सुमंगल दीप त्रिवेदी

यूपी में सरकार बदलने के बाद से एक शब्द लगभग हर एक सख्श की जुबान पर आ रहा है, वह है ‘रोमियो’। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्कूली छात्राओं, बालिकाओं एवं युवतियों से आये दिन होने वाली बदसलूकी, छींटाकशी पर विराम लगाने के उद्देश्य एवं महिलाओं के प्रति बढ़ रही आपराधिक वारदातों पर विराम लगाने की मंशा से सूबे के नये मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने पुलिस विभाग को निर्देशित किया। फलस्वरूप, गठन हुआ ‘एंटी रोमियो स्क्वैड’।

इस एंटी रोमियो स्क्वैड का प्रमुख काम है बालिका विद्यालयों, सार्वजनिक स्थानों, पार्कों आदि जगहों पर युवतियों के साथ छेड़खानी करने वाले ‘मार्डन रोमियो’ को सबक सिखाना और साथ ही युवतियों को भी नैतिकता का पाठ पढ़ाना। जिस दिन से सीएम साहब ने एंटी रोमियो स्क्वैड को समाज सुधार का काम दिया, उस दिन से हर जिले, कस्बे से तमाम खबरें आनी शुरू हो गयीं। कई ‘रोमियो’ धरे गये तो कई युवतियों को भी नैतिकता का पाठ पढ़ाया गया। सूबे का शायद ही कोई जिला बचा हो, जहां ‘रोमियो’ पुलिस को मिले न हों।

लेकिन इन सबके बीच कई प्रश्न ऐसे भी सामने आते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना बहुत जरूरी है। सबसे पहला सवाल कि यह ‘रोमियो’ शब्द इन संस्कारहीन युवाओं के लिए आखिर क्यों प्रयोग किया जा रहा है क्योंकि ‘रोमियो’ प्रेम करता था न कि अश्लीलता। कभी किसी ने सुना कि रोमियो ने जूलियट को कभी सड़क पर छेड़ा हो या जूलियट रोमियो के साथ अश्लीलता में मग्न हो। जवाब इसका सिर्फ एक है, नहीं, कभी नहीं। अब कुछ लोग सोंचेंगे कि रोमियो के साथ जूलियट कहां से आ गयी? कौन है यह जूलियट?

आइये, सबसे पहले जानते हैं रोमियो-जूलियट के बारे में। महान लेखक और नाटककार विलिमय शेक्सपियर ने एक त्रासदी (ट्रैजिकल) नाटक लिखा था, रोमियो और जूलियट। उनके नाटक का नायक रोमियो मोटेंग था। रोमियो हाउस आॅफ कैपियलेट की ‘जूलियट’ से प्यार करता था और शादी कर लेता है। जूलियट के चचेरे भाई ‘टायबाल्ट’ की हत्या के बाद रोमियो ने जूलियट की मौत की झूठी गवाही पर आत्महत्या कर ली। एक आदर्शवादी प्रेमी के रूप में पर्याय बनने के लिए ‘रोमियो’ शब्द का विलियम शेक्सपियर ने नेतृत्व किया है। तो इसके अनुसार, रोमियो आधुनिक सड़कछाप, आवारा प्रेमियों की तरह नहीं था। रोमियो कोई दिलफेंक आशिक नहीं था, जो राह चलते किसी को भी छेड़ता। रोमियो ने प्रेम की अनूठी मिसाल पेश की। लेकिन दुर्भाग्य कि रोमियो इंग्लैण्ड से भारत आते-आते आवारा, सड़क छाप शोहदा बनकर रह गया।

अब आते हैं असली प्रश्न पर कि आखिरकार यूपी में इतने सड़कछाप, आवारा शोहदे अर्थात यूपी के रोमियो अचानक से पैदा कैसे हो गये? क्या इनका कोई शिक्षण संस्थान चल रहा है, जहां से यह अश्लीलता, आवारगर्दी, बदसलूकी, निर्लज्जता, शोहदापन जैसे तमाम विषयों की परीक्षाएं पास करके निकलते हैं। इन सबके जवाब तलाशने चलते हैं करीब तीन दशक पूर्व। तीन दशक पूर्व उत्तर प्रदेश में स्वकेन्द्र परीक्षा प्रणाली नाम की कोई चीज होती ही नहीं थी। उस वक्त शिक्षा एक व्यवसाय नहीं समाजसेवा थी। शिक्षक अपने छात्रों के बौद्धिक उत्थान के साथ ही नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक सम्बन्धों की भी शिक्षा देते थे। तब यदि कोई छात्र गलती करता था तो शिक्षक उसे दण्ड देते थे। स्कूल से जब छात्र वापस जाता था तो कभी-कभार शिक्षक भी शाम तक घर आकर अभिभावक से उसके पाल्य की उद्दण्डता व स्वयं द्वारा दिये गये दण्ड से अवगत कराते थे। शिक्षक इसलिए ऐसा नहीं करते थे कि उनकी छात्र से कोई दुश्मनी है। बल्कि इसलिए ताकि अपने पाल्य के भविष्य को लेकर अभिभावक भी सतर्क हो जायें। मुझे आज भी याद आता है कि बचपन में अगर कोई गलती करता था तो सोंचता था कि कहीं घर पर न पता चल जाये।

आजकल छात्र अपने शिक्षकों को न सिर्फ अपशब्द सुनाते हैं, बल्कि विद्यालय प्रांगण के बाहर मिलने की धमकी तक दे डालते हैं। दिनोंदिन कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ते स्कूलों ने शिक्षा के स्तर को निम्नतम कर डाला है। तृतीय श्रेणी में स्नातक उत्तीर्ण विद्यार्थी, जब शिक्षक बनकर नौनिहालों को विद्याध्ययन कराते हैं, तो आसानी से सोंचा जा सकता है कि संकीर्ण विचारधारा नौनिहालों को उत्कृष्ट शिक्षा, नैतिकता एवं संस्कार कैसे दे पायेगी? आज प्राइवेट विद्यालयों की बाढ़ तो आ गयी, लेकिन शिक्षा का सर्वोच्च मापदण्ड खो गया। स्वकेन्द्र परीक्षा प्रणाली का सीधा तात्पर्य है कि जिस विद्यालय में छात्र अध्ययन कर रहा है, उसी में परीक्षा दे। एक कहावत है कि अपने घर में हर कोई शेर होता है। शिक्षक परीक्षा दौरान ब्लैक बोर्ड पर लिखकर, बोलकर और नकल सामग्री मुहैया कराकर अपने विद्यालय के बच्चों को मेरिट में अधिक से अधिक प्रतिशत दिलाने का कुत्सित कार्य करते हैं। अभिभावकों को भी सिर्फ अपने पाल्यों के अधिक प्रतिशत से मतलब रहता है।

खास बात तो यह है कि यदि कोई अध्यापक छात्र को दण्डित करता है तो अभिभावक शिक्षक और विद्यालय प्रबंधन पर ही उंगली उठाता है। ऐसे में अध्यापक भी सोंचते हैं कि हमको क्या लेना-देना? बस यही भाव, छात्रों को और अधिक निरंकुश करता है। पाश्चात्य सभ्यता में दिनोंदिन रंगती जा रही भारतीय सभ्यता इस गिरते शिक्षा स्तर और संस्कारों के कारण ‘रोमियो’ पैदा करने जुटी है। सूबा सरकार द्वारा एण्टी रोमियो स्क्वैड भले ही खुलेआम समाज में व्याप्त अश्लीलता पर कुछ विराम लगा सके। लेकिन सरकार को इन प्राइवेट स्कूलों पर नकेल भी कसनी होगी।

मानकविहीन होने के बावजूद मान्यता देने का यह खेल अब बंद होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह ऐसे तमाम विद्यालयों को चिन्हित कर न सिर्फ उन पर विधिक कार्रवाई करे। बल्कि इस बात पर भी विशेष ध्यान दे कि भविष्य में किसी भी अन्य नाम, संस्था अथवा क्षेत्र में ऐसे विद्यालय दोबारा चालू न हो सकें। जिस दिन प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था सुधर जायेगी, तय है कि उस दिन सरकार को इस एण्टी रोमियो स्क्वैड की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

Sumangal Deep
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