एक पुलिस अधिकारी के वक्तत्व पर समर्पित मेरा यह आलेख! हुआ यूं की मैंने एक मामले को लेकर पुलिस अधिकारी से कल बात की। उस अधिकारी ने अपने पद के रौब में आकर मुझे अर्दब देने के लिए कहा "काजू खान" मैं आपकी हिस्ट्री जानती हूं। पुलिस अधिकारी का यह कहना कितना जायज है, और उसके क्या मायने हैं। मैंने सच को हमेशा सच कहा है कभी कोई प्रशासनिक अधिकारी अगर गलत रहा है तो मैंने उसे गलत ही कहा है। मैं दिन को दिन ही कहूंगा, किसी के दबाव में रात नहीं कह सकता हूं। रही बात मेरी हिस्ट्री की तो इतना समझ लो, किसी ने बदतमीजी की तो मैंने उसे मुंह तोड़ जवाब दिया है, फिर चाहे पुलिस विभाग के सब इंस्पेक्टर ने मुझे गोली ही क्यों न मार दी हो।

मुझ पर लिखे गए मुकदमे, पुलिस की ढोंगी दरियादिली का नमूना है, मेरे ऊपर पुलिस इंस्पेक्टर ने मुकदमा दर्ज किया कि मैंने कोतवाली में घुसकर पुलिस वालों पर हमला किया! अब यह बात स्वत: स्पष्ट हो जाती है कि पुलिस कितनी कमजोर है, या फिर मक्कार! मुकदमों की संख्या बढ़ जाने से कोई अपराधी नहीं हो जाता है। सच बोलना और सच के लिए लड़ना मेरे लिए एक आंदोलन है। या आंदोलन मेरा जारी रहेगा।

मैं यह भी जानता हूं की पुलिस मेरी हिस्ट्री नहीं बल्कि मेरे ऊपर गोलियां भी चलवा सकती है, मुझे जेल भिजवा सकती है। तो क्या जेल जाने या फिर मौत से बचने के लिए जिंदगी छोड़ दूं। मेरे सच को सच समझो, इसे आंदोलन समझो, इसे इस युग की एकल क्रान्ति समझो। तुम घूसखोर, रिश्वतखोर, बे अंदाज हो, तुम्हें अंदाजा नहीं समय की गतिविधियों का! समयचक्र एक सा नहीं रहता, इसके बदलने का तुम्हें अंदाजा भी नहीं है। मुकदमें तो भगतसिंह, अशफाक उल्ला, राजगुरु पर भी ब्रिटिश हुकूमत ने लिखा था लेकिन भगत सिंह, अशफाक उल्ला, राजगुरु का उद्देश्य अत्याचारियों के विरुद्ध अपने आंदोलन का संदेश था। देश की आवाम को अत्याचारियों के विरुद्ध खड़ा करना था, हो सकता है कि ब्रिटिश हुकूमत के लिए वह अपराधी थे, लेकिन जिनकी आजादी के लिए लड़े और हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़े उनके लिए जननायक है।

मेरा इतिहास (हिस्ट्री) भी दूसरों की हक की लड़ाई लड़ने के लिए बना है। और इस इतिहास को और भी गंभीर बनना है, अभी तो यह अंगड़ाई है। जन आकांक्षाओं की अनदेखी करने वाले भ्रष्ट अफसरों और भ्रष्ट व्यवस्था के लिए मेरा आंदोलन जारी रहेगा। मेरे पत्रकार मित्र के ऑफिस में एक स्लोगन लिखा है
"मेरी कलम के पुर्जे सलामत हैं जब तक,
तब तक यह जंग जारी है,
जिस दिन स्याही कलम की खत्म हो जाए,
उस दिन मुझे जला देना"

ना मुकम्मल है अभी वर्दी पुलिस की हुजूर,
इनमें कुछ चूड़ियों का इजाफा होना चाहिए।

यह शेर जब कभी भी लिखा गया था उस वक्त शायर के दिमाग में पुलिस विभाग की बदली व्यवस्था की कल्पना भी नहीं होगी, लेकिन मौजूदा परिवेश में सब कुछ बदल गया है और भाषाई रुप से आज भी पिछड़ी हुई है पुलिस।

जय हिंद
जय भारत
आपका अपना
काजू खान (पत्रकार)
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संपर्क सूत्र - 08924999786