अनीति के नाभिकेंद्र पर जिस बुजुर्ग गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने निशाना लगाया है, उसे यह चुनौती नहीं दी जा सकती कि पहला पत्थर वह मारे जिसने पाप न किया हो- क्योंकि 72 बरस की जिंदगी की चादर अन्ना ने कबीर की तरह इतने जतन से ओढ़ी-बिछाई है कि उसमें कहीं कोई दाग नहीं है। इसीलिए भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अनसुनी की हो मगर दिल्ली के जंतरमंतर पर आमरण अनशन पर बैठते ही देशभर में हजारे के साथ करोड़ों हाथ उठ खड़े हुए हैं। राष्ट्रपिता गांधी ने ही सिखाया है कि आचरण ही सबसे बड़ी चीज होती है, सो हजारे ने सुबह राजघाट पहुंचकर गांधी समाधि पर फूल चढ़ाए और वहां से संकल्प के साथ जंतरमंतर पहुंचकर जनलोकपाल बिल संसद में लाए जाने और उसे लागू किए जाने की मांग पर आमरण अनशन पर बैठ गए।

: अन्‍ना के समर्थन में 8 करोड़ लोगों ने उपवास रखा : प्रख्यात गांधीवादी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और आमरण अनशन से सोनिया मोइनो गांधी सरकार की सांस अटकने लगी है, हाफा–डाफा शुरू हो गया है। सूत्रों के मुताबिक सोनिया मोइनो गांधी व उनके कीर्तनी कनफुकवों (सलाहकारों) को भय होने लगा है कि अन्ना का यह भ्रष्टाचार विरोधी अभियान, सोनिया सरकार हटाओ अभियान बन सकता है। सो अन्ना हजारे, उनके संगठन और “भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत” कार्यालय की हर गतिविधि पर बारीक नजर रखने के लिए खुफिया एजेंसियों को चौकस कर दिया गया है। कुछ सत्ताप्रसादलोभी दोहरे चरित्रवाले पुलिस अफसरो, विवि शिक्षकों, सामाजिक-राजनीति नेताओं को अन्ना का करीबी, उनके इस अभियान व संगठन में पदाधिकारी बनने के लिए लगा दिया गया है। ताकि पल-पल की सूचना मिलती रहे।

गिरीश जी: प. बंगाल, केरल में माकपा की चुनावी गणित के अंतर्द्वंद्व : वैसे तो किसी भी चुनाव से पहले सीटों को लेकर आपसी उखाड़-पछाड़ या फिर सहयोगी पार्टियों से तालमेल में सीटों की संख्या को लेकर विवाद होना आम बात है. विवाद, वार्ता, संतुलन, समन्वय, सहमति-ये सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शुमार हैं. लेकिन मजे का नजारा केरल और पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है और वो भी दर्शन, विचार, जनआकांक्षा और जनसंघर्ष की बात करने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी कि माकपा के अंदरूनी संघर्ष में. एक ओर पश्चिम बंगाल में अब तक मुख्यमंत्री रहे बुद्धदेव भट्टाचार्य की अगुवाई में लेफ्ट सक्रिय हो गया है तो केरल में मुख्यमंत्री रहे वीएस अच्युतानंदन को चुनावी परिदृश्य से हटाने के लिए पिछले कई दिनों से जबरदस्त ड्रामा चलता रहा, लेकिन 87 साल का यह बुजुर्ग मैदान से हटने को तैयार नहीं है.

गोपाल अग्रवालसाझा सरकारों के गठन की बाध्यताओं के राजनीतिक दौर में विरोधाभासी मुद्दों को दर-किनार करना मान्य नीति बना चुकी है, साथ ही आम सहमति के बिन्दुओं तक सीमित राष्ट्रीय एजेन्डे के सिद्धान्त को सभी मोर्चों ने अपनी नियमित कार्य प्रक्रिया बना लिया है। किन्तु, प्रबन्ध विज्ञान के दृष्टिकोण से यह अक्षमता का निम्नतर स्तर होगा और इससे कभी भी अच्छे परिणाम नहीं आ सकते। राजनीतिक प्रबन्ध में समूचे राष्ट्र को एक संस्था मानकर उन‍ नीतियों का निर्धारण किया जाना चाहिए, जिनसे संस्था का प्रत्येक सदस्य लाभान्वित हो। व्यवस्था के नियम ऐसे जो निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को चलाते हुए सभी को अवसरों की समानता प्रदान करें।

केबीजी हां। तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा। कुछ ऐसी ही सोच है, झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का। जोड़–तोड़, सांठ–गांठ, तिकड़मबाजी में महारत हासिल भाजपा के इस नेता ने झारखंड की सत्ता संभालने के बाद अपनी छवि जनता के बीच ठीक जाये इसके लिए, इन्होंने अपने आवास पर 12 मार्च को मीडियाकर्मियों को भोज पर आमंत्रित किया और उनसे गुफ्तगू की। इस गुफ्तगू में रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के गण्यमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया। सभी पहुंचे भी। क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री ने भोज पर आमंत्रित किया था।

: विजन 2020 पत्रिका ने किया खुलासा : उत्तराखण्ड में विधनसभा चुनाव की आधिका‍रिक घोषणा भले ही अब तक नहीं हुई हो, लेकिन कांग्रेस-भाजपा तथा क्षेत्रीय ताकतों की तैयारियां बता रही है कि विधान सभा चुनावों के लिए उन्होंने कसरत शुरू कर दी है। कांग्रेस जहां भाजपा को सत्ता से बेदखल करने को आतुर है तो छोटी ताकतें मुन्ना सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा तथा कांग्रेस को सत्ता के नजदीक भी फटकने नहीं देना चाहती। तीसरे मोर्चे की संभावना दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए नासूर बन सकती है। सत्ता में गुटबाजी को लेकर भले ही कांग्रेस बदनाम है, लेकिन उत्तराखण्ड की सियासत में यह पहला मौका है जब गुटबाजी के मामले में भाजपा ने कांग्रेस को बहुत पीछे छोड़ दिया है। इतना पीछे कि गुटबाजी ने अब बगावत का रूप ले लिया है। हैरत वाली बात यह है कि बगावत की यह गंध पार्टी की प्रथम पंक्ति के नेताओं से लेकर विलेज कैड़र तक है।

अरविंद पुराने जमाने में किसान जब बैल से खेत की जुताई करता था तो कभी-कभी ऐसी भी स्थितियां आ जाती थीं कि बैल खेत की एक भी क्यारी जोतने या आगे बढ़ने से ही इनकार कर देता था। ऐसी परिस्थिति में किसान बैल के हर मर्म को समझता था। वह कोई और उपाय न कर बैल की पूंछ मरोड़ता था और बैल आगे बढ़ने लगता था। ठीक वैसी ही स्थिति कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार की हो गई है, जिसको न्यायालय रूपी किसान को सरकार के कर्तव्यों और यहां तक कि उसके अधिकारों की याद दिलाने के लिए लगातार उसकी पूंछ मरोड़नी पड़ रही है।

गोपाल अग्रवालकरीब दो सौ वर्षो की आर्थिक सोच के बावजूद कोई ऐसा सिद्धान्त प्रतिपादित नहीं हुआ, जिससे हम बेरोजगारी का समाधान निकाल पाते। यह विश्व स्तर पर राजनीतिक दलों की विफलता या राष्ट्रों के निजी स्वार्थ हैं, जहां उपलब्ध मानव संसाधनों के प्रयोग में कोताही बरती जा रही है। यह भी सम्भव है कि जानबूझकर आर्थिक नीति अर्थशास्त्रियों के हाथों से सरका कर चुनिंदा पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली बना दी गई है। पश्चिमी यूरोपियन व अमेरिकन देशों में भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अपने देश में अर्थव्यवस्था के लिए सीआईआई या फिक्की के टॉप बॉस ही निर्णायक होते हैं।

शेषजीबीजेपी में शीर्ष स्तर पर गड़बड़ी के संकेत साफ़ नज़र आने लगे हैं. मुख्य सतर्कता आयुक्त के मसले पर लोक सभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने जो कुछ भी किया उस पर लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्ववास रखने वालों को संतोष ही होगा. सुषमा स्वराज ने सीवीसी की नियुक्ति के मामले में जो भी काम किया है, वह शुरू से अंत तक मर्यादा की मिसाल है. जानकार बताते हैं कि अगर उनका आचरण ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले वक़्त में वे एक स्टेट्समैन राजनेता के रूप में स्थापित हो जाएंगी. संविधान में दी गयी व्यवस्था के तहत लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज उस सलेक्शन कमेटी की सदस्य हैं, जो सीवीसी का चुनाव करती है.

मदनजीबिहार की किस्मत हीं शायद खराब है। वीपी सिंह के मंडल कमिशन के खतरनाक खेल ने बिहार की धरती को टुकडे़–टुकडे़ में बांट दिया। पिछड़ावाद की राजनीति करनेवाले शरद, नीतीश, रंजन यादव जैसों ने लालू को सामने करके जातिगत विभाजन को सैद्धांतिक जामा पहनाया और लालू यादव सता पर काबिज हुए। ऐसा लगा बिहार अब स्वर्ग बन जायेगा, सारी समस्या सिर्फ़ अगडी जातियों की देन थी। आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान ट्रेनों में जाति पूछ-पूछकर लोगों को मारा गया। पटना की कालोनियों में तथाकथित उच्च जाति की महिलाओं के साथ घर में घुसकर बलात्कार किया गया। सामने चेहरा था यादवों का और बुद्धि तथा सलाह थी कु्र्मी-कोयरी की।

संजयजी: माओवादी आतंक से मुक्ति और सार्थक विकास होगी सच्ची श्रद्धांजलि : जिन्होंने बलिराम कश्यप को देखा था, उनकी आवाज की खनक सुनी है और उनकी बेबाकी से दो-चार हुए हैं- वे उन्हें भूल नहीं सकते। भारतीय जनता पार्टी की वह पीढ़ी जिसने जनसंघ से अपनी शुरुआत की और विचार जिनके जीवन में आज भी सबसे बड़ी जगह रखता है, बलिराम जी उन्हीं लोगों में थे। बस्तर के इस सांसद और दिग्गज आदिवासी नेता का जाना, सही मायने में इस क्षेत्र की सबसे प्रखर आवाज का खामोश हो जाना है। अपने जीवन और कर्म से उन्होंने हमेशा बस्तर के लोगों के हित व विकास की चिंता की। भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में उनका एक खास स्थान था।

प्रदीप श्रीवास्‍तवयोग गुरु बाबा रामदेव का कहना है कि सन 2014 के आम चुनाव के पहले ही मध्यावधि चुनाव होने की पूरी संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. यह बात भारत स्वाभिमान यात्रा पर निकले बाबा ने निज़ामाबाद में आयोजित योग शिविर के बाद इन पंक्तियों के लेखक के साथ एक विशेष बातचीत में कही. जब बाबा से यह पूछा गया कि क्या आप अगल चुनाव लड़ने का मान बना रहे हैं? इस पर बाबा रामदेव ने कहा कि मैं स्वयं तो चुनाव नहीं लडूंगा, लेकिन मेरी पार्टी जरुर देश से भ्रष्टाचार मिटने के लिए लडे़गी. बाबा ने यह भी कहा कि बास आप जून तक प्रतीक्षा करें, उसके बाद भारत स्वाभिमान पार्टी के इरादों के बारे में पता चल जायेगा.

पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे माकपा के वरिष्ठ नेता दिवंगत ज्योति बसु को अपना राजनीतिक गुरू मानने वाले लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से काफी चिंतित हैं। उनका कहना है कि आजकल सत्ता में बने रहने और कुर्सी से चिपके रहने के लिए नेता हर वह हथकंड़ा अपना रहे हैं, जो उनके (नेताओं) के लिए फायदेमंद है। आजकल नेता देश नहीं, खुद के बारे में सोचने लगे हैं। कभी जनता सेवा, समाज सेवा और देश सेवा के लिए राजनीति में आने वाले लोग अब निज व परिवार सेवा को महत्व देने लगे हैं। यहीं कारण है कि जनता की नजर में आज नेताओं की वह इज्जत नहीं रह गई है, जो दस-बीस साल पहले होती थी या होनी चाहिए थी। 30 साल से ज्यादा समय तक सांसद और पांच साल तक लोकसभा अध्यक्ष रहे सोमनाथ चटर्जी से शुक्रवार के लिए शंकर जालान ने कोलकाता स्थित उनके निवास पर लंबी बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश।

शेषजीआज से ठीक 34 साल पहले 24 मार्च 1977 के दिन मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. कांग्रेस की स्थापित सत्ता के खिलाफ जनता ने फैसला सुना दिया था. अजीब इत्तेफाक है कि देश के राजनीतिक इतिहास में इतने बड़े परिवर्तन के बाद सत्ता के शीर्ष पर जो आदमी स्थापित किया गया, वह पूरी तरह से परिवर्तन का विरोधी था. मोरारजी देसाई तो इंदिरा गाँधी की कसौटी पर भी दकियानूसी विचारधारा के राजनेता थे, लेकिन इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी की सत्ता से मुक्ति की अभिलाषा ही आम आदमी का लक्ष्य बन चुकी थी, इसलिए जो भी मिला उसे स्वीकार कर लिया.

राज्य में विधानसभा चुनाव की तिथि का एलान हो गया है। विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की ओर से जहां उम्मीदवारों के नाम पर विचार-विमर्श हो रहा है। वहीं, कई विधायक अप्रत्यक्ष रूप से जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करने में जुट गए हैं। ज्यों-ज्यों चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं। त्यों-त्यों विधायक हो या संभावित उम्मीदवार जनता तक पहुंचने का मौका तलाशने में लग गए हैं। इसी क्रम में जोड़ासांकू क्षेत्र के तृणमूल कांग्रेस के विधायक को बधाई देते कई होर्डिंग लगे हैं। इन होर्डिंग में वार्ड नंबर 25, 41 व 42 में विधायक कोटे से वार्ड के विकास के लिए मुहैया कराई गई राशि का उल्लेख है। वार्ड नबंर 25 में 32 लाख, वार्ड नबंर 41 में 25.4 लाख और वार्ड नंबर 42 में 36 लाख का जिक्र किया गया है। मजे की बात यह है कि इन होर्डिंगों में प्रचारक, प्रसारक व मुद्रक का उल्लेख नहीं है।

बीपी गौतमकश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहेगा भी, पर तकनीकी दृष्टि से देखा जाये, तो कश्मीर भारत का अभिन्न अंग सिर्फ कहने को ही है, क्यों कि विधान के अनुसार कागजों में जो दर्ज है, उसका ऐसा ही कुछ अर्थ निकलता है, जिसके बारे में देश के बाकी भागों में रहने वाले अधिकांश आम नागरिकों को जानकारी ही नहीं है। सरकार सब कुछ जानते हुए भी कुछ कर नहीं पा रही है, जिससे समस्या कम या समाप्त होने की बजाये हमेशा मुंह फैलाये निगलने को आतुर ही बनी रहती है।