दीपक आजाद'अंग्रेज कुछ सालों में हिन्दुस्तान छोड़ जाएंगे, लेकिन यह गोरे अंग्रेजों से काले अंग्रेजों के हाथों में सत्ता के हस्तांतरण के सिवा और कुछ नहीं होगा। दस-पंद्रह साल इसी खुशफहमी में गुजर जाएंगे और फिर लोगों को महसूस होगा कि उनके साथ धोखा हो रहा है।'  अंग्रेजों की जेल में फांसी का इंतजार करते हुए भगत सिंह का यह बयान देश पर हुकूमत कर रहे आज के हुक्मरानों पर उतनी ही सटीक बैठता है, जितना जब हिन्दुस्तान अपनी गुलामी के खिलाफ मुक्ति की लड़ाई लड़ रहा था। भ्रष्टाचार और लूट-खसोट से देश के करोड़ों-करोड़ लोगों को नारकीय जीवन जीने के लिए बाध्य करने वाले हुक्मरान आजादी के छह दशक बाद भी इस देश की जनता के साथ जिस कार्यरता से बर्बरतायुक्त व्यवहार कर रहे हैं, उससे साफ होता है कि डायर की इन संतानों के चंगुल में फंसे देश को बचाने के लिए आजादी की दूसरी जंग कितनी जरूरी है।

बिहार की जनता ने हालांकि नीतीश कुमार को दोबारा सत्ता सौंप दी है, लेकिन नीतीश सरकार के कई विरोधाभास उसे मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली केन्द्र की लंगड़ी सरकार से भी बदतर हालात में ले जा रहे हैं। सवाल यहां पर यह भी है कि क्या जनता ने नीतीश को सचमुच सत्ता की चाबी सौंपी या अपने बड़े भाई श्रीमान लालू प्रसाद जी की तरह नीतीश जी ने भी बैलेट बॉक्स की जगह इस बार ईवीएम मशीन से जिन्नातों को बाहर निकाला। इस बात पर सत्ता के गलियारों में जबरदस्त कानाफूसी चली हुई है। इस मुद्दे पर इलेक्ट्रानिक्स विजिलेंस या सीबीआई स्वतः संज्ञान ले। अब जरा नवम्बर, 2010 से लेकर अब तक हुए मुख्य घटनाक्रमों पर प्रकाश डालें तो हमें सारी बातों के खोल से निकलते जाने का अनुमान हो सकता है।

भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ दिल्ली के रामलीला मैदान में आंदोलनरत लोगों पर कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा हुआ लाठीचार्ज और अनशनरत बाबा रामदेव की गिरफ्तारी लोकतंत्र की हत्या है और यह प्रमाणित करता है कि देश आपातकाल की ओर बढ़ रहा है। यह बयान आज जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ बाबा रामदेव के नेतृत्व में आंदोलनरत लोगों पर हुए दमन की कड़ी निंदा करते हुए दिया। उन्होंने कहा कि रामदेव को ठग और बेईमान बताने वाले कांग्रेस के नेताओं को देश को बताना चाहिए कि जब वह यह बात पहले से ही जानते थे तो आखिर क्या वजह थी कि केन्द्र सरकार के आला मंत्री पलक पांवड़े बिछाए हवाई अड्डे पर जाकर उनका स्वागत कर रहे थे और आज आखिर कौन सा ऐसा खतरा पैदा हो गया कि आधी रात को लोगों पर दमन ढाया गया व बाबा रामदेव को गिरफ्तार किया गया।

संजय शर्मा लोकपाल विधेयक को लेकर एक बार फिर अन्ना हजारे और उनकी टीम सरकार के निशाने पर है। ऐसा होना ही था। जिस तरह से पूरे देश में अन्ना हजारे ने माहौल बना दिया था, उस समय केन्द्र सरकार के पास इसके अलावा कोई और चारा भी नहीं था कि वह इस बात को स्वीकार करे कि अब पूरा देश भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है और वह किसी भी कीमत पर लोकपाल विधेयक को लाना ही चाहता है। मगर भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से घिरी सरकार अब भी इस विधेयक में कांटछांट का कोई मौका नहीं छोड़ रही। जाहिर है कि मानसून सत्र में यह विधेयक संसद में आ पायेगा और लागू हो जायेगा इसकी संभावना कम ही है।

डा. नूतन ठाकुरउत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव होने में अभी लगभग एक वर्ष शेष है, पर अभी से अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं कि शासन की बागडोर किसके हाथों में जायेगी. बसपा दुबारा सत्ता में आयेगी या फिर सपा. कांग्रेस और भाजपा की सरकार बनाने में क्या और कितनी भूमिका होगी. रालोद, पीस पार्टी, निर्दलीय और अन्य छोटी पार्टियां किस हद तक अपनी उपस्थिति से शासन-सत्ता के समीकरणों को प्रभावित कर सकते है. इस सम्बन्ध में सभी के अपने-अपने मत और तर्क हैं. पर एक बात जिस पर लगभग सभी सहमत होते दिखते हैं वह यह कि सरकार चाहे जिसकी भी बने बिना कांग्रेस या भाजपा के समर्थन के बननी लगभग असंभव ही है.

आलोक कुमार उत्तर प्रदेश में बिछी राजनीति के बिसात पर अजीबो-गरीब इत्तेफाक के साथ कई भाई और बहन के रिश्ते रोचक तरीके से दांव पर लगे हैं। कांग्रेस के अंदर से राहुल को किनारे कर प्रियंका बढेरा को सामने करने की बात उठ रही है। उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान या उसके बाद इसे बल मिल सकता है। युवराज राहुल के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जादू नहीं चला तो कहा जा रहा है कि प्रियंका पर बड़ी जिम्मेदारी लाद दी जाएगी। भाई राहुल से बहन के रिश्ते को लेकर किसी विवाद के उभरने का राजनीतिक इंतजार लंबे समय से हो रहा है। राज्य का चुनाव कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के लिए आखिरी इम्तिहान साबित होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

निरंजन परिहार: निधि की लूट में कोई दया नहीं की दयानिधि ने : पहले ए राजा, फिर कनिमोजी। और अब कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन भी अचानक लुटेरे के अवतार में। करोड़ों की कमाई के लिए करुणानिधि की कलाबाजियों के मोहरों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि साफ सुथरी छवि का लबादा ओढ़कर मारन भी वह सब पहले से ही कर रहे थे, जो उनकी पार्टी के बाकी लोगों ने किया। इसलिए अब यह अंदाज लगाना गैरजरूरी लगने लगा है कि अगला नाम किसका आएगा। जब अपने नाम के बिल्कुल विपरीत दयानिधि ने भी देश की निधि को लूटने में कोई दया नहीं दिखाई, तो फिर अगला नाम तो कोई भी हो सकता है।

: सत्याग्रह पर कांग्रेस का ही हमला : सत्याग्रह के खिलाफ कांग्रेस ने दमन का रास्ता अपना लिया, जिस हथियार के भरोसे देश को आजादी दिलाने का दावा कांग्रेस करती हैं उसी हथियार को दबाने के लिए अंग्रेजों की तरह सोनिया और मनमोहन की पुलिस रामलीला मैदान में महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार करती हुई नजर आई। बाबा रामदेव के अनशन से डरी हुई केन्द्र सरकार अब चारों तरफ से हिल चुकी हैं, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के कागजी शेर बने मंत्रियों ने सरकार के मानवीय अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। देश अराजकता की ओर एक साथ कई कदम बढ़ चुका हैं जिसका अहसास विदेशी मूल के कांग्रेस नेतृत्व को संभवतः नहीं हैं।

सलीम अख्तर सिद्दीकीउत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले दिनों अपने चार साल मुकम्मल कर लिए हैं। इधर नगर निकायों का कार्यकाल भी समाप्त होने को है, इसलिए नगर निकाय और विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गर्इं हैं। राजनैतिक दलों ने कुछ उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दी है। जब चुनाव आते हैं, तो मुसलिम वोट बैंक को हर राजनैतिक दल ललचाई नजरों से देखता है। देखे भी क्यों नहीं? उत्तर प्रदेश में मुसलिम आबादी लगभाग 20 प्रतिशत है। भले ही भाजपा का आधार मुसलिम विरोध पर टिका हो, लेकिन वह भी मुसलिम वोटों की चाहत रखती है। ये अलग बात है कि मुसलिमों की और कदम बढ़ाते ही उसका अपना वोट बैंक उसे ‘कांग्रेस की कार्बन कापी’ बताने लगता है, लेकिन उसकी ये चाहत कभी भी उभर ही आती है।

शनिवार की रात साढ़े 11 बजे दिल्ली पुलिस के एक महान अफसर रामलीला मैदान जाते हैं और बारीकी से मौका मुआयना करके वापस चले आते हैं। ठीक 11 बजकर 50 मिनट पर सो रहे देश को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बताता है कि पांच हजार पुलिस, सीआरपी और आरएएफ के जवानों ने रामलीला मैदान को घेर लिया है। साढ़े 12 बजे पता चलता है कि बाबा रामदेव को मंच के पीछे से पुलिस उठाकर ले जा रही थी और तब वे मंच पर आ गए थे। उनके समर्थक उन्हें घेर लेते हैं और खबर यह आती है कि पुलिस ने योग शिविर की अनुमति रद्द करके रामलीला मैदान में धारा-144 लगा दी है। रात 1.20 बजे पुलिस पंडाल में घुसती है और सत्याग्रहियों के साथ बदसलूकी प्रारंभ कर देती है।

कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह आजकल आतंकवादियों का महिमा मंडन करते हैं और साधु-संतों का मान मर्दन। वह साधु संतों को राजनीति से दूर रहने की चेतावनी देने के साथ ही वह ओसामा बिन लादेन को ओसामा जी कह कर सम्मानित करते हैं। उन्होंने ओसामा बिन लादेन के अंतिम संस्कार पूर्ण मज़हबी रीति से करने को जरूरी बताया है। इस बयान से उन्होंने लादेन को इस्लामिक आइकन के तौर पेश किया है। वह लादेन को इस्लाम का आइकन बनाकर श्री नरेंद्र मोदी को हिन्दुत्व का आइकन साबित कर रहे हैं और इस पर्दे के पीछे एक भयानक लोकतांत्रिक महाघोटाले को अंजाम दिया जा रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण किन्तु कटु सत्य है कि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम के आइकन के रूप में महमूद गज़नवी, मोहम्मद ग़ोरी, चंगेज़ ख़ान और बाबर को पेश करके इस्लाम को रक्तपात प्रिय धर्म के रूप में प्रचारित किया गया।

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह तो बहुत पहले से कह ही रहे थे। लेकिन अब अंतत: कांग्रेस बाबा को बीजेपी का एजेंट साबित करने में भी कामयाब हो गई है। कांग्रेस और सरकार की निगाहें कई दिनों से रामदेव पर थीं। लेकिन आखिर वे बट्टे में आ ही गए। सरकार और कांग्रेस को पता था कि बाबा के साथ जो किया, वह करने के बाद क्या होना है। और वही हुआ। रामलीला मैदान से रामदेव को खदेड़ने और दिल्ली से बेदखल करने के तत्काल बाद लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। नरेंद्र मोदी ने खुलकर क्रोध जताया। नितिन गड़करी ने निंदा की। विनय कटियार ने अपनी वार्ता में गुस्सा दिखाया। राम माधव ने रोष व्यक्त किया। रमेश पोखरियाल ने खेद जताया। वसुंधरा राजे ने इसे कानून के खिलाफ बताया। और संघ परिवार ने दुखद कहा।

डा. आशीष वशिष्‍ठ भट्टा पारसौल की घटना ने माया सरकार की दोमुंही नीति को सारे देश के सामने उजागर कर दिया है। मार्च महीने में जाट आरक्षण की मांग कर रहे आंदोलनकारियों को खुली छूट देने वाली माया सरकार जब भट्टा पारसौल के आंदोलनकारी किसानों पर गोली चलवाती है तो यूपी सरकार की दोमुंही और जनविरोधी नीति का कुरूप चेहरा पूरे देश के सामने बेपर्दा हो जाता है। वैसे भी माया राज में सरकार और नौकरशाह कानून, मानवाधिकार और जनपक्ष से जुड़े मुद्दों को जूते की नोंक पर ही रखते हैं। और बहन मायावती का हर कदम और बयान विशुद्व रूप से वोट बैंक और राजनीतिक गुणा-भाग से प्रेरित और संचालित होता है। भट्टा पारसौल के किसान जमीन के बदले मिलने वाले सरकारी मुआवजे को बढ़ाने की मांग के लिए आंदोलनरत थे। किसानों की जायज मांगों और आंदोलन का प्रशासन लंबे समय से अनसुना और अनदेखा कर रहा था।

राजीव जन-समाज, सभ्यता और संस्कृति के ख़िलाफ की गई समस्त साजिशें इतिहास में कैद हैं। बाबा रामदेव की रामलीला मैदान में देर रात हुई गिरफ्तारी इन्हीं अंतहीन साजिशों की परिणती है। यह सरकार के भीतर व्याप्त वैचारिक आपातकाल का नया झरोखा है जो समस्या की संवेदनशीलता को समझने की बजाय तत्कालीन उपाय निकालना महत्त्वपूर्ण समझती है। बीती रात को जिस मूर्खतापूर्ण तरीके से दिल्ली पुलिस ने बाबा रामदेव के समर्थकों को तितर-बितर किया; शांतिपूर्ण ढंग से सत्याग्रह पर जुटे आन्दोलनकारियों को दर-बदर किया; वह देखने-सुनने में रोमांचक और दिलचस्प ख़बर का नमूना हो सकता है, किन्तु वस्तुपरक रिपोर्टिंग करने के आग्रही ख़बरनवीसों के लिए यह हरकत यूपीए सरकार की चूलें हिलाने से कम नहीं है। केन्द्र सरकार की बिखरी हुई देहभाषा से यह साफ जाहिर हो रहा है कि जनता अब उसे बौद्धिक, विवेकवान एवं दृढ़प्रज्ञ पार्टी मानने की भूल नहीं करेगी।

बीपी गौतमबसपा सरकार के निर्देश पर पुलिस व प्रशासन द्वारा भट्टा पारसौल में किसानों पर ढाये गये कहर से हर कोई दु:खी है। प्रदेश की जनता के साथ देश के अन्य राज्यों के लोग भी घटना पर दु:ख व्यक्त करते देखे जा रहे हैं। घटना के बाद से भाजपा, कांग्रेस, सपा, रालोद के साथ सामाजिक कार्यकर्ता वहां लगातार पहुंच रहे हैं और पीडि़त किसानों से बात करते हुए दु:ख बांटते नजर आ रहे हैं। नेताओं को देख कर लग रहा है कि उनके बीच भट्टा पारसौल जाने की प्रतियोगिता चल रही है, तभी सबके सब अचानक उधर ही दौड़ते दिखाई दे रहे हैं, जब कि अधिग्रहण का विरोध करने वाले किसान पहले से ही आंदोलन कर रहे थे, इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि इन सब नेताओं के हृदय पहले से द्रवित क्यूं नहीं हुए।

दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकारी शह पर पुलिस ने आधी रात को जो 'लीला' रची है, उसने लोकतंत्र के चेहरे को बुरी तरह से कलंकित कर दिया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव के आंदोलन से बौखलाई सरकार को जब कुछ नहीं सूझा तो उसने सभास्थल को उजाड़ने और लोगों को मार-भगाने में ही अपनी खैर समझी। सोते हुए लोगों पर जिस तरह से लाठियां भांजीं गयीं, आंसू गैस के गोले छोड़े गये और लोगों को खदेड़कर भगाया गया.. उसने इमरजेंसी की यादें ताज़ा कर दी हैं। सत्ता के गलियारों में अब सियासत इस मुद्दे पर आम आदमी को बांटने और उसका ध्यान भटकाने में लग गयी है। कांग्रेस, अंग्रेजों से विरासत में मिली 'फूट डालो और राज करो' की नीति का प्रयोग अपने ही लोगों पर कर रही है। जैसे ही भ्रष्टाचार को लेकर समवेत स्वर मुखर होते हैं, तो उसकी पूरी की पूरी मशीनरी इन आवाज़ों को दबाने में लग जाती है।