Election in Bengal is over amidst speculation of change, while coming to office I was asking my taxi driver about his feeling, as it is said that the people from all section of society in Bengal carries individual political identity and belief, he instantly said who ever will come is good for Bengal, if change comes then people at least can have a taste of a different kind of governance at least, which has been monopolized by the left for last 34 years continuously, during this process a new generation has born and became adult and young Rakesh,the taxi driver is also among them.

जगमोहन फुटेला अखबारों में एक खबर है कि रिश्वत और दलाली काण्ड में फंसे संसदीय सचिव राज खुराना का इस्तीफ़ा लेने के लिए बादल ने बीजेपी को मना लिया. अपन को निदा फाज़ली साहब का एक शे'र याद आता है. फिर इस खबर के सुर भी समझेंगे.पर,पहले शे'र...

"यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम,
संभल सको तो चलो.
सफ़र में धूप तो होगी,
जो चल सको तो चलो."

बिहार। विकसित राज्य। विकास प्रदेश। महिलाओं को आरक्षण। रोजाना विदेशी लोगों से मुख्यमंत्री की मुलाकात। ढेरों सारे सम्मान। कौन कह सकता है कि पंचायत चुनाव में गुंडई चल रही है। जी हां.. खुलेआम गुंडई। अभी बिहार के गांवों का माहौल गरम है। चाय, पान और पाउच की दुकान पर भीड़ बढ़ गई है। बक्सर जैसे इलाके में चर्चा है कि इस बार दुसधा को वोट नहीं देना है। ऐ बार चमरा के लइकवा के वोट दिआई। बड़ी जाति के लोगों का राज है। वे फिर से मलिकार बन गए हैं। उनके दरवाजे पर फिर से नथुनी दुसाध, मानरुप पासवान, अशोक चमार की भीड़ लगने लगी है। क्योंकि इनकी बीबीयां पंचायत चुनाव लड़ रही हैं। सबको चुनाव में सफलता चाहिए।

प्रदीप श्रीवास्‍तवआन्ध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के कडप्पा लोकसभा एवं पुलिवेंदुला विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिये हो रहे उप चुनाव पर न केवल प्रदेश क़ी जनता क़ी निगाहें लगी हैं अपितु कांग्रेस क़ी प्रतिष्ठा का सवाल भी बना हुआ है. पुलिवेंदुला में जेठ व भयो (जेठ वाईएस राजशेखर रेड्डी के बड़े भाई वाईएस विवेकानंद एवं भयो वाईएस राजशेखर रेड्डी क़ी पत्नी श्रीमती विजय लक्ष्मी) के बीच टक्कर है.  पता हो कि कांग्रेस से नाराज प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वाईएस राजशेखर रेड्डी के सांसद बेटे वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने कडप्पा लोकसभा सीट एवं उनकी मां श्रीमती वाईएस विजयलक्ष्मी ने पुलिवेंदुला विधान सभा सीट से पार्टी में अनदेखी के चलते त्याग पत्र दे दिया था. जिसके कारण आठ मई को वहाँ पर उपचुनाव हो रहे हैं. इस बार मां एवं बेटे दोनों ही कांग्रेस के झंडे के नीचे चुनाव न लड़कर स्वयं क़ी बनाई वाईएस कांग्रेस पार्टी के बैनर तले ही चुनाव लड़ रहे हैं.

कुमार सौवीरसंविधान सभा का संकल्‍प- हम भारत के लोग भारत को समाजवादी गणतांत्रिक राज्‍य बनाने का संकल्‍प लेते हैं। मनमोहन सरकार का संकल्‍प-  हम भारत की सरकार के लोग दुनिया के पूंजीवादी दबंग अमेरिका के निर्देश पर भारत को बाजारू गणतंत्र में तब्‍दील करने का संकल्‍प लेते हैं। यहां यह दो तथ्‍य हैं। पहले में तो देश के जन-गण-मन ने देश के नागरिकों को बराबरी के अधिकारों से लैस किया ताकि भारत का जन-गण-मन अपने भावी कर्णधारों के लिए एक बेहतर भारत का तोहफा तैयार कर सके, जहां मानवता अपने पूरे सौंदर्य और समग्रता में विकसित हो सके। जबकि दूसरे तथ्‍य में देश के आधुनिक कर्णधारों ने देश की आजादी के मायने ही बदल दिये। सारा कुछ मनमर्जी और पूरी बेशर्मी से हुआ।

लोकेंद्र अक्सर कहा जाता है कि साधु-सन्यासियों को राजनीति में दखल नहीं देना चाहिए। उनका काम धर्म-अध्यात्म के प्रचार तक ही सीमित रहे तो ठीक है, राजनीति में उनके द्वारा अतिक्रमण अच्छा नहीं। इस तरह की चर्चा अक्सर किसी भगवाधारी साधु/साध्वी के राजनीति में आने पर या आने की आहट पर जोर पकड़ती है। साध्वी ऋतंभरा, साध्वी उमा भारती, योगी आदित्यनाथ आदि के राजनीति में भाग लेने पर नेताओं और कुछ विचारकों की ओर से अक्सर ये बातें कही जाती रही हैं। इसमें एक नाम और जुड़ा है स्वामी अग्निवेश का जो अन्य भगवाधारी साधुओं से जुदा हैं। हालांकि इनके राजनीति में दखल देने पर कभी किसी ने आपत्ति नहीं जताई। वैसे अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति में ये अग्रणी भूमिका निभाते हैं, इस बात से कोई अनजान नहीं है। पूर्व में इन्होंने सक्रिय राजनीति में जमने का प्रयास किया जो विफल हो गया था।

गिरीशजीतमिलनाडु के मदुरई के तिरुमंगलम क्षेत्र की 78 साल की यसोदाई बुधवार को विधानसभाई चुनाव में वोट डालते समय चल बसीं. अस्वस्थ होने के बाद भी वोट देने की जिद थी. घर से 300 मीटर दूर पैदल चल कर वोट डालने बूथ पर गईं. ऊंगली पर वोट डालने का काला निशान भी लगा पर वोटिंग मशीन का बटन दबाने के पहले ही चल बसीं. वैसे तो चुनावों में ऐसे उम्रदराज बुजुर्ग वोट डालते ही हैं, लेकिन अस्वस्थता में भी वोट डालने की जिद और इस घटना को निम्न वास्तविकताओं के संदर्भ में देखा जाए तो बेहतर होगा.

सलीम अख्‍तरबंगाल के विधानसभा चुनाव कई मायनों में अलग हैं। नतीजों से पहले ही वामदलों के लिए 'मर्सिया' पढ़े जाने लगे हैं। वाम दलों का परंपरागत वोट बैंक समझे जाने वाले मुसलमान इस बार क्या करेंगे? यह सवाल फिजा में तैर रहा है। हालांकि पिछले लोकसभा और पंचायत चुनावों में मुसलमानों ने वाम दलों को अपनी दूरी को नतीजों का रूप दे दिया था। यही वजह है कि इस बार राजनीतिक पार्टियां मुसलिम वोट बैंक का हिसाब लगा रही हैं। बंगाली वाममोर्चा को गलतफहमी हो गई है कि अब पहले जैसे हालात नहीं हैं और मुसलमान उसके साथ हैं। इसमें शक नहीं कि सिंगूर और नंदीग्राम में मुसलमानों के साथ वाममोर्चा ने ज्यादती की, जो उसकी कामयाबी में बड़ी भूमिका अदा करते रहे हैं।

बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर के जयन्ती के अवसर पर "आरटीआई एक्टिविस्ट एसोसिएशन ऑफ इण्डिया" द्वारा लक्ष्मी नगर में "यदि आज अंबेडकर जीवित होते"  विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में संस्था के महासचिव गोपाल प्रसाद (आरटीआई एक्टिविस्ट) ने कहा कि यदि आज अंबेडकर जीवित होते तो वे निश्चित रूप से दलितों को सूचना का अधिकार प्रयोग करने, आरटीआई एक्ट को सशक्त करने तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून में कठोर प्रावधान अवश्य करते. वास्तव में सूचना का अधिकार (RTI) का अधिकाधिक प्रयोग करके ही भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं को उजागर किया जा सकता है. भ्रष्टाचारियों  को नकेल डालकर ही कानून का भय बनाया जा सकता है. जब तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनहित हेतु आरटीआई एक्ट को और अधिक शक्ति नहीं दिया जायेगा तब तक कानून तोड़नेवालों के दिल में कानून के प्रति सम्मान कैसे हो सकता है?

बिहार में इन दिनों पंचायत चुनाव चल रहा है। चारों ओर चिल्ल-पों मची है। सबलोग मुखिया बनना चाहते हैं। इसके लिए सभी तरह के हंथकंडे अपनाए जा रहे हैं। जिसमें धनबल और बाहुबल तो आम बात है। क्योंकि मुखिया, सरपंच और पंचायत प्रतिनिधि बनने का फायदा लोगों ने इन पांच सालों में देख लिया है। अब चुनाव जीताऊ हथकंडे में एक और हथकंडा शामिल हो गया है। वह है चमड़ी का। समझे नहीं आप। गर्म गोस्त का। अब जो शख्स अपने आपको को वोट मैनेजर कहता है उसे शराब, कबाब के साथ शहर में शबाब की भी व्यवस्था की जा रही है। मात्र तीन दिनों में मुजफ्फरपुर शहर के आवासीय इलाकों में चलने वाले दो सेक्स रैकेट गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। इस कांड में जो महिलाएं और पुरुष गिरफ्तार हुए हैं उनके बयान काफी चौंकाने वाले हैं।

आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री चले गये। छायावाद के इस पुरोधा ने सौ से अधिक रचनायें लिखीं, पांच हजार से अधिक गीत। कोई एक गीत दूसरे की प्रतिलिपि नहीं। साहित्य में ही नहीं, निजी जीवन में भी प्रसाद और निराला के अनुयायी, उन्हीं की तरह स्वाभिमानी। कुछ समय पूर्व सरकार ने पद्म पुरस्कार देने का निर्णय किया किन्तु उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। जीवन के अंतिम वर्षों में किसी ने उनके लिये कहा कि निराला को आदर्श मानने वाले को ‘उनके जैसे अन्त के लिये भी’ तैयार रहना चाहिये। उन्होंने इसे स्वीकार भी किया।

सपा सुप्रीमो के फैसले को न मानने वाले लोगों के खिलाफ सपा मुखिया क्या कारवाई कर सकते हैं इसका जीता जगता सबूत आज उस समय देखने को मिला जब मैनपुरी की पूर्व विधायक उर्मिला यादव और पूर्व जिलाध्यक्ष केसी यादव को सपा से इसलिये निकाला गया, क्योंकि ये लोग सपा सुप्रीमो के फैसले का विरोध कर रहे थे. सपा मुखिया ने इस फैसले से बगाबत करने वालों को सचेत किया है तो यह भी कयास लगाया जा रहा है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की जनता को भी यह सन्देश देने की कोशिश की है कि सपा अब परिवार बाद से हटकर राजनीति करने की कवायद शुरू कर चुकी है. इस फैसले के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव मिशन 2012  के चलते अब नाम के ही मुलायम नजर आ रहे हैं.

श्रीनिवासयाचना नहीं अब रण होगा, संघर्ष बड़ा भीषण होगा.. हाँ कुछ इसी  तर्ज़ पर अन्ना हजारे ने 4 अप्रैल, 2011 को दिल्ली के जंतर मंतर पर हुंकार भरते हुए.. जन लोकपाल विधेयक के मांग लिए आमरण अनशन पर बैठ गए. पूरे देश में एक स्वत:-स्फूर्त आंधी आयी और भारत की लाखों-करोड़ जनता अन्ना के इस मुहिम से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ गई.. जंतर- मंतर पर मानो हर दिशा से जन सैलाब सा उमड़ने लगा....पूरे वातावरण में वन्दे मातरम की जय घोष  सुनाई देने लगी.. उद्घोषों में इनती तीव्रता थी, मानो ऐसा लग रहा था कि ये आज आसमान का भी सीना वन्दे मातरम और जय हिंद के नारों से छलनी कर देंगे.. कारवां चल पड़ा था.

शेषजीइस बात में दो राय नहीं है कि अन्ना हजारे सर्वोच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से बहुत चिंतित हैं. उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में बिताया है. फौज की नौकरी ख़त्म करने के बाद उन्होंने सही गांधीवादी तरीके से अभियान चलाया और अपने गाँव को बाकी गावों से बेहतर बनाया. उनके गाँव में कुछ ऐसे परिवार भी हैं जो ऊब कर बड़े शहरों में चले गए थे लेकिन फिर वापस आ गए हैं. अन्ना को उनके समाज में बहुत ही सम्मान से देखा जाता है. ज़ाहिर है धीरे-धीरे ईमानदारी से काम करते हुए वे आज देश में एक आन्दोलन खड़ा करने में सफल रहे हैं.

पंकज झाजुलाई का महीना दिल्ली के लिए काफी गर्म होता है. पर यह धूप तब और कष्टकर हो जाता है जब आप बायो-डाटा लेकर नौकरी की तलाश में दिल्ली की सड़कों पर घूमते रहें. सन 2004 की ऐसी ही गर्मी में, जब दिल्ली की गद्दी से उतरे हुए भाजपा को ज्यादे दिन नहीं हुए थे, भाजपा की नौकरी करने का प्रस्ताव मिला. कहते हैं जब विकल्प नहीं हो तो तय करना आसान हो जाता है. लोकसभा चुनाव के बाद ताज़ा-ताज़ा बेरोजगार हुआ यह खादिम निकल पड़ा था कभी नक़्शे में ही देखे छत्तीसगढ़ की तरफ. एक झोला उठाये दोस्त से टिकट का पैसा उधार लेकर. सोच यह भी थी कि एक पार्टी को अंदर से जानने का मौका मिलेगा जिससे मुख्यधारा की पत्रकारिता में उन अनुभवों का लाभ भी लिया जा सकेगा.

लोकेंद्र सिंह राजपूतलौह-सा दिखता वो वृद्ध पुरुष धीमे-धीमे पिघलने लगा है। आलोचना की गर्मी से या किन्ही और कारणों से... निश्चिततौर पर आलोचना की गर्मी से यह संभव नहीं। महाराष्ट्र के एक गांव रालेगन सिद्धि का यह जनयोद्धा दिल्ली आकर महान से महामानव, अन्ना हजारे से छोटा गांधी और भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए आमजन का सूरज बन गया था। जब अन्ना ने दिल्ली का रण संभाला था, उसी दिन मैंने सोचा था कुछ न कुछ तो जरूर होगा, क्योंकि यह आदमी विजयपथ पर निकलता है तो न रुकता है, न थकता है और न झुकता है। हुआ भी यही, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जंग में जंतर-मंतर के रणक्षेत्र से सचिवालय में हुई संयुक्त कमेटी की पहली बैठक तक जो हुआ उससे मैं अचरज में हूं। चट्टान सा दिखने वाला पुरुष लगातार समझौतावादी होता जा रहा है।