एलएन शीतलभारत को जीतने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अनेक अधिकारियों ने भारत का ‘इतिहास’ लिखा। उन्होंने जगह-जगह लिखा कि भारत पर अंग्रेजों से पहले मुसलमानों का राज था। उन्होंने अपनी इस शरारत के जरिये मुसलमानों के दिमाग में एक गलत धारणा बैठा दी, जिसका नतीजा अंतत: यह निकला कि वे बेचारे घमंड, हठधर्मिता और अदम्य महत्वाकांक्षा का शिकार बन गए। इसकी परिणति 1947 में भारत-विभाजन के रूप में सामने आई। ब्रिटिश हुक्मरानों ने कहा कि उन्होंने मुसलमानों के हाथों से हुकूमत ली। इससे बड़ा झूठ तो कोई हो ही नहीं सकता। उन्हें सत्ता हथियाने के लिए मराठों, सिखों और गोरखाओं से खूनी जंगें लडऩी पड़ी थीं। लेकिन सर सैयद अहमद जैसे कई लोगों को ब्रिटिश हुक्मरानों की यह फंतासी खूब रास आई।

अंगरेजों का सबसे बड़ा झूठ

अंगरेजों द्वारा फैलाई गई यह अवधारणा पूरी तरह से असत्य है। सच तो यह है कि शासक और शासक-वर्ग बेशक विदेशी मुसलमान ही थे और उन्होंने हमेशा भारतीय मूल के मुसलमानों को दोयम दर्जे का समझा। इतिहासकार सेतु माधवराव पागड़ी ने नवंबर,1974 में मराठी पत्रिका ‘किर्लोस्कर’ के दीपावली विशेषांक में इस ऐतिहासिक सच पर प्रकाश डाला था। उन्होंने लिखा: ‘जब हम अपने स्कूली दिनों में भारतीय इतिहास पढ़ते थे, तो हमें एक बात को लेकर हमेशा उलझन होती थी। किताबों में इतिहास के तीन कालखंड बताए जाते थे-हिन्दू युग, मुस्लिम युग और ब्रिटिश युग। मेरी समझ में यह नहीं आता था कि हिन्दू युग और मुस्लिम युग तो ठीक, लेकिन ब्रिटिश युग को ‘क्रिश्चियन युग’ क्यों नहीं कहा गया। मुझे अपने स्कूली दिनों में इसका कोई संतोषजनक जवाब कभी नहीं मिला। मेरे कॉलेज के दिनों में भी यह प्रश्न अनुत्तरित ही रहा। जब मैंने विन्सेंट स्मिथ जैसे इतिहासकारों को पढ़ा तो मुझे ब्रिटिश इतिहासकारों की एक और चाल समझ में आई। उन्होंने मुस्लिम युग को 1761 तक रखा है, लेकिन ब्रिटिश युग को 1603 से शुरू दिखा दिया है, तब से जब ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला जहाज सूरत पहुंचा था। मैं 1933 से 1948 तक निजाम की निजामत में रहा और उस दौरान अकसर मुसलमानों को यह कहते हुए सुनता था कि उन्होंने हिन्दुस्तान पर एक हजार साल हुकूमत की। मुझे उनके इस झूठे दावे से बहुत झटका लगता था। मैंने तभी तय कर लिया था कि मैं इसके तथ्यात्मक निष्कर्ष पर अवश्य पहुंचूंगा।’

ऐतिहासिक साजिश

चूंकि विदेशी शासक तुर्क (मौजूदा टर्की से नहीं) थे, इस लिए उनके समय को ‘तुर्की युग’ कहना ज्यादा उचित होगा। ईरान, रूस और चीन के इतिहासों में उनके इतिहासकारों ने ‘तुर्की युग’ का इस्तेमाल किया है। उन्होंने मुस्लिम युग कहीं नहीं कहा। लेकिन भारत में तो अंगरेजों ने ‘तुर्की युग’ को इरादतन और शरारतन ‘मुस्लिम युग’ कह कर देश का नक्शा ही बदल डाला। अंगरेजों की इसी शरारत के चलते भारतीय मुसलमान मुहम्मद गौरी, महमूद गजनवी और औरंगजेब के जुल्मोसितम पर खुश हुए और शिवाजी के हाथों अफजल खां की मौत पर शोकमग्न हुए। उन्हें तुर्की युग में न तो सम्मान मिला और न कोई अहमियत। इसलिए कोई वजह नहीं कि वे उस युग को लेकर व्यर्थ में इतराएं।

ज्यादातर मुसलमानों के पुरखे हिन्दू

ऐसे अनेक जाने-माने मुसलमान हुए हैं, जिनके पूर्वज हिन्दू थे। उदाहरण के लिए उर्दू कवि मुसाफी, इतिहासकार शिबली नेमानी, सर फिरोजखान नून, जुल्फिखार अली भुट्टो, पूर्व हैदराबाद रियासत के प्रधानमंत्री रहे नवाब छतारी और प्रख्यात शायर हाफिज जालंधरी के पूर्वज राजपूत थे, जबकि ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ के रचयिता सर मोहम्मद इकबाल के पुरखे कश्मीरी ब्राह्मण थे। इसी तरह पूर्व हैदराबाद रियासत के प्रधानमंत्री रहे सर अकबर हैदरी के पुरखे गुजरात के हिन्दू थे, पूर्व श्रम मंत्री आबिदअली जफरभाई के पूर्वज कच्छ के हिन्दू थे, क्रान्तिकारी और लेखक उबेदुल्ला सिंधी के पूर्वज सिख थे तथा क्रांतिकारी अब्दुल करीम तो आचार्य कृपलानी के सगे भाई ही थे। अंगरेजों द्वारा लिखे या लिखवाए गए मनगढ़ंत इतिहास ने हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों के मानस पर बहुत बुरा असर डाला। इसके चलते हिन्दुओं के दिलोदिमाग में हीनताबोध भर गया, जबकि मुसलमान अपने अपने छद्म गौरवशाली अतीत के दंभ से भर गए। मुहम्मद अली जिन्ना के पिता हिन्दू थे। खुद गान्धीजी ने 1940 में इस तथ्य का उल्लेख किया था कि सर सिकन्दर हयात खान के पुरखे ब्राह्मण थे। बंगाल के तत्कालीन मुख्यमन्त्री फज़ुल हक के पुरखे भी हिन्दू थे। किसी व्यक्ति ने कभी यह प्रश्न नहीं पूछा कि उन्होंने अचानक यह कहना कैसे शुरू कर दिया कि मुसलमान हिन्दुओं से सर्वथा अलग हैं और उनका अपना अलग इतिहास है, अपनी अलग संस्कृति है, अपने जीवन-मूल्य हैं, अपनी अलग भाषा है और अपनी अलग पहचान है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे जुल्फिकार अली भुट्टो की मां हिन्दू थी। लेकिन उसने धर्म बदलकर इस्लाम अपना लिया और उसी का बेटा ये जनूनी दावे करते नहीं थकता था कि वह हजारों साल तक भारत के खिलाफ जंग लड़ता रहेगा। गुजरात के बोहारियों और मोमिनों, ज्यादातर कश्मीरी मुसलमानों और बांग्लादेश के अधिकतर लोगों की जड़ें निस्संदेह हिन्दुत्व से जुड़ी हैं। कश्मीरी मुसलमानों के उपनाम-पंडित, भट्ट, जुत्शी, किचलू तथा ऐसे ही अन्य उपनाम सहज ही अपनी जड़ों का अहसास करा देते हैं। ये ऐसे असंदिग्ध मुसलमान हैं, जिन्हें निस्संदेह भारतीय ही कहा जाएगा। लेकिन, इसका यह मतलब नहीं कि बाकी मुसलमान भारतीय नहीं हैं। आज सभी मुसलमानों को खुद को भारतीय मानना चाहिए, भले ही उनके पुरखे चाहे जो रहे हों।

शासक तो विदेशी ही थे

यदि हम तटस्थ इतिहास में जाएं तो पाएंगे कि मध्ययुग में चीजें अलग थीं। तब, जिन्होंने हुकूमत की, वे स्पष्टत: विदेशी थे। उन्होंने इस्लाम अपनाने वाले हिन्दुओं और भारत में बस गए व्यापारियों को ‘हिन्दुस्तानी’ कहा। शासकों ने खुद की पहचान तुर्क और पठान के रूप में ही स्थापित की और वे विदेशी धरती यानी हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने में घमंड भी महसूस करते थे। यह सच उन हुक्मरानों के ज्यादा निकट है, जिन्होंने दिल्ली से हुकूमत की। हालांकि वे मजहब से मुसलमान जरूर थे, लेकिन नस्ल से तुर्क, पठान या अफगान थे। इसी वजह से आम बोलचाल में मुसलमानों का एक नाम-‘तुर्क’ भी प्रचलित हो गया । कन्नड़, तेलुगु और उर्दू भाषाओं में मुसलमानों को ‘तुर्क’ ही कहा गया है। मध्यकाल में हिन्दी भाषा में मुसलमानों को ‘तुर्क’ ही कहा जाता था। उदाहरण के लिए-‘तुम तो निरे तुर्क भये’। इस तरह अस्वच्छ या आवारागर्दों को तुर्क का संबोधन देते हुए हिकारत से देखा जाता था।

ऐसे हुआ अरब हुकूमत का विस्तार

अरब भारत में व्यापारी के रूप में आए थे। उन्होंने पश्चिमी तट पर बस्तियां बसाईं, लेकिन उनका तत्कालीन राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं था। अरबों ने बगदाद के खलीफा के आदेश पर ही सिंध पर हमला किया था। सन् 710 में मुहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर को हराया। अरबों ने भारत के दूसरे हिस्सों पर भी हमले किए, लेकिन दिल्ली के गुर्जर प्रतिहारों, चित्तौड़ के बप्पा रावल और गुजरात के चालुक्यों ने उन पर अंकुश बनाए रखा। इस तरह अरबों ने सिंध पर सैकड़ों साल राज किया। बाद में सिंध पर तुर्कों ने हुकूमत की। मुहम्मद तुगलक (1324-1350) के शासनकाल में एक अरब शहजादे ने तमिलनाडु में मदुराई के पास अपना राज्य कायम किया। लेकिन उसकी एक-दो पीढिय़ां ही शासन कर पाईं। दौलताबाद (देवगिरि) के राजा ने उसके राज्य को जीत लिया। सन् 1354 में विजयनगर के हिन्दू शासकों ने उस राज्य को अपने राज्य में मिला लिया। इन दो उदाहरणों को छोडक़र भारत के अन्य किसी भाग पर अरबों ने राज नहीं किया। हालांकि सैकड़ों परिवार भारत आकर बस जरूर गए। हम उन्हें उनके नामों से आसानी से पहचान सकते हैं।

उदाहरण के लिए, ‘सय्यद’ को लीजिए। पैगंबर मोहम्मद की बेटी फातिमा की शादी अली से हुई थी। फातिमा ने दो बेटे जन्मे-हसन और हुसेन। उन्हीं के वंशज सय्यद कहलाते हैं। प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ (1707-1720) के समय में हुए सय्यद बंधुओं, अलीगढ़ आंदोलन के प्रणेता, कांग्रेस से मुसलमानों की दूरी बनाने वाले और मुसलमानों के लिए अलग दर्जे की मांग करने वाले सर सय्यद अहमद खान, अब्दुल कलाम आजाद तथा कई सूफी संत सय्यद ही थे। हुसेन के उत्तराधिकारियों में दस गुरु हुए। उन्हें ‘इमाम’ कहा जाता था। उनके नाम थे-मूसा, रिज़ा, नकी, जफर आदि-आदि। आगे चलकर उनके नामों के आधार पर उपनाम बने-मुसाबी, रिज़वी, नकवी, जाफरी आदि-आदि। सय्यदों को मुसलमानों के बीच बहुत ज्यादा इज्जत हासिल थी, ठीक उसी तरह जैसे हिन्दू राजा ब्राह्मणों का सम्मान करते थे। तुर्क और पठान शासक भी सय्यदों की बेहद इज्जत करते थे। पैगंबर मुहम्मद का जन्म कुरेश कबीले में हुआ था। उसी के आधार पर कुरेशी उपनाम प्रचलित हुआ। वे व्यापारी हुआ करते थे, इस लिए हाशमी नाम चला। जब पैगंबर मोहम्मद की स्थिति मजबूत नहीं थी, तो उन्हें मक्का से खदेड़ दिया गया था और उन्हें मदीना में शरण लेनी पड़ी थी। उनके प्रति जिनका व्यवहार सद्भावपूर्ण था, वे अंसारी (यानी अरबों के मित्र) कहलाए। अली के कुछ वंशज अलवी कहलाए। खलीफा उमर के वंशज फारुखी और खलीफा अबू बकर के वंशज सिद्दिकी कहलाए। ये कुछ ऐसे परिवार थे, जो भारत में आकर बस गए। इस लिए अरबों के साथ ऐसा कुछ नहीं जुड़ा है, जिसपर वे शासक होने का घमंड कर सकें। उपर्युक्त दो अपवादों को छोड़ दें तो भारत में कोई भी अरब शासक, सूबेदार या बड़ा सिपहसालार नहीं हुआ।

कौन थे तुर्क?

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक तुर्किस्तान, अफगानिस्तान, ईरान और रूस के विभिन्न कबीलों के लोग ही तुर्क कहलाए। उनका उद्भव मध्य एशिया में हुआ। बहुत से लोगों को तुर्कों और मंगोलों को लेकर भ्रम है। ये दोनों सदियों तक दुश्मन रहे। मंगोलों का उद्भव उत्तरी चीन के मंगोलिया से हुआ। चंगेजखान (1162-1227) का नाम किसने नहीं सुना? उसी का पोता कुबलई खान (1216-1294) चीन का पहला मंगोल सम्राट था। वे मंगोल तो थे, लेकिन मुसलमान नहीं। एक समय (तेरहवीं और चौदहवीं सदी) में तो मंगोलों ने इराक तथा पूर्वी रूस से लेकर चीन सहित कोरिया तक के इलाकों को जीत लिया था। तुर्क, तूरानी, उज़बेक, और तुर्कमान एक दूसरे के पड़ौसी कबीले थे। वे उज़बेकिस्तान (ताशकंद, समरकंद और बुखारा), तुर्कमेनिस्तान, चीन के शिंकियांग प्रांत (यरकंद, कशगर व खोहान) और अफगानिस्तान के बल्ख और बहरूशन इलाकों से आए थे। नौवीं शताब्दी में अरबों द्वारा मध्य एशिया जीत लिये जाने के बाद तुर्कों ने इस्लाम कुबूल कर लिया था। तब तुर्क बगदाद के खलीफा की फौज में शामिल हो गए और समूचे अरब साम्राज्य में फैल गए। समय बीतता गया और खलीफा नाम मात्र के शासक रह गए। तब तुर्क पश्चिम में फैले। आज के तुर्की की स्थापना तुर्कों ने ही की थी। तब, बहुत से तुर्कों ने खलीफा की खिदमत नाम भर के लिए कुबूल की थी और खुद शासक बन बैठे थे। महमूद गजनवी ऐसा ही शासक था।

भारत में ऐसे आए तुर्क

महमूद गजनवी ऐसा पहला तुर्क था, जिसने उत्तरी भारत पर 17 बार हमले किए। अंतिम हमले में उसने सन् 1026 में गुजरात के प्रख्यात सोमनाथ मंदिर को तहस-नहस कर डाला। उसकी मौत के समय तुर्की शासकों ने पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त और सिन्ध पर कब्जा जमा लिया। महमूद के उत्तराधिकारियों ने सन् 1190 तक राज किया। तब तक मुहम्मद गौरी नामक तुर्क ने गजनी साम्राज्य पर कब्जा कर लिया और दिल्ली पर हमला बोल दिया। सन् 1192 में थानेसर की लड़ाई में उसने पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया और वह दिल्ली-अजमेर का शासक बन गया। गौरी के एक सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुलाम वंश की नींव डाली। कुतुबुद्दीन के उत्तराधिकारी थे-अल्तमश, रजि़या, नसीरुद्दीन और बलबन। वे सब के सब तुर्क थे। उनके ज्यादातर सरदार भी तुर्क थे। कुछ सरदारों के पुरखे पीढिय़ों पहले अफगानिस्तान में आ बसे थे और इस तरह वे अफगान हो गए थे। इतिहास की किताबों में उन्हें तुर्की अफगान कहा गया है।

गुलाम वंश के तुर्कों ने पूरब में बंगाल तक हिन्दू राजाओं को हराते हुए अपनी सल्तनत का विस्तार किया। गुलाम वंश के बाद खिलजी वंश ने 1290 से लेकर 1324 तक हुकूमत की। इस वंश के सबसे मशहूर सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 1296 से 1316 के बीच मालवा, गुजरात और महाराष्ट्र को फतह किया तथा आन्ध्र, कर्नाटक व तमिलनाडु के राजाओं पर भारी कर थोपे। उसकी मौत के बाद गद्दी के लिए खून की होलियां खेली गईं और तख्तोताज के कई दावेदारों की हत्या कर दी गई। अंतत: सत्ता के लिए चले खूनी खेल का अंत कुतुबुद्दीन मुबारिक खान खिलजी की जीत से हुआ, जिसने चार साल हुकूमत की। सत्ता की यह जंग 1320 में फिर सामने आई, जब हिन्दू से जबरन मुसलमान बनाए गए खुसरो ने अलाउद्दीन खिलजी के बेटे मुबारक का कत्ल करके तख्त पर कब्जा कर लिया और खुद को शासक घोषित कर दिया। लेकिन पूरा भारत उस समय अचंभित रह गया जब खुसरो ने खुद को पुन: हिंदू घोषित कर दिया। हालांकि एक साल के भीतर ही गयासुद्दीन तुर्क ने खुसरो को हरा दिया और दिल्ली पर तुर्कशाही बहाल की। उसके बेटे मुहम्मद तुगलक ने सन् 1324 से लेकर 1350 तक हुकूमत की और एक बार तो उसने दक्षिण में मदुरै तक अपने साम्राज्य का विस्तार कर डाला। लेकिन मुहम्मद तुगलक के ही दिनों में उसकी हुकूमत डगमगाने लगी थी। सन् 1347 में एक तुर्क अफगान अलाउद्दीन हसन गंगू बहमनी ने दक्षिण भारत में अपना राज्य कायम कर लिया था। इस तरह बहमनी साम्राज्य का अभ्युदय हुआ।

विजयनगर साम्राज्य

हरिहर और बुक्काराय नामक दो युवकों का जबरिया धर्मांतरण कराके दिल्ली ले जाया गया। वे दोनों मुहम्मद तुगलक के इतने ज्यादा विश्वासपात्र बन गए कि उसने उन्हें सन् 1331 में एक जंग फतह करने के लिए दक्षिण भेज दिया। लेकिन कुछ हिन्दू योद्धाओं की मदद से वे बच निकले और शंकराचार्य विद्यारण्यस्वामी की प्रेरणा से वे पुन: हिन्दू बन गए। उन दोनों योद्धाओं ने ही सन् 1336 में शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य स्थापित किया। विजयनगर साम्राज्य की पताका दो सौ साल से भी ज्यादा सन् 1565 तक फहराई। उधर, मुहम्मद तुगलक के उत्तराधिकारी फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली में सत्ता संभाली। उसके शासनकाल में कई स्वतंत्र राज्य स्थापित हुए। कश्मीर में तुर्कों ने राज्य कायम किया, जबकि बंगााल में पहले तुर्कों ने, फिर बाद में अफगाानों ने राज किया। दक्षिण में अफगान बहमनी शासक थे ही। मालवा का शासक दिलावर खान खिलजी (अफगान)था। खानदेश के शासक (1370-1599) खुद को द्वितीय खलीफा उमर फारुख का वंशज बताते थे।

बहमनी साम्राज्य टुकड़े-टुकड़े

सन् 1489 में बहमनी साम्राज्य पांच हिस्सों में बंट गया। बीजापुर का यूसुफ आदिलशाह एक तुर्क था, जो इस्तांबुल से भाग कर आया था। गोलकुंडा का सुल्तान कुली कुतुब (कुतुबशाह) तुर्क था, जो उत्तरी ईरान से भाग कर आया था। बीदर का कासिम बेरिद (बेरिदशाह) पूर्व सोवियत संघ के एक राज्य जाॢजया से आया था। नगर का शासक निजामशाह मूलत: एक ब्राह्मण था। यही नहीं, बरार का भैरवभट इमादशाह भी मूलत: ब्राह्मण ही था, जिसका उल्लेख बीएम पुरंदरे ने अपनी पुस्तक ‘राजा शिवाछत्रपति’ के 1974 संस्करण के पेज 34 पर किया है। ऐसे ही कई अन्य उदाहरण भी हैं। गुजरात के सुल्तान मूलत: राजपूत थे। बंगाल में एक जमींदार राजा गणेश अंतत: राजा बन बैठा। लेकिन उसके उत्तराधिकारियों ने इस्लाम कुबूल कर लिया और उसकी दो पीढिय़ों ने राज किया। लेकिन किसी देशी मुसलमान के शासक बनने का एक भी उदाहरण कहीं नहीं मिलता। जब दिल्ली पर तुगलक हुकूमत कर रहे थे, तैमूरलंग ने उत्तर भारत पर चढ़ाई की और जमकर जुल्मोसितम ढाए। तैमूरलंग के नुमाइंदे के तौर पर एक सैयद परिवार के सूबेदार ने दिल्ली की हुकूमत संभाली। लेकिन सन् 1456 में बहलोल लोधी नामक एक अफगाान ने उसे सत्ता से बेदखल कर दिया और खुद शासक बन बैठा। तैमूरलंग के वंशज बाबर ने सन् 1526 में इब्राहीम लोधी को पराजित किया और दिल्ली में मुगल सत्ता स्थापित की। बाबर तुर्क था। उसने हजारों हिन्दुओं को तलवार के जोर पर इस्लाम कुबूल करने के लिए विवश किया। लेकिन विदेशी मुस्लिम शासकों द्वारा उन्हें हमेशा राजनीतिक सत्ता से सदैव दूर रखा गया। मजे की बात तो यह कि दो पीढिय़ों के अंतराल पर विदेशी मुसलमानों के वंशज नव आगत विदेशी मुसलमानों को हेय दृष्टि से देखने लगते थे। और इस तरह नए-नए धड़े बनते रहे, खंूरेजी होती रही और राज्य बनते बिगड़ते रहे।

दक्षिण का परिदृश्य

बहमनी साम्राज्य (1347-1489) के दिनों में और उसके बाद ईरान तथा इराक से बड़ी संख्या में मुसलमान भारत आए। बहमनी सुल्तानका प्रधानमंत्री ख्वाजा महमूद गवां उत्तरी ईरान के गिलान से आया था। जनरल वलफ हसन बसरी एक इराकी था। बहमनियों का गुरु नियामतुल्ला ईरान के किरमान इलाके से आया था। बेलगाम में उनका जनरल सरदार असद खान एक ईरानी था। बीजापुर का वजीर रफीउद्दीन शिराजी एक ईरानी था। नगर के आला अफसर सलाबत खान और चंगेज खान तुर्क थे। अहमदनगर के निजाम का वजीरेआला मलिक अंबर (1605-1626) एक इथिओपियाई था। यह सूची अंतहीन है। ये विदेशी अफाफी कहे जाते थे। बहमनी साम्राज्य के बाद के दिनों का इतिहास अफाफियों और दक्षिण भारतीय मुसलमानों के बीच हुए खूनखराबे से भरा पड़ा है। और इस तरह, ख्वाजा मुहम्मद गवान और निजामुलमुल्क नगर की निजामशाही में मारे गए। फिर तो खूनखराबे का एक लंबा सिलसिला चला। प्रख्यात इतिहासकार फरिश्ता एक अफाफी था और उसे जान बचाकर भागना पड़ा था।

भारतीय मुसलमानों की बदहाली

मराठा संत एकनाथ (सन् 1586) ने लिखा: ‘लोग बदहाली के इस कदर शिकार थे कि वे ईद के मौके पर तुर्की शासकों की जूठन भी चाव और शान से खाते थे।’ संत एकनाथ ने तुर्क शब्द का बिल्कुल सटीक इस्तेमाल किया। वह जानते थे कि शासक तुर्क थे, न कि भारतीय मुसलमान। शिवाजी के पिता शाहजी एक महान योद्धा थे। बीजापुर के आदिलशाह के आदेश पर उन्हें मुस्तफा खान, अफजल खान, और बाजी घोरपड़े ने धोखे से कैद कर लिया। शिवाजी ने शाहजहां से परदे के पीछे संपर्क किया और अपने पिता को मुक्त करा लिया। लेकिन, शाहजी अपने अपमान को भूले नहीं। बाजी घोरपड़े के बारे में उन्होंने अपने बेटे शिवाजी को लिखा: ‘मेरे बेटे, वह बाजी घृणित तुर्कों की साजिश में शामिल हो गया और उसने मुझे धोखा दिया। तुम उससे बदला जरूर लेना।’ शाहजी ने शब्द ‘तुर्क’ का इस्तेमाल किया, ‘मुसलमान’ शब्द का नहीं। साफ था कि शासक एक तुर्क था। शिवाजी ने अक्तूबर, 1664 में एक खुली लड़ाई में बाजी घोरपड़े को मार डाला। जब भारतीय मुसलमान बदहाली के इस कदर शिकार थे, तब विदेशी मुसलमानों के बढ़ते सैलाब को उत्तर में राजपूतों और दक्षिण में विजयनगर के राजाओं ने रोका। मुस्लिम शासकों ने कभी भी अपने आप को भारतीय नहीं कहा। समय के बदलाव के दौर में मंगोलों यानी मुगलों और तुर्कों में वैवाहिक संबंध कायम हुए तथा चगताई तुर्कों अथवा मुगलों की एक नस्ल पैदा हुई। लेकिन शुरुआती दौर में उन्हें अन्य मुसलमानों ने खूब घृणा की नजरों से देखा। दिल्ली में अलाउद्दीन खिलजी ने उनका कत्लेआम तक किया।

तुर्कों ने खुद को विदेशी ही माना

बाबर मध्य एशिया (उजबेकिस्तान) के फरगना प्रांत का एक तुर्क था। उसकी मातृभाषा तुर्की थी। उसकी जीवनी भी तुर्की में है। उसमें उसने भारत के मुसलमानों सहित सभी समुदायों को ‘हिन्दुस्तानी’ कह कर संबोधित किया है। बाबर के पोते अकबर की मां का नाम हमीदाबानू था, जो ईरानी थी। अकबर ने कश्मीर, सिन्ध, मालवा, गुजरात, बंगाल और खानदेश को फतह किया, जबकि उन सबके शासक मुस्लिम थे। इसी तरह, शाहजहां ने नगर को फतह किया, जिसका शासक मुसलमान था। औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुंडा को फतह किया। मुगल विदेशी थे, तुर्क थे। यहां तक कि बीजापुर और गोलकुंडा के शासकों ने भी उन्हें विदेशी ही माना। अकबर का जन्म सिंध के अमरकोट में हुआ था। जहांगीर आगरा के पास फतेहपुर सीकरी में जन्मा था। शाहजहां लाहौर और औरंगजेब गुजरात के दाहोद में जन्मे थे। इसके बावजूद उन्होंने खुद को तुर्क ही माना। उन्होंने खुद की पहचान हिन्दुस्तान के बादशाह के रूप में ही स्थापित की। उन्होंने खुद को कभी हिन्दुस्तानी नहीं कहा। भारतीय मुसलमानों को संबोधित करते हुए वे कहा करते थे: ‘हम तुर्क हैं और तुम लोग हिन्दुस्तानी हो।’ औरंगजेब ने ये अल्फाज कई बार इस्तेमाल किए। शाहजहां ने मध्य एशिया के बल्ख और बुखारा प्रांतों को फतह करने के लिए करोड़ों रुपए फूंक दिए, क्योंकि वह उन्हें अपनी मातृभूमि का हिस्सा मानता था। सन् 1653 से 1708 तक भारत में रहा एक इतालवी यात्री निकोलाओ मनूसी मुगल शहजादों की शिक्षा के बारे में बताता है: ‘पांच वर्ष की अवस्था से ही उनके लिए शिक्षक नियुक्त कर दिए जाते हैं। उन्हें तुर्की भाषा सिखाई जाती है, क्योंकि यही उनकी मातृभाषा है।’

विदेशी आते गए, सत्ता हथियाते गए

भारत में बाहर से आने वालों का सिलसिला लंबे समय तक चला। भारतीय मुसलमानों की भाषा फारसी नहीं थी। आज की उर्दू से मिलती-जुलती हिन्दुस्तानी थी। मुगलों के समय सरकारी कामकाज की भाषा फारसी थी। मुगलों का पतन होने तक आम बोलचाल की भाषा हिन्दुस्तानी बनी रही। मुगलों के समय मध्य एशिया से हजारों तुर्कों के आने का सिलसिला जारी रहा। ईरानी भी बड़ी संख्या में भारत आए। सन् 1540 में शेरशाह सूरी से हारने के बाद हुमायूं ईरान गया था और वहां के तत्कालीन शासक से मदद मांगी थी। ईरान के बादशाह ने हुमायूं के साथ अपने फौजी दस्ते भेजे थे, जिनकी मदद से हुमायूं ने 1955 में सत्ता वापस हासिल की थी। इस तरह इन 15 वर्षों की अवधि में सत्ता पर अफगान एक बार फिर काबिज रहे। हुमायूं की वापसी के बाद वजीरों, क्षेत्रीय सूबेदारों, फौजी अफसरों आदि के सभी अहम ओहदों पर तुर्क या ईरानी ही काबिज रहे। जहां तक शेरशाह सूरी का ताल्लुक है, उसका दादा बहलोल लोधी के समय में नौकरी की खोज में भारत आया था। और...दिल्ली की हुकूमत को कब्जे में लेने के लिए उसने फौज कैसे खड़ी की थी? उसने देश के हर हिस्से से अफगान सिपाहियों को बुलावा भेजा और उन्हें ऊंचे से ऊंचे ओहदे दिए। अफगान दस्तों के सिपाही प्राय: एक ही नस्ल या कबीले के होते थे। यही वजह थी कि उनकी वफादारी अपने ही कबाइली सरदार के प्रति होती थी न कि शहंशाह के प्रति। इसका उल्लेख वीडी महाजन की ‘मुगल रूल इन इंडिया’ के 1982 के संस्करण के पेज 46 पर देखा जा सकता है।

इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के 1977 संस्करण में लिखा है: ‘1556 से 1605 तक हुकूमत करने वाले अकबर की फौज में मुगल, ईरानी, तुर्क, उजबेक और अफगान थे।’ उसमें देशी मुसलमानों को जगह कहां थी? कुछ और उदाहरण देखिए। एक ईरानी गयास बेग अकबर के आखिरी दिनों में भारत आया था। उसकी बेटी मेहरुन्निसा यानी नूरजहां की शादी जहांगीर से हुई थी। गयास बेग का बेटा यानी नूरजहां का भाई आसफ खान जहांगीर का वजीरेआजम था। शाहजहां की हुकूमत में भी वह वजीरेआजम बना रहा। उसका दूसरा बेटा इतिकाद खान 1633 में दिल्ली का सूबेदार था। आसफ खान का बेटा ही वह शाइस्ता खान था, जिसकी उंगलियां 1663 में शिवाजी के हमले में कट गई थीं। वह शाहजहां और औरंगजेब की हुकूमतों में अहम ओहदों पर रहा। शाइस्ता खान का बेटा बुज़ुर्ग उम्मेद खान 1683 से 1692 तक बिहार का सूबेदार रहा। नूरजहां की भतीजी यानी आसफखान की बेटी मुमताज उल जमानी शाहजहां की बेगम थी। दूसरी भतीजी एक अन्य वजीरे आजम मुहम्मद जफर को ब्याही थी। तीसरी भतीजी औरंगजेब के वजीरेआजम असदखां की बेगम बनी थी। एक दौर ऐसा भी आया जब नूरजहां के रिश्तेदारों के नियंत्रण में मुगलिया हुकूमत का आधा हिस्सा था।

इसी तरह, औरंगजेब का एक खास सिपहसालार मीर शिहाबुद्दीन अक्तूबर, 1669 में समरकंद से अपनी किस्मत आजमाने दिल्ली दरबार में आया था। मिर्जा मिउज़ा ईरान के मशहद से आया था। उसकी शादी औरंगजेब की एक साली से हुई थी। उसका बेटा मुसई खान 1688 में सरकारी खजाने का दीवान बना और 1689 में उसे दक्खन का दीवान बनाया गया। इसी तरह, मुहम्मद अमू खान 1687 में बुखारा से भारत आया था। उसे 1698 में सद्र, 1706 में चिन बहादुर और 1707 में 4000 घुड़सवारों का सालार बनाया गया। ऐसा ही एक लड़ाकू मीर जुमला था, जो गोलकुण्डा का वजीरेआजम बनने में कामयाब हुआ। बाद में उसने गोलकुण्डा के सुल्तान से गद्दारी की और शाहजहां के आखिरी दिनों में मुगलों से आ मिला। उसके बेटे मुहम्मद अमीन खान हाफिज को औरंगजेब ने मीर बख्शी यानी घुड़सवारों की सेना का प्रमुख बनाया। बाद में उसे सूबेदार बनाकर गुजरात भेज दिया गया। वह इस पद पर 1672 से 1682 तक रहा। प्रख्यात इतिहासकार सरदेसाई अपनी किताब ‘न्यू हिस्टरी ऑफ मराठाज़’ में लिखते हैं: ‘निज़ाम अली का वज़ीर यानी मुशीर-उल-मुल्क गुलाम सैयद खान ईरान से आया था और 1754 के आसपास निज़ाम के प्रधानमंत्री सलाबत जंग के अधीन नौकरी पाने में कामयाब रहा था। वह 1775 में नंबर एक वजीर बनने में कामयाब रहा। अलावर्दी खान नामक एक तुर्क 1726 में हिन्दुस्तान आया था और उसे तत्कालीन मुगल सम्राट ने महाबत जंग की पदवी देते हुए अपना प्रधान सैन्य अधिकारी नियुक्त किया। इसी तरह एक चतुर ईरानी मीर हबीब शिराज से आया था और वह 1740 में उड़ीसा का नायब सूबेदार बनने में कामयाब हुआ।

औरंगजेब की दक्खन की कुछ मुहिमों (1682-1707) के बारे में बताते हुए पागड़ी लिखते हैं: ‘विशालगढ़ को फतह करने की मुहिम को मतलब खान ने अंजाम दिया था, जो औरंगजेब की बेगम दिलरसबानू का संबंधी था। मुहिम में उसका साथी था मुहम्मद अमीन खान नामक तुर्क था, जो 3000 सिपाहियों का सालार था। वह 1686 में बुखारा से भारत आया था। उसका चचेरा भाई गाज़ीउद्दीन फिरोजजंग मुगलों का एक सिपहसालार था। आदिलशाह के जिस सेनापति सिद्दी जौहर ने 1660 में शिवाजी पर हमला किया था, वह इथिओपियाई था। शिवाजी के इलाके पर हमला करने के लिए औरंगजेब ने मिजऱ्ा राजा जयसिंह और एक पठान दिलेरखां को भेजा। औरंगजेब के दरबार में 75 फीसदी से ज्यादा दरबारी तुर्कों या ईरानियों की पहली या दूसरी पीढ़ी के थे। पहला निजामुलमुल्क (1671-1748) औरंगजेब के समय में अपने पिता गाजी उद्दीन फिरोजजंग के साथ मध्य एशिया यानी उजबेकिस्तान के बुखारा से आया था। वह औरंगजेब की मौत के महज छह साल बाद 1713 में दक्खन का सूबेदार बन गया। लखनऊ का पहला नवाब सादतखान पूर्वी ईरान के मशहद से आया था। बंगाल का नवाब और 1757 में पलासी के युद्ध में अंगरेजों से हारने वाले सिराजुद्दौला का दादा अलीवर्दी खां ईरान से आया था। सर सैयद अहमद खां के पुरखे अफगानिस्तान के हिरात से भारत आए थे। भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसेन के पूर्वज शिक्षक थे और वे 1712 में अफगानिस्तान से भारत आए थे।’

ईरानियों का वर्चस्व

‘ताज महल बनाने के लिए 20 हजार लोग 22 साल तक दिनरात जुटे रहे’-अपने इस वाक्य के लिए मशहूर हुआ फ्रांसीसी जवाहरात व्यापारी टेवरनिअर बताता है: ‘यहां तक कि सरदार ईरानी भगोड़े हैं, जिनकी जन्मभूमि हिन्दुस्तान नहीं है और जो दिल के बहुत छोटे हैं। ऐसे तंगदिल लोगों को उन लोगों का साथ मिल गया, जिन्होंने इस धरती को अपना सर्वस्व दे डाला।’ वह आगे लिखता है: ‘मैंने कहीं उल्लेख किया है कि मुगलों की रियाया में शामिल देशी मुसलमानों में से महज कुछ मुसलमानों को ही बड़े ओहदे हासिल थे, और यही वजह थी कि अनेक ईरानी लोग किस्मत आजमाने हिन्दुस्तान चले आए। चालाक होने के नाते वे मरने-मारने के धन्धे में मौके हथियाने में कामयाब हो गए हैं। इसी के चलते, न केवल मुगल साम्राज्य, बल्कि गोलकुण्डा और बीजापुर सल्तनतों में भी उन्हें अहम सरकारी ओहदे हासिल हो गए हैं।’

औरंगजेब के दरबार में 1658 से 1665 तक रहा फ्रांसीसी डॉक्टर बर्निअर बताता है: ‘ज्यादातर दरबारी ईरानी हैं। खुद मुगल सम्राट भी तो विदेशी ही हैं। मुगल दरबार का वास्तविक स्वरूप उसके शुरूआती स्वरूप जैसा नहीं रह गया है। अब तो वह उजबेकों, ईरानियों, अरबों और तुर्कों या आम तौर पर मुगल बन बैठे उनके वंशजों की खिचड़ी की मानिंद है। विदेशियों की तीसरी या चौथी पीढ़ी के बच्चों का रंग गेहुंआ है, और वे इस मुल्क के देशी मुसलमानों जैसे आलसी हो गए हैं, उन्हें नव आगंतुक विदेशियों की तुलना में कहीं कम सम्मान मिलता है। उन्हें हुकूमत के मामलों में कभी-कभार ही शामिल किया जाता है। उन्हें अगर पैदल या घुड़सवार सेना में मौका मिल जाता है तो वे खुद को बहुत खुशकिस्मत मानते हैं।’ जब उनका यह हाल था, तो समझा जा सकता है कि मूल देशी मुसलमानों की हालत क्या रही होगी। अगर किसी उमरा की उमरावी लंबी चल जाती थी तो वह अपनी औलादों को ज्यादा से ज्यादा शाही सुविधाएं दिलवा देता था। अगर वे सलीकेदार हो जाते थे तथा उनका रंग साफ होता था और शक्लोसूरत से अच्छे होते थे, तो अंतत: वे मुगल बन जाते थे। इन निष्पत्तियों की पुष्टि कई ऐतिहासिक दस्तावेज करते हैं।

मुगलों और पठानों में कट्टर दुश्मनी

पागड़ी ने 1974 में पानीपत के मैदान का दौरा किया था। वह लिखते हैं: ‘मुगलों और पठानों में कट्टर दुश्मनी थी। औरंगजेब मराठों का दमन करने के लिए दक्खन गया, जहां वह 1682 से लेकर 1707 में अपनी मौत होने तक रहा। मराठे अंतत: विजयी रहे। लेकिन दक्खन में औरंगजेब के लंबे प्रवास के चलते पठानों को हजारों की संख्या में गंगा और यमुना के बीच के पश्चिमी इलाके यानी दोआब में फैलने पसरने का मौका मिल गया। इस दौरान बरेली के हाफिज रहमत खान, पीलीभीत के इंदे खान, अली मुहम्मद खान, फर्रुखाबाद के मुहम्मद बंगश, और इन सबमें सबसे ज्यादा खतरनाक नजीबाबाद के नजीब खान जैसे कई इलाकाई सरदारों का उदय हुआ। नजीब खान ने ही काबुल के अहमदशाह अब्दाली को दिल्ली पर चढ़ाई करने का न्योता दिया था। इसके चलते 1761 में पानीपत का युद्ध हुआ। मराठों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला का साथ दिया। मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ ने लिखा: ‘इन पठानों ने हिन्दुओं से कहीं ज्यादा हिन्दुस्तानी मुसलमानों को हेय समझा।’ मनूसी लिखता है: ‘पठान सिन्धु नदी के पार यानी पश्चिम या उत्तर में रहते हैं। मुगल हमेशा पठानों से चौकस रहते हैं, क्योंकि पठानों को इस बात की तकलीफ रहती है कि वे कभी दिल्ली पर हुकूमत किया करते थे। लिहाजा मुगल और पठान एक साथ नहीं रह सकते और उनके बीच रोटी-बेटी के रिश्ते तो होते ही नहीं हैं। हालांकि पठानों में भी खेमेबाजी है।’ निज़ाम के दरबार में पेशवा के दूत गोविंदराव काले ने 1793 में नाना फडऩवीस को लिखा: ‘अटक (रावलपिण्डी के निकट) से लेकर बंगाल की खाड़ी और हिन्द महासागर तक की जमीन हिन्दुओं की है, न कि तुर्कों की।’ इस तरह मराठे तुर्कों के खिलाफ लड़ रहे थे, जो कि विदेशी हुक्मरान थे, न कि भारतीय मुसलमानों के खिलाफ।

अंबेडकर के भ्रम

डॉ. भीमराव अंबेडकर 1946 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ में दो उदाहरण देते हैं। पहला उदाहरण-ख्वाजा हसन निज़ामी ने 1928 में हिन्दू-मुस्लिम संबंधों पर जारी एक घोषणापत्र में ऐलान किया कि मुसलमान हिन्दुओं से अलग हैं। वे हिन्दुओं से नहीं मिल सकते। मुसलमानों ने कई जंगों में खून बहाने के बाद हिन्दुस्तान पर फतह हासिल की थी और अंगरेजों को हिन्दुस्तान की हुकूमत मुसलमानों से मिली थी। मुसलमान एक अलहदा कौम हैं और वे अकेले ही हिन्दुस्तान के मालिक हैं। वे अपनी अलग पहचान कभी भी खत्म नहीं करेंगे। उन्होंने हिन्दुस्तान पर सैकड़ों साल राज किया है। इस लिए मुल्क पर उनका निॢववाद और नैसॢगक हक है। दुनिया में हिन्दू एक छोटा समुदाय हैं। वे गान्धी में आस्था रखते हैं और गाय को पूजते हैं। हिन्दू स्व-शासन में यकीन नहीं रखते। वे आपस में ही लड़ते झगड़ते रहे हैं। वे किस क्षमता के बूते हुकूमत कर सकते हैं? मुसलमानों ने हुकूमत की थी, और मुसलमान ही हुकूमत करेंगे?...(टाइम्स ऑफ इंडिया 14 मार्च, 1928)

दूसरा उदाहरण-सन् 1926 में एक विवाद खड़ा हुआ कि 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में वास्तविक जीत किसकी हुई थी? मुसलमानों का सच यह था कि युद्ध में उनकी भारी जीत हुई थी। एक तरफ अहमद शाह अब्दाली और उसके एक लाख सैनिक थे तथा दूसरी तरफ मराठों के 4 से 6 लाख सैनिक थे। इसके जवाब में हिन्दुओं ने कहा कि भले ही वक्ती तौर पर वे पराजित हुए थे, लेकिन अंतिम जीत उनकी ही हुई थी, क्योंकि उस जंग ने भविष्य के तमाम मुस्लिम हमलों को रोक दिया। मुसलमान हिन्दुओं के हाथों हार मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने दावा किया कि वे हिन्दुओं पर हमेशा भारी साबित होंगे। हिन्दुओं पर मुसलमानों की पैदाइशी श्रेष्ठता साबित करने के लिए नजीबाबाद के मौलाना अकबर शाह खान ने पूरी संजीदगी के साथ पेशकश की कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जंग होनी चाहिए-परीक्षणकारी स्थितियों में पानीपत की चौथी जंग उसी जंग के मैदान में।

मौलाना ने अपनी धमकी पर अमल करके यह कहते हुए पंडित मदन मोहन मालवीय को चुनौती दी: ‘मालवीय जी! यदि आप पानीपत की जंग के नतीजों को लेकर झूठे दावे जारी रखते हैं तो मैं इसके लिए एक आसान और शानदार तरीका बता सकता हूं। आप अपने सुविख्यात असर और रसूख का इस्तेमाल करते हुए ब्रिटिश सरकार को इस बात के लिए राजी करें कि वह पानीपत के चौथे युद्ध की इजाजत दे, जिसमें सरकार के दखल की कोई गुंजाइश न हो। मैं हिन्दुओं और मुसलमानों के जुझारूपन और हौसले के तुलनात्मक परीक्षण को तैयार हूं। भारत में सात करोड़ मुसलमान हैं। मैं तयशुदा तारीख पर 700 मुसलमान लेकर पानीपत के मैदान में पहुंच जाऊंगा। वे 700 मुसलमान भारत के सात करोड़ मुसलमानों की नुमाइंदगी कर रहे होंगे। और, चूंकि देश में हिन्दुओं की संख्या 22 करोड़ है, लिहाजा आप 2200 हिन्दुओं को मैदान में ला सकते हैं। वाजिब यह होगा कि युद्ध में लाठियों, मशीनगनों और बमों का इस्तेमाल न करके उनकी जगह तलवारों, भालों, तीर-कमानों और छुरों का इस्तेमाल किया जाए। अगर आप हिन्दू सेना के सर्वोच्च सेनापति का पद स्वीकार नहीं कर सकते तो यह पद सदाशिवराव या विश्वासराव के वंशजों में से किसी एक को सौंप सकते हैं, ताकि उन्हें 1761 के युद्ध में हारे अपने पुरखों की हार का बदला लेने का एक मौका मिल सके। लेकिन आप युद्ध देखने जरूर आएं, ताकि उस युद्ध के परिणामों को देखकर आप अपना नजरिया बदल सकें। मुझे भरोसा है कि उस युद्ध के नतीजों से मुल्क में मौजूदा वैमनस्य और झगड़ों का अन्त जरूर हो जाएगा। निष्कर्षत: मैं यह गुजारिश करूंगा कि मेरे उन 700 आदमियों में, जिन्हें मैं लाऊंगा, एक भी अफगानी पठान नहीं होगा, जिनसे आप बेइंतहा खौफ खाते हैं। इस लिए मैं केवल शरियत के सख्त पाबन्द अच्छे परिवारों के भारतीय मुसलमानों का लेकर ही आऊंगा।’...(टाइम्स ऑफ इंडिया, 20 जून 1926)

खुली पोल

अंबेडकर हिन्दू-विरोधी फोबिया से ग्रस्त और मुसलमानों की डींगों से बुरी तरह प्रभावित थे। उनके लिए इससे ज्यादा और क्या दयनीय होगा कि उनकी खुद की जाति महार, जो पहले अछूत मानी जाती थी, एक मशहूर लड़ाका जाति है। यहां तक कि भारतीय सेना में तो महार रेजिमेंट तक है। केवल 2200 महार, जो मराठों की श्रेणी में ही आते हैं, आराम से मुसलमानों का गुरूर तोड़ सकते थे। लेकिन अंबेडकर ने ऐसा नहीं किया। बहु प्रचारित 1929 के मुस्लिम दंगे ऐसा ही एक और उदाहरण हैं। दंगों से पहले मुसलमानों ने डींग हांकी थी कि 29 हिन्दुओं पर एक अकेला मुसलमान ही भारी है, और वह भी एक आम भारतीय मुसलमान। एक पठान तो 100 हिन्दुओं के छक्के छुड़ा सकता है। और फिर हुआ क्या? दंगे हुए तो वे पठान ही थे, जो जान बचाते भाग रहे थे और दुहाई दे रहे थे कि दंगे फौरन थमें।

पानीपत की तीसरी लड़ाई का सच

जहां तक पानीपत के युद्ध का संबंध है, हरेक को यह तथ्य याद रहे कि युद्ध के केवल चार दिन बाद ही अहमद शाह अब्दाली ने पेशवा बालाजी बाजीराव को एक पत्र भेजा था, जिसमें मेल-मिलाप की बात कही गई थी। एक विजेता ऐसा क्यों लिखेगा? जवाब बहुत आसान है। उसे यह अच्छी तरह मालूम था कि मराठे बदला जरूर लेंगे और वे अपनी हार का मुंह तोड़ जवाब देने में पूर्णत: सक्षम हैं। लड़ाई के कुछ महीनों बाद ही बालाजी बाजीराव का निधन हो गया और जब उनके 16 वर्षीय बेटे माधवराव को पेशवाई सौंपी गई तो उसी अहमद शाह अब्दाली ने उनके पास सम्मानपत्र भेजा। उस पत्र के साथ बहुत सी बेशकीमती सौगातें भी भेजी गईं। अंबेडकर यह इतिहास बहुत आसानी से भूल गए। संभव है कि उन्होंने केवल अंगरेजों द्वारा लिखित इतिहास ही पढ़ा होगा। लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि पानीपत के युद्ध के बाद खुद अब्दाली ने मराठों की बहादुरी की प्रशंसा की थी और स्वीकार किया था कि यह युद्ध अभूतपूर्व था।

जरा देखिए तो मगरूरी!

सर सैयद अहमद, शायर हुसेन हाली और पत्रकार वहीवुद्दीन सलीम के लेखन में मगरूरी साफ-साफ देखी जा सकती है: हम हिन्दुस्तान आए और हमने इस मुल्क पर हुकूमत की। वहीउद्दीन सलीम अपनी एक कविता में कहते हैं: गरचे हममें मिलती-जुलती तेरी कौमियत न थी, तूने लेकिन अपनी आंखों पर लिया हमको बिठा, अपनी आंखों पर बिठाकर तूने इज्जत दी हमें। कवि अल्ताफ हुसेन अली का परिवार सैकड़ों साल भारत में रहा। लेकिन वह अभी भी उसी सुर को अलापे जा रहे हैं। सर सैयद अहमद पर भी यही बात लागू होती है। कुछेक मामलों में वे सही हो सकते हैं। लेकिन ज्यादातर मुसलमान धर्मांतरित हिन्दुओं की औलादें हैं। ऐसे अहमन्यताभरे विचार सभी मुसलमानों के क्यों और कैसे हो सकते हैं? सच तो यह है कि भारतीय मुसलमानों का उन विदेशी मुसलमानों से कुछ लेना-देना नहीं है, जो या तो खुद हमलावर थे, या जिन्होंने विदेशी मुसलमान शासकों के नुमाइंदे के तौर पर भारतीय क्षेत्रों पर हुकूमत की। उनमें केवल एक ही बात साझी है-‘इस्लाम’।

पागड़ी अपना खुद का अनुभव बताते हैं कि वह 1933 में निज़ाम की हुकूमत के दौरान भू-राजस्व सेवाओं में शामिल होने के लिए इम्तहान में बैठे थे। उनका साबका अबू तुरब नामक एक मुसलमान से पड़ा। पागड़ी की उत्तर पुस्तिका की नकल करके वह पास हो गया। कुछ साल बाद उन दोनों की कहीं फिर मुलाकात हो गई। अबू तुरब का तबादला मराठीभाषी क्षेत्र मराठवाड़ा में हो गया था। पागड़ी ने उससे कहा: ‘आप अपने इलाके के मसलों को बेहतर ढंग से समझने और रोजमर्रा की जिन्दगी को सहज बनाने के लिए थोड़ी मराठी सीख लें, ठीक वैसे ही जैसे कि मैंने उर्दू और फारसी सीख ली है।’ उसका जवाब था: ‘हम मुसलमानों को तुम्हारी जुबान सीखने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम्हीं लोगों को हमारी भाषा सीखने की ज़रूरत है।’ पागड़ी ने 1963 में लिखा: ‘अबू तरब की बातें इतनी ज्यादा मगरूरी भरी थीं कि मैं 30 साल बाद भी उन्हें भूल नहीं सका हँू। यह मुझे बेनहूर नामक फिल्म की याद दिला जाती है। बेनहूर यहूदी था। उसके बचपन के एक दोस्त का नाम मसाला था जोकि रोमन था। उसे फलस्तीन का गवर्नर बनाकर भेज दिया गया। मसाला का स्वागत करते हुए बेनहूर ने कहा: बहुत खुशी की बात है कि तुम गवर्नर बन गए हो। मैं तुम्हारा स्वागत इसलिए और ज्यादा करता हँू कि तुम यहूदियों को ज्यादा करीब से जानते हो। लेकिन मसाला का जवाब था: हम रोमनों के लिए यहूदियों को करीब से जानने की क्या ज़रूरत है? यह तो उनके लिए ज़रूरी है कि वे रोमनों को जानें और समझें। अबू तरब और मुसलमानों के दिलोदिमाग में यही मगरूरी गहरे तक बैठी हुई है।’

ईसाइयों का मुगालता

मजे की बात तो यह है कि भारतीय ईसाई भी इस मुगालते को पाले हुए हैं कि उन्होंने ब्रिटिश राज के दौरान डेढ़ सौ सालों तक भारत पर हुकूमत की, या कि उन्होंने गोवा पर चार शताब्दियों तक शासन किया।

गलती सुधार रहे

इस परिप्रेक्ष्य में तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ 1971 में बांग्लादेशियों के संघर्ष को देखे जाने की जरूरत है। पाकिस्तान में उर्दू और पंजाबियों के वर्चस्व के खिलाफ अपनी पहचान और मातृभाषा की रक्षा के लिए उठ खड़े हुए सिंधियों के संघर्ष को भी इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है। सिंध के मुसलमानों ने अब हिन्दू राजा दाहिर को अपना पूर्वज मानना और मुहम्मद बिन कासिम को एक हमलावर के रूप में मानकर उससे घृणा करनी शुरू कर दी है।

अंगरेजों का भ्रमजाल

अंगरेजों ने हिन्दुओं को भरमाने के लिए यह दुष्प्रचार बड़े पैमाने पर किया कि अगर वे भारत छोडक़र गए तो मुसलमान अतीत की भांति उनपर हुकूमत करना फिर शुरू कर देंगे। उन्होंने मुसलमानों को यह कहकर बहकाया कि हिन्दू अतीत के मुसलमानी शासन का बदला तुमसे चुकाएंगे। इस तरह उन्होंने एक तस्वीर साफ बना दी-मुसलमान यानी बहादुर और हिन्दू यानी डरपोक तथा व्यापारी हिन्दू जिन्हें सिर्फ पैसे बनाने से मतलब होता है और जिनकी कोई इज्जत नहीं। अंगरेजों द्वारा लिखे गए इतिहासों, उनकी जीवनियों, कहानियों की किताबों और उपन्यासों में इसे जगह-जगह देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए ‘मदर इंडिया’ और ‘वरडिक्ट ऑफ इंडिया’ पढक़र देखिए।

बंद हो भ्रम की अंधी गली

भ्रम की इस अंधी गली को खत्म होना चाहिए। मुसलमानों को खुद को भारतीय समाज का अविभाज्य अंग समझना चाहिए। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच विभाजन की दीवार ध्वस्त कर दी जानी चाहिए। फासले खत्म करने और दोनों को एक कतार में लाने का यह काम मुश्किल जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं। जो हिन्दुओं का इतिहास है, ठीक वही इतिहास भारत के मुसलमानों का भी है। यह सच हर समय ध्यान में रखा जाना चाहिए। इससे मुसलमानों में खुद को अलग समझने की भावना कम होगी। खेद है कि भारतीय सियासतदांओं की दिलचस्पी तो केवल मुसलमानों को नित नई रियायतों की रेबडिय़ां बांटने में है। यह बेहद जरूरी है कि भारतीय मुसलमानों को सही ढंग से शिक्षा दी जाए और ऐतिहासिक तथ्यों से उन्हें अवगत कराया जाए। जरूरत इस बात की भी है कि वे महाराणा प्रताप, शिवाजी और विजयनगर साम्राज्य के राजाओं पर गर्व करना सीखें। (समाप्त)

लेखक एलएन शीतल वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों राष्ट्रीय सहारा, देहरादून के संपादक हैं.