ईवीएम से छेड़छाड़ करने में हमें महारत हासिल है। लड़कियों पर फब्तियां कसने में महारत हासिल है। ट्रैफिक कानून की धज्जियां उड़ाने में महारत हासिल है। इश्क और मुश्क छिपाने में महारत हासिल है। दूरदर्शी को लगता है कि सब कुछ छिप सकता है पर ईवीएम का खेल नहीं छिप सकता। उसमें छेड़छाड़ का कारनामा नहीं छिप सकता। एमपी के भिंड में डमी ईवीएम का ट्रायल हुआ तो बड़ा राज खुल गया। बटन तो अलग-अलग दबे, पर निकलीं सिर्फ कमल की पर्चियां। चुनाव आयोग का भी जवाब नहीं। नौ अफसरों को नापकर छेड़छाड़ की पटकथा मिटा दी।

दूरदर्शी का मानना है कि छेड़छाड़ करना हमारा राष्ट्रीय स्वभाव है। यह आदत नहीं, एक ध्येय है। ईवीएम में छेड़छाड़ से जनादेश जुटाना ध्येय है। माया ने ईवीएम का खेल उजागर किया तो मंगरू चचा के दिल में हौल उठने लगा। अब उनके पेट में इस बात के लिए मरोड़ है कि ईवीएम सिर्फ कमल ही क्यों छापती है? अगर उसे भाजपा का निशान ही छापना है तो बटन बनाने की जरुरत क्या है? आंख दबाने से भी कमल छप सकता है। कपाल भाती से भी कमल छप सकता है। जुमलेबाजी से भी कमल छप सकता है।

दूरदर्शी को लगता है कि शासन और सत्ता, नैतिकता भरी बातों से नहीं, मक्कारी भरी चालों से चलती है। विपक्ष शोर मचा रहा है कि अगर हराना ही है तो बूथ कैप्चरिंग करके हराते। कम से कम पारदर्शिता तो रहती। सोशल मीडिया का शिगूफा यह है कि ईवीएम में छेड़छाड़ डिजिटल इंडिया की चुनाव-सुधारों को प्रमोट करने के लिए की गई है। पंत प्रधान के भक्तों को लगता है कि धार्मिक नगरी काशी में इन दिनों छेड़छाड़ बंद है। रोमांस और गोमांस बंद है। दूरदर्शी का मानना है कि बंद कुछ भी नहीं है। सिर्फ तरीके बदल गए हैं। छेड़छाड़ हाईटेक हो  गया है। रोमांस हाईटेक हो गया है। फेसबुकिया छेड़छाड़, ट्यूटरिया छेड़छाड़ और व्ह्वाट्सएपिया छेड़छाड़ शुरू हो गई है। इसमें भावनात्मक पुट नहीं तो क्या हुआ?  इसे तो राष्ट्रवाद से जगाया जा सकता है। जहां तक मांस के साथ रोमांस बंद होने की बात है तो नवरात्र में सांप केंचुल बदल रहा है। इन दिनों मनचलों को भोग में जोग और फकीरी में सारंगी भा रही है।

काशी लघु भारत है। काशी में सभी तीर्थों का समावेश है। काशी खुद में धरोहर है। काशी में मनचलों का भूत एंटी रोमियो अभियान से नहीं, उठक-बैठक कराने से नहीं, सरेराह मुर्गा बनाने से नहीं, देवी मंदिरों में शीश नवाने से उतारा जा सकता है। मां कामाख्या, चामुंडा (महिषासुर मर्दिनी), जगदंबिका, महालक्ष्मी, काली, ललिता, विंध्यवासिनी, महागौरी, मंगलागौरी, तारा और महामाया का ठौर काशी में है। नौ दुर्गा मंदिरों में शैलपुत्री (मढ़ियाघाट), ब्रह्मचारिणी (दुर्गाकुंड), चित्रघंटा (लक्खी चौतरा), कूष्मांडा (दुर्गाकुंड), स्कंदमाता (जैतपुरा), कात्यायिनी (सिंधियाघाट), कालरात्रि (कालिकागली), महागौरी (अन्नपूर्णा जी), सिद्धिदात्री (सिद्धमाता की गली) नवरात्र में अपार सुख बरसाती हैं। मुख निर्मालिका गौरी, ज्येष्ठा गौरी, विशालाक्षी गौरी, ललिता गौरी, भवानी गौरी, मंगला गौरी, महालक्ष्मी गौरी के अलावा ब्राह्मी, माहेरेश्वरी, एंद्री, बाराही, कौमारी, वैष्णवी, नरसिंघी, चर्चिका एवं विकटा काशी में विराजमान हैं। तारा देवी, काली देवी, कमला देवी, त्रिपुरा भैरवी, षोड़शी, मातृग्डी, बंगला देवी, शीतला को सौभाग्य सुख प्रदान करने वाली देवी बताया गया है। विशालाक्षी, ललिता, विश्वभुजा, बागाही, शिवदूती, वज्रस्ता, रौद्र, संपत्कारी, कौमारी, विरुपाक्षी, शैलेश्वरी, चित्रघंटा, चित्रग्रीवा, भद्रकाली, हरसिद्धी, विंध्यवासिनी, निगड़भंजिनी, घनटंकारी, अमृतेश्वरी, सिद्ध लक्ष्मी, कुब्जा, त्रिलोक सुंदरी, दीप्ता शक्तिपीठ, जगदंबिका, हयकंठी, कौर्मी शक्ति, वागेश्वरी, शिखी, भीमचंडी, क्षावगक्रेश्वरी, तालजेघेश्वरी, विकटानना, यमदंष्ट्रा, शुष्कोदरी, चर्ममुंडा, महारुण्डा, चामुंडा, स्वप्नेश्वरी, मंंदाकिनी, धुमावती देवी, दुर्गा देवी की आराधना से सभी पापों का नाश हो जाता है। दीगर बात है कि कुछ देवियों के पीठ विलुप्त हो चुके हैं। भक्तों को लगता है कि काशी में मनचले अपना राजपथ (माल, स्कूल-कालेज) छोड़कर इन दिनों मां के दरबार में चक्कर लगा रहे हैं। दुनियावी सिद्धांतों को छोड़ रहे हैं। जाहिर है कि सत्ता के लिए जब नेता ईवीएम से छेड़छाड़ करा सकते हैं तो मनचलों में फकीरी के कीटाणु आना क्या अचरज की बात नहीं है?

पुछल्ला---
मौजमस्ती के दीवानों ने  वेलेंटाइन डे की तर्ज पर मूर्ख दिवस मनाया। बनारस के आरपी घाट पर मूर्खों का मेला लगाया। दूरदर्शी को लगता है कि वेलेंटाइन डे को हमने विदेशों से तो आयात किया, लेकिन हम मूर्ख परंपरा का निर्यात नहीं कर पा रहे हैं। मूर्खता रहस्यवाद है। मूर्खता नशा है। मूर्खता कालीदास बनाता है। इसके लिए एटीएम, पेटीएम और आधार कार्ड की जरुरत नहीं पड़ती। काशी में मूर्ख बनने की परंपरा आजादी के बाद से ही शुरू हो गई थी। ईवीएम चाहे कमल छापे या हाथ। लोगबाग अपनी मूर्खता का रिन्युवल पांच साल में करा ही लेते हैं। निखालिस मूर्ख इसे अन्यथा नहीं लेता। बनारस में मूर्ख बनने-बनाने की पुरानी परंपरा में अब कल्ले फूटने लगे हैं। बनारस के मूर्ख मेले में कालीदासों की खूब जय-जयकार हुई। काशी के मूर्खाधिराजों ने रोमियो-जूलियट की शादी कराई और फिर तोड़वा दी। इसी बहाने बनारस के गाजी मियां की परंपरा इटली के राजघरानों तक पहुंचा दी...।

और अंत में...
आग थी कल, आज पानी हो गई,
ये जिंदगी कैसी सयानी हो गई।
मैं जिसे अपना समझता था कभी,
जाने किस-किस की कहानी हो गई।

लेखक विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं और जनसंदेश टाइम्स अखबार के संपादक हैं. वे 'इन दिनों' नामक उपरोक्त कालम 'दूरदर्शी' नाम से जनसंदेश टाइम्स में लिखते हैं.