अजय कुमार, लखनऊ
आखिरकार समाजवादी कुनबा बिखर ही गया। इसका दुख नेताजी मुलायम से अधिक शायद ही किसी और को हो। समाजवादी पार्टी को मुलायम ने अपने खून-पसीने से खड़ा किया था। अनु शिवपाल यादव उनके साथ ‘हनुमान’ की तरह डटे रहे तो मुलायम की राह आसान हो गई। मुलायम की मेहनत के बल पर समाजवादी पार्टी ने न केवल उत्तर प्रदेश में अपनी पहचान बनाई बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी सपा का झंडा हमेशा बुलंद रहा। यूपी में सपा को तीन बार सत्ता हासिल हुई इतनी ही बार मुलायम सिंह यूपी के सीएम भी बने।(पहली बार मुलायम जनता दल से सीएम बने थे और बाकी दो बार समाजवादी पार्टी के बल पर सत्ता हासिल की थीं।) केन्द्र में गठबंधन की सियासत के दौर में नेताजी मुलायम सिंह ने रक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी संभाली थी। दस वर्षो तक यूपीए की मनमोहन सरकार मुलायम के समर्थन से मजबूती हासिल करती रही। मुलायम के दांव के सामने सियासत के बड़े-बडे सूरमाओं को कई बार चारो खाने चित होते देखा गया है,लेकिन वो ही मुलायम अपने बेटे से हार गये।

भाजपा का यह एक अचूक निशाना हो सकता है, यदि भाजपा ऐसा करती है तो एक तीर से कई निशाने निश्चित साध लेगी, क्योंकि भाजपा की रणनीति आने वाले लोक सभा चुनाव में सभी समीकरणों को मजबूती से सिद्ध करना होगा, वास्तव में भाजपा आने वाले लोकसभा चुनाव में पुन: अपनी बड़ी जीत दर्ज करवाने का प्रयास करेगी, जिसके लिए भाजपा को उत्तर प्रदेश की धरती पर एक ऐसा प्रदेश अध्यक्ष चाहिए जोकि ऐसी जाति से आता हो जिससे दलित वोट बैंक को भी आसानी से साधा जा सके, आने वाले लोक सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी अपने राजनीतिक समीकरण को मजबूती से धरातल पर उतारने का प्रयास करेगी जिसमें सभी जातियों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करेगी जिसका मुख्य आधार दलित एवं पिछड़ा वर्ग होगा दलित वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने हेतु भारतीय जनता पार्टी सम्पूर्ण रूप से इस क्षेत्र में सफल होने का प्रयास करेगी। अत: इस समीकरण को एक मजबूत एवं आधारयुक्त स्थिति में धरातल पर उतारने हेतु कर्मठ एवं योग्य व्यक्ति की आवश्यकता होगी, जो कि सभी समीकरणों को संगठन के साथ आसानी बैठा सके|

अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में सत्ता परिर्वतन किसानों के लिये खुशियों की सौगात ले कर आई है। चुनावी प्रचार के दौरान पीएम मोदी के किसानों से किये गये वायदे के अनुसार लघु और सीमांत किसानों का कर्जा माफ होने के साथ यूपी के नये सीएम योगी आदित्य राज ने किसानो का सौ फीसदी गेहूं खरीदने की घोषणा कर दी है। गेहूं खरीद का पैसा सीधे किसानों के खाते में जायेगा। योगी सरकार के द्वारा गन्ना किसानों को उनका भुगतान जल्द से जल्द दिलाये जाने की कोशिश हो रही है। योगी सरकार केन्द्र की उन योजनाओं को भी जल्द से जल्द जमीनी हकीकत में बदलेगी जिससे किसानों का भला हो सकता है। सीएम योगी का तो ध्यान किसानों की समस्याओं पर है ही इसके अलावा किसानों के लिए केन्द्र सरकार ने भी इस बजट में कई अहम घोषणाएं की हैं। जैसे मनरेगा के लिए 48,000 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है। योजना के तहत गांवों में 10 लाख तालाब बनेंगे. ई-नैम के तहत एपीएसी के लिए 75 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान और को-ऑपरेटिव बैंकों में सेवाओं को डिजिटल बनाने के लिए 3 साल में 1900 करोड़ रुपये का प्रस्ताव. इसके अलावा नाबार्ड के अंतर्गत डेयरी प्रोसेसिंग इंफ्रा फंड के तहत 8000 करोड़ रुपये का प्रावधान और फसल बीमा योजना की रकम 5500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 13 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया है।

छत्तीसगढ़ के सुकमा क्षेत्र में केन्द्रीय सुरक्षा बलों (सीआरपीएफ) पर योजनाबद्ध तरीके से किये गये हालिया हमले में जिस तरह लगभग तीन सौ माओवादियों ने तकरीबन दो सौ ग्रामीणों को आगे कर अकस्मात् हमला किया वह उनकी हर बार बदलती पैंतरेबाजी का एक नया नमूना है। जिस प्रकार माओवादी प्रहार और विस्तार में निरंतर वृद्धि कर अपने शक्तिशाली होते जाने का संदेश दे रहे हैं, वह और भी चिंता पैदा करता है। सुरक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि नक्सलियों के गढ़ में सेना की छावनी स्थापित करने से आतंकवाद पर अंकुश लगाया जा सकेगा और प्रभावित क्षेत्र में विकास कार्यों को गति मिलेगी। दूसरी तरफ योजनाकारों के लिए विचारणीय तथ्य यह होना चाहिए कि जब तक देश में आर्थिक समानता और कृषि व ग्रामीण विकास के द्वार नहीं खुलेंगे तब तक आंतरिक शांति और सीमाओं पर खतरा मंडराता रहेगा।

साथियो!

जैसा कि आप अवगत हैं कि वर्तमान दलित राजनीति एक बहुत बड़े संकट में से गुज़र रही है. हम लोगों ने देखा है कि पहले बाबासाहेब द्वारा स्थापित रेडिकल रिपब्लिकन पार्टी कैसे व्यक्तिवाद, सिद्धांतहीनता और अवसरवाद का शिकार हो कर बिखर चुकी है. इसके बाद बहुजन के नाम पर शुरू हुयी दलित राजनीति कैसे सर्वजन के गर्त में समा गयी है.  इस समय दलितों के सामने एक राजनीतिक शून्यता की स्थिति पैदा हो गयी है. मेरे विचार में इस संकट के समय में सबसे पहले हमें डॉ. आंबेडकर के राजनीति, राजनेता, राजनैतिक सत्ता और राजनीतिक पार्टी के सम्बन्ध में विचारों का पुनर अध्ययन करना चाहिए और उसे वर्तमान परिपेक्ष्य में समझ कर एक नए रेडिकल विकल्प का निर्माण करना चाहिए. इसी ध्येय से इस लेख में डॉ. आंबेडकर के राजनैतिक पार्टी, राजनेता और सत्ता की अवधारणा के बारे में विचारों को संकलित कर प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि इन माप-दंडों पर वर्तमान दलित राजनीति और राजनेताओं का आंकलन करके एक नया विकल्प खड़ा किया जा सके. 

एक पुरानी कहावत है - ‘नाच न आवै आँगन टेढ़ा’। इसका सीधा सा अर्थ है -- अपनी त्रुटि अथवा अक्षमता के लिए अन्य को दोषी ठहराना । यह बड़ी सहज मानव प्रवृत्ति भी है कि मनुष्य स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने और आरोप मुक्त बनाने के लिए अपनी गलतियाँ दूसरों के सिर पर मढ़ देता है। विगत कुछ महीनों में आए चुनाव परिणामों के अनन्तर ई.वी.एम. पर किया गया आक्षेप भी ऐसी ही मानवीय निम्नवृत्ति का परिचायक है। रोचक यह है कि हारे हुए लोग एक स्वर से ई.वी.एम. को दोषी ठहराने लगे हैं जबकि विजयी पक्ष दलीय भेदभाव त्यागकर ई.वी.एम. से चुनाव की निष्पक्षता का समर्थन कर रहें हैं। इस संदर्भ में उ.प्र. और पंजाब के चुनावों में विजयी नेता एकमत हैं , जबकि पराजित दलों के नेता परस्पर सर्मथन करते हुए अपनी पराजय का ठीकरा ई.वी.एम के माथे पर फोड़ रहे हैं।

एक योगी का मुख्यमंत्री बनना! ... योगी आदित्यनाथ को उप्र का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया है, इस तथ्य ने सबको आश्चर्य में डाल दिया है, जैसा कि वहां के चुनाव-परिणामों ने डाल दिया था लेकिन उप्र के चुनाव-परिणाम और योगी की नियुक्ति में सहज-संबंध का एक अदृश्य तार जुड़ा हुआ है। आप पूछें कि उप्र में भाजपा कैसे इतना चमत्कार दिखा सकी तो इसका एक ही बड़ा उत्तर है कि वहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ। हिंदुओं ने नोटबंदी की तकलीफों को भुला दिया। उन पर फर्जीकल स्ट्राइक का भी कोई फर्क नहीं पड़ा। मोदी विकास के नाम पर भी शून्य थे लेकिन फिर भी बाजी मार ले गए।

कार्यकर्ताओं के टूटते मनोबल और चुनाव में लगातार मिल रही  हार ने कांग्रेस और उसके नेता बुरी तरह परेशान है। हालात सुधारने के लिए मंथन किया जा रहा है। लेकिन पहली कोशिश ही फेल हो गई। कांग्रेस अध्य़क्ष सोनिया गांधी ने सांसदों से मिलने के लिए भोज का आयोजन किया। सबको न्यौता दिया। कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने 44 लोकसभा और 59 राज्यसभा सांसदों के लिए पहुंचने की सुविधा का भी खयाल रखा और संसद परिसर में ही इस रात्रि भोज का आयोजन किया। लेकिन फिर भी कुल 103 में से सिर्फ 60 सांसद ही सोनिया गांधी से मिलने पहुंचे। 43 आए ही नहीं और न ही न आने की कोई सूचना तक दी। जो कांग्रेसी कभी सोनिया गांधी के निवास 10 जनपथ के बाहर घंटों कतार लगाकर अपने नेता की एक झलक पाने के लिए बेताब रहते थे, उनका व्यक्तिगत निमंत्रण पर भी न पहुंचना कांग्रेस को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है। शर्म से बचने के लिए कांग्रेस की तरफ से बहाना यह बनाया गया कि मोतीलाल वोरा की तबियत खराब हो गई थी, सो सांसद वहां चले गए थे। लेकिन देश बेवकूफ नहीं है, वह सब समझता है। मोतीलाल वोरा कोई गांधी परिवार के बुलावे के सामने इतने महत्वपूर्ण है कि सांसद राहुल गांधी और सोनिया की उपेक्षा करके उन्हें देखने चले जाएं। फिर ऐसे बहानों से अब बचाव की कोशिशें उल्टे कांग्रेस की भद्द ही पिटवा रहे है। हालात खराब है और सुधरने की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे मजबूत सेनापति अमित शाह फिर से काम पर लग गए हैं। पांच राज्यों के चुनाव के तत्काल बाद वे अपने नए अभियान पर हैं। इस साल के अंत में और अगले साल होनेवाले करीब 15 विधानसभाओं के चुनाव के साथ सथ नका फोकस उन 200 लोकसभा क्षेत्रों पर है, जहां बीजेपी को मजबूत करके मोदी के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के सपने को साकार किया जा सकता है।

आराम न करना अमित शाह का शगल है और निशाना साधे रखना उनकी फितरत। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अथक सेनापति अमित शाह ने अपने अगले युद्ध की तैयारी शुरू कर दी है। वे लोकसभा चुनाव में अपना रणनीतिक कौशल साबित कर चुके हैं। और अब यूपी और उत्तराखंड में उनकी रणनीतिक सफलता ने बीजेपी को चमत्कृत कर देनेवाली जीत दिला दी है। मणिपुर और गोवा में भी सरकार बनाने का काम पूरा हो गया है। इसीलिए शाह ने अपने अगले अभियान के लिए कमर कस ली है।

कश्मीर में सुरक्षा बलों की दुर्दशा और अपमान के जो चित्र वायरल हो रहे हैं, उससे हर हिंदुस्तानी का मन व्यथित है। एक जमाने में कश्मीर को लेकर हुंकारे भरने वाले समूह भी खामोश हैं। ऐसे में यह सवाल पूछने का मन हो रहा है कि कश्मीर में सरकार तो आपकी है पर ‘राज’ किसका है ? कश्मीर एक ऐसी अंतहीन आग में जल रहा है जो हमारे प्रथम प्रधानमंत्री की नादानियों की वजह से एक नासूर बन चुका है। तब से लेकर आजतक सारा देश कश्मीर को कभी बेबसी और कभी लाचारी से देख रहा है।

Protect our great Indian democracy from being bulldozed.... In India Don’t allow use of EVM to protect our Democracy. All EVM’s can be easily tampered. So say no to EVM. MCD elections would be won by Aam Admi Party. Reason, is simple, BjB wants to use tampered evm to win big state elections. If BjB uses tampered evm in Mcd elections , chances are that EVM fraud would be exposed. So Bjb wont use tampered Evm in MCd elections, but use them instead in coming state elections, and most importantly for 2019 Lok shabha elections.

शुंगलू कमेटी ने जब शीला सरकार पर 75 हजार करोड़ के भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप लगाया तब केजरीवाल जी ने शीला दीक्षित से इस्तीफ़ा मांगा था. अब उसी शुंगलू कमेटी ने केजरीवाल सरकार पर गंभीर आरोप लगाया है तब 10 साल में 12 लाख करोड़ का घोटाला करने वाली कांग्रेस पार्टी अब केजरीवाल से इस्तीफ़ा मांग रही है. लेकिन मजे की बात यह है कि नैतिकता के आधार पर न तो शीलाजी ने इस्तीफ़ा दिया और न तो केजरीवाल जी इस्तीफ़ा दे रहे हैं.

यूपी विधानसभा चुनाव परिणाम ने दुनिया भर के राजनीति के पंडितों को चौका दिया है.ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि भाजपा की सफलता अत्यंत अप्रत्याशित व अभूतपूर्व है.यहां मोदी के करिश्मे के बदौलत उसने तीन सौ से अधिक सीटें जीतकर विधानसभा के चुनावी इतिहास के सारे रिकार्ड तोड़ दिया है.ऐसी सफलता वह उस 1991 के राम लहर में भी हासिल नहीं कर पायी थी, जो 2017 में मोदी लहर में अर्जित किया है.राम लहर में उसे 430 में से 221 सीटों पर ही सफलता मिल पाई थी.किन्तु उसने मोदी लहर में 403 में से 325 सीटें जीता है जो तीन चौथाई बहुमत (302) से भी ज्यादा है.सीटों का तीहरा शतक लगाने के क्रम में उसने सपा-कांग्रेस गठबंधन (54 सीटें) से छः गुना और और बसपा (19 सीटें) से 17 गुना अधिक सीटों पर सफलता पाया है.स्वाधीनता के बाद शायद यह पहला अवसर है जब किसी पार्टी को इतनी प्रचंड सफलता मिली है.वैसे 1951-52 के प्रथम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 388 सीटें मिली थीं,किन्तु उस समय यूपी और उत्तराखंड दो अलग राज्य नहीं बने थे एवं सीटों की कुल संख्या 430 थीं.यही नहीं तब एक साथ चार ऐसे दल भी एक साथ चुनाव में नहीं उतरे थे जिन्होंने अलग समय से यहां की सत्ता संभाली.इसी तरह 1977 और 1980 में जनता पार्टी और कांग्रेस ने क्रमशः 352 और 309 सीटें जीता,पर उस समय भी सीटें 430 थीं प्रदेश का विभाजन नहीं हुआ था.ऐसे में कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सफलता विशुद्ध विस्मयकारी है. बहरहाल इस चुनावी विस्मय उबारने के बाद अब पूरी दुनिया की निगाहें उसके द्वारा चुने जाने वाले सीएम चेहरे की ओर टिक गयी है.

ये प्रश्न आज बहुत से लोगों के मन में उठ रहा है और कईंयों के दिलो दिमाग में तूफ़ान पैदा कर रहा है! तथाकथित ‘सेक्युलरिस्टों’ की जमात ने अल्पसंख्यक समुदाय, खासकर मुसलमानों के मन में भगवा रंग और भाजपा के प्रति जैसी धारणा बनादी है,उससे उस समुदाय में यूपी की सरकार और खासकर उसके मुखिया योगी आदित्यनाथ को लेकर आशंकाओं का पैदा होना लाज़मी ही है.हालांकि इस बार के यूपी चुनावों ने अल्पसंख्यकों की इस अवधारणा को ध्वस्त किया है,क्योंकि उन्होंने  भी इस बार भाजपा को वोट किया है,फिर भी ‘छद्म सेक्युलरिस्टों’की जमात मीडिया में अपनी छाती कूट कर भाजपा के खिलाफ एक भय वाला माहोल बनाने में सक्रीय है.

मान्यवर कांशीराम की 83 वीं जयंती पर विशेष लेख... आज बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम की 83 वीं जयंती है, किन्तु उनके अनुसरणकारी बहुत उदास मन से इसका जश्न माना रहे हैं.कारण हर कोई जानता है कि साहब कांशीराम ने भारत में समतामूलक समाज निर्माण के लिए 1984 में जिस पार्टी का गठन किया था ,आज उसके वजूद पर संकट खड़ा हो गया है और यह इससे उबार जाएगी, इसकी फिलहाल सम्भावना भी नहीं दिख रही है.हजारों साल के दासों, शुद्रातिशूद्रों में शासक बनने की महत्वाकांक्षा पैदा करने का चमत्कार घटित करने वाले साहब ने बहुजन समाज के जिन लाखों सक्षम लोगों को ‘पे बैक टू द सोसाइटी’के मन्त्र से दीक्षित कर समाज परिवर्तन के मोर्चे पर लगाया,आज वे बसपा की कल्पनातीत हार से खुनके आंसू रो रहे हैं  हैं;उन्हें चारो ओर अँधेरा ही अँधेरा नजर आ रहा है.बहरहाल निराश-हताश बहुजन अगर इस अँधेरे से निकलना चाहते हैं,तो उन्हें कांशीराम साहब के उस दर्शन का नए सिरे से अध्ययन कर लेना चाहिए,जिसमें सिर्फ उनकी ही नहीं,सम्पूर्ण मानवता की मुक्ति के बीज छिपे हैं.     

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में जाति-राजनीति की भूलभलैया को कैसे पछाड़ा

सत्याकी राय तथा पंकज सिंह

(अनुवादकीय नोट: इस लेख में बहुत अच्छी तरह से बताया गया है कि इस चुनाव में भाजपा ने किस तरह से जाति की राजनीति का इस्तेमाल अपने पक्ष में किया है. दरअसल जाति की राजनीति ने हिंदुत्व की ताकतों को ही मज़बूत किया है. इसका मुकाबला केवल जाति की राजनीति को छोड़ कर वर्गहित आधारित जनवादी राजनीति से ही किया जा सकता है.)

उत्तर और पच्छिम भारत में अपने वर्चस्व को मज़बूत करने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उसके रणनीतिकार दलित जनसख्या के बड़े हिस्से को जीतना चाहते हैं. अब तक यह प्रक्रिया बहुत आसान नहीं रही है. उत्तर प्रदेश की दलित आबादी का एक बड़ा हिस्सा बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती का नियमित वोटर रहा है जिस कारण पिछले कुछ चुनावों में उसके वोट बैंक में बहुत गिरावट नहीं आई है.