद्दा क्रियाशील है ,जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई है,और वह है भाजपा को रोकना .पूरे देश के धर्मनिरपेक्ष और सच्चे राष्ट्र-प्रेमियों की एक ही चाह है कि यहां के लोग किसी तरह भाजपा को रोकें .ऐसा इसलिए कि उन्हें लगता है अगर भाजपा यूपी में जीत गयी तो देश की एकता-अखंडता के साथ जन्मजात वंचितों  के समक्ष बड़ा संकट खड़ा हो जायेगा.

बृजेश सती/देहरादून
उत्तराखंड के लिए यह चौथा विधानसभा चुनाव बेहद अहम होने जा रहा है। यह इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि चुनाव नतीजे आने के बाद कई सूरमाओं के राजनीतिक भविष्य पर भी संकट गहरा सकता है। इसमें भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस दोनों दलों से जुडे कद्दावर नेताओं के नाम शामिल हैं। टिकट वितरण के बाद जो राजनीतिक परिदृश्य उभर रहा है उससे यह बात बिल्कुल साफ है कि दोनों दलों के हाईकमान के पास उम्मीदवारों के चयन में विकल्प सीमित थे। टिकट बंटबारे में उभय पक्षों में एक समानता यह देखने को मिली कि आलाकमान ने भारी भरकम चेहरों को मैदान में उतारने में कोई हिचक नहीं दिखाई। मुख्यमंत्री जहां अंतिम समय तक पत्ते खोलने को तैयार नहीं थे तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की चुनाव न लडने की ईच्छा के विपरीत चुनावी दंगल में उतरने को मजबूर होना पड़ा।

बीजेपी महाराष्ट्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी। कड़ी मेहनत, समर्पण और जमीन पर काम करने की वजह से पार्टी अब शहरी और ग्रामीण महाराष्ट्र में मजबूत शक्ति बन गई है। लोगों ने भाजपा के विकास और अच्छी गवर्नेंस पर भरोसा जताया है। यह 2017 की शानदार शुरुआत है। पार्टी ने ऐसे क्षेत्रों में भी जीत हासिल की है जहां अतीत में वो कभी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पायी थी। पहले ओडिशा में अभूतपूर्व समर्थन और अब महाराष्ट्र के लोगों की असीम शुभकामनाएं। मैं हर एक भारतीय को भाजपा में लगातार विश्वास जताने के लिए धन्यवाद देता हूं। हम पूरी लगन से एक मजबूत और समृद्ध भारत बनाने के लिए काम कर रहे हैं। मैं महाराष्ट्र बीजेपी की पूरी टीम, सीएम देवेंद्र फणनवीस और राव साहब पाटिल (राज्य प्रमुख भाजपा) को लोगों के बीच अथक काम करने के लिए बधाई देता हूं। यह बाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र के वोटर्स का शुक्रिया अदा करते हुए अपने ट्वीट में लिखी है।

Prabhat Dabral : आपने कई बार अफसरों की अंध- स्वामिभक्ति के कारण सरकारों को शर्मिंदा होते हुए देखा होगा. केंद्रीय सूचना आयोग में काबिज़ रिटायर्ड सरकारी अफसर प्रधान मंत्री और कपड़ा मंत्री (स्मृति ईरानी) की डिग्रियों के मामले में ऐसा ही कुछ कर रहे हैं जिससे लगने लगा है कि डिग्रियों के मामले में दाल में कुछ काला ज़रूर है. पूरा किस्सा सुनिये, ध्यान से पढ़ेंगे तो आने वाले समय में जब ये विवाद और बढ़ेगा, तो समझने में आसानी होगी.

प्रिय मोदी जी,

बीजेपी के नेता शायद इतिहास में कमज़ोर हैं। साल 1950 के बाद देश की राजनीति में तमाम लोगों ने अपना वर्चस्व बनाने की कोशिश की। कुछ ने तो तानाशाही भी की जबकि कुछ ने तो हत्या तक करवाई और कुछ लोगों का ख़ुलासा सीधे मीडिया के सामने हुआ। बीजेपी के नेता भूल गए कि कैसे 1987 तक सबकुछ ठीक था और बाद में राजीव गांधी 1989 में सत्ता से बाहर चले गए। 1999 में अटल जी भी ख़ूब चमके थे लेकिन ख़ुलासे के बाद सत्ता के बाहर नज़र आए थे। 1963 में पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार प्रताप सिंह कैरो के खिलाफ कांग्रेसी नेता प्रबोध चंद्र ने आरोप पत्र पेश किया था। आपको तो याद होगा?

आचार्य संजय प्रसाद द्विवेदी सिर्फ पंद्रह साल की बाली उमर में बनारस के एक मंदिर के पुजारी बन गए थे। बाद में तो खैर, उन्होंने अपनी पूजन प्रतिभा के बल पर बिडला ग्रुप के मंदिरों के मुख्य पुजारी का पद भी प्राप्त कर लिया था और हिंदुत्व में अपनी आखरी सांस लेने तक वे ऑल इंडिया ब्राह्मण असोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। मगर, आचार्य संजय द्विवेदी अब अहमद पंडित हैं। मौलवी बन गए हैं और देश भर में घूम घूम कर वेदों की पवित्र  ऋचाओं और उपनिषद की धाराओं की खिल्ली उडाते हुए अपने कट्टरतापूर्ण प्रतिवेदनों में हिंदुत्व पर प्रहार करके लोगों को इस्लाम स्वीकारने की प्रेरणा देते हैं। परंतु उनके नाम के साथ पंडित अब भी जुड़ा हुआ है। बनारस में संजय प्रसाद एक दिन शाम के कर्मकांड और पूजा पाठ करने के बाद रात को सोए थे, तो और सोते सोते ही अचानक उनका हृदय परिवर्तन हो गया। वे सुबह उठे, और मुसलमान बन गए।

दोस्तों, अगर आपके पास कोई नेता वोट मांगने आये तो आप उससे ये तीन सवाल पूछ डालिये...

1- आप जो जनता को कैशलेश और पेटीएम तथा ऑनलाइन पेमेंट की बात समझाते हो तो ऐसा सविंधान क्यों नहीं बनाते कि देश की सभी पार्टियां ऑनलाइन और पेटीएम से ही चंदे की रकम स्वीकार करें। ये सारे नियम सिर्फ जनता ही क्यों पालन करे।राजनीतिक पार्टियां क्यों नहीं।

An RTI information by Ministry of Home Affairs has revealed that Government of India is framing policy about Public Interest Litigations being filed by All India Service and other government servants. In a PIL filed by IPS officer Amitabh Thakur, Lucknow bench of Allahabad High Court had directed the Central and UP Government on 09 April 2014 to formulate policy as regards government servants filing PILs. Among the major charges made against Amitabh, when he was suspended on 13 July 2015 after Mulayam Singh threat episode, was filing of PILs.

निरंजन परिहार

सोमनाहल्ली मल्लैया कृष्णा को आप नहीं जानते। लेकिन का इस नाम को थोड़ा आसान करके एसएम कृष्णा लिखा जाए, तो यह वही आदमी हैं, जो सरदार मनमोहन सिंह की सरकार में भारत का विदेश मंत्री हुआ करता था। और जब विदेश जाता था, तो भूल जाता था कि वह किस देश में किस काम से वहां पहुंचा है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्रसंघ जाकर भारत के बजाय पुर्तगाल का भाषण पढ़कर देश की भद्द पिटवाकर वापस भारत आ जाता था। और, क्रिकेट  के खेल में हारकर आनेवाली टीम को काले झंडे दिखानेवाले देशप्रेम जतानेवालों में से कोई उनका विरोध भी नहीं करता था। लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने मंत्रिमंडल में एसएम कृष्णा को मंत्री बनाए रखने को मजबूर थे।