आदरणीय यशवंतजी, पता नहीं क्यों अपने काम से इतर जब भी मैं अकेला बैठता हूं... तो रह-रह कर देश के बारे मैं सोचने को मजबूर हो जाता हूं... कभी सोने की चिड़िया कहा जाने वाला मेरा वतन आज भी सोने की चिड़िया तो हैं.. लेकिन अब सत्ता में बैठे शिकारी उसका शिकार करने में लगे हैं... हां मुझे ये भी पता है कि ये सोचकर मैं कुछ भी नहीं कर सकता क्योंकि भारत की सवा सौ करोड़ जनता में से करीब पचास करोड़ जनता रोज इस बुलंद भारत के बारे सोचती जरूर होगी कि जो भी देश में चल रहा है.. वो सही नहीं है... लेकिन वो भी ये सोच कर सो जाती है कि वो क्या कर सकती है...
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राष्ट्रपति का पद पर आसीन होने की एक मात्र मुख्य योग्यता भारत का नागरिक होना है। वैसे 35 वर्ष उम्र होने की दूसरी प्रमुख योग्यता को भी जोड़ा जा सकता है। इन दोनों मुख्य योग्यताओं को आईटी व्यापारी नारायणमूर्ति पूर्ति करते हैं। इस लिहाज से नारायण मूर्ति राष्ट्रपति पद पर पहुंचने की इच्छा रख सकते हैं। उन्होंने राष्ट्रपति बनने की इच्छा भी जताई है। पर एक शर्त है कि राष्ट्रपति का चुनाव के मतदाता सांसद-विधायक उन्हें राष्ट्रपति पद पर पसंद कर वोटिंग मशीन पर बटन दबा दें। संवैधानिक स्थिति में इन उपर्युक्त दोनों अहर्ताएं-योग्यताएं के इत्तर कोई विशेष योग्यता बंधित नहीं है पर मान्यताएं -परमपंराएं और अब तक की उपस्थित उदाहरण राष्ट्रपति पद के लिए स्वस्थ्य व प्रेरणादायी योग्यताएं जरूर स्थापित हैं।
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भ्रष्टाचार के गरमागरम मुद्दे के साथ चुनाव सुधारों का मुद्दा भी अब धीरे-धीरे गरम होने लगा है। कभी राइट टू रीकाल और कभी राइट टू रिजेक्ट की बात होती है। ये सभी मुद्दे जनता की सत्ता में भागीदारी और सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही बढ़ाने के लिए ही हैं, किन्तु जनता की भागीदारी सत्ता में बढ़ाने का तथा सरकार को और अधिक जवाबदेह बनाने का एक तरीका और भी हो सकता है। भारत की संसद के दो सदन हैं। लोकसभा (निम्नसदन) एवं राज्यसभा (उच्च सदन), जिसमें से लोकसभा के सदस्यों का चयन भारत की जनता के द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर मतदान से और राज्यसभा के सदस्यों का चयन अप्रत्यक्ष रूप से होता है।
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: अन्ना और सरकार के बढते द्वंद्व : अन्ना हजारे ने अपने हालिया बयान से जहां कांग्र्रेस को थोड़ा परेशान किया है, वहीं अनेक ऐसे लोगों को जो अन्ना के आंदोलन को पार्टी और सत्ता के सियासी जोड़तोड़ से अलग समाज में व्यापक राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का वाहक समझते थे, उन्हें निराशा हुई है. अन्ना ने कहा है कि यदि जनलोकपाल विधेयक संसद के शीत सत्र में पारित नहीं हुआ तो वो अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी का विरोध करेंगे. उनका मानना है कि चूंकि कांग्रेस पार्टी केंद्र की यूपीए सरकार की सबसे प्रभावी घटक है, इसलिए जनलोकपाल कानून के अमल में न आ पाने की जिम्मेदारी भी उसी पर है.
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आडवाणी जी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर फिर से एक रथ यात्रा पर निकालने का ऐलान किया है। आडवाणी जी द्वारा रथ यात्रा के ऐलान के राजनैतिक और व्यक्तिगत कारणों में जाएंगे तो लगेगा कि आडवाणी जी अपने राजनैतिक यात्रा को अपने मुकाम तक पहुंचाने में अभी तक सफल नहीं हो पाए हैं। उनकी पूरी राजनीति भारत के प्रधानमंत्री बनने की चाह की धुरी के आस-आप ही घूमती रही है। इसके लिए उन्होंने यात्राओं का सिलसिला जारी रखा और राम मंदिर यात्रा उनके लिए राजनैतिक रूप से सबसे सफल यात्रा मानी जानी चाहिए, जिसमें उनकी पार्टी को संसद में उनकी संख्या 2 से 184 तक पहुंचा दिया। लेकिन देश के परिप्रेक्ष्य में देखें तो देश के लिए सबसे खराब समय था, जिस यात्रा ने लोगों की भावनाओं से खेलकर देश में आपसी भाईचारा और अमन चैन को खत्म कर दिया। हिन्दू मुस्लिम के बीच कभी न भरने वाली खाई पैदा कर दी, किस के लिए सिर्फ सत्ता पाने की लालसा के लिए। पर अफसोस आडवाणी जी का सपना फिर भी पूरा नहीं हुआ।
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'यह नैतिकता क्या चीज होती है?" अपने 'सद्भावना मिशन" के तहत तीन दिन के उपवास पर बैठे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह प्रतिप्रश्न एक टीवी चैनल के संवाददाता के उस प्रश्न के जवाब में किया था, जिसमें उनसे पूछा गया था कि क्या वे गुजरात में 2002 में हुई सांप्रदायिक हिंसा की नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार है? प्रश्न पूरा होते ही मोदी ने अपना उक्त प्रतिप्रश्न दागा था। इसी के साथ उन्होंने कहा- 'जब मेरे खिलाफ गुजरात के किसी पुलिस थाने में कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं है तो मैं किस बात की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करूं।" जिस राज्य में सांप्रदायिक हिंसा में एक वर्ग विशेष के दो हजार से ज्यादा निर्दोष लोगों की मौत हो गई हो, उसके बारे में उक्त दंभपूर्ण और गैरजिम्मेदाराना उद्गार व्यक्त करने वाला उस राज्य का मुखिया किस तरह का सद्भाव कायम करना चाहता है, यह आसानी से समझा जा सकता है।
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दोहरे चरित्र रखने वाले व अति हिन्दू विरोध से लथपथ देश के बुद्धीजीवियों व गैर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक संवर्ग निश्चित तौर पर मुस्लिम आबादी के शुभचिंतक नहीं, उनके वोट बैंक पर कुदृष्टि डाले गिद्ध हैं और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की असली शक्ति हैं। नरेन्द्र मोदी का जितना अधिक विरोध और उनके खिलाफ राजनीतिक/न्यायिक प्रक्रियाएं चलती हैं उतना ही गुजरात का जनमानस नरेन्द्र मोदी के साथ निकट चला आता है। गुजरात की जनता की अस्मिता के साथ गोधरा कांड से ही खिलवाड़ करने की राजनीतिक-सामाजिक प्रक्रिया चलती रही है। गुजरात दंगा निश्चित तौर पर एक गैरजरूरी प्रक्रिया थी। लेकिन यह क्यों भूला दिया जाता है कि गोधरा कांड के बाद तथाकथित दोहरे चरित्र रखने वाले और अति हिन्दू विरोध से लथपथ बुद्धिजीवियों-राजनीतिक पार्टियों ने सांप्रदायिक मानसिकता की आग लगायी थी।
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राजनीति से मर्माहत एक विद्वान ने कहा था कि ‘पॉलिटिक्स इज द गेम आफ स्कॉन्ड्रल्स’ अर्थात राजनीति ‘घाघ लोगों का खेल’ है। 15वीं लोकसभा पर यह कहावत सटीक बैठती है। यह सही है कि भारतीय लोकतंत्र मजबूत हुआ है, लेकिन इससे भी ज्यादा सत्य यह है कि आजादी के 64 साल में ही संसदीय व्यवस्था और संसदीय प्रक्रिया में भारी गिरावट आई है। संसद में गुंडई, लंपटई, दबंगई और दुष्कर्म करने के आरोपियों के साथ ही ‘धन कुबेरों’ की फौज पहुंच चुकी है।
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पिछले दिनों दो घटनाएं हुईं जो हमसे जवाब मांगती हैं और इस सवाल का जवाब भी देती हैं कि हम भारत के लोग आजादी के 64 साल बाद भी उस भारत का निर्माण नहीं कर पाए जिसका सपना हमने अपने संविधान में देखा। हमारे संविधान की उद्देशिका में कहा गया है- “हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय/ विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता/ प्रतिष्ठा और अवसर की समता/ प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26-11-1950 ई. (मिति मार्गशीष शुक्ल सप्तमी, संवत 2006 विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं.”
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आन्दोलन के दौरान जोर शोर से हमें बताया जाता रहा कि लाखों-लाख जनता सड़कों पर उतर गयी है. अन्ना हजारे ने इस बीच यह दावा भी कर दिया कि उनका आन्दोलन 120 करोड़ लोगों की इच्छाओं का इजहार है. इस दावे के प्रमाण के रूप में हमें 16 अगस्त को तिहाड़ जेल के बाहर जमा भीड़ के विजुअल्स परोसे गए. अगले दिन इंडिया गेट पर जमा कुछ हज़ार लोगों की तस्वीरें दिखाई गयी और 80000 की क्षमता वाले रामलीला मैदान जिसके तीन चौथाई हिस्से पर पानी भरा हुआ था, के एक कोने में जमा 4-5000 लोगों को लाखों-लाख की भीड़ बता कर लगभग यह तथ्य स्थापित कर दिया गया कि अन्ना के समर्थन में पूरा भारत सड़कों पर उतर आया है.
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने कहा था कि क्रांति की स्पीरिट से इंसानियत की रूह में हरकत पैदा होती है। आजादी के 64 साल बाद जब हम भूत से लेकर वर्तमान तक पर नजर डालते हैं तो लोकतंत्र में आम जन संगठित रूप से शोषित हुआ है। आज सत्ता की मलाई चाट रहे दरबारी जनता की हित के बजाए अपने आकाओं की बांसुरी पर ताता थैया कर रहे हैं। सरकार की प्रवृति शोषक और भ्रष्ट हो चुकी है। छत्तीसगढ़ से झारखण्ड तक आदिवासी, उत्तर प्रदेश से आंध्र प्रदेश तक में किसान जल-जंगल-जमीन-खनिजों की कारपोरेट लूट के खिलाफ लड़ रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत और कश्मीर में आम लोग सम्मान के साथ जीवन जीने के लिए लड़ रहे हैं। दिल्ली से लेकर छोटे शहरों के कॉलेजों तक में छात्र और नवयुवक रोजगार और शिक्षा के लिए लड़ रहे हैं।
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अब जरा इस बात पर गौर फरमाते हैं कि एक छोटे से गाँव में कुछ सामाजिक सुधार जैसे काम करने वाले और महाराष्ट्र में छुटपुट आन्दोलन चलाने वाले अन्ना अचानक पूरे राष्ट्रीय परिदृश्य पर कैसे छा गए. अप्रैल के महीने में अन्ना ने लोकपाल विधेयक की ड्राफ्टिंग में सिविल सोसाइटी को सम्मिलित किये जाने को लेकर दिल्ली में जंतर मंतर पर जब अनशन शुरू किया तब इस ड्राफ्ट को लेकर कई स्तरों पर काम चल रहा था. इन में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सम्मिलित की गयीं अरुणा रॉय के प्रयास काफी अहम थे. यह बात आम अहम है कि सूचना के अधिकार के लिए सर्वाधिक संघर्ष अरुणा रॉय ने ही अपने संगठन एम.के.एस.एस.के जरिये किया था और उन्ही के प्रयासों से राजस्थान में सूचना के अधिकार पर पहला अधिनियम राजस्थान में आया था.
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: चुनावी सिस्टम में झोल : आजादी के बाद पोल के बोल में बह गई दौलत अनमोल : नेताओं ने नहीं अदा किए रोल : पूरे नहीं हुए गोल : करप्शन के और तेज बजने लगे ढोल : देश में हर तरह के चुनाव पर अब तक कितना सरकारी धन यानि जनता की कमाई खर्च हुई, इसका कोई रिकार्ड सरकारी सिस्टम के पास नहीं : यही है लोकतंत्र की विडंबना : करप्शन के खिलाफ अन्ना हजारे की जंग का रंग सब पर चढ़ चुका है। हर कोई मानता है कि करप्शन की असली जड़ है राजनीति और राजनेता। सही नेता संसद पहुंचे और देश को सही ढंग से चलाएं।
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मेरे कई मित्रों और परिचितों के सन्देश इस बीच मुझे मिले हैं जो इस बात से असहज महसूस कर रहें हैं कि मैंने और मेरे जैसे कई लोगों ने न केवल अन्ना हजारे के आन्दोलन से दूरी बनाये रखी, उसका समर्थन नहीं किया बल्कि उसका वैचारिक स्तर पर विरोध भी किया.. 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद आरक्षण विरोधी आन्दोलन के दिनों में भी हमारे आरक्षण का समर्थन करने पर ढेरों मित्र हैरान होते थे और उन में से अनेकों तो हमारे दुश्मन बन गए थे.. उन्हें इस बात से भारी परेशानी होती थी कि एक ऐसा छोटा सा समूह जिन में अधिकांश आरक्षित श्रेणियों में नहीं आते, आरक्षण के पक्ष में दलीलें कैसे दे सकता है.. हमारे असहज मित्रों की दृष्टि में अन्ना के आन्दोलन के कई मायने हैं.. अन्ना का आन्दोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ है और उनके सुझाये जन लोकपाल से भ्रष्टाचार पूरी तरह ख़तम न भी हुआ तो जैसा अन्ना का कहना है कि इस से भ्रष्टाचार में 90% कमी आ जाएगी..
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भ्रष्ट सरकार की जड़ों में मट्ठा भरने वाले और उसे आकाश से रसातल में लाने वाले अन्ना हजारे एक पखवाड़े तक अख़बारों और चैनलों की 'हेडिंग' बने रहे. अन्ना रोज अख़बारों के कई-कई पन्ने देशभक्ति के रंग में रंगवाते और चैनलों पर घंटों जनतंत्र की शक्ति दिखाते दिखे. पुंछ से कन्याकुमारी और तिनसुकिया (असम) से पोरबंदर तक सभी प्रमुख शहरों में लगी 'अन्नामयीं होर्डिंगें' युवाओं में जोशोखरोश पैदा करती रहीं. तो पानी को मम बोलने वाले बच्चे से लेकर बोलने को तरसने वाले बुजुर्ग तक की जुबान पर 'अन्ना हजारे' और सिर पर 'मैं अन्ना हूँ' की टोपी छाई रही. पूरे देश में लाखों मोमबत्तियों ने देशहित में क़ुरबानी दी. वहीं दक्षिणपंथियों, चरमपंथियों और सेकुलरों ने सुर में सुर मिलाये.
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