साथियों,
मैं उन मीडियाकर्मियों से नहीं कह रहा हूं जो अपना जमीर बेचकर दलाली कर बड़ा पत्रकार होने का दंभ भरते घूम रहे हैं। मैं उन कर्मियों से भी नहीं कह रहा हूं जो लालची, निर्लज्ज, बेशर्म और कायर हैं। मैं उन कर्मियों से भी नहीं कह रहा हूं जो कुछ पाने के लिए कुछ भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं। मैं कह रहा हूं उन कर्त्तव्यनिष्ठ, साहसी, खुद्दार और देशभक्त मीडियाकर्मियों से जिन्होंने अपनी परेशानी भूलकर हमारे दूसरे अन्य साथियों के हक में अपनी आवाज बुलंद की।

इलोक्ट्रिनिक मीडिया जो हो रहा है सो हो रहा है पर प्रिंट मीडिया में जो साथी प्रबंधन के उत्पीड़न के खिलाफ और मजीठिया वेजबोर्ड की मांग को लेकर संघर्षरत हैं, वे निश्चित रूप से बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं। हमें किसी भी हालत में यह सिद्धांत व उसूलों की लड़ाई जीतनी है। निश्चित रूप से देश के बड़े वकील सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में अवमानना का केस लड़ रहे हैं और हम जीतेंगे भी पर यह लड़ाई हमें कोर्ट के साथ ही सड़कों पर भी लड़नी पड़ेगी। जब तक अखबारों के गेट पर धरना-प्रदर्शन नहीं होगा तब तक अखबार मालिकों व संपादकों के कानों पर जूं नहीं रेगेगी। इसलिए मेरा मानना है कि हम लोग फाइट फॉर राइट के बैनर तले बड़ा आंदोलन छेड़ें। फाइट फॉर राइट का गठन राष्ट्रीय स्तर पर हो चुका है।

जब हम लोग इस बैनर तले किसान-मजदूरों व अन्य तबकों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं तो फिर अपनी क्यों नहीं ? रांची में हमारे साथी 10 मार्च से धरना देने जा रहे हैं। उन साथियों से मेरा कहना है कि आप लोग फाइट फॉर राइट का बैनर लगाकर आंदोलन को गति दें। रांची में जिस तरह से हमारे साथियों ने प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोला है वह सराहनीय है। इस तरह से अन्य शहरों में भी मोर्चा खोला जाए। अब समय आ गया है कि सभी साथी मिलकर इस लड़ाई को लड़ें और अंजाम तक पहुंचाएं। यदि हम लोगों ने मिलकर मीडियाकर्मियों की हक की इस लड़ाई को लड़ लिया तो निश्चित रूप से हम लोग अपना हक पा लेंगे। साथ ही मालिकान और प्रबंधन मीडियाकर्मियों का शोषण व उत्पीड़न करने की जुर्ररत नहीं कर पाएगा।

यह लड़ाई इसलिए भी जीतनी जरूरी है कि मीडिया से जनता को बहुत अपेक्षाएं हैं। इसलिए मीडिया में सकारात्मक सोच रखने वाले लोगों का होना बहुत जरूरी है। गंदे लोगों का खेल हर हाल में खत्म करना होगा। भले ही आज की तारीख में कुछ गंदे लोगों ने मीडिया का स्तर गिरा दिया हो पर देश को आजाद कराने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है। अधिकतर स्वतंत्रता सेनानी अखबारों से संबंधित थे। दिन में सड़कों पर आजादी की लड़ाई लड़ते थे तो रात में अखबार निकालते थे।

प्रख्यात क्रांतिकारी व नेता गणेश शंकर विद्यार्थी के 'प्रतापÓ नामक अखबार में कई क्रांतिकारियों ने काम किया। सरदार भगत सिंह ने लंबे समय तक इस अखबार में संपादन किया। ऐसे कितने अखबार थे जो युवाओं में आजादी की लड़ाई लड़ने का जज्बा भर रहे थे। अंग्रेजों के दमन की दास्तां लिख रहे थे। अधिकतर क्रांतिकारी पत्रकार, कवि व लेखक थे। यह था सकारात्मक मीडिया, पर आज के दौर के मीडिया की बात करें तो मालिकों, संपादकों व पत्रकारों के गैर जिम्मेदाराना रवैये से मीडिया पूंजपीतियों, नेताओं व प्रभावशाली लोगों की रखैल बनकर रह गया है। हां कुछ रवीश कुमार, प्रसून वाजपेई जैसे कुछ पत्रकार हैं जो पत्रिकारिता की इज्जत बचाए हुए हैं।

बड़े-बड़े सपनों के साथ युवा इस पेशे में आते हैं और मीडिया पर काबिज लोग इन्हें दलाल बना देते हैं। जो नहीं बनता है तो उसे बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। मीडिया में कितने मामले महिलाओं के साथ यौन शोषण के आ रहे हैं। उत्पीड़न के आ रहे हैं। दमन के आ रहे हैं। यह हाल उस मीडिया का है। जिसे समाज का आइना कहा जाता है। वैसे तो इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया दोनों की हालत एक ही जैसी है पर जब से प्रिंट मीडिया में सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन देने का आदेश दिया है तब से अखबारों व पत्रिकाओं में दमन का खेल बड़े स्तर पर खेला जा रहा है।

दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला समेत बड़ी संख्या में अखबार और पत्रिकाएं किसी भी तरह से मीडियाकर्मियों को डरा-धमकाकर शांत कराने चाहते हैं। जो मीडियाकर्मी साहस करके सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन मांग रहे हैं। क्लेम कर रहे हैं उन्हें या दूरदराज जगहों पर स्थानांतरित कर दिया जा रहा है या फिर बर्खास्त कर दिया जा रहा है। मीडियाकर्मियों के साथ प्रबंधन की बददमीजी करने की बातें सामने आ रही हैं। इन सबके बीच मैं मैं यह कहना चाहूंगा कि इन सबके बावजूद बड़ी संख्या में बेगैरत, लालची, कायर, स्वार्थी और अवरसादी टाइप के मीडियाकर्मी आंदोलन में नकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं।

अखबारों में बड़ी बातें लिखने वाले पत्रकार प्रबंधन के सामने दुम हिलाते देखे जा रहे हैं। दुनिया के सामने अन्याय का विरोध जताने वाले पत्रकार अपने संस्थानों में न केवल अन्याय बल्कि उत्पीड़न होते देख रहे हैं। यह कैसी पत्रकारिता है ? खबरें भी प्रायोजित लिखी जा रही हैं। अधिकतर अखबार किसी न किसी पार्टी के मुखपत्र बने हुए हैं। मीडिया के व्यावसायीकरण ने स्वाभिमानी, खुद्दार और ईमानदार मीडियाकर्मियों का तो नुकसान किया ही है साथ ही इससे देश व समाज का भी बहुत नुकसान हो रहा है। मीडिया को देश का प्रहरी बताया जाता है। जब मीडियाकर्मी अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं तो अन्य बेसहाय, जरूरतमंद व कमजोर लोगों की क्या खाक लड़ेंगे ?

चरण सिंह राजपूत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
फाइट फॉर राइट
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