क्या भारत का संविधान किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह दूसरे व्यक्ति पर अपना रोब झाड़ सके एवं दूसरे व्यक्ति कि हत्या भी कर सके। इसको बड़ी गम्भीरता से सोचना पड़ेगा। यह अत्यंत गम्भीर एवं संवेदनशील विषय है। इसपर चिंतन एवं मनन करने की अतिशीघ्र आवश्यक्ता है। यह हमारे देश की एकता और अखंडता पर बहुत बड़ा प्रश्न है। जिससे देश को क्षति हो रही है। मात्र कुछ व्यक्तियों की ऐसी मानसिकताओं से पूरा देश आहत है। ऐसी मानसिकताएँ क्या देश को विकास कि गति दे रहीं हैं। अथवा देश के विकास कि गति में सहायक हैं। सोचिए, समझिए। क्या कारण है। यह उग्रता, यह संविधान के साथ खिलवाड़, यह कानून एवं संविधान का अपमान, यह हमारी एकता को दूषित करने का प्रयास, क्या कारण है। क्या ऐसी मानसिकताओं पर शीघ्र अंकुश लगाने कि आवश्यक्ता है अथवा नहीं?......

कानून अपने हाँथों में लेकर किसी भी व्यक्ति को पीट पीटकर उसकी हत्या कर देना क्या सही है?... अथवा क्या न्याय यही कहता है।... गम्भीरता से सोचिए कि क्या किसी भी जाति अथवा धर्म विशेष को संविधान यह अधिकार प्रदान करता है कि वह मात्र शंका के आधार पर किसी भी व्यक्ति के प्राण ले ले। यह गम्भीर प्रश्न है। कहीं ऐसा तो नहीं कि अब संविधान को मात्र कागज के पन्नों पर ही सीमित करके देखा जा रहा हो। क्योंकि ऐसी मानसिकताएँ कैसे जन्म ले रही हैं। ऐसी मानसिकता अस्त्तिव में कैसे आ रही है। जिसका उग्र रूप उभरकर किसी भी व्यक्ति के ऊपर एक तांडव के रूप में टूटता हुआ दिखाई देता है। जिसका भुक्तिभोगी एक व्यक्ति होता है। जिसके प्राणों कि रक्षा तक नहीं हो पाती। जिसके परिणाम स्वरूप उसको अपने प्राणों को त्यागकर चुकानी पड़ती है।

अभी कुछ दिन पहले जब देश के सर्वश्रेष्ठ नेता एवं वर्तमान में शिखर पर विराजमान महान व्यक्ति ने ऐसी मानसिकताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाए थे तो बड़ा हो हल्ला हुआ था। कि चोला पहनकर कुछ गुंडे रोड पर तांडव करते हैं और नाम सेवक का रख लेते हैं। जिससे धर्म के आधार पर समाज में गलत संदेश जाता है। तब बड़ा उछ्ल कूद एवं हो हल्ला हुआ था। प्रंतु सत्य सदैव सत्य ही होता है।..... इतिहास में कभी भी अन्याय तर्कों के माध्यम से न्यायिक नहीं हो पाया। सत्यता सदैव रंग, रूप, एवं ढ़ंग के माध्यम से स्वंय उजागर हो जाती है। स्वयं ऐसे व्यक्तियों कि कार्य शैली उनकी मानसिकताओं का साक्ष्य प्रस्तुत कर देती है। जिसे स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता है।

ऐसी मानसिकताओं पर तुरंत अंकुश लगाने की आवश्यक्ता है। और ऐसे व्यक्तियों को समाज के प्रति उनके दयित्वों से अवगत कराने की अतिशीघ्र आवश्यक्ता है। जिससे देश को मजबूती एवं प्रबलता प्राप्त हो। जो देश के भविष्य को शशक्त एवं दृढ़ बना सके। जिससे हमारा देश विश्व के पटल पर तेजी से आगे बढ़सके। एकता ही मात्र ऐसा मंत्र है जिससे देश को गति प्रदान होती है।.......एकता भंग करके किसी भी देश को गति कदापि नहीं मिल सकती।

विश्व स्तर पर आज कई देशों की विक्राल समस्याएँ हमारे सामने हैं। जिससे हमें सीख एवं समझ लेना चाहिए। जहाँ पर एकता भंग हो गई है वहाँ अंतरद्वंद मचा हुआ है। जिससे वहाँ के परिणाम उस देश को क्षति पहुँचा रहे हैं। जिससे दूसरे देशों को लाभ मिलरहा है। जिसका फायदा अन्य दूसरे देश उठा रहे हैं। यह समझने, सोचने, एवं विवेक, की बात है। उदाहरणता जब दो भाई आपस में लड़ते हैं तब किसी बाहर के व्यक्ति को मध्यस्था करने का अवसर मिल जाता है। और वह व्यक्ति सर्व प्रथम अपना लाभ सिद्ध करने का प्रयास करता है। सत्यता यही है। धरातल पर ऐसी अनेकों स्थितियों को भलि भाँति देखा गया है।

गलती मानव से ही होती है तथा सुधार मानव का ही होता है। अन्यथा कृप्या करके देश एवं समाज के हित की सोचें और उस ओर अग्रसर हों जिससे देश एवं समाज का भला हो सके। क्योंकि दूषित मानसिकताओं से मात्र हानि ही होती है।

अत: बुद्धि जीवियों से मेरी प्रार्थना है कि आगे आएँ और समाज को जागरूप करने का भरसक प्रयास करें। तथा ऐसी समाज विरोधी मानसिकताओं को परिवर्तित करके पुन: समाज से उन्हें जोड़ने का अथक प्रयास करें। जिससे देश को क्षति न हो तथा देश आगे की ओर आसानी से तीव्रगति से बढ़ता रहे।  

एम०एच० बाबू
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